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    मैं सत्यकाशी से कल्कि

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  • अनन्त ब्रह्माण्ड के अनगिनत सौर मण्डल में से एक

    इस सौरमण्डल के आकार में पाँचवें सबसे बड़े ग्रह पृथ्वी

    के मानवों को पूर्ण एवं सत्य-शिव-सुन्दर

    बनाने हेतु विचारार्थ

    अन्तिम अवतार - कल्कि महाअवतार

    द्वारा समर्पित
     

     

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  • विषय-सूची

    भूमिका
    01. आत्मा और विश्वात्मा
          सांख्य दर्शन
          धर्म विज्ञान (स्वामी विवेकानन्द)
          आत्मा और विश्वात्मा
                    रज मन
                    तम मन
                    सत्व मन
                           अ. निवृत्ति मार्गी
                           ब. प्रवृत्ति मार्गी
                    अवतारी मन
           मानव और पूर्ण मानव
           विकासवाद और अवतारवाद
    02. शास्त्र और धर्मशास्त्र
           ”सम्पूर्ण मानक“ का विकास भारतीय आध्यात्म-दर्शन का मूल और अन्तिम लक्ष्य
           लेखक/शास्त्राकार, शास्त्र और महर्षि वेदव्यास
           लेखकों के आदि पुरूष प्रतीक व्यास
           महर्षि वेदव्यास शास्त्र लेखन कला
           युगानुसार धर्म, प्रवर्तक और धर्मशास्त्र
           व्यष्टि और समष्टि धर्मशास्त्र
    03. मनु और कल्कि अवतार
           मनु और मनवन्तर
           कल्कि अवतार
           कल्कि अवतार, महाअवतार क्यों?
    04. ईश्वर, अवतार और पुनर्जन्म
          ईश्वर और ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास
          अवतार और पुनर्जन्म
          ईश्वर के अवतार
          ब्रह्मा के अवतार
          विष्णु के अवतार
          शंकर के अवतार
          अदृश्य काल में विश्वात्मा का प्रथम जन्म - योगेश्वर श्री कृष्ण
          दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का पहला भाग - स्वामी विवेकानन्द
          दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का अन्तिम भाग - भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
          बुड्ढा कृष्ण - कृष्ण का भाग दो और अन्तिम
    05. काशी
          काशी का अर्थ
          ज्योतिर्लिंग: अर्थ और द्वादस (12) ज्योतिर्लिंग
          ज्योतिर्लिंगों का स्थान
          तीसरी आँख (Third Eye)
          योगेश्वर (ज्ञान का विश्वरूप) और भोगेश्वर (कर्मज्ञान का विश्वरूप)
          मोक्षदायिनी काशी और जीवनदायिनी सत्यकाशी: प्रतीक चिन्ह व अर्थ
          मोक्षदायिनी काशी
                  मोक्षदायिनी काशी: पंचम, प्रथम एवं सप्तम काशी
                  मोक्षदायिनी काशी: वाराणसी
                  विश्वेश्वर (योगेश्वरनाथ): प्रथम ज्योतिर्लिंग क्यों?
          जीवनदायिनी सत्यकाशी
                  जीवनदायिनी सत्यकाशी - पंचम, अन्तिम और सप्तम काशी
                  जीवनदायिनी सत्यकाशी: वाराणसी-विन्ध्याचल-शिवद्वार-सोनभद्र के बीच का क्षेत्र
                  भोगेश्वरनाथ: 13वाँ और अन्तिम ज्योतिर्लिंग क्यों?
    06. धर्म शास्त्र कथन
                  सनातन / हिन्दू शास्त्र व मान्यता के अनुसार
                          अ. वेद व पुराण के अनुसार
                          ब. महर्षिदयानन्द के अनुसार
                          स. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार
                          द. नाड़ी ताड़ पत्ते ;छंकप च्ंसउ स्मंअमेद्ध के अनुसार
                          य. अन्य के अनुसार
                  बौद्ध धर्म के अनुसार
                  यहूदी शास्त्र के अनुसार
                  ईसाई शास्त्र के अनुसार
                  इस्लाम शास्त्र के अनुसार
                  सिक्ख धर्म के अनुसार
                  मायां कैलण्डर के अनुसार
    07. भविष्यक्ता कथन
                  प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस के अनुसार
                  ज्योतिषि श्री बेजन दारूवाला के अनुसार
                  पुस्तक - ”अमर भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
                  पुस्तक - ”विश्व की आश्चर्यजनक भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
                  पुस्तक - ”दुर्लभ भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
                  अन्य भविष्यवक्ताओं के अनुसार
    08. सत्य एकीकरण
                 ये घटना क्रम क्या बता रहा है?
                श्रीकृष्ण व महाभारत काल
                श्री राम कृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानन्द काल
                पूर्व स्वतन्त्र भारत काल
                स्वतन्त्र भारत काल में नेतृत्वकर्ताओं के विचार
                वर्तमान समय - इतिहास लौट चुका है
                शास्त्रार्थ, शास्त्र पर होता है, शास्त्राकार से और पर नहीं
                एक ही मानव शरीर के जीवन, ज्ञान और कर्म के विभिन्न विषय क्षेत्र से मुख्य नाम
                आध्यात्मिक सत्य एवं दार्शनिक आधार पर अन्तिम दृष्टि
                परिचालन प्रणाली (Operating System)
                भारतीय संविधान
                भारतीय संसद
                भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
                भारतीय शिक्षा प्रणाली
                भारतीय विपणन प्रणाली
                भारतीय मीडिया (चैथा स्तम्भ - पत्रकारिता)
                सहस्त्राब्दि विश्व शान्ति सम्मेलन
                एक भारत - श्रेष्ठ भारत के निर्माण के लिए आवश्यक कार्य
                क्या नई घटना घटित हुई थी 21 दिसम्बर, 2012 को?
    09. सत्य शास्त्र: समष्टि शास्त्र
                विश्वशास्त्र
                शास्त्रकार श्री लव कुश सिंह विश्वमानव (16 अक्टुबर 1967 - .................)
                रचना क्यों?
                आविष्कार किस प्रकार हुआ?
                उपयोगिता क्या है?
                बाद का मनुष्य, समाज और शासन
                कितना छोटा और कितना बड़ा?
                एक ही शास्त्र-साहित्य के विभिन्न नाम
                विश्वव्यापी स्थापना का स्पष्ट मार्ग
                सम्बन्धित स्थान?
                उत्पन्न नयी प्रणाली और व्यापार
                विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार
    10. सत्य वार्ता
                विश्वमानव से वार्ता - 1
                विश्वमानव से वार्ता - 2
                विश्वमानव से वार्ता - 3

    11. सत्य वक्तव्य
                विश्व शान्ति के लिए मन का मानकीकरण केवल शब्द नहीं बल्कि उसके मानक का निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है।
                मैं भारत और अमेरिका के हताश होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ
                रचनात्मक पत्रकारिता - पत्रकारिता का सत्य-रूप
                21 दिसम्बर, 2012 को सर्वनाश नहीं बल्कि पाँचवें युग - स्वर्ण युग और सत्यकाशी तीर्थ प्रकट हुआ है
                मेरे विश्व शान्ति के कार्य हेतु बनाये गये पाँच ट्रस्ट मानवता के लिए सत्य-कार्य एवं दान के लिए सुयोग्य पात्र
    12. सत्य अर्थ
    13. सत्य सुर
               ब्लैक होल और आत्मा
              श्रीमदभवद्गीता की शक्ति सीमा तथा कर्मवेद: पंचमवेद समाहित विश्वशास्त्र के प्रारम्भ का आधार
              कालभैरव कथा : यथार्थ दृष्टि
              गीता नहीं बल्कि कर्मवेद: पंचमवेद समाहित विश्वशास्त्र राष्ट्रीय-वैश्विक शास्त्र-साहित्य है।
              मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा
              लक्ष्य - गणराज्यों का संघ - देश और देशों का संघ - विश्व राष्ट्र
              स्वच्छ मन - स्वच्छ भारत - स्वस्थ भारत के लिए कल्कि महाअवतार के नौ रत्न
              मैं-विश्वात्मा ने भारतीय संविधान की धारा-51 (ए): नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य अनुसार अपना धर्म कत्र्तव्य निभाया
    14. सत्य दिशा-बोध
              ईश्वर, अवतार और मानव की शक्ति सीमा
              क्यों असम्भव था व्यक्ति, संत-महात्माओं-धर्माचार्यो, राजनेताओं और विद्वानों द्वारा यह अन्तिम कार्य?
              ”सम्पूर्ण मानक“ के विश्वव्यापी स्थापना का स्पष्ट मार्ग
              नागरिकों को आह्वान
              विचारकों को आह्वान
              शिक्षण क्षेत्र से जुड़े आचार्यो को आह्वान
              प्रबंध शिक्षा क्षेत्र को आह्वान
              शिक्षा पाठ्यक्रम निर्माता को आह्वान
              पत्रकारिता को आह्वान
              मानकीकरण संगठन और औद्योगिक जगत को आह्वान
              फिल्म निर्माण उद्योग को आह्वान
              धर्म क्षेत्र को आह्वान
              राजनीतिक दलों को आह्वान
              सरकार / शासन को आह्वान
              संसद को आह्वान
              सर्वोच्च न्यायालय को आह्वान
              क्या है जनहित याचिका (PIL-Public Interest Litigation)
                       जनहित याचिका - 01. पूर्ण शिक्षा का अधिकार
                       जनहित याचिका - 02. राष्ट्रीय शास्त्र
                       जनहित याचिका - 03. नागरिक मन निर्माण का मानक
                       जनहित याचिका - 04. सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त
                       जनहित याचिका - 05. गणराज्य का सत्य रूप
    15. सत्य आमंत्रण
                पाँचवें युग - स्वर्णयुग के तीर्थ सत्यकाशी क्षेत्र में प्रवेश का आमंत्रण
                पाँचवें युग - स्वर्णयुग में प्रवेश का आमंत्रण
    16. सत्य सन्देश
               अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार का काशी-सत्यकाशी क्षेत्र से विश्वशान्ति का अन्तिम सत्य-सन्देश
    17. सत्य चुनौति
               अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का मानवों के नाम खुला चुनौति पत्र
    18. सत्य प्रवाह
               जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो
               समय प्रवाह/आत्मीय बल

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  •  भूमिका

    वर्तमान समय मंे भारत को पुनः और अन्तिम कार्य से युक्त ऐसे महापुरूष की आवश्यकता थी जो न तो राज्य क्षेत्र का हो, न ही धर्म क्षेत्र का। कारण दोनों क्षेत्र के व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमता का सर्वोच्च और अन्तिम प्रदर्शन कर चुके हैं जिसमंे सत्य को यथारूप आविष्कृत कर प्रस्तुत करने, उसे भारतभूमि से प्रसारित करने, अद्धैत वेदान्त को अपने ज्ञान बुद्धि से स्थापित करने, दर्शनांे के स्तर को व्यक्त करने, धार्मिक विचारों को विस्तृत विश्वव्यापक और असीम करने, मानव जाति का आध्यात्मिकरण करने, धर्म को यथार्थ कर सम्पूर्ण मानव जीवन में प्रवेश कराने, आध्यात्मिक स्वतन्त्रता अर्थात मुक्ति का मार्ग दिखाने, सभी धर्मो से समन्वय करने, मानव को सभी धर्मशास्त्रों से उपर उठाने, दृश्य कार्य-कारणवाद को व्यक्त करने, आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ लाने, वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान को प्रस्तुत करने और उसे घरेलू जीवन में परिणत करने, भारत के आमूल परिर्वतन के सूत्र प्रस्तुत करने, युवकों को गम्भीर बनाने, आत्मशक्ति से पुनरूत्थान करने, प्रचण्ड रजस की भावना से ओत-प्रोत और प्राणों तक की चिन्ता न करने वाले और सत्य आधारित राजनीति करने की संयुक्त शक्ति से युक्त होकर व्यक्त हो और कहे कि जिस प्रकार मैं भारत का हूँ उसी प्रकार मैं समग्र जगत का भी हूँ। 

    उपरोक्त समस्त कार्याे से युक्त हमारी तरह ही भौतिक शरीर से युक्त विश्व धर्म, सार्वभौम धर्म, एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म, एकात्म ध्यान, कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद (धर्मयुक्त शास्त्र) अर्थात विश्वमानक शून्य श्रंृखला-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक (धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव शास्त्र), सत्य मानक शिक्षा, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी -WCM-TLM-SHYAM.C, भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel), विकास दर्शन, विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम, 21वीं शदी का कार्यक्रम और पूर्ण शिक्षा प्रणाली, विवाद मुक्त तन्त्रों पर आधारित संविधान, निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम से युक्त भगवान विष्णु के मुख्य अवतारों में दसवाँ-अन्तिम और कुल 24 अवतारों में चैबीसवाँ-अन्तिम निष्कलंक कल्कि और भगवान शंकर के बाइसवें-अन्तिम भोगेश्वर अवतार के संयुक्त पूर्णावतार श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ (स्वामी विवेकानन्द की अगली एवं पूर्ण ब्रह्म की अन्तिम कड़ी), स्व प्रकाशित व सार्वभौम गुण से युक्त 8वें सांवर्णि मनु, काल को परिभाषित करने के कारण काल रूप, युग को परिभाषित व परिवर्तन के कारण युग परिवर्तक, शास्त्र रचना के कारण व्यास के रूप मंे व्यक्त हैं जो स्वामी विवेकानन्द के अधूरे कार्य स्वतन्त्र भारत की सत्य व्यवस्था को पूर्ण रूप से पूर्ण करते हुये भारत के इतिहास की पुनरावृत्ति है जिस पर सदैव भारतीयों को गर्व रहेगा। उस अनिर्वचनीय, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, मुक्त एवं बद्ध विश्वात्मा के भारत में व्यक्त होने की प्रतीक्षा भारतवासियांे को रही है। जिसमंे सभी धर्म, सर्वाेच्च ज्ञान, सर्वाेच्च कर्म, सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त इत्यादि सम्पूर्ण सार्वजनिक प्रमाणित व्यक्त दृश्य रूप से मोतियांे की भँाति गूथंे हुये हंै। 

    इस प्रकार भारत अपने शारीरिक स्वतन्त्रता व संविधान के लागू होने के उपरान्त वर्तमान समय में जिस कत्र्तव्य और दायित्व का बोध कर रहा है। भारतीय संसद अर्थात विश्वमन संसद जिस सार्वभौम सत्य या सार्वजनिक सत्य की खोज करने के लिए लोकतन्त्र के रूप में व्यक्त हुआ है। जिससे स्वस्थ लोकतंत्र, स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग और पूर्ण मानव की प्राप्ति हो सकती है, उस ज्ञान से युक्त विश्वात्मा श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ वैश्विक व राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के सर्वाेच्च और अन्तिम प्रतीक के रूप मंे व्यक्त हंै।

    निःशब्द, आश्चर्य, चमत्कार, अविश्वसनीय, प्रकाशमय इत्यादि ऐसे ही शब्द विश्वशास्त्र और शास्त्राकार के लिए व्यक्त हो सकते हैं। विश्व के हजारों विश्वविद्यालय जिस पूर्ण सकारात्मक, रचनात्मक एवम् एकीकरण के विश्वस्तरीय शोध को न कर पाये, वह एक ही व्यक्ति ने पूर्ण कर दिखाया हो उसे कैसे-कैसे शब्दों से व्यक्त किया जाये, यह सोच पाना और उसे व्यक्त कर पाना निःशब्द होने के सिवाय कुछ नहीं है। एका-एक विश्वशास्त्र प्रस्तुत कर दिया जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है।

    जो व्यक्ति कभी किसी वर्तमान गुरू के शरणागत होने की आवश्यकता न समझा, जिसका कोई शरीरधारी प्रेरणा स्रोत न हो, किसी धार्मिक व राजनीतिक समूह का सदस्य न हो, इस कार्य से सम्बन्धित कभी सार्वजनिक रूप से समाज में व्यक्त न हुआ हो, जिस विषय का आविष्कार किया गया, वह उसके जीवन का शैक्षणिक विषय न रहा हो, 50 वर्ष के अपने वर्तमान अवस्था तक एक साथ कभी भी 50 लोगों से भी न मिला हो, यहाँ तक कि उसको इस रूप में 50 आदमी भी न जानते हों, यदि जानते भी हो तो पहचानते न हों और जो पहचानते हों वे इस रूप को जानते न हों, वह अचानक इस विश्वशास्त्र को प्रस्तुत कर दें तो इससे बडा चमत्कार क्या हो सकता है। जिस व्यक्ति का जीवन, शैक्षणिक योग्यता और कर्मरूप यह शास्त्र तीनों का कोई सम्बन्ध न हो अर्थात तीनों, तीन व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हों, इससे बड़ी अविश्वसनीय स्थिति क्या हो सकती है।

    विश्वशास्त्र में जन्म-जीवन-पुनर्जन्म-अवतार-साकार ईश्वर-निराकार ईश्वर, अदृश्य और दृश्य ईश्वर नाम, मानसिक मृत्यु व जन्म, भूत-वर्तमान-भविष्य, शिक्षा व पूर्ण शिक्षा, संविधान व विश्व संविधान, ग्राम सरकार व विश्व सरकार, विश्व शान्ति व एकता, स्थिरता व व्यापार, विचारधारा व क्रियाकलाप, त्याग और भोग, राधा और धारा, प्रकृति और अहंकार, कत्र्तव्य और अधिकार, राजनीति व विश्व राजनीति, व्यक्ति और वैश्विक व्यक्ति, मानवतावाद व एकात्मकर्मवाद, नायक-शास्त्राकार- आत्मकथा, महाभारत और विश्वभारत, जाति और समाजनीति, मन और मन का विश्वमानक, मानव और पूर्ण मानव एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, आॅकड़ा व सूचना और विश्लेषण, शास्त्र और पुराण इत्यादि अनेकांे विषय इस प्रकार घुले हुये हैं जिन्हें अलग कर पाना कठिन कार्य है और इससे बड़ा प्रकाशमय शास्त्र क्या हो सकता है। जिसमें एक ही शास्त्र द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान स्वप्रेरित होकर प्राप्त किया जा सके। इस व्यस्त जीवन में कम समय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का इससे सर्वोच्च शास्त्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस शास्त्र के अध्ययन से यह अनुभव होता हे कि वर्तमान तक के उपलब्ध धर्मशास्त्र कितने सीमित व अल्प ज्ञान देने वाले हैं परन्तु वे इस शास्त्र तक पहुँचने के लिए एक चरण के पूर्ण योग्य हैं और सदैव रहेगें। 

    एक ही विश्वशास्त्र द्वारा पृथ्वी के मनुष्यों के अनन्त मानसिक समस्याओं का हल जिस प्रकार प्राप्त हुआ है उसका सही मूल्यांकन सिर्फ यह है कि यह विश्व के पुनर्जन्म का अध्याय और युग परिवर्तन का सिद्धान्त है जिससे यह विश्व एक सत्य विचारधारा पर आधारित होकर एकीकृत शक्ति से मनुष्य के अनन्त विकास के लिए मार्ग खोलता है और यह विश्व अनन्त पथ पर चलने के लिए नया जीवन ग्रहण करता है। विश्वशास्त्र अध्ययन के उपरान्त ऐसा अनुभव होता है कि इसमें जो कुछ भी है वह तो पहले से ही है बस उसे संगठित रूप दिया गया है और एक नई दृष्टि दी गई है जिससे सभी को सब कुछ समझने की दृष्टि प्राप्त होती है। युग परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन या सत्यीकरण के विश्वशास्त्र में पाँच संख्या का महत्वपूर्ण योगदान है जैसे 5 अध्याय, 5 भाग, 5 उपभाग, 5 लेख, 5 विश्वमानक की श्रृंखला, 5वां वेद, 5 जनहित याचिका इत्यादि, जो हिन्दू धर्म के अनुसार महादेव शिवशंकर के दिव्य पंचमुखी रूप से भी सम्बन्धित है और यह ज्ञान उन्हीं का माना जाता है। इस को तीसरे नेत्र की दृष्टि कह सकते हैं और इस घटना को तीसरे नेत्र का खुलना। हमारे सौरमण्डल के 5वें सबसे बड़े ग्रह पृथ्वी के लिए यह एक आश्चर्यजनक घटना भी है। 5वें युग - स्वर्णयुग में प्रवेश के लिए यह ज्ञानरूपी 5वां सूर्य भी है जिसमें अनन्त प्रकाश है। विश्वशास्त्र में नामों का अपने सत्य अर्थ में प्रयोग और योग-माया का आद्वितीय प्रयोग है और उसकी समझ अनेक दिशाओं से उसके अगली कड़ी के रूप में है। साथ ही एक शब्द भी आलोचना या विरोध का नहीं है। सिर्फ समन्वय, स्पष्टीकरण, रचनात्मकता व एकात्मकर्मवाद का दिशा बोध है और सम्पूर्ण कार्य का अधिकतम कार्य व रचना क्षेत्र समाज के जन्मदाता भगवान विष्णु के पाँचवें वामन अवतार के क्षेत्र चुनार (चरणाद्रिगढ़) से ही व्यक्त है।

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का यह मानसिक कार्य इस स्थिति तक योग्यता रखता है कि वैश्विक सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक एकीकरण सहित विश्व एकता-शान्ति-स्थिरता-विकास के लिए जो भी कार्य योजना हो उसे देश व संयुक्त राष्ट्र संघ अपने शासकीय कानून के अनुसार आसानी से प्राप्त कर सकता है। और ऐसे आविष्कारकर्ता को इन सबसे सम्बन्धित विभिन्न पुरस्कारों, सम्मानों व उपाधियों से बिना विलम्ब किये सुशोभित किया जाना चाहिए। यदि यथार्थ रूप से देखा जाये तो विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार-नोबेल पुरस्कार के शान्ति व साहित्य क्षेत्र के पूर्ण रूप से यह योग्य है। साथ ही भारत देश के भारत रत्न से किसी भी मायने में कम नहीं है। भविष्य में ”राम (राष्ट्रपति, भारत) ने दिया लवकुश (सामान्य नागरिक) को भारत रत्न“ समाचार का मुख्य शीर्षक बन जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि अनेक दिशाओं से यही सत्य है।

    प्रस्तुत पुस्तक ”मैं सत्यकाशी से कल्कि महाअवतार बोल रहा हूँ“, विश्वशास्त्र के आविष्कारों का व्यावहारिक जीवन (व्यष्टि और समष्टि) में उपयोगिता का सारांश-अंश भाग है। 

    चूँकि प्रस्तुत पुस्तक क्रियात्मक है अर्थात भारत व विश्व के नेतृत्वकर्ताओं द्वारा व्यक्त विचार का शासनिक प्रणाली के अनुसार स्थापना की प्रक्रिया पर आधारित है इसलिए समाज व राज्य के विभिन्न स्तर के नेतृत्वकर्ताओं जैसे - समाजसेवी, लेखक, विचारक, धर्माचार्य, राजनीतिक नेतागण, विधायक, सांसद, शिक्षण क्षेत्र से जुड़े आचार्य इत्यादि सहित आम नागरिक को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए जिससे उन्हें अपने आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के सम्बन्ध में आधारभूत दृष्टि प्राप्त हो और ”एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ तथा ”नया भारत (New India)“ के विचार को प्राप्त करने के इस अन्तिम मार्ग पर कार्यवाही प्रारम्भ हो सके। 

    अवतारी परम्परा के इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अवतार गण मानक ब्रह्माण्डीय गणतन्त्र के अनुसार मानवीय व्यवस्था में उसके समरूप स्थापना करना, उनका उद्देश्य रहा है। इस क्रम में अवतारों का मूल लक्ष्य और कार्य का केन्द्र बिन्दु मानव के मस्तिष्क के विकास व व्यवस्था सत्यीकरण ही रहा है। कभी किसी अवतार ने कोई नया सम्प्रदाय, जीवन पद्धति और उपासना पद्धति की स्थापना नहीं की। अवतारगण स्वतन्त्रता के पक्षधर रहें हैं इसलिए वे मनुष्य के लिए बन्धनस्वरूप कोई नियम नहीं दिये। नियम देते हुये भी ये स्वतन्त्रता दिये ”जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो।“ अवतारगण के शरीर से मुक्त होने के बाद निश्चित रूप से ऐसा हुआ है कि बाद के लोग उनके नाम पर नया सम्प्रदाय, जीवन पद्धति और उपासना पद्धति की स्थापना कर दिये। 

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का यथार्थ अवतारी श्रृंखला के अनुसार कार्य ही उन्हें अन्तिम अवतार कल्कि के रूप में योग्य व स्थापित करता है। कल्कि अवतार के लिए समाज में अनके दावेदार हैं कोई समर्थकों की संख्या के आधार पर, कोई शरीर पर किसी विशेष प्रकार के चिन्ह के आधार पर, कोई किसी पौराणिक कथा इत्यादि के आधार पर व्यक्त हैं। परन्तु अवतारी श्रृंखला के अनुसार कार्य किसी के द्वारा सम्पन्न नहीं हो रहा है। परिणाम यह है कि वर्तमान समय में जिस विषय पर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ ने कार्य किया है, वह सम्पूर्ण विश्व में अपने आप में अकेला कार्य है और अनेक दिशाओं से प्रमाण को प्राप्त है।

    प्रस्तुत पुस्तक का उद्देश्य श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के अवतार होने या ना होने पर कम बल्कि आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर ”एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ तथा ”नया भारत (New India)“ के निर्माण पर उपयोगिता की दृष्टि का दिशा बोध ही पुस्तक की उपयोगिता है और वह जीवन के व्यावहारिक उपयोगिता पर आधारित है न कि आधारहीन व्यक्तिगत प्रमाणित कल्पना और मान्यताओं पर। आँठवें अवतार श्रीकृष्ण के मुख से निकला और महर्षि व्यास कृत ”गीता“ में 18 अध्याय हैं। इस पुस्तक में भी 18 अध्याय हैं। अब वह समय आ गया है कि कालानुसार ”गीता की उपयोगिता“ और ”उपयोगिता की गीता“ पर विचार हो, जिससे शिक्षा के लिए महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटीन का कथन- ”शिक्षा, तथ्यों को सिखना नहीं बल्कि मस्तिष्क को चिंतनयुक्त बनाने का प्रशिक्षण है (Education is not the learning of facts, but the training of the mind to think)“ सिद्ध हो जाये। पूर्व राष्ट्रपति स्व0 ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जीे के कथन- ”नवीनता के द्वारा ही ज्ञान को धन में बदला जा सकता है।“ के यथार्थ रूप हैं श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“, जिनके समस्त कार्य का मूल है- 

    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देख चुका हूँ, 

    अक्षय-अनन्त है मेरी हाला।  

    कण-कण में हूँ-”मैं ही मैं“, 

    क्षयी-ससीम है तेरी प्याला । 

    जिस भी पथ-पंथ-ग्रन्थ से गुजरेगा तू, 

.......