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    सत्य पुस्तक- विश्वशास्त्र

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  • RENEW HUMAN           RENEW INDIA                RENEW WORLD

     भारत सरकार के साथ लेकिन सरकार की सोच से हमेशा आगे

    आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण,

    पूर्ण मानव निर्माण व भारत को जगत गुरू बनाने की योजना है - पुनर्निर्माण


    नया, पुराना और वर्तमान

    जिस प्रकार वाहन-कार का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया, पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है परन्तु हैं सभी कार। इसी प्रकार सत्य का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है। परन्तु हैं सभी सत्य। जिस प्रकार वाहन ”कार“ वर्तमान है उसी प्रकार सत्य भी वर्तमान है सिर्फ उसके व्यवहार में लाने के लिए संस्करण नवीन हो रहे है। नवीन संस्करण की पहचान तभी हो सकती है जब पुराने संस्करण की पहचान हो और उसका ज्ञान हो। अन्यथा वह सब पुराना ही लगेगा या नया ही लगेगा। नवीन संस्करण अधिक व्यावहारिक होता है। इसलिए वह अधिक क्रिया-प्रतिक्रियापूर्ण होता है और यदि क्रिया-प्रतिक्रिया पूर्ण नहीं है तो उसके दो कारण होगें। पहला नवीनत्व के पहचानने का अभाव या दूसरा वह संस्करण नवीन ही नहीं है ”कार“ हो या ”सत्य“ उसका नवीन संस्करण तब तक आता रहेगा जब तक कि वह पूर्ण विकसित और व्यावहारिक रूप को प्राप्त नहीं कर लेता। और सिर्फ वही संस्करण स्थिरता और व्यवहार में रहेगा जो पूर्ण व्यावहारिक और विकसित होगा। शेष विकास के क्रम के इतिहास के रूप में जाने जायेंगे। ऐसा ही होता हैं।

    - श्री लव कुश सिंह विश्वमानव

    रचनाकर्ता - लक्ष्य पुनर्निर्माण व उसकी प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम व कार्य योजना

    आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी

    दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न


     

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  • त्रिलोक की व्यक्तिगत प्रमाणित कथा नहीं, बल्कि इस लोक की सार्वजनिक प्रमाणित “आध्यात्मिक सत्य” पर आधारित व्यावहारिक कथा

    सभी शिक्षा एक तरफ, “विश्वशास्त्र” एक तरफ।

    सभी पुस्तक-शास्त्र एक तरफ, “विश्वशास्त्र” एक तरफ

    हर घर का शान और प्राण “विश्वशास्त्र”

    धरती के नागरिक का जीवनशास्त्र “विश्वशास्त्र”

    स्वर्ण युग का शास्त्र “विश्वशास्त्र”

    राष्ट्र का एक मात्र अन्तिम शास्त्र “विश्वशास्त्र”

     

    (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

    प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में

    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)

     

    विश्वशास्त्र: द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज

    VISHWSHASTRA : THE KNOWLEDGE OF FINAL KNOWLEDGE

     

     शास्त्राकार
    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और

    पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”

                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न

    जन्म स्थान: रिफाइनरी टाउनशिप अस्पताल, बेगूसराय (बिहार)

    निवास: ग्राम-नियामतपुर कलाॅ, पोस्ट-पुरुषोत्तमपुर

    जिला-मीरजापुर (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

    e_mail : kalki2011@rediffmail.com

    Mobile No. 8090287511


    For more detail
    www.moralrenew.com 

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    (in English) - Lava Kush Singh “Vishwmanav”, Vishwshastra, Satyakashi

    (in Hindi) - लव कुश सिंह विश्वमानव, विश्वशास्त्र, सत्यकाशी

                      

     

     

  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र की भूमिका भाग-01
  •  विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-01

    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता)

    मनुष्य का प्रत्येक बच्चा निष्पक्ष, पूर्ण, धर्मयुक्त, धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव रूप में ही होता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, बच्चे के पूर्ववर्ती संस्कार, विचारधारा, धारणाएँ व मान्यताएँ उसे बाँधते हुये अपूर्ण, पक्ष व सम्प्रदाययुक्त बना देती है और वह जीवन पर्यन्त उस छवि में बँधकर एक विशेष प्रवृत्ति के मनुष्य के रूप में व्यक्त होता है। यह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक नया कम्प्यूटर जिसमें कोई भी एप्लीकेशन साफ्टवेयर न डाला गया हो और फिर उसमें किसी विशेष-विशेष कार्य के लिए एप्लीकेशन साफ्टवेयर डालना शुरू किया जाय तो वह कम्प्यूटर उस विशेष कार्य व प्रवृत्ति वाला बन जाता है जिसका उसमें एप्लीकेशन साफ्टवेयर डाला गया है।
    प्रस्तुत ”विश्वशास्त्र: द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज“ मनुष्य के मस्तिष्क के लिए एक ऐसा साफ्टवेयर है जो उसे पूर्ण और सभी विचारों को समझने में सक्षम बनाता है। यह शास्त्र एक मानक शास्त्र है जिसमें प्रत्येक स्तर का मनुष्य अपनी छवि देख सकता है। उदाहरण स्वरूप जिस प्रकार हम किसी ठोस पदार्थ को किलो से तोलते हैं उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क को तोलने का यह शास्त्र है। कभी भी ठोस पदार्थ से किलो को नहीं तोला जाता। हम यह नहीं कहते कि इतना ठोस पदार्थ बराबर एक किलो बल्कि हम यह कहते हैं कि एक किलो बराबर इतना ठोस पदार्थ।
    इस शास्त्र को पढ़ने व समझने के पहले पाठकगण अपने मस्तिष्क को नये कम्प्यूटर की भाँति रिक्त कर लें, जिसका मैं निवेदन भी करता हूँ। किसी भी पूर्वाग्रह व संस्कार से ग्रसित होकर पढ़ने पर शास्त्र समझ के बाहर हो जायेगा क्योंकि शास्त्र बहुआयामी (मल्टी डायमेन्सनल) है अर्थात अनेक दिशाओं से एक साथ देखने पर ही इसके ज्ञान का प्रकाश आप में प्रकाशित होगा। ऐसा न करने पर आप शास्त्र को किसी विशेष विचार, मत व सम्प्रदाय का समझ बैठ जायेगें जो आपका विचार हो सकता है परन्तु इस शास्त्र का नहीं। शास्त्र के बहुत से शब्द इसके पाठकों को कठिन अर्थो वाले दिख सकते हैं। यह व्यक्ति के अपने चिन्तन स्तर की समस्या से ही व्यक्त हो रहा है। व्यक्तियों को इन कठिन शब्दों के अर्थों को सरल भाषा में समझना इस शास्त्र के क्रमिक अध्ययन व चिन्तन से ही सम्भव हो सकेगा। जन्म से मनुष्य सिखता ही चला जाता है। व्यक्ति को जहाँ पहुँचना होता है उसके लिए व्यक्ति को ही प्रयत्न करना होता है। पहुँच का वह स्थान व्यक्ति तक चल कर नहीं आता। इसलिए स्वयं को वहाँ पहुँचायें, यही लाभकारी होगा। आज तक शास्त्रों के प्रति दृष्टि यह रही है कि ये सब रहस्यवाद का विषय है ऐसा नहीं है। सिर्फ दृष्टि की बात है कि आप किस दृष्टि से उसे समझने का प्रयत्न करते हैं। भाषा के अक्षर व शब्द तो वही होते हैं सिर्फ चिन्तन स्तर और शब्दों का अर्थ ही उसे कठिन व आसान भाषा शैली में विभाजित करता है।
    प्रस्तुत शास्त्र किसी धर्म-सम्प्रदाय विशेष की सर्वोच्चता का शास्त्र नहीं है बल्कि सभी को अपने-अपने धर्म-सम्प्रदाय और एक दूसरे के धर्म-सम्प्रदाय के प्रति समझ को विकसित करते हुये ज्ञान व कर्मज्ञान द्वारा एकीकरण का शास्त्र है। एक मात्र ज्ञान व कर्मज्ञान ही ऐसा विषय है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सकता है। क्योंकि इसका सम्बन्ध सीधे मस्तिष्क से है और कौन नहीं चाहेगा कि उसका मस्तिष्क ज्ञान-बुद्धि के लिए पूर्णता की ओर बढ़े। ज्ञान-कर्मज्ञान के अलावा जो कुछ है वह संस्कृति है और उस पर एकीकरण असम्भव ही नहीं नामुमकिन है। मैं यह कभी नहीं चाहता कि यह पृथ्वी एक रंगी हो जाये। जिस प्रकार प्रत्येक घर का मालिक अपने बाग में अनेक रंग व प्रकार का फूल इसलिए उगाता है कि उसके बाग की सुन्दरता और निखरे। उसी प्रकार परमात्मा ने इस पृथ्वी पर समय-समय पर उत्पन्न अनेक अवतारों, पैगम्बरों, दूतों इत्यादि के माध्यम से धर्म-सम्प्रदाय उत्पन्न कर मनुष्यों को युगों-युगों से संस्कारित व निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ किया है ताकि उसकी यह पृथ्वी रूपी बाग सुन्दर और रंगबिरंगी लगे और अब वह समय आ चुका है जिसमें मनुष्य को पूर्ण संस्कारित किया जाये। यह जानना आवश्यक है कि यह शास्त्र उस सर्वोच्च और अन्तिम मन स्तर पर जाकर मनुष्य को पूर्ण संस्कारित करने के लिए आविष्कृत किया गया है जैसे कोई व्यक्ति चाँद पर बैठकर अपने इस पृथ्वी रूपी घर को संयुक्त परिवार का रूप देने और बिखरे हुये परिवार के एकीकरण का प्रयास एक विचारधारा ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ द्वारा किया है।
    यह शास्त्र वर्तमान तक के सभी अवतारों, महापुरूषों, धर्म-सम्प्रदाय प्रवर्तकों, राष्ट्रीय व वैश्विक विचार व्यक्त करने वाले सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्वकर्ताओं के सकारात्मक विचारों के समन्वय और उसके राष्ट्रीय व वैश्विक शासन प्रणाली के अनुसार स्थापना के लिए एवं मनुष्य जीवन में उसके व्यावहारीकरण का शास्त्र है। किसी भी एक अवतार, महापुरूष, धर्म-सम्प्रदाय प्रवर्तक, राष्ट्रीय व वैश्विक विचार व्यक्त करने वाले सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्वकर्ता के सकारात्मक विचार को लेकर समाज गठन व ”सम्पूर्ण क्रान्ति“ घटित नहीं हो सकती। उसके लिए चाहिए समन्वय। समन्वय का अर्थ ही है-”जिसमें सभी हों, और सभी में वो हो“। शास्त्र में ऐसे बहुत से विचार मिलेगें जो वर्तमान में सत्य व समझ में न दिखाई देती हो परन्तु वह मनुष्य के अपने कर्मो के प्रयोग और उससे प्राप्त ज्ञान के फलस्वरूप अन्त में सत्य सिद्ध होगीं क्योंकि यह शास्त्र सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त पर आधारित है जिससे मनुष्य बाहर नहीं है। इसी कारण से इस शास्त्र को ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (The Knowledge of final knowledge)“ भी कहा गया है और यह भी कहा गया है ”सभी सर्वोच्च विचार एवं सर्वोच्च कर्म मेरी ओर ही आते है“
    किसी भी अवतार-महापुरूष इत्यादि का सार्वभौम सत्य ज्ञान एक हो सकता है परन्तु उसके स्थापना की कला उस अवतार-महापुरूष इत्यादि के समय की समाजिक व शासनिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है, जो पुनः दुबारा प्रयोग में नहीं लायी जा सकती। वर्तमान तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिससे यह सिद्ध होता हो कि उस अवतार-महापुरूष इत्यादि की कला को दुबारा प्रयोग कर कुछ सकारात्मक किया गया हो। इस प्रकार पुनर्जन्म और अवतार केवल मानसिक रूप से सिद्ध होता है न कि शारीरिक रूप से। उस अवतार-महापुरूष इत्यादि की कला, वेश-भूषा की नकल करने वाले को समर्थक या नकलची कहते हैं। जबकि उनके मानसिक स्तर को समझकर आगे काम करने वाले को उनका पुनर्जन्म और अवतार कहते हैं। स्वामी विवेकानन्द के पुनर्जन्म या अवतार को स्वामी विवेकानन्द के काम को आगे बढ़ाना होगा। श्रीकृष्ण के पुनर्जन्म या अवतार को श्रीकृष्ण के काम को आगे बढ़ाना होगा। केवल उनके रूप को धारण करना तो नकल या समर्थन करना ही कहा जायेगा।
    किसी भी अवतार-महापुरूष इत्यादि के दर्शन या चित्र से अधिकतम लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब उनकी विचार व कृति का ज्ञान व समझ हो। उसी से मनुष्य का विकास सम्भव है। मैं यह चाहूँगा कि मुझसे अधिक महत्व इस ”विश्वशास्त्र“ नामक कृति को समाज दे क्योंकि इसी में उनका विकास है। यह भौतिक शरीर जिसके माध्यम से यह कार्य सम्पन्न हुआ वह तो एक दिन नष्ट हो जायेगा परन्तु यह कृति वर्तमान समाज के संसाधनों व विज्ञान की तकनीकों के सहारे बहुत अधिक समय तक रहेगी। इसे उसी प्रकार समझें जिस प्रकार वर्तमान भौतिक विज्ञान से आविष्कृत पंखा, बल्ब, मोबाइल, कम्प्यूटर इत्यादि का समाज उपयोग करता है न कि इसके आविष्कारकर्ता का दर्शन व चित्र की पूजा। अर्थात यह शास्त्र ही गुरू है न कि इसके आविष्कारक का शरीर। इस कारण से ही मैंने जिस शरीर का प्रयोग इस कार्य के लिए किया है, उसका वह एकमात्र रूप ही शास्त्र में दिया हूँ जो ”ज्ञान, कालबोध तथा शब्दब्रह्म“ प्राप्ति की उम्र 28 वर्ष की अवस्था का है। वर्तमान में मैं इससे बहुत दूर आ चुका हूँ जहाँ पहचान ही असम्भव है।
    प्रत्येक मनुष्य के लिए 24 घंटे का दिन और उस पर आधारित समय का निर्धारण है और यह पूर्णतः मनुष्य पर ही निर्भर है कि वह इस समय का उपयोग किस गति से करता है। उसके समक्ष तीन बढ़ते महत्व के स्तर हंै- शरीर, धन/अर्थ और ज्ञान। इन तीनों के विकास की अपनी सीमा, शक्ति, गति व लाभ है। जिसे यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ-
    1. शरीर आधारित व्यापार- यह व्यापार की प्रथम व मूल प्रणाली है जिसमें शरीर के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे सबसे कम व सबसे अधिक धन कमाया जा सकता है। परन्तु यह कम धन कमाने के लिए अधिक लोगों को अवसर तथा अधिक धन कमाने के लिए कम लोगों कांे अवसर प्रदान करता है। अर्थात् शरीर का प्रत्यक्ष प्रयोग कर अधिक धन कमाने का अवसर कम ही लोगों को प्राप्त होता है। यह प्रकृति द्वारा प्राप्त गुणों पर अधिक आधारित होती है। जो एक अवधि तक ही प्रयोग में लायी जा सकती है। क्योंकि शरीर की भी एक सीमा होती है। उदाहरण स्वरुप- किसान, मजदूर, कलाकार, खिलाड़ी, गायक, वादक, पहलवान इत्यादि। जिसमें अधिकतम संख्या कम कमाने वालों की तथा न्यूनतम संख्या अधिक कमाने वालों की है। शरीर आधारित व्यापारी हमेशा धन व ज्ञान आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में शरीर की उपयोगिता अधिक तथा धन व ज्ञान की उपयोगिता कम होती है।
    2. धन/अर्थ आधारित व्यापार- यह व्यापार की दूसरी व मध्यम प्रणाली है जिसमें धन के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे अधिक धन कमाया जा सकता है और उन सभी को अवसर प्रदान करता है जिनके पास धन होता है। उदाहरण स्वरुप- दुकानदार, उद्योगपति, व्यापारी इत्यादि। धन आधारित व्यापारी हमेशा शरीर व ज्ञान आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में धन की उपयोगिता अधिक तथा शरीर व ज्ञान की उपयोगिता कम होती है।
    3. ज्ञान आधारित व्यापार- यह व्यापार की अन्तिम व मूल प्रणाली है जिसमें ज्ञान के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे सबसे अधिक धन कमाया जा सकता है और उन सभी को अवसर प्रदान करता है जिनके पास ज्ञान होता है। उदाहरण स्वरुप- विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं अन्य शिक्षा व विद्या अध्ययन संस्थान, शेयर कारोबारी, बीमा व्यवसाय, प्रणाली व्यवसाय, कन्सल्टेन्ट, ज्ञान-भक्ति-आस्था आधारित ट्रस्ट-मठ इत्यादि। ज्ञान आधारित व्यापारी हमेशा शरीर व धन आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में ज्ञान की उपयोगिता अधिक तथा शरीर व धन की उपयोगिता कम होती है।
    शरीर के विकास के उपरान्त मनुष्य को धन के विकास की ओर, धन के विकास के उपरान्त मनुष्य को ज्ञान के विकास की ओर बढ़ना चाहिए अन्यथा वह अपने से उच्च स्तर वाले का गुलाम हो जाता है। बावजूद उपरोक्त सहित इस शास्त्र से अलग विचारधारा में होकर भी मनुष्य जीने के लिए स्वतन्त्र है। परन्तु अन्ततः वह जिस अटलनीय नियम-सिद्धान्त से हार जाता है उसी सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को ईश्वर कहते हैं और इसके अंश या पूर्ण रूप को प्रत्यक्ष या प्रेरक विधि का प्रयोग कर समाज में स्थापित करने वाले शरीर को अवतार कहते हैं। तथा इसकी व्याख्या कर इसे व्यक्ति में स्थापित करने वाले शरीर को गुरू कहते हैं। मनुष्य केवल प्रकृति के अदृश्य नियमों को दृश्य में परिवर्तन करने का माध्यम मात्र है। इसलिए मनुष्य चाहे जिस भी विचार में हो वह ईश्वर में ही शरीर धारण करता है और ईश्वर में ही शरीर त्याग देता है, इसे मानने या न मानने से ईश्वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह उसी प्रकार है जैसे कोई किसी देश में रहे और वह यह न मानने पर अड़ा रहे कि वह उस देश का नहीं है या कोई स्वयं को यह समझ बैठे कि मेरे जैसा कोई ज्ञानी नहीं और यदि हो भी तो मैं नहीं मानता।
    कोई अवतार किसी सम्प्रदाय, जाति, नारी, पुरूष इत्यादि में भेद-भाव से युक्त होकर कार्य नहीं करते, वे सम्पूर्ण मानव जाति को सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से जोड़ने के लिए कार्य करते हैं। जो मनुष्य विचारशील नहीं हैं वे पशुमानव हैं, जो विचारशील हैं वे मानव हैं। मानवों में भी जो व्यक्तिवादी हैं वे असुर-मानव तथा जो समाजवादी हैं वे देव-मानव हैं। वे मानव जो सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से युक्त हैं वे ईश्वर-मानव हैं। अवतारों का कार्य पशुमानव और मानव को ईश्वर-मानव तक उठाना होता है। अवतारों को किसी सम्प्रदाय या पूर्ववर्ती धर्म से जोड़ देना यह मानवों की अपनी दृष्टि होती है। अवतारों का लक्ष्य सदैव समाज में सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की स्थापना रहा है। उनका लक्ष्य कभी भी ऐश्वर्य युक्त जीवन या नश्वर समाजिक विषय या रक्त-रिश्ता-धन सम्बन्ध से लगाव नहीं रहा है। शरीर धारण के धर्म के लिए इन सबकी आवश्यकता मात्र साधन स्वरूप अवश्य रहा है परन्तु लक्ष्य या साध्य स्वरूप कभी नहीं रहा है। चूँकि अवतार भी शरीरधारी ही होते हैं इसलिए समाज के मानव भी अपने-अपने प्रिय वस्तु के लगाव की भाँति उन्हें भी उसी में लिप्त दिखाई पड़ते हैं।

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  •  विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-02
    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता)


    निराकार विचार के समान सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का भी अपना कोई गुण नहीं होता। जब वह पूर्णरूपेण किसी साकार शरीर से व्यक्त होता है तब उसका गुण एकात्म ज्ञान, एकात्म वाणी, एकात्म प्रेम, एकात्म कर्म, एकात्म समर्पण और एकात्म ध्यान के सर्वोच्च संयुक्त रूप में व्यक्त होता है। चूँकि पुनः इन गुणों का अलग-अलग कोई रूप नहीं होता इसलिए इन गुणों से युक्त करते हुये समाज के परिवर्तक और नियंत्रक ऋृषि-मुनि गणों ने मानक चरित्रों का साकार निरूपण या प्रक्षेपण किये। जैसे एकात्म ज्ञान व एकात्म वाणी से युक्त ब्रह्मा परिवार, एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी सहित एकात्म प्रेम व एकात्म कर्म से युक्त विष्णु परिवार, एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी-एकात्म प्रेम-एकात्म कर्म सहित एकात्म समर्पण व एकात्म ध्यान से युक्त शिव-शंकर परिवार। क्रमशः ये आदर्श मानक व्यक्ति चरित्र, आदर्श मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र व आदर्श मानक वैश्विक व्यक्ति चरित्र के रूप में प्रस्तुत किये गये। ये प्रस्तुतीकरण स्वतन्त्र नहीं हैं बल्कि एक दूसरे में समाहित और उत्तरोत्तर, उच्चतर स्थिति के हैं अर्थात ब्रह्मा, विष्णु में तथा विष्णु, शिव-शंकर परिवार में समाहित हैं। इस प्रस्तुतीकरण से ही सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित अवतारों का सनातन धर्म, हिन्दूधर्म के रूप में अलग हो नये पहचान को प्राप्त किया। फलस्वरूप अवतारों को भी इन्हीं मानक चरित्रों के अवतार के रूप में जाना जाने लगा और अवतारों का वर्तमान में अवनति होकर केवल हिन्दू धर्म का माना जाने लगा। इस प्रकार अवतारों द्वारा व्यक्त शास्त्र-साहित्य जो मानव समाज के लिए थी उसे हिन्दू धर्म का समझा जाने लगा जिसका उदाहरण श्री कृष्ण द्वारा व्यक्त ”गीता“ है। उपरोक्त मानक चरित्रों के क्रम में आदर्श मानक व्यक्ति चरित्र के पूर्णावतार श्रीराम तथा आदर्श मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र (व्यक्तिगत प्रमाणित आदर्श मानक वैश्विक व्यक्ति चरित्र) के पूर्णावतार श्रीकृष्ण हो चुके हैं। अब केवल अन्तिम सार्वजनिक प्रमाणित आदर्श मानक वैश्विक व्यक्ति चरित्र के पूर्णावतार ही शेष हैं जिसका विस्तृत विवरण इस शास्त्र में प्रस्तुत किया गया है। ”विश्वशास्त्र“ को ”गीता“ का ही विस्तार और वृक्ष शास्त्र कह सकते हैं। ”गीता“ में चित्र नहीं थे इसलिए लोगों को रूचिकर नहीं लगी इसलिए ”विश्वशास्त्र“ में चित्र भी लगाये गये हैं। ”गीता“ व्यक्तिगत प्रमाणित विश्वशास्त्र है जबकि ”विश्वशास्त्र“ सार्वजनिक प्रमाणित विश्वशास्त्र है। सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की ओर मनुष्य को ले जाने वाले पुस्तक को ही शास्त्र कहा जाता है।
    जिस प्रकार वर्तमान व्यावसायिक-समाजिक-धार्मिक इत्यादि मानवीय संगठन में विभिन्न पद जैसे प्रबन्ध निदेशक, प्रबन्धक, शाखा प्रबन्धक, कर्मचारी, मजदूर इत्यादि होते हैं और ये सब उस मानवीय संगठन के एक विचार जिसके लिए वह संचालित होता है, के अनुसार अपने-अपने स्तर पर कार्य करते हैं और वे उसके जिम्मेदार भी होते हैं। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ईश्वरीय संगठन है जिसमें सभी अपने-अपने स्तर व पद पर होकर जाने-अनजाने कार्य कर रहें हैं। यदि मानवीय संगठन का कोई कर्मचारी दुर्घटनाग्रस्त होता है तो उसका जिम्मेदार उस मानवीय संगठन का वह विचार नहीं होता बल्कि वह कर्मचारी स्वयं होता है। इसी प्रकार ईश्वरीय संगठन में भी प्रत्येक व्यक्ति की अपनी बुद्धि-ज्ञान-चेतना-ध्यान इत्यादि गुण ही उसके कार्य का फल देती है जिसका जिम्मेदार वह व्यक्ति स्वयं होता है न कि ईश्वरीय संगठन का वह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त। मानवीय संगठन का विचार हो या ईश्वरीय संगठन का सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त यह दोनों ही कर्मचारी के लिए मार्गदर्शक नियम है। जिस प्रकार कोई मानवीय संगठन आपके पूरे जीवन का जिम्मेदार हो सकता है उसी प्रकार ईश्वरीय संगठन भी आपके पूरे जीवन का जिम्मेदार हो सकता है। जिसका निर्णय आपके पूरे जीवन के उपरान्त ही हो सकता है परन्तु आपके अपनी स्थिति के जिम्मेदार आप स्वयं है। जिस प्रकार मानवीय संगठन में कर्मचारी समर्पित मोहरे की भाँति कार्य करते हैं उसी प्रकार ईश्वरीय संगठन में व्यक्ति सहित मानवीय संगठन भी समर्पित मोहरे की भाँति कार्य करते हैं, चाहे उसका ज्ञान उन्हें हो या न हो। और ऐसा भाव हमें यह अनुभव कराता है कि हम सब जाने-अनजाने उसी ईश्वर के लिए ही कार्य कर रहें है जिसका लक्ष्य है- ईश्वरीय मानव समाज का निर्माण जिसमें जो हो सत्य हो, शिव हो, सुन्दर हो और इसी ओर विकास की गति हो।
    ईश्वर सम्बन्धित विचार और उस पर आधारित पूजास्थल, प्रवचन इत्यादि अब एक आयोजन व मनुष्य के अपने स्वयं के सामाजिक छवि बदलने का रूप ले चुका है। अब आवश्यकता यह है कि उसे और भी दृढ़ता प्रदान करने के लिए व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान से युक्त कर दिया जाये जो ज्ञान-कर्मज्ञान से ही आ सकता है और इसी से सभी धर्म व जाति का सत्य कल्याण हो सकता है। जिस वृक्ष से शाखाएँ निकल चुकी हों पुनः तने में वापस नहीं भेजी जा सकती। आवश्यकता यह है कि हम उसके तने को और मजबूती प्रदान करें। इसी प्रकार ईश्वर सम्बन्धित व्यापार न तो कभी बन्द हो सकता है और न ही बन्द होता है जिसके सामने सभी व्यापार छोटे व अस्थिर हैं।
    यह युग आॅकड़ो (डाटा), सूचनाओं, आरेख, ग्राॅफ व इंजिनियरिंग का युग है इसलिए यह शास्त्र भी उसी रूप में प्रस्तुत है। क्योंकि युग का बहुमत मन (अधिकतम मन) जिस ओर बढ़ चुका होता है ज्ञान को गति देने के लिए उसी कला का प्रयोग किया जाता है। इसलिए उन लोगों से मैं क्षमा चाहता हूँ जो यह उम्मीद किये होगें कि शास्त्र सदैव कविताओं, छन्दों, दोहों व संस्कृत भाषा में ही हो सकता है। संस्कृत भाषा में शास्त्रीय मन्त्रों के गायन के उस शक्ति को मैं स्वीकार करता हूँ जिसके सुनने पर रोम-रोम झंकरित हो उठता है। हो सकता है ऐसा मुझे इसलिए लगता हो कि अनेकों जन्मों से यह मेरे पूर्व संस्कारों में समाहित हो। भाषा तो ज्ञान को व्यक्त करने का माध्यम मात्र है। कई भाषाओं का ज्ञानी होना अच्छी बात है लेकिन उससे भी अच्छी बात ज्ञान का ज्ञानी होना है। मैं किसी भी भाषा का ज्ञानी नहीं हूँ इसलिए इस शास्त्र में व्याकरण व मात्रात्मक त्रुटियाँ मिलेगीं, उसे पकड़ने से आपके भाषा ज्ञान की विद्वता अवश्य सिद्ध हो सकती है परन्तु शास्त्र जिस दिशा की ओर आपको निर्देश कर रहा है उसे समझना अधिक उपयोगी है। प्रस्तुत शास्त्र में वर्तमान विश्व शासन व्यवस्था के अनुसार स्थापना स्तर तक का प्रक्रिया व विश्लेषण उपलब्ध है। जिसके 90 प्रतिशत भाग से सभी परिचित ही हैं। शेष 10 प्रतिशत भाग दृष्टि, काल (समय), ध्यान व चेतना की स्थिति और ज्ञान-कर्मज्ञान का वर्तमान विश्व शासन व्यवस्था के अनुसार रूपान्तरण है और बिखरे हुये ज्ञान सूत्रों को संगठित रूप देते हुये कार्य योजना की दिशा व्यक्त की गयी है। यह ऐसे था कि घर बनाने के लिए सारा निर्माण कार्य पहले ही पूर्ण किया जा चुका था सिर्फ छत डालना था, यह शास्त्र वही छत है जो पूर्ण किया गया है और अब इस छत के नीचे और भी सुन्दरता के लिए सम्बन्धित विषय के विशेषज्ञों के सहयोग के लिए सदा ही स्वागत रहेगा। अपनी यात्रा व वार्ता के दौरान मेरे सामने यह भी प्रश्न आया कि इस शास्त्र में अधिकतम तो पहले से ही विद्यमान विषयों को ही दिया गया है तो फिर आपका अपना क्या है? तो मैं उन लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि मेरा इसमें ”समझ व एकत्रीकरण“ नाम की कला व विषय है। इसे आप सब इस प्रकार समझ सकते हैं। आपकी जमीन थी, ईंट था, बालू, सीमेण्ट, छड़ सब आपका था। आप कुछ नहीं कर पा रहे थे। एक व्यक्ति आया, उसने उसे संगठित करने की योजना बनाया, एक रूप दिया और मकान बना दिया। फिर घर किसका हुआ? घर भी तो आपका ही हुआ। यह शास्त्र विज्ञान की भाँति ज्ञान-कर्मज्ञान का एक क्रमिक अध्ययन का शास्त्र है, जो आपका ही है।
    समाज के व्यक्ति यह भी कह सकते हैं कि मैं ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ। तो मैं उन लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि मैं उस ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसने विश्व का सर्वप्रथम, प्राचीन और वर्तमान तक अकाट्य ”क्रिया-कारण“ दर्शन कपिल मुनि के माध्यम से दिया जिसे आज का दृश्य विज्ञान (पदार्थ या भौतिक विज्ञान) ने भी आइन्सटाइन के माध्यम से E=mc2 देकर और दृढ़ता ही प्रदान की है। मैं उस भारत के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जहाँ ऐसी प्रत्येक वस्तु जिससे मनुष्य जीवन पाता है और ऐसी प्रत्येक वस्तु जिससे मनुष्य का जीवन संकट में पड़ सकता है उसे देवता माना जाता है। इस प्रकार हमारे भारत में 33 करोड़ देवता पहले से ही हैं। इस प्रकार हमारा भारत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही देवता और ईश्वर के रूप में देखता व मानता है और इसकी व्यवस्था व विकास हेतू कर्म करता रहा है। मैं उस ”भारत“ के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसने ”शून्य“ व ”दशमलव“ दिया जिस पर विज्ञान की भाषा गणित टीकी हुई है। मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं उस ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसका अपनी भाषा में नाम ”भारत“ है तथा विश्वभाषा में नाम INDIA है। मैं INDIA का विरोध नहीं करता बल्कि भारत को विश्वभारत बनाकर नाम INDIA को पूर्णता प्रदान करना चाहता हूँ। मैं संकुचन में नहीं बल्कि व्यापकता में विश्वास करता हूँ। मैं अंश में नहीं बल्कि पूर्णता, समग्रता व सार्वभौमिकता में विश्वास करता हूँ। समग्र ब्रह्माण्ड निरन्तर फैल रहा है। मानव जाति को भी अपने मस्तिष्क और हृदय को फैला कर विस्तृत करना होगा । तभी विकास, शान्ति, एकता व स्थिरता आयेगी। तो मैं उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि भारत को समझने के लिए ”भारत माता“ में जन्म लेना पड़ता है और ”भारत माता“ आलीशान कोठीयों में नहीं गाँवों, झोपड़ियों व जंगलों में मिलती हैं और वहीं जाना पड़ता है। इतिहास साक्षी है ऐसा ही हुआ है। केवल पुस्तकों को पढ़कर भारत को जानना असम्भव है। भारत की समझ कोई प्रापर्टी (धन-दौलत) नहीं जो विरासत में ले ली जाये, यह अनेक जन्मों का फल होता है। लोगों का ऐसा भी कहना है कि जब यह ”विश्वशास्त्र“ है तो इसमें भारत के बाहर के देशों के दार्शनिकों को स्थान क्यों नहीं दिया गया? इस प्रश्न के उत्तर में मैं यह कहना चाहता हूँ कि ”विश्वशास्त्र“ एकीकृत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का शास्त्र है न कि विचारों का। मनुष्य समाज में विचार आधारित चाहे जितनी बड़ी क्रान्ति या समर्थन क्यों न प्राप्त कर लिया जाये वह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त नहीं हो सकता, वह एक घटना अवश्य हो सकती है। संसार के सभी दार्शनिक यदि अपने दर्शन को सार्वभौम एकीकृत करेंगे तो उन्हें भारतीय दर्शन में ही अपना अन्तिम संस्कार करवाना पड़ेगा। विचारों की मृत्यु ही सत्य है अर्थात सत्य, एक विचार नहीं बल्कि आत्मसात् करने का विषय है।

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  •   विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-03

    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता) 


    सन् 1893 से सन् 1993 के 100 वर्षो के समय में विश्व के बौद्धिक शक्ति को जिन्होंने सबसे अधिक हलचल दी वे हैं- धर्म की ओर से स्वामी विवेकानन्द और धार्मिकता की ओर से आचार्य रजनीश ”ओशो“। मनुष्य जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के नवीन आविष्कारों को आसानी से ग्रहण करता है उसी प्रकार धर्म-आध्यात्म-दर्शन के नवीन आविष्कारों को भी मनुष्य को ग्रहण करना चाहिए, तभी मानसिक-आध्यात्मिक स्वतन्त्रता का अनुभव हो सकेगा। अन्यथा पूर्ण शारीरिक गुलामी का समय बीत चुका, आर्थिक गुलामी का काल चल रहा है और मानसिक गुलामी के काल चक्र में मनुष्य फँस जायेगा। स्वामी विवेकानन्द जी का कहना था-”उसी मूल सत्य की फिर से शिक्षा ग्रहण करनी होगी, जो केवल यहीं से, हमारी इसी मातृभूमि से प्रचारित हुआ था। फिर एक बार भारत को संसार में इसी मूल तत्व का-इसी सत्य का प्रचार करना होगा। ऐसा क्यों है? इसलिए नहीं कि यह सत्य हमारे शास्त्रों में लिखा है वरन् हमारे राष्ट्रीय साहित्य का प्रत्येक विभाग और हमारा राष्ट्रीय जीवन उससे पूर्णतः ओत-प्रोत है। इस धार्मिक सहिष्णुता की तथा इस सहानुभूति की, मातृभाव की महान शिक्षा प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित सब जाति और वर्ण वाले सीख सकते हैं। तुमको अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर तुम एक हो।“ (जितने मत उतने पथ, रामकृष्ण मिशन, पृष्ठ-39)। आचार्य रजनीश ”ओशो“ का कहना था-कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम भविष्य के लिए ज्यादा है। सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय से कम से कम पाँच हजाार वर्ष पहले पैदा हुये। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। बस महत्वपूर्ण और गैर महत्वपूर्ण में इतना फर्क है और सभी साधारण व्यक्ति अपने समय के साथ पैदा होते हैं महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं होता। उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता अनुभव करता है जब हम समझने योग्य नहीं हो पाते तब हम उसकी पूजा शुरु कर देते हैं या तो हम उसका विरोध करते हैं। दोनों पूजाएं हैं एक मित्र की एक शत्रु की।“, ”इस देश को कुछ बाते समझनी होगी। एक तो इस देश को यह बात समझनी होगी कि तुम्हारी परेशानियों, तुम्हारी गरीबी, तुम्हारी मुसीबतों, तुम्हारी दीनता के बहुत कुछ कारण तुम्हारे अंध विश्वासों में है, भारत कम से कम डेढ़ हजार साल पिछे घिसट रहा है। ये डेढ़ हजार साल पूरे होने जरूरी है। भारत को खिंचकर आधुनिक बनाना जरूरी है। मेरी उत्सुकता है कि इस देश का सौभाग्य खुले, यह देश भी खुशहाल हो, यह देश भी समृद्ध हो। क्योंकि समृद्ध हो यह देश तो फिर राम की धुन गुंजे, समृद्ध हो यह देश तो फिर लोग गीत गाँये, प्रभु की प्रार्थना करें। समृद्ध हो यह देश तो मंदिर की घंटिया फिर बजे, पूजा के थाल फिर सजे। समृद्ध हो यह देश तो फिर बाँसुरी बजे कृष्ण की, फिर रास रचे! यह दीन दरिद्र देश, अभी तुम इसमें कृष्ण को भी ले आओंगे तो राधा कहाँ पाओगे नाचनेवाली? अभी तुम कृष्ण को भी ले आओगें, तो कृष्ण बड़ी मुश्किल में पड़ जायेगें, माखन कहाँ चुरायेगें? माखन है कहाँ? दूध दही की मटकिया कैसे तोड़ोगे? दूध दही की कहाँ, पानी तक की मटकिया मुश्किल है। नलों पर इतनी भीड़ है! और एक आध गोपी की मटकी फोड़ दी, जो नल से पानी भरकर लौट रही थी, तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देगी कृष्ण की, तीन बजे रात से पानी भरने खड़ी थी नौ बजते बजते पानी भर पायी और इन सज्जन ने कंकड़ी मार दी। धर्म का जन्म होता है जब देश समृद्ध होता है। धर्म समृद्ध की सुवास है। तो मैं जरूर चाहता हँू यह देश सौभाग्यशाली हो लेकिन सबसे बड़ी अड़चन इसी देश की मान्यताएं है। इसलिए मैं तुमसे लड़ रहा हँू। तुम्हारे लिए।“
    वर्तमान में जीने का अर्थ होता है-विश्व ज्ञान जहाँ तक बढ़ चुका है वहाँ तक के ज्ञान से अपने मस्तिष्क को युक्त करना। तभी डेढ़ हजार वर्ष पुराने हमारे मस्तिष्क का आधुनिकीकरण हो पायेगा। सिर्फ वर्तमान में तो पशु रहकर कर्म करते हैं। यह शास्त्र मनुष्य के मस्तिष्क के आधुनिकीकरण का शास्त्र है या विज्ञान की भाषा में कहें तो मस्तिष्क के आधुनिकीकरण का साफ्टवेयर या माइक्रो चिप्स (Integrated Circuit - IC) है। वर्तमान की अब नवीनतम परिभाषा है-पूर्ण ज्ञान से युक्त होना और कार्यशैली की परिभाषा है-भूतकाल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकतानुसार पूर्णज्ञान और परिणाम ज्ञान से युक्त होकर वर्तमान समय में कार्य करना।
    अपने सम्पर्को व समाज के व्यक्तियों से मुझे यह भी सूचना प्राप्त हुई कि दुनिया बहुत तेज (फास्ट) हो गई है। 1000 पृष्ठ का पुस्तक पढ़ने का समय किसके पास है? मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है। एक तरफ मनुष्य के पूरे मस्तिष्क को आधुनिक करना है जिसके न होने से वह अपने कर्मो का जिम्मेदार ईश्वर को बनाता है, दूसरी तरफ उसे पढ़ने का समय नहीं है। तो मैं उनसे कहता हूँ मार्ग या रास्ता बनाने वाला, मार्ग इसलिए बनाता है कि लोग उसपर चलकर अपनी मंजिल तय करेगें। बस उसका इतना ही धर्म होता है। चलने वाला अगर न चले तो मार्ग बनाने वाला दोषी नहीं होता और वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त भी होता है। मैंने सिर्फ मार्ग बनाया है जो इस शास्त्र के रूप में आपके सामने है। हाँ इतना जरूर करूँगा कि मार्ग बन गया है इसकी सूचना समाज में अधिकतम क्षेत्र तक पहुँचाने की कोशिश करूँगा। मेरा यही कर्म है जिसे मैं करूँगा। एक व्यक्ति सामान्यतः यदि स्नातक (ग्रेजुएशन) तक पढ़ता है तो वह कितने पृष्ठ पढ़ता होगा और क्या पाता है? विचारणीय है। एक व्यक्ति इंजिनियर व डाॅक्टर बनने तक कितना पृष्ठ पढ़ता है? यह तो होती है कैरियर की पढ़ाई इसके अलावा कहानी, कविता, उपन्यास, फिल्म इत्यादि के पीछे भी मनुष्य अपना समय मनोरंजन के लिए व्यतीत करता है। और सभी एक चमत्कार के आगे नतमस्तक हो जाते हैं तो पूर्ण मानसिक स्वतन्त्रता कहाँ है? विचारणीय विषय है। वैसे भी मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह शास्त्र तो ज्ञान-कर्मज्ञान का शास्त्र है जो प्रत्येक व्यक्ति की वर्तमान की आवश्यकता है और उसकी महत्ता धीरे-धीरे ही सही परन्तु भविष्य में बढ़ती ही जायेगी। मैंने जहाँ तक देखा है कि ऐसे व्यक्ति जिनका धनोपार्जन व्यवस्थित चल रहा है वे ज्ञान की आवश्यकता या उसके प्राप्ति की आवश्यकता के प्रति रूचि नहीं लेते परन्तु वे भूल जाते हैं कि ज्ञान की आवश्यकता तो उन्हें ज्यादा है जिनके सामने भविष्य पड़ा है और उन्हें आवश्यकता है जो देश-समाज-विश्व के नीति का निर्माण करते हैं। मैंने एक आधार तैयार किया है जिससे आने वाली पीढ़ी और विश्व निर्माण-विकास-विस्तार के चिन्तक दोनों को एक दिशा प्राप्त हो सके। वे जो मशीनवत् लग गये हैं वे जहाँ लगे हैं सिर्फ वहीं लगे रहें, आखिर में वे भी तो संसार के विकास में ही लगे है उन्हें न सही उनके बच्चों को तो ज्ञान की जरूरत होगी। जिसके लिए वे एक लम्बा समय और धन उनके ऊपर खर्च करते हैं। मेरा मानना है कि गरीबी, बेरोजगारी इत्यादि का बहुत कुछ कारण ज्ञान, ध्यान, चेतना जैसे विषयों का मनुष्य के अन्दर अभाव होने से ही होता है। मनुष्य जीवन पर्यन्त रोजी-रोटी, धनोपार्जन इत्यादि के लिए भागता रहता है परन्तु यदि मात्र 6 महीने वह ज्ञान, ध्यान, चेतना जैसे विषयों पर पहले ही प्रयत्न कर ले तो उसके सामने विकास के अनन्त मार्ग खुल जाते हैं। ज्ञान, ध्यान, चेतना की यही उपयोगीता है जिसे लोग निरर्थक समझते हैं। बचपन से अनेक वर्षो तक माता-पिता-अभिभावक अपने बच्चों के विद्यालय में धन भेजते हैं, बच्चा वहाँ से कौन सा सामान लाता है, विचारणीय विषय है?
    तेज इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम के मोबाइल व इन्टरनेट के इस दुनिया में यह भी देखने को मिलता है कि लड़के-लड़कीयाँ अनेकांे लड़के-लड़कीयाँ से बात करते हुये स्वयं को कृष्ण-गोपीयों के भाव में देखने लगते हैं परन्तु उन्हें जानना चाहिए कि कृष्ण-गोपियों का भाव सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं था। कृष्ण केवल गोपियांे से बात ही नहीं करते थे बल्कि उन्हें एकात्म की सर्वोच्च अनुभूति का अनुभव भी कराते थें साथ ही कृष्ण व्यक्तिगत रूप से योगेश्वर अर्थात सभी योगो की विधि से युक्त, मित्र, प्रेमी, समन्वयी इत्यादि तथा सामाजिक रूप से राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, दार्शनिक, नवसृजन करने के लिए सम्यक कर्म, सम्यक ज्ञान व ध्यान इत्यादि गुणों से भी युक्त थे। इसलिए उन लड़के-लड़कीयाँे से विशेष निवेदन हैं कृष्ण के अपने लिए उपयोगी एक अंश गुण को धारण कर न बल्कि सम्पूर्ण कृष्ण बनने की ओर बढ़े तो उनके लिए भी तथा राष्ट्र के लिए भी उपयोगी होगा।
    इस छोटे से कार्य को सम्पन्न करने में सबसे आसान बात यह थी कि प्रत्येक मनुष्य अपनी-अपनी आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए इतना अधिक व्यस्त था कि वह व्यापक सार्वजनिक सोच से बहुत दूर हो चुका था। जो नौकरी पेशा थे वे कार्य किये, वेतन लिए और शेष समय वेतन वृद्धि और उससे सम्बन्धित चर्चा में ही व्यस्त रहते थे। जो विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर-लेक्चरर थे वे केवल अपना कर्तव्य निर्वाह कर रहे थे। वे विचारक थे परन्तु खोज के लिए त्यागी न थे। जो विद्यार्थी थे वे उतना ही ज्ञान प्राप्त इसलिए कर रहे थे जितने से वे एक अच्छा कैरियर प्राप्त कर अपने सुनहरे सपनों को साकार कर सकें। जो धर्माचार्य थे वे केवल वही पुराने शास्त्रों पर ही व्याख्यान करने में व्यस्त थे। जो राजनेता थे उन्हें सिर्फ वोट बैंक व पद की चिन्ता थी और आम जनता चुपचाप सभी को ढोने में व्यस्त थी, जितना वजन लाद दो सब ढोने के लिए तैयार और उम्मीद सरकार से। समय बदल चुका है अब विश्व-भारत को नये महापुरूष की आवश्यकता है। जो जिस विषय के लिए अपना समय खर्च करता है, समय भी उसी विषय में उसे फल देता है। मेरे जीवन की यह एक अलग यात्रा इसी शास्त्र के पीछे समय खर्च करने में लगी और समय ने फलरूप से यह शास्त्र दिया है।
    यह पृथ्वी, मन्दिर रूपी मेरा घर है जहाँ सोने व भोजन के लिए गुरूद्वारा है, समय से जोड़ने के लिए मस्जिद की पुकार है, प्रेम व कर्म करने के लिए सारी पृथ्वी है और गलती हो तो प्रायश्चित करने के लिए गिरजाघर (चर्च) है। ऐसे घर में कौन नहीं रहना चाहेगा? मैं तो इस घर में आने के लिए हजारों वर्षो से प्रतीक्षा कर रहा था और अब मैं आकर संतुष्ट, सुखी और मुक्ति की कामना के लिए आश्वस्त हूँ। अब आने वाले समय में जब भी एक आदर्श वैश्विक समाज का निर्माण करना हो तो किसी भी देश या विश्व के लिए राष्ट्रीय-वैश्विक गीत या गान ऐसा होना चाहिए जो नागरिकों में कत्र्तव्य और जोश की भावना का संचार करने वाली हो, न कि गुणगान, अभिनन्दन, भक्ति, हीनता, भाग्यवाद और अकर्मण्यता की भावना भरने वाली। अपराधिक कानून शारीरिक, आर्थिक व मानसिक अपराध के बढ़ते क्रम में कड़े दण्ड देने वाली और न्याय समय सीमा में बद्ध हो। इसी आधार पर नागरिको के उनके विकास के लिए विशेष अधिकार प्राप्त हो जो स्त्री-पुरूष के भेद-भाव से मुक्त हो। साथ ही पूर्णज्ञान का ज्ञानार्जन सबके लिए खुला हो। सभी जीवों की भाँति मनुष्य को भी भोजन का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त हो। साथ ही ऐसे तमाम बिन्दुओं को खोला जाय जहाँ धन के आदान-प्रदान की गति बाधित हो रही हो या इकट्ठा हो रहा हो क्योंकि आदान-प्रदान ही विकास है, रूकना ही विनाश है।
    ”विश्वशास्त्र“, विकास क्रम के उत्तरोत्तर विकास के क्रमिक चरणों के अनुसार लिखित है जिससे एक प्रणाली के अनुसार पृथ्वी पर हुए सभी व्यापार को समझा जा सके। फलस्वरूप मनुष्य के समक्ष व्यापार के अनन्त मार्ग खुल जाते हैं। किसी भी सिनेमा अर्थात फिल्म को बीच-बीच में से देखकर डाॅयलाग की भावना व कहानी को पूर्णतया नहीं समझा जा सकता। मनुष्य समाज में यही सबसे बड़ी समस्या है कि व्यक्ति कहीं से कोई भी विचार या वक्तव्य या कथा उठा लेता है और उस पर बहस शुरू कर देता है। जबकि उसके प्रारम्भ और क्रमिक विकास को जाने बिना समझ को विकसित करना असम्भव होता है। ज्ञान सूत्रों का संकलन और उसे चार वेदों में विभाजन, उसे समझने-समझाने के लिए उपनिषद्, पुराण इत्यादि के वर्गीकरण व क्रमिक विकास का कार्य सदैव चलता रहा है। काल और युग के अनुसार यह कार्य सदैव होता रहा है। जिससे समाज के सत्यीकरण का कार्य होता रहा है। सामाजिक विकास के क्षेत्र में परिवर्तन, देश-काल के परिस्थितियों के अनुसार किया जाता रहा है जबकि सत्यीकरण मूल सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से जोड़कर किया जाने वाला कार्य है। सत्यीकरण, अवतारों की तथा परिवर्तन मनुष्यों की कार्य प्रणाली है। इस क्रम में प्रयोग किया गया शास्त्र, अपने समस्त पिछले शास्त्रों का समर्थन व आत्मसात् करते हुए ही होता है, न कि विरोध। किसी भी विषय की शक्ति सीमा निर्धारित करना, उसका विरोध नहीं होता बल्कि उसे और आगे विकसित करने के बिन्दु को निर्धारित करता है।

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  •    विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-04

    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता)


    अधिकतम व्यक्ति ऐसा सोचते हैं कि ज्ञान का अन्त नहीं हो सकता और व्यक्ति ऐसा भी मानते हैं कि जिसका जन्म (प्रारम्भ) हुआ है उसका मृत्यु (अन्त) भी होता है। इस प्रकार यदि ज्ञान का प्रारम्भ हुआ है तो उसका अन्त भी होगा। इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी का कहना है कि ”विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है। ज्योंही कोई विज्ञान शास्त्र पूर्ण एकता तक पहुँच जायेगा, त्योंहीं उसका आगे बढ़ना रुक जायेगा क्योंकि तब तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुकेगा। उदाहरणार्थ रसायनशास्त्र यदि एक बार उस एक मूल द्रव्य का पता लगा ले, जिससे वह सब द्रव्य बन सकते हैं तो फिर वह और आगे नहीं बढ़ सकेगा। पदार्थ विज्ञान शास्त्र जब उस एक मूल शक्ति का पता लगा लेगा जिससे अन्य शक्तियां बाहर निकली हैं तब वह पूर्णता पर पहुँच जायेगा। वैसे ही धर्म शास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा जब वह उस मूल कारण को जान लेगा। जो इस मत्र्यलोक में एक मात्र अमृत स्वरुप है जो इस नित्य परिवर्तनशील जगत का एक मात्र अटल अचल आधार है जो एक मात्र परमात्मा है और अन्य सब आत्माएं जिसके प्रतिबिम्ब स्वरुप हैं। इस प्रकार अनेकेश्वरवाद, द्वैतवाद आदि में से होते हुए इस अद्वैतवाद की प्राप्ति होती है। धर्मशास्त्र इससे आगे नहीं जा सकता। यहीं सारे विज्ञानों का चरम लक्ष्य है। (राम कृष्ण मिशन, हिन्दू धर्म, पृष्ठ-16) यह समझना होगा कि धर्म के सम्बन्ध में अधिक और कुछ जानने को नहीं, सभी कुछ जाना जा चुका है। जगत के सभी धर्म में, आप देखियेगा कि उस धर्म में अवलम्बनकारी सदैव कहते हैं, हमारे भीतर एक एकत्व है अतएव ईश्वर के सहित आत्मा के एकत्व ज्ञान की अपेक्षा और अधिक उन्नति नहीं हो सकती। ज्ञान का अर्थ इस एकत्व का आविष्कार ही है। यदि हम पूर्ण एकत्व का आविष्कार कर सकें तो उससे अधिक उन्नति फिर नहीं हो सकती। (राम कृष्ण मिशन, धर्म विज्ञान, पृष्ठ-7)“। इस प्रकार हम पाते है कि ज्ञान का अर्थ सिर्फ सार्वभौम एकत्व है जिसका अन्त ”सार्वभौम सत्य“ के रूप में ”गीता“ द्वारा तथा ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ के रूप में ”विश्वशास्त्र“ द्वारा हो चुका है। इस ज्ञान के अलावा सभी ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी तथा समाज का ज्ञान है। अभी ज्ञान का अन्त हुआ है। फिर विज्ञान के ज्ञान का अन्त होगा और उसके बाद तकनीकी के ज्ञान का भी अन्त हो जायेगा। विज्ञान के अन्त ”गाॅड पार्टीकील“ अर्थात एक ऐसा कण जो ईश्वर की तरह हर जगह है और उसे देख पाना मुश्किल है जिसके कारण कणों में भार होता है, के खोज के लिए ही जेनेवा (स्विट्जरलैण्ड-फ्रंास सीमा पर) में यूरोपियन आर्गनाइजेशन फाॅर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) द्वारा रूपये 480 अरब के खर्च से महामशीन लगाई गई है। जिसमें 15000 वैज्ञानिक और 8000 टन की चुम्बक लगी हुई है।
    विभिन्न सम्प्रदाय (धर्म), जाति, मत, दर्शन इत्यादि में विभाजित इस मानव समाज में वर्तमान तथा आने वाले भविष्य के समय की मूल आवश्यकता है- मानव के मनों का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण। इसकी आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि मानव अपने विज्ञान व तकनीकी ज्ञान से प्राप्त संसाधनों का प्रयोग करते हुये, एक तरफ तो ब्रह्माण्ड की ओर चल पड़ा है तो दूसरी तरफ विध्वंस के लिए अनेक हथियारों का भी निर्माण कर चुका है। ऐसी स्थिति में हमें निश्चित रूप से ऐसे एकीकरण की आवश्यकता है जिससे हम इस पृथ्वी से मानसिक स्तर के विवादों को समाप्त कर सकें।
    माया सभ्यता के अनुसार विश्व के मानव समाज यह भी मान रहें थें कि 21 दिसम्बर, 2012 को दुनिया का अन्त हो जायेगा। जबकि हिन्दू धर्म शास्त्र विष्णु पुराण, भागवत पुराण, अग्नि पुराण, गरूड़ पुराण, पद्म पुराण इत्यादि में भगवान के दसवें और महाअवतार ”कल्कि“ का होना अभी शेष है। जिनसे कलियुग के अंधकार व विनाश को समाप्त करने का कार्य सम्पन्न होगा, साथ ही सत्ययुग का आरम्भ होगा। सिक्ख धर्म के पवित्र ग्रन्थ ”दशम् ग्रन्थ“ में भी ”कल्कि अवतार“ का वर्णन मिलता है। सृजन और विनाश का स्तर शारीरिक, आर्थिक व मानसिक होता है। जो एक व्यक्ति, समाज, देश और विश्व राष्ट्र के लिए होता है। व्यक्ति पर हुये शारीरिक, आर्थिक व मानसिक सृजन और विनाश को व्यक्ति ही अनुभव करता है परन्तु समाज, देश और विश्व राष्ट्र पर हुये शारीरिक, आर्थिक व मानसिक सृजन व विनाश को सार्वजनिक रूप से सभी देखते है। समाज, देश और विश्व राष्ट्र पर शारीरिक व आर्थिक सृजन और विनाश वर्तमान में तो चल ही रहा है जिसे सार्वजनिक रूप से मानव समाज देख रहा है।
    भौतिकवादी पश्चिमी संस्कृति किसी भी सृजन व विनाश को मानसिक स्तर पर सोच ही नहीं सकता क्योंकि वह समस्त क्रियाकलाप को वाह्य जगत में ही घटित होता समझता व समझाता है जबकि वर्तमान समय मानसिक स्तर पर विनाश व सृजन का है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि माया सभ्यता के अनुसार 21 दिसम्बर, 2012 को जो विनाश व सृजन होना था, वह मानसिक स्तर का ही है। जिसके परिणामस्वरूप सभी सम्प्रदाय, मत, दर्शन एक उच्च स्तर के विचार या सत्य में विलीन अर्थात विनाश को ”विश्वशास्त्र“ से प्राप्त कर चुका है। फलस्वरूप उच्च स्तर के विचार या सत्य में स्थापित होने से सृजन का मार्ग खुल चुका है। कुल मिलाकर माया सभ्यता के कैलेण्डर का अन्त तिथि 21 दिसम्बर, 2012, दुनिया के अन्त की तिथि नहीं थी बल्कि वह वर्तमान युग के अन्त की अन्तिम तिथि और नये युग के आरम्भ की तिथि थी। ईश्वर भी इतना मूर्ख व अज्ञानी नहीं है कि वह स्वयं को इस मानव शरीर में पूर्ण व्यक्त किये बिना ही दुनिया को नष्ट कर दे। इसके सम्बन्ध में हिन्दू धर्म शास्त्रो में सृष्टि के प्रारम्भ के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”ईश्वर ने इच्छा व्यक्त की कि मैं एक हँु, अनेक हो जाऊँ“। इस प्रकार जब वही ईश्वर सभी में है तब निश्चित रूप से जब तक सभी मानव ईश्वर नहीं हो जाते तब तक दुनिया के अन्त होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। और विकास क्रम चलता रहेगा। 21 दिसम्बर, 2012 के बाद का समय नये युग के प्रारम्भ का समय है जिसमें ज्ञान, ध्यान, चेतना, भाव, जन, देश, विश्व राष्ट्र, आध्यात्मिक जागरण, मानवता इत्यादि का विश्वव्यापी विकास होगा। परिणामस्वरूप सभी मानव को ईश्वर रूप में स्थापित होने का अवसर प्राप्त होगा। और यही विश्व मानव समाज की मूल आवश्यकता है। प्राचीन वैदिक काल में समाज को नियंत्रित करने के लिए ज्ञानार्जन सबके लिए खुला नहीं था परन्तु वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता यह है कि समाज को नियंत्रित करने के लिए सभी को पूर्ण ज्ञान से युक्त कर सभी के लिए ज्ञान को खोल दिया जाय। यही कारण था कि वेद को प्रतीकात्मक रूप में लिख कर गुरू-शिष्य परम्परा द्वारा उसकी व्याख्या की जाती रही थी जिससे राजा और समाज को नियंत्रण में रखा जा सके। 

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  •     विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-05

    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता)

    ईश्वर, अवतार व गुरू के सम्बन्ध में समझ पैदा करने के लिए स्वामी विवेकानन्द जी का कहना है- ”जिस प्रकार मानवी शरीर एक व्यक्ति है और उसका प्रत्येक सूक्ष्म भाग जिसे हम ”कोश“ कहते हैं एक अंश है। उसी प्रकार सारे व्यक्तियों का समष्टि ईश्वर है, यद्यपि वह स्वयं भी एक व्यक्ति है। समष्टि ही ईश्वर है, व्यष्टि या अंश जीव है। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व जीवों के अस्तित्व पर निर्भर है जैसे कि शरीर का उसके सूक्ष्म भाग पर और सूक्ष्म भाग का शरीर पर। इस प्रकार जीव और ईश्वर परस्परावलम्बी हैं। जब तक एक का अस्तित्व है तब तक दूसरे का भी रहेगा। और हमारी इस पृथ्वी को छोड़कर अन्य सब उँचे लोकों में शुभ की मात्रा अशुभ से अधिक होती है। इसलिए वह समष्टि स्वरुप ईश्वर शिव स्वरुप, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ कहा जा सकता है। ये गुण प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। ईश्वर से सम्बद्ध होने के कारण उन्हें प्रमाण करने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म इन दोनों से परे है और वह कोई विशिष्ट अवस्था नहीं है वह एक ऐसी वस्तु है जो अनेकों की समष्टि से नहीं बनी है। वह एक ऐसी सत्ता है जो सूक्ष्मातित-सूक्ष्म से लेकर ईश्वर तक सब में व्याप्त है और उसके बिना किसी का अस्तित्व नहीं हो सकता सभी का अस्तित्व उसी सत्ता या ब्रह्म का प्रकाश मात्र है। जब मैं सोचता हूँ ”मैं ब्रह्म हूँ“ तब मेरा यथार्थ अस्तित्व होता है ऐसा ही सबके बारे में है विश्व की प्रत्येक वस्तु स्वरुपतः वही सत्ता है (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-18, राम कृष्ण मिशन)“, ”सबका स्वामी (परमात्मा) कोई व्यक्ति विशेष नहीं हो सकता, वह तो सबकी समष्टि स्वरुप ही होगा। वैराग्यवान मनुष्य आत्मा शब्द का अर्थ व्यक्तिगत ”मैं“ न समझकर, उस सर्वव्यापी ईश्वर को समझता है जो अन्तर्यामी होकर सबमें वास कर रहा हो। वे समष्टि के रुप में सब को प्रतीत हो सकते हैं ऐसा होते हुए जब जीव और ईश्वर स्वरुपतः अभिन्न हैं, तब जीवों की सेवा और ईश्वर से प्रेम करने का अर्थ एक ही है। यहाँ एक विशेषता है। जब जीव को जीव समझकर सेवा की जाती है तब वह दया है, किन्तु प्रेम नहीं। परन्तु जब उसे आत्मा समझकर सेवा करो तब वह प्रेम कहलाता है। आत्मा ही एक मात्र प्रेम का पात्र है, यह श्रुति, स्मृति और अपरोक्षानुभूति से जाना जा सकता है। (पत्रावली, भाग-2, पृष्ठ-109, राम कृष्ण मिशन)“, ”स ईशोऽनिर्वचनीयप्रेमस्वरुपः“- ईश्वर अनिर्वचनीय प्रेम स्वरुप है। नारद द्वारा वर्णन किया हुआ ईश्वर का यह लक्षण स्पष्ट है और सब लोगों को स्वीकार है। यह मेरे जीवन का दृढ़ विश्वास है। बहुत सेे व्यक्तियों के समूह कांे समष्टि कहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टि कहलाता है आप और मैं दोनों व्यष्टि हैं, समाज समष्टि है आप और मैं- पशु, पक्षी, कीड़ा, कीड़े से भी तुक्ष प्राणी, वृक्ष, लता, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे यह प्रत्येक व्यष्टि है और यह विश्व समष्टि है जो कि वेदान्त में विराट, हिरण गर्भ या ईश्वर कहलाता है। और पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, देवी इत्यादि। व्यष्टि को व्यक्तिशः स्वतन्त्रता होती है या नहीं, और यदि होती है तोे उसका नाम क्या होना चाहिए। व्यष्टि को समष्टि के लिए अपनी इच्छा और सुख का सम्पूर्ण त्याग करना चाहिए या नहीं, ये प्रत्येक समाज के लिए चिरन्तन समस्याएँ हैं सब स्थानों में समाज इन समस्याओं के समाधान में संलग्न रहता है ये बड़ी-बड़ी तरंगों के समान आधुनिक पश्चिमी समाज में हलचल मचा रही हैं जो समाज के अधिपत्य के लिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का त्याग चाहता है वह सिद्धान्त समाजवाद कहलाता है और जो व्यक्ति के पक्ष का समर्थन करता है वह व्यक्तिवाद कहलाता है। (पत्रावली, भाग-2, पृष्ठ-288, राम कृष्ण मिशन)“, ”ईश्वर उस निरपेक्ष सत्ता की उच्चतम अभिव्यक्ति है, या यों कहिए, मानव मन के लिए जहाँ तक निरपेक्ष सत्य की धारणा करना सम्भव है, बस वहीं ईश्वर है। सृष्टि अनादि है और उसी प्रकार ईश्वर भी अनादि है (भक्ति योग, पृष्ठ-13, राम कृष्ण मिशन)“, ”यह सारा झगड़ा केवल इस ”सत्य“ शब्द के उलटफेर पर आधारित है। ”सत्य“ शब्द से जितने भाव सूचित होते हैं वे समस्त भाव ”ईश्वर भाव“ में आ जाते हैं। ईश्वर उतना ही सत्य है जितनी विश्व की कोई अन्य वस्तु। और वास्तव में, ”सत्य“ शब्द यहाँ पर जिस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, उससे अधिक ”सत्य“ शब्द का कोई अर्थ नहीं। यहीं हमारी ईश्वर सम्बन्धी दार्शनिक धारणा है। (भक्ति योग, पृष्ठ-21, राम कृष्ण मिशन)“, ”गुरु के सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि उन्हें शास्त्रो का मर्म ज्ञान हो। वैसे तो सारा संसार ही बाइबिल, वेद, पुराण पढ़ता है, पर वे तो केवल शब्द राशि है। धर्म की सूखी ठठरी मात्र है। जो गुरु शब्दाडंबर के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिनका मन शब्दों की शक्ति में बह जाता है, वे भीतर का मर्म खो बैठते हैं। जो शास्त्रों के वास्तविक मर्मज्ञ हैं, वे ही असल में सच्चे धार्मिक गुरु हैं (भक्ति योग, पृष्ठ-32, राम कृष्ण मिशन)“, ”हम गुरु बिना कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। अब बात यह है कि यदि मनुष्य, देवता अथवा कोई स्वर्गदूत हमारे गुरु हो, तो वे भी तो ससीम है; फिर उनसे पहले उनके गुरु कौन थे? हमें मजबूर होकर यह चरम सिद्धान्त स्थिर करना ही होगा कि एक ऐसे गुरु हैं, जो काल के द्वारा सीमाबद्ध या अविच्छिन्न नहीं है। उन्हीं अनन्तज्ञानसम्पन्न गुरु को, जिनका आदि भी नहीं और अन्त भी नहीं, ईश्वर कहते हैं। (राजयोग, पृष्ठ-134, राम कृष्ण मिशन)“, ”संसार के प्रधान आचार्यों में से कोई भी शास्त्रों की इस प्रकार नानाविध व्याख्या करने के झमेले में नहीं पड़ा। उन्होनें श्लोकों के अर्थ में खींचातानी नहीं की। वे शब्दार्थ और भावार्थ के फेर मंे नहीं पड़े। फिर भी उन्होंने संसार को बड़ी सुन्दर शिक्षा दी। इसके विपरीत, उन लोगों ने जिनके पास सिखाने को कुछ भी नहीं, कभी एकाध शब्द को ही पकड़ लिया और उस पर तीन भागों की एक मोटी पुस्तक लिख डाली, जिसमें सब अनर्थक बातें भरी हैंे (भक्ति योग, पृष्ठ-33, राम कृष्ण मिशन)“, ”साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, और वे हैं-इस संसार में ईश्वर के अवतार। वे केवल स्पर्श से, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही आध्यात्मिकता प्रदान कर सकते हैं। उनकी इच्छा मात्र से पतित से पतित व्यक्ति क्षण मात्र में साधु हो जाता है। वे गुरुओं के भी गुरु हैं-नरदेहधारी भगवान हैं। (भक्तियोग, पृष्ठ-39, राम कृष्ण मिशन)“, ”अवतार का अर्थ है जीवनमुक्त अर्थात् जिन्होंने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है। अवतार विषयक और कोई विशेषता मेरी दृष्टि में नहीं है। ब्रह्मादिस्तम्यपर्यत्त सभी प्राणी समय आने पर जीवनमुक्ति को प्राप्त करेंगे, उस अवस्था विशेष की प्राप्ति में सहायक बनना ही हमारा कर्तव्य है। इस सहायता का नाम धर्म है बाकी कुधर्म है। इस सहायता का नाम कर्म है। बाकी कुकर्म है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-328, राम कृष्ण मिशन)“। इस प्रकार यह अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिए कि अवतार, गुरू, माता-पिता इत्यादि ईश्वर तुल्य हो सकते हैं परन्तु ईश्वर नहीं।
    मैं ही इस शास्त्र का विचारक हूँ, आविष्कारक हूँ, प्रारूप एवं स्थापनार्थ नीति निर्धारणकर्ता हूँ, लिपिबद्धकर्ता हूँ, सम्पादक हूँ, यहाँ तक कि कम्प्यूटराइज्ड टाइप सेटिंगकर्ता भी हूँ और इसमें मैं स्वयं हूँ। मैंने इस शास्त्र के माध्यम से स्वयं को ”अन्तिम, पूर्णावतार और महावतार कल्कि“, जिसे मेरे जन्म से पहले ही समाज ने सम्बोधित कर रखा है, प्रस्तुत किया है और वह इसलिए किया है कि मेरे जीवन, ज्ञान व कर्म तथा संसार-समाज में उपलब्ध आॅकड़े इस ओर ही निर्देश करते हैं और उसे मंैने पूरी ईमानदारी, निष्पक्षता और सर्वव्यापकता के साथ प्रस्तुत किया है। यह पद समाज का एक मात्र सर्वोच्च और अन्तिम पद है जो मेरे शरीर धारण के पूर्व ही समाज द्वारा सृजित है। जिस पर कोई भी योग्यता प्रस्तुत कर अपने को स्थापित कर सकता है। जिसका निर्णय वोटांे (मत पत्रांे या एस.एम.एस) द्वारा नहीं बल्कि योग्यता द्वारा तय होना है। जिसके अनेक स्वघोषित दावेदार है। जिन्हें इन्टरनेट (www.google.com, www.youtube.com) पर ”कल्कि अवतार (KALKI AVATAR)“ सर्च कर देखा जा सकता है और मुझे और शास्त्र के विषय में लव कुश सिंह ”विश्वमानव“, सत्यकाशी, विश्वशास्त्र, विश्वमानव (LAVA KUSH SINGH “VISHWMANAV”, SATYAKASHI, VISHWSHASTRA, VISHWMANAV) इत्यादि से पाया जा सकता है। उनमें से एक मैं भी हूँ- नाम, रूप, गुण, कर्म से योग्य और ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह सब मेरे द्वारा इस जीवन में अर्जित किया गया है। इस शास्त्र के माध्यम से मैंने इसे सिद्ध किया है और जिसे समाज के मुझे जानने वाले देख भी रहे हैं। और मैं सत्य रूप में यही हूँ-मानो या न मानो या जब समझ में आये तभी से मानो या न भी मानो तो कम से कम व्यक्ति, देश व विश्व के विकास के लिए ”विश्वशास्त्र“ में कुछ उपयोगी हो तो ग्रहण कर लो, या जो समझ में आये वो करो। प्रत्येक विषय के दो पहलू होते हैं और वे एक दूसरे को पूर्णता प्रदान करते है। अंधकार है तो प्रकाश है, मुद्रा (भारत में रूपया) जिसके पीछे मनुष्यों का सारा जीवन संघर्षमय रहता है वह भी दोनों तरफ से सत्य न हो तो बेकार होता है। इसी प्रकार साकार है तो निराकार है, निराकार है तो साकार है। चाहे तो मुझे साकार विश्वात्मा समझ सकते हो। कुछ नहीं समझ सकते तो शातिर अपराधी, भ्रष्टाचारी, आंतकवादी की तरह इस समस्त अस्तित्व के भोग के लिए योगमाया का प्रयोग करने वाला शातिर चालाक, बुद्धिमान और महत्वाकंाक्षी तो समझ ही सकते हो, लेकिन कुछ न कुछ तो समझना ही पड़ेगा। क्योंकि कार्य रूप में यह ”विश्वशास्त्र“ आपके समक्ष है तो कारण को कुछ न कुछ तो नाम देना ही पड़ेगा। हम सभी श्रीराम और श्रीकृष्ण के होने न होने पर अन्तहीन तर्क व बहस प्रस्तुत कर सकते हैं परन्तु वाल्मिकि, महर्षि व्यास और गोस्वामी तुलसीदास के न होने पर पर तर्क नहीं दे सकते क्योंकि उनकी कृति क्रमशः रामायण, महाभारत और रामचरितमानस हमारे समक्ष उपस्थित है। इन कृतियों में उनके नायक उनसे अलग थे इसलिए नायक का होना, न होना तर्क का विषय था परन्तु इस ”विश्वशास्त्र“ का नायक और इसका रचनाकार मै स्वयं हूँ। अब यह भी एकीकृत है।
    अभी तक जितने अवतार हुये, उन्हें लोग उनके कर्म करके जाने के बाद ही जान पाये हैं। कल्कि अवतार एक ऐसा अन्तिम अवतार है जिसके कर्म पहले से ही निर्धारित है और समय इतना भ्रमित किया गया है कि कल्कि अवतार आ कर व अपना कार्य पूर्ण कर चले भी जायें तो भी समाज उनकी प्रतिक्षा ही करता रह जायेगा। बिना युद्ध के ही विजय प्राप्त करके जाने की सुविधा इस अन्तिम अवतार-कल्कि अवतार को प्राप्त होगी और वह समाज द्वारा तब जाना जायेगा जब उसके कर्म के उपयोग के बिना समस्याओं का हल और विकास सम्भव न होगा। ब्रह्माण्ड की समस्त गति गोलाकार होते हुये विकास क्रम तरंगाकार रूप में व्यक्त है। मनुष्य के सकारात्मक सोच की गति भी गोलाकार और विकास क्रम तरंगाकार रूप में ही है। ”विश्वशास्त्र“ वही गोलाकार चक्कर है जहाँ तक मनुष्य अपने तरंगाकार विकास क्रम की गति से इसमें ही अन्तिम गति करेगा। जब भी ”स्व“ या ”जन“ या ”लोक“ के ”राज“ या ”तन्त्र“ की सत्य स्थापना करनी होगी, उस समय बिना ”विश्वशास्त्र“ से मार्गदर्शन प्राप्त किये सम्भव नहीं हो सकेगा। तब ”कल्कि अवतार“ कौन है?, कौन था?, क्यों है?, क्यों था? जैसे विषयों का हल स्वयं ही प्राप्त हो जायेगा। 100 प्रतिशत साकार से साकार का युद्ध श्रीराम कर चुके है। 50-50 प्रतिशत साकार और निराकार का युद्ध श्रीकृष्ण कर चुके हैं। अब 100 प्रतिशत निराकार से निराकार का युद्ध का क्रम है और इस युद्ध से जो प्रकाशमय चिंगारी निकलेगी, उससे इस मार्ग की सूचना सभी को मिलेगी और मार्ग दिखाई देगा, जिसपर मानव अपनी ईश्वरीय मानव बनने की यात्रा प्रारम्भ करेंगें। यह युद्ध आवश्यक है क्योंकि अवतारों को पहचानना, जानना और मानना स्वयं मनुष्यों के भी वश की बात नहीं। इतनी आसानी से पहचानना, जानना और मानना हो जाता तो न रामायण होती, न महाभारत होता और न ही विश्वभारत समाहित यह विश्वशास्त्र होता। ध्यान देने के योग्य यह है कि- सत्य से कुछ भी नहीं छोड़ा जा सकता और सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है।

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  •     विश्वशास्त्र की भूमिका        भाग-06

    (शास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिष्क की आवश्यकता)


    मुझे कभी भी ऐसा कोई खेल पसन्द नहीं था जिसमें बार-बार हार और जीत होती रहे। मैंने एक यही खेल खेला-एक बार हार या एक बार जीत जिसके लिए मैंने अपने जीवन के 20 वर्ष (सन् 1992-2012) सभी सांसारिक कर्म को करते हुये लगाये। जिसमें इस कार्य का मुख्य कार्यकाल अक्टुबर, 1995 से दिसम्बर, 2001 तक (शास्त्र का मूल सिद्धान्त का लेखन समय) तथा जुलाई, 2010 से दिसम्बर, 2012 तक रहा है। इस समय में हमारे हम उम्र परिचितांे में से अनेक ने अच्छी नौकरी व अच्छा धन अर्जित कियें। उनको देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। जब भी उन्हें यह पता चले कि मैंने यह कार्य किया है और उनका एक परिचित भी ”अन्तिम अवतार“ के ओलम्पिक खेल का एक प्रतिभागी है तो उन्हें भी खुशी होगी ऐसी आशा करता हूँ। बहुत से मेरे परिचित व्यक्ति जो मुझसे सिर्फ परिचित हैं और ऐसे परिचित जिन्हें इस शास्त्र के पूर्ण करने के समय तक भी, उनका कोई योगदान इस सकारात्मक श्रृंखला के योग्य नहीं हो सका इसका मुझे अत्यन्त दुःख है। मेरे अनेक शुभचिन्तक समय-समय पर मुझे अनेक जीवकोपार्जन के उपाय सुझाते रहे, जिससे मैं एक सुखमय जीवन प्राप्त कर सकूँ। मैं उनका सदैव आभारी हूँ परन्तु उनके सुझावों पर मैं कभी नहीं चल पाया इसका मुझे दुःख है। मैं ”कल्कि अवतार“ के योग्य हूँ या नहीं यह बाद की बात है लेकिन वर्तमान में इससे यह लाभ है कि समाज इस पद की योग्यता के लिए चर्चा व चिंतन अवश्य करेगा जिसका फल ज्ञान के विकास के रूप में समाज को प्राप्त होगा। मेरे विचार से ”नेशनल साइबर ओलंपियाड (NCO)“, ”नेशनल साइंस ओलंपियाड (NSO)“, ”इन्टरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड (IMO)“, ”इन्टरनेशनल इंग्लिश ओलंपियाड (IEO)“ की भाँति ”विश्व कल्कि ओलंपियाड (WKO)“ का भी आयोजन होना चाहिए जिससे इस विश्व के एकीकरण, शान्ति, एकता, स्थिरता, विकास, सुरक्षा, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग व पूर्ण शिक्षा के लिए मस्तिष्क की खोज हो सके।
    सभी मानव को ईश्वर रूप में स्थापित होने के लिए जो माध्यम चाहिए वह है- ”सत्य शिक्षा“ से मानव को शिक्षित करना। इस आवश्यकता हेतू ही ”पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way)“ का कार्यक्रम बनाया गया है जिससे इस विषय को बिना शिक्षा पाठ्यक्रम बदले अलग से पूरक र्के रूप में नागरिकों तक पहुँचाया जा सके। और भविष्य में शिक्षा पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से अध्ययन के लिए शामिल कराया जा सके। 
    शास्त्र को पूर्ण करने के उपरान्त इसके गुणों के आधार पर धर्म और धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव क्षेत्र से अनेकों नाम निकलकर आये जो क्यों हैं, इसका भी स्पष्टीकरण इस शास्त्र में दिया गया है। फिर भी एक सर्वोच्च और सर्वमान्य नाम की आवश्यकता थी इसलिए इस शास्त्र का नाम ”विश्वशास्त्र“ रखा गया तथा एक संक्षिप्त वाक्य ;ज्ंह स्पदमद्ध के विचार पर पाँच वाक्य 1. ”विश्व का अन्तिम ज्ञान (The final knowledge of world)“, 2. ”भारत का अन्तिम ज्ञान (The final knowledge of India)“, 3. ”ज्ञान का अन्त (The end of knowledge)“, 4. ”अन्तिम कार्य योजना का ज्ञान (The knowledge of final action plan)“, 5. ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (The Knowledge of final knowledge)“ और 6. ”ज्ञान समकक्षीकरण (The knowledge Equalizer)“ सामने आये। जिस पर विश्वशास्त्र के समीक्षक द्वय डाॅ0 राम व्यास सिंह व डाॅ0 कन्हैया लाल के विचारों से संक्षिप्त वाक्य ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (The Knowledge of final knowledge)“ के लिए सहमति व्यक्त की गयी। इनके प्रति मैं आभारी हूँ।
    प्रत्येक बच्चे की भाँति मैं भी एक बच्चे के रूप से ही इस अवस्था तक आया हूँ। बस आप में और मुझमें यह अन्तर है कि मैं अपने बचपन से स्वयं को महान समझता था जो आप भी थे। इस महानता को मंैने कभी नहीं भूला। यह अलग बात है कि उसे सिद्ध करने में इतने वर्ष लग गये परन्तु आप लोग भी महान हैं यह बात आप लोग भूल गये और न ही उसे सिद्ध करने की कोशिश की। जो धर्म की रक्षा करने के लिए स्वयं को कठिन परिस्थितियों में डालता है या कठिन परिस्थितियों में भी धर्म को नहीं भूलता ईश्वर और धर्म उन्हीं में अवतरित होता है। जिस प्रकार आप अपने परिवार के संरक्षण, व्यवस्था और विकास के लिए सजग रहकर कर्म करते हैं उसी प्रकार मैं भी अपने विश्व परिवार के लिए सदैव सजग रहकर प्रत्येक युग में कर्म करता रहा हूँ। आपका व्यक्तिगत परिवार, हमारे विश्व परिवार की इकाई है, इसलिए यह न सोचे कि यह कार्य आपके लिए नहीं हुआ है।
    हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप भी उस मन स्तर और व्यापक हृदय पर स्थित होकर ही इस शास्त्र का अध्ययन, चितंन व मनन करेंगें जिससे आपका मस्तिष्क पूर्णता को प्राप्त हो सके। आपका मस्तिष्क पूर्णता को प्राप्त करे और इस सुन्दर संसार को और भी सुन्दर बनाने के लिए शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से सक्रिय हों, यही सबसे बड़ा धर्म और धार्मिक कार्य होगा। अन्त में-

    माँफ करना ऐ भारत, मंजिल पर आया हूँ थोड़ी देर से। 
    मोहब्बत पड़ावो को भी थी, हक उनका अदा करना था।

    - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ 
    आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी
    अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान - ”भारत रत्न“

     

     

      ”प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया“ - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

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  • “विश्वशास्त्र” साहित्य समीक्षा     भाग-01


    वीर युग के श्रीराम जो एक सत्य और मर्यादा के विग्रह, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, पिता थे। वे भी हमारी तरह भौतिक शरीर वाले ही मनुष्य थे। भगवान श्रीकृष्ण जिन्होंने ”मैं, अनासक्त कर्म और ज्ञान योग“, स्वामी विवेकानन्द जिन्होंने ”विश्व धर्म के लिए वेदान्त की व्यावहारिकता“, शंकराचार्य जिन्होंने ”मैं और शिव“, महावीर जिन्होने ”निर्वाण“, गुरू नानक जिन्होंने ”शब्द शक्ति“, मुहम्मद पैगम्बर जिन्होंने ”प्रेम और एकता“, ईसामसीह जिन्होंने ”प्रेम और सेवा“, भगवान बुद्ध जिन्होंने ”स्वयं के द्वारा मुक्ति, अहिंसा और ध्यान“ जैसे विषयांे को इस ब्रह्माण्ड के विकास के लिए अदृश्य ज्ञान को दृश्य रूप में परिवर्तित किये, वे सभी हमारी तरह भौतिक शरीर वाले ही थे। अन्य प्राचीन ऋषि-मुनि गण, गोरख, कबीर, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती, आचार्य रजनीश ”ओशो“, महर्षि महेश योगी, बाबा रामदेव इत्यादि स्वतन्त्रता आन्दोलन मंे रानी लक्ष्मी बाई, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, पं0 जवाहर लाल नेहरू इत्यादि। स्वतन्त्र भारत में डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद, डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर, श्रीमती इन्दिरा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गँाधी, अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि और अन्य जिन्हंे हम यहाँ लिख नहीं पा रहे है। और वे भी जो अपनी पहचान न दे पाये लेकिन इस ब्रह्माण्डीय विकास में उनका योगदान अवश्य मूल रूप से है, वे सभी हमारी तरह भौतिक शरीर युक्त ही थे या हैं। फिर क्या था कि वे सभी आपस में विशेषीकृत और सामान्यीकृत महत्ता के वर्ग में बाँटे जा सकते हैं या बाँटे गये हंै? उपरोक्त महापुरूषों के ही समय में अन्य समतुल्य भौतिक शरीर भी थे। फिर वे क्यों नहीं उपरोक्त महत्ता की श्रंृखला में व्यक्त हुये?
    उपरोक्त प्रश्न जब भारतीय दर्शन शास्त्र से किया जाता है। तो साख्य दर्शन कहता है- प्रकृति से, वैशेषिक दर्शन कहता है-काल अर्थात समय से, मीमांसा दर्शन कहता है- कर्म से, योग दर्शन कहता है- पुरूषार्थ से, न्याय दर्शन कहता है- परमाणु से, वेदान्त दर्शन कहता है- ब्रह्म से, कारण एक हो, अनेक हो या सम्पूर्ण हो, उत्तर यह है- अंतः शक्ति और बाह्य शक्ति से। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन मंे कुछ लोगो ंने बाह्य शक्ति का प्रयोग किया तो कुछ लोगो ने बाह्य शक्ति प्रयोगकर्ता के लिए आत्म शक्ति बनकर अन्तः शक्ति का प्रयोग किया। अन्तः शक्ति ही आत्म शक्ति है। यह आत्मशक्ति ही व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्ति होती है। इस अन्तः शक्ति का मूल कारण सत्य-धर्म-ज्ञान है अर्थात एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म और एकात्म ध्यान। एकात्म ध्यान न हो तो एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म स्थायित्व प्राप्त नहीं कर पाता। यदि सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह इत्यादि बाह्य जगत के क्रान्तिकारी थे तो स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि अरविन्द अन्तः जगत के क्रान्तिकारी थे।
    स्वामी विवेकानन्द मात्र केवल भारत की स्वतंत्रता की आत्म शक्ति ही नहीं थे बल्कि उन्होंने जो दो मुख्य कार्य किये वे हैं- स्वतन्त्र भारत की व्यवस्था पर सत्य दृष्टि और भारतीय प्राच्य भाव या हिन्दू भाव या वेदान्तिक भाव का विश्व में प्रचार सहित शिव भाव से जीव सेवा। ये दो कार्य ही भारत की महानता तथा विश्व गुरू पद पर सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रूप से पीठासीन होने के आधार है। वेदान्तिक भाव और शिव भाव से जीव सेवा तो वर्तमान में उनके द्वारा स्थापित ”रामकृष्ण मिशन“ की विश्वव्यापी शाखाओं द्वारा पिछले 110 वर्षाे से मानव जाति को सरोबार कर रहा है। वहीं भारत की व्यवस्था पर सत्य दृष्टि आज भी मात्र उनकी वाणियों तक ही सीमित रह गयी। उसका मूल कारण सत्य-धर्म-ज्ञान आधारित भारत, जिस धर्म को विभिन्न मार्गाे से समझाने के लिए विभिन्न अर्थ युक्त प्रक्षेपण जैसे मूर्ति, पौराणिक कथाआंे इत्यादि को प्रक्षेपित किया था, आज भारत स्वयं उस अपनी ही कृति को सत्य मानकर उस धर्म और सत्य-सिद्धान्त से बहुत दूर निकल आया। परिणाम यहाँ तक पहुँच गया कि जो हिन्दू धर्म समग्र संसार को अपने में समाहित कर लेने की व्यापकता रखता था, वह संकीर्ण मूर्तियांे तथा दूसरे धर्माे, पंथो के विरोध और तिरस्कार तक सीमीत हो गया। यह उसी प्रकार हो गया जैसे वर्तमान पदार्थ विज्ञान और तकनीकी से उत्पन्न सामान्य उपकरण पंखा, रेडियो, टेलीविजन इत्यादि को आविष्कृत करने वाले इसे ही सत्य मान लें और इन सब को क्रियाशील रखने वाले सिद्धान्त को भूला दे। लेकिन क्या भारत का वह धर्म-सत्य-सिद्धान्त अदृश्य हो जायेगा। तब तो भारत का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। लेकिन भारत का इतिहास साक्षी है कि भारत मंे कभी भी ऐसे महापुरूषांे का अभाव नहीं रहा जिनमें सम्पूर्ण विश्व को हिला देने वाली आध्यात्मिक शक्ति का अभाव रहा हो और मात्र यही तपोभूमि भारत की अमरता का मूल रहा है। जिस पर भारतीयांे को गर्व रहा है।
    वर्तमान समय मंे भारत को पुनः और अन्तिम कार्य से युक्त ऐसे महापुरूष की आवश्यकता थी जो न तो राज्य क्षेत्र का हो, न ही धर्म क्षेत्र का। कारण दोनों क्षेत्र के व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमता का सर्वोच्च और अन्तिम प्रदर्शन कर चुके है जिसमंे सत्य को यथारूप आविष्कृत कर प्रस्तुत करने, उसे भारतभूमि से प्रसारित करने, अद्धैत वेदान्त को अपने ज्ञान बुद्धि से स्थापित करने, दर्शनांे के स्तर को व्यक्त करने, धार्मिक विचारों को विस्तृत विश्वव्यापक और असीम करने, मानव जाति का आध्यात्मिकरण करने, धर्म को यथार्थ कर सम्पूर्ण मानव जीवन में प्रवेश कराने, आध्यात्मिक स्वतन्त्रता अर्थात मुक्ति का मार्ग दिखाने, सभी धर्मो से समन्वय करने, मानव को सभी धर्मशास्त्रों से उपर उठाने, दृश्य कार्य-कारणवाद को व्यक्त करने, आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ लाने, वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान को प्रस्तुत करने और उसे घरेलू जीवन में परिणत करने, भारत के आमूल परिर्वतन के सूत्र प्रस्तुत करने, युवकों को गम्भीर बनाने, आत्मशक्ति से पुनरूत्थान करने, प्रचण्ड रजस की भावना से ओत प्रोत और प्राणो तक की चिन्ता न करने वाले और सत्य आधारित राजनीति करने की संयुक्त शक्ति से युक्त होकर व्यक्त हो और कहे कि जिस प्रकार मैं भारत का हूँ उसी प्रकार मैं समग्र जगत का भी हूँ। उपरोक्त समस्त कार्याे से युक्त हमारी तरह ही भौतिक शरीर से युक्त विश्वधर्म, सार्वभौमधर्म, एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म, एकात्म ध्यान, कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद (धर्मयुक्त शास्त्र ) अर्थात विश्वमानक शून्य श्रंृखला-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक (धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव शास्त्र), सत्य मानक शिक्षा, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी - WCM-TLM-SHYAM.C, भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel), विकास दर्शन, विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम, 21वीं शदी का कार्यक्रम और पूर्ण शिक्षा प्रणाली, विवाद मुक्त तन्त्रों पर आधारित संविधान, निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम से युक्त भगवान विष्णु के मुख्य अवतारों में दसवाँ-अन्तिम और कुल 24 अवतारों में चैबीसवाँ-अन्तिम निष्कलंक कल्कि और भगवान शंकर के बाइसवें-अन्तिम भोगेश्वर अवतार के संयुक्त पूर्णावतार श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ (स्वामी विवेकानन्द की अगली एवं पूर्ण ब्रह्म की अन्तिम कड़ी), स्व प्रकाशित व सार्वभौम गुण से युक्त 8वें सांवर्णि मनु, काल को परिभाषित करने के कारण काल रूप, युग को परिभाषित व परिवर्तन के कारण युग परिवर्तक, शास्त्र रचना के कारण व्यास के रूप मंे व्यक्त हैं जो स्वामी विवेकानन्द के अधूरे कार्य स्वतन्त्र भारत की सत्य व्यवस्था को पूर्ण रूप से पूर्ण करते हुये भारत के इतिहास की पुनरावृत्ति है जिस पर सदैव भारतीयों को गर्व रहेगा। उस अनिर्वचनीय, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, मुक्त एवं बद्ध विश्वात्मा के भारत में व्यक्त होने की प्रतीक्षा भारतवासियो को रही है। जिसमंे सभी धर्म, सर्वाेच्च ज्ञान, सर्वाेच्च कर्म, सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त इत्यादि सम्पूर्ण सार्वजनिक प्रमाणित व्यक्त दृश्य रूप से मोतियांे की भँाति गूथंे हुये हंै।
    इस प्रकार भारत अपने शारीरिक स्वतन्त्रता व संविधान के लागू होने के उपरान्त वर्तमान समय में जिस कत्र्तव्य और दायित्व का बोध कर रहा है। भारतीय संसद अर्थात विश्वमन संसद जिस सार्वभौम सत्य या सार्वजनिक सत्य की खोज करने के लिए लोकतन्त्र के रूप में व्यक्त हुआ है। जिससे स्वस्थ लोकतंत्र, स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग और पूर्ण मानव की प्राप्ति हो सकती है, उस ज्ञान से युक्त विश्वात्मा श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ वैश्विक व राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के सर्वाेच्च और अन्तिम प्रतीक के रूप मंे व्यक्त हंै।
    निःशब्द, आश्चर्य, चमत्कार, अविश्वसनीय, प्रकाशमय इत्यादि ऐसे ही शब्द इस शास्त्र और शास्त्राकार के लिए व्यक्त हो सकते हैं। विश्व के हजारो विश्वविद्यालय जिस पूर्ण सकारात्मक एवम् एकीकरण के विश्वस्तरीय शोध को न कर पाये, वह एक ही व्यक्ति ने पूर्ण कर दिखाया हो उसे कैसे-कैसे शब्दों से व्यक्त किया जाये, यह सोच पाना और उसे व्यक्त कर पाना निःशब्द होने के सिवाय कुछ नहीं है।
    सन् 1987 से डाॅ0 राम व्यास सिंह और सन् 1998 से मैं डाॅ0 कन्हैया लाल इस शास्त्र के शास्त्राकार श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ से परिचित होकर वर्तमान तक सदैव सम्पर्क में रहे परन्तु ”कुछ अच्छा किया जा रहा है“ के अलावा बहुत अधिक व्याख्या उन्होंने कभी नहीं की। और अन्त में कभी भी बिना इस शास्त्र की एक झलक भी दिखाये एका-एक समीक्षा हेतू हम दोनों के समक्ष यह शास्त्र प्रस्तुत कर दिया जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है।
    जो व्यक्ति कभी किसी वर्तमान गुरू के शरणागत होने की आवश्यकता न समझा, जिसका कोई शरीरधारी प्रेरणा स्रोत न हो, किसी धार्मिक व राजनीतिक समूह का सदस्य न हो, इस कार्य से सम्बन्धित कभी सार्वजनिक रूप से समाज में व्यक्त न हुआ हो, जिस विषय का आविष्कार किया गया, वह उसके जीवन का शैक्षणिक विषय न रहा हो, 50 वर्ष के अपने वर्तमान अवस्था तक एक साथ कभी भी 50 लोगों से भी न मिला हो, यहाँ तक कि उसको इस रूप में 50 आदमी भी न जानते हों, यदि जानते भी हो तो पहचानते न हों और जो पहचानते हों वे इस रूप को जानते न हों, वह अचानक इस शास्त्र को प्रस्तुत कर दें तो इससे बडा चमत्कार क्या हो सकता है।
    जिस व्यक्ति का जीवन, शैक्षणिक योग्यता और कर्मरूप यह शास्त्र तीनों का कोई सम्बन्ध न हो अर्थात तीनों तीन व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हों, इससे बड़ी अविश्वसनीय स्थिति क्या हो सकती है।
    प्रस्तुत शास्त्र में जन्म-जीवन-पुनर्जन्म-अवतार-साकार ईश्वर-निराकार ईश्वर, अदृश्य और दृश्य ईश्वर नाम, मानसिक मृत्यु व जन्म, भूत-वर्तमान-भविष्य, शिक्षा व पूर्ण शिक्षा, संविधान व विश्व संविधान, ग्राम सरकार व विश्व सरकार, विश्व शान्ति व एकता, स्थिरता व व्यापार, विचारधारा व क्रियाकलाप, त्याग और भोग, राधा और धारा, प्रकृति और अहंकार, कत्र्तव्य और अधिकार, राजनीति व विश्व राजनीति, व्यक्ति और वैश्विक व्यक्ति, मानवतावाद व एकात्मकर्मवाद, नायक-शास्त्राकार-आत्मकथा, महाभारत और विश्वभारत, जाति और समाजनीति, मन और मन का विश्वमानक, मानव और पूर्ण मानव एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, आॅकड़ा व सूचना और विश्लेषण, शास्त्र और पुराण इत्यादि अनेकांे विषय इस प्रकार घुले हुये हैं जिन्हें अलग कर पाना कठिन कार्य है और इससे बड़ा प्रकाशमय शास्त्र क्या हो सकता है। जिसमें एक ही शास्त्र द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान स्वप्रेरित होकर प्राप्त किया जा सके। इस व्यस्त जीवन में कम समय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का इससे सर्वोच्च शास्त्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस शास्त्र के अध्ययन से यह अनुभव होता हे कि वर्तमान तक के उपलब्ध धर्मशास्त्र कितने सीमित व अल्प ज्ञान देने वाले हैं परन्तु वे इस शास्त्र तक पहुँचने के लिए एक चरण के पूर्ण योग्य हैं और सदैव रहेगें।

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  • “विश्वशास्त्र” साहित्य समीक्षा     भाग-02

    इस शास्त्र में अनेक ऐसे विचार हैं जिसपर अहिंसक विश्वव्यापी राजनीतिक भूकम्प लायी जा सकती है तथा अनेक ऐसे विचार है जिसपर व्यापक व्यापार भी किया जा सकता है। इस आधार पर अपने जीवन के समय में अर्जित विश्व के सबसे धनी व्यक्ति विल गेट्स की पुस्तक ”बिजनेस @ द स्पीड आॅफ थाॅट (विचार की गति व्यापार की गति के अनुसार चलती है)“ का विचार सत्य रूप में दिखता है। और यह कोई नई घटना नहीं है। सदैव ऐसा होता रहा है कि एक नई विचारधारा से व्यापक व्यापार जन्म लेता रहा है जिसका उदाहरण पुराण, श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि के व्यक्त होने की घटना है। ”महाभारत“ टी.वी. सीरीयल के बाद अब ”विश्वभारत“ टी.वी. सीरीयल निर्माण हेतू भी यह शास्त्र मार्ग खोलता है। शास्त्र को जिस दृष्टि से देखा जाय उस दृष्टि से पूर्ण सत्य दिखता है। विश्वविद्यालयों के लिए यह अलग फैकल्टी या स्वयं एक विश्वविद्यालय के संचालन के लिए उपयुक्त है तो जनता व जनसंगठन के लिए जनहित याचिका 1. पूर्ण शिक्षा का अधिकार 2.राष्ट्रीय शास्त्र 3. नागरिक मन निर्माण का मानक 4. सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त 5. गणराज्य का सत्य रूप के माध्यम से सर्वोच्च कार्य करने का भी अवसर देता है। भारत में ”शिक्षा के अधिकार अधिनियम“ के उपरान्त ”पूर्ण शिक्षा के अधिकार अधिनियम“ को भी जन्म देने में पूर्णतया सक्षम है। साथ ही जब तक शिक्षा पाठ्यक्रम नहीं बदलता तब तक पूर्ण ज्ञान हेतू पूरक पुस्तक के रूप में यह बिल्कुल सत्य है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार शारीरिक आवश्यकता के लिए व्यक्ति संतुलित विटामिन-मिनरल से युक्त दवा भोजन के अलावा लेता है।
    प्रस्तुत एक ही शास्त्र द्वारा पृथ्वी के मनुष्यों के अनन्त मानसिक समस्याओं का हल जिस प्रकार प्राप्त हुआ है उसका सही मूल्यांकन सिर्फ यह है कि यह विश्व के पुनर्जन्म का अध्याय और युग परिवर्तन का सिद्धान्त है जिससे यह विश्व एक सत्य विचारधारा पर आधारित होकर एकीकृत शक्ति से मनुष्य के अनन्त विकास के लिए मार्ग खोलता है और यह विश्व अनन्त पथ पर चलने के लिए नया जीवन ग्रहण करता है। शास्त्र अध्ययन के उपरान्त ऐसा अनुभव होता है कि इसमें जो कुछ भी है वह तो पहले से ही है बस उसे संगठित रूप दिया गया है और एक नई दृष्टि दी गई है जिससे सभी को सब कुछ समझने की दृष्टि प्राप्त होती है। युग परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन या सत्यीकरण के इस शास्त्र में पाँच संख्या का महत्वपूर्ण योगदान है जैसे 5 अध्याय, 5 भाग, 5 उपभाग, 5 लेख, 5 विश्वमानक की श्रृंखला, 5वां वेद, 5 जनहित याचिका इत्यदि, जो हिन्दू धर्म के अनुसार महादेव शिवशंकर के दिव्य पंचमुखी रूप से भी सम्बन्धित है और यह ज्ञान उन्हीं का माना जाता है। इस को तीसरे नेत्र की दृष्टि कह सकते हैं और इस घटना को तीसरे नेत्र का खुलना। हमारे सौरमण्डल के 5वें सबसे बड़े ग्रह पृथ्वी के लिए यह एक आश्चर्यजनक घटना भी है। 5वें युग - स्वर्णयुग में प्रवेश के लिए यह ज्ञानरूपी 5वां सूर्य भी है जिसमें अनन्त प्रकाश है। शास्त्र में नामों का अपने सत्य अर्थ में प्रयोग और योग-माया का आद्वितीय है और उसकी समझ अनेक दिशाओं से उसके अगली कड़ी के रूप में है। साथ ही एक शब्द भी आलोचना या विरोध का नहीं है। सिर्फ समन्वय, स्पष्टीकरण, रचनात्मकता व एकात्मकर्मवाद का दिशा बोध है और सम्पूर्ण कार्य का अधिकतम कार्य व रचना क्षेत्र समाज के जन्मदाता भगवान विष्णु के पाँचवें वामन अवतार के क्षेत्र चुनार (चरणाद्रिगढ़) से ही व्यक्त है।
    संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दि0 28 - 31 अगस्त 2000 को न्यूयार्क में आयोजित धार्मिक नेताओं के सहस्त्राब्दि विश्व शान्ति सम्मेलन में लिए गये निर्णय ”विश्व में एक धर्म, एक भाषा, एक वेश भूषा, एक खान पान, एक रहन-सहन पद्धति, एक शिक्षा पद्धति, एक कोर्ट, एक न्याय व्यवस्था, एक अर्थ व्यवस्था लागू की जाय“ के अधिकतम अंशों की पूर्ति के लिए यह मार्ग प्रशस्त करता है। भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), एक राष्ट्रीय पक्षी (भारतीय मोर), एक राष्ट्रीय पुष्प (कमल), एक राष्ट्रीय पेड़ (भारतीय बरगद), एक राष्ट्रीय गान (जन गण मन), एक राष्ट्रीय नदी (गंगा), एक राष्ट्रीय जलीय जीव (मीठे पानी की डाॅलफिन), एक राष्ट्रीय प्रतीक (सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ का सिंह), एक राष्ट्रीय पंचांग (शक संवत पर आधारित), एक राष्ट्रीय पशु (बाघ), एक राष्ट्रीय गीत (वन्दे मातरम्), एक राष्ट्रीय फल (आम), एक राष्ट्रीय खेल (हाॅकी), एक राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह, एक संविधान की भाँति एक राष्ट्रीय शास्त्र के लिए यह पूर्णतया योग्य है। इतना ही नहीं एक राष्ट्रपिता (महात्मा गाँधी) की भाँति एक राष्ट्रपुत्र के लिए निष्पक्षता और योग्यता के साथ स्वामी विवेकानन्द को भी देश के समक्ष प्रस्तावित करता है साथ ही आरक्षण व दण्ड प्रणाली में शारीरिक, आर्थिक व मानसिक आधार को भी प्रस्तावित करता है।
    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का यह मानसिक कार्य इस स्थिति तक योग्यता रखता है कि वैश्विक सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक एकीकरण सहित विश्व एकता-शान्ति-स्थिरता-विकास के लिए जो भी कार्य योजना हो उसे देश व संयुक्त राष्ट्र संघ अपने शासकीय कानून के अनुसार आसानी से प्राप्त कर सकता है। और ऐसे आविष्कारकर्ता को इन सबसे सम्बन्धित विभिन्न पुरस्कारों, सम्मानों व उपाधियों से बिना विलम्ब किये सुशोभित किया जाना चाहिए। यदि यथार्थ रूप से देखा जाये तो विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार-नोबेल पुरस्कार के शान्ति व साहित्य क्षेत्र के पूर्ण रूप से यह योग्य है। साथ ही भारत देश के भारत रत्न से किसी भी मायने में कम नहीं है।
    कर्म के शारीरिक, आर्थिक व मानसिक क्षेत्र में यह मानसिक कर्म का यह सर्वोच्च और अन्तिम कृति है। भविष्य में यह विश्व-राष्ट्र शास्त्र साहित्य और एक विश्व-राष्ट्र-ईश्वर का स्थान ग्रहण कर ले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। इस शास्त्र की भाषा शैली मस्तिष्क को व्यापक करते हुये क्रियात्मक और व्यक्ति सहित विश्व के धारण करने योग्य ही नहीं बल्कि हम उसमें ही जीवन जी रहें हैं ऐसा अनुभव कराने वाली है। न कि मात्र भूतकाल व वर्तमान का स्पष्टीकरण व व्याख्या कर केवल पुस्तक लिख देने की खुजलाहट दूर करने वाली है। वर्तमान और भविष्य के एकीकृत विश्व के स्थापना स्तर तक के लिए कार्य योजना का इसमें स्पष्ट झलक है।
    देशों के बीच युद्ध में मारे गये सैनिकों को प्रत्येक देश अपने-अपने सैनिकों को शहीद और देशभक्त कहते हैं। इस देश भक्ति की सीमा उनके अपने देश की सीमा तक होती है। भारत में भी यही होता है। भारत को नये युग के आरम्भ के लिए विश्व के प्रति कत्र्तव्य व दायित्व का बोध कराते हुए उसके प्राप्ति के संवैधानिक मार्ग को भी दिखाता है। साथ ही भारत देश के लिए देशभक्त सहित विश्व राष्ट्र के लिए विश्व भक्त का बेमिसाल, सर्वोच्च, अन्तिम, अहिंसक और संविधान की धारा-51(ए) के अन्तर्गत नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य के अनुसार भी एक सत्य और आदर्श नागरिक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता है। वर्षो से भारत के दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर राष्ट्रीय विभिन्नताओं में एकता और एकीकरण का भाव जगाने वाले गीत ”मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा“ का यह शास्त्र प्रत्यक्ष रूप है और हमारा सुर ही है। साथ ही यह भारत सहित विश्व का प्रतिनिधि शास्त्र भी है। जिस प्रकार व्यापारीगण अपने लाभ-हानि का वार्षिक बैलेन्स सीट तैयार करवाते हैं उसी प्रकार यह धर्म का अन्तिम बैलेन्स सीट हैं। जिससे सम्पूर्ण मानव जाति का मन इस पृथ्वी से बाहर स्थित हो सके और मनुष्यों द्वारा इस विश्व में हो रहे सम्पूर्ण व्यापार को समझ सकें और फिर उनमें से किसी एक का हिस्सा बनकर व्यापार कर सकें।
    हमारे सभी ज्ञान का आधार अनुभव, दूसरों से जानना और पुस्तक द्वारा, पर ही आधारित हैं और मनुष्य नामक इस जीव के अलावा किसी जीव ने पुस्तक नहीं लिखा है। सूक्ष्म दृष्टि से चिन्तन करने पर यह ज्ञान होता है कि सभी धर्मो की कथा केवल हम पुस्तकों और दूसरे से सुनकर ही जानते हैं। उसका कोई प्रमाणिक व्यक्ति गवाह के रूप में हमारे बीच नहीं है। नया शास्त्र और अवतार के अवतरण को भी एक लम्बी अवधि निकल चुकी है। हम सभी ज्ञान के खोज के लिए स्वतन्त्र हैं। लेकिन यदि हम अब तक क्या खोजा जा चुका है इसे न जाने तो ऐसा हो सकता है कि खोजने के उपरान्त ज्ञात हो कि यह तो खोजा जा चुका है और हमारा समय नष्ट हो चुका है। इसलिए यह शास्त्र एक साथ सभी आॅकड़ों को उपलब्ध कराता है जिससे खोज में लगे व्यक्ति पहले यह जानें कि क्या-क्या खोजा जा चुका है। शास्त्र का यह दावा कि यह अन्तिम है, यह तभी सम्भव है जब इसमें उपलब्ध ज्ञान व आॅकड़ों को जानकर आगे हम सभी एकात्मता के लिए नया कुछ नहीं खोज पाते हैं। और ऐसा लगता है कि शास्त्र का दावा सत्य है। शास्त्र किसी व्यवस्था परिवर्तन की बात कम, व्यवस्था के सत्यीकरण के पक्ष में अधिक है। शास्त्र मानने वाली बात पर कम बल्कि जानने और ऐसी सम्भावनाओं पर अधिक केन्द्रित है जो सम्भव है और बोधगम्य है। शास्त्र द्वारा शब्दों की रक्षा और उसका बखूबी से प्रयोग बेमिसाल है। ज्ञान को विज्ञान की शैली में प्रस्तुत करने की विशेष शैली प्रयुक्त है। मन पर कार्य करते हुये, इतने अधिक मनस्तरों को यह स्पर्श करता है जिसको निर्धारित कर पाना असम्भव है। और जीवनदायिनी शास्त्र के रूप में योग्य है।
    सम्पूर्ण शास्त्र का संगठन एक सिनेमा की तरह प्रारम्भ होता है जो व्लैक होल से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, सौर मण्डल, पृथ्वी ग्रह से होते हुए पृथ्वी पर होने वाले व्यापार, मानवता के लिए कर्म करने वाले अवतार, धर्म की उत्पत्ति से होते हुए धर्म ज्ञान के अन्त तक का चित्रण प्रस्तुत करता है। पूर्ण ज्ञान के लिए इस पूरे सिनेमा रूपी शास्त्र को देखना पड़ेगा। जिस प्रकार सिनेमा के किसी एक अंश को देखने पर पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती उसी प्रकार इसके किसी एक अंश से पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता।
    श्री लव कुश सिह ”विश्वमानव“ के जीवन का एक लम्बी अवधि हम समीक्षक द्वय के सामने रही है। जिसमें हम लोगों ने अनेकों रंग देखें हैं। सभी कुछ सामने होते हुये सिर्फ एक ही बात स्पष्ट होती है कि इस धरती पर यह शास्त्र उपलब्ध कराने और धर्म को अपने जीवन से दिखाने मात्र के लिए ही उनका जन्म हुआ है। जिससे विश्व की बुद्धि का रूका चक्र आगे चलने के लिए गतिशील हो सके। स्वामी विवेकानन्द के 1893 में दिये गये शिकागो वकृतता के विचार को स्थापना तक के लिए प्रकिया प्रस्तुत करना ही जैसे उनके जीवन का उद्देश्य रहा हो। स्वयं को अन्तिम अवतार के सम्बन्ध में नाम, रूप, जन्म, ज्ञान, कर्म कारण द्वारा प्रस्तुत करने का उनका दावा इतने अधिक आॅकड़ों के साथ प्रस्तुत है कि जिसका किसी और के द्वारा या दूसरा उदाहरण की पुनरावृत्ति हो पाना भी असम्भव सा दिखता है। यह प्रस्तुतिकरण इतना शक्तिशाली है कि जैसे उनके जन्म के साथ ही योग-माया भी उनमें समाहित हैं।
    ऐसा नहीं है कि श्री लव कुश सिह ”विश्वमानव“ ने यह कार्य बस यूँ ही प्रारम्भ किया और बिना किसी बाधा के उसे पूर्ण कर दिया। यह एक विचित्रता भरे, त्याग और अति संकल्प युक्त जीवन का परिणाम रहा है जिसमें एक साधारण मनुष्य टूटने के सिवा और कुछ परिणाम नहीं दे सकता था। उनके जीवन को इस एक लघु कथा से समझा जा सकता है - ”मै भी संसार को सुबास दूँगा, यह संकल्प कर एक नन्हा सा पुष्पबीज धरती को गोद में अपने शिव संकल्प के साथ करवट बदल रहा था। धरती उसके बौनेपन पर हँस पड़ी और बोली - ‘बावले, तू मेरा भार सहन कर जाये, यही बहुत है। कल्पना लोक की मृग मरीचिका में तू कबसे फँस गया?’ पुष्पबीज मुस्कराया, पर कुछ नहीं बोला। मृत्तिका कणों व जल की कुछ बूँदों के सहयोग से वह ऊपर उठने लगा। जमीन पर उगी हुई टहनी को देखकर वायु ने अट्टास किया - ‘अरे अबोध पौघे, तूने मेरा विकराल रूप नहीं देखा। मेरे प्रचण्ड वेग के आगे तो बड़े-बड़े वृक्ष उखड़ जाते हैं, फिर तेरी औकात ही क्या हैं?’ फूल का वह पौधा अभी भी विनम्र बना रहा। वायु के वेग में वह कभी दायें झुका तो कभी बाँए। लहराना उसके जीवन की मस्ती बन गई। इस तरह वह धीरे-धीरे विकसित होता रहा। उपवन में उगे झाड़-झंखाड़ से भी उस नन्हें पौधे का बढ़ना नहीं देखा गया। ऐसी झाड़ियों से सारा उद्यान भरा पड़ा था। उन्होंने चारो ओर से पुष्प-वृक्ष पर आघात करना आरम्भ कर दिया। किसी ने उसकी जड़ों को आगे बढ़ने से रोका, किसी ने तने को, तो किसी ने उसके पत्तों को उजाड़ने की साजिश की, पर उस पौधे ने हिम्मत नहीं हारी और वह तमाम दिक्कतें झेलने के बाद भी बढ़ता रहा। माली उसकी धुन पर मुग्ध हो उठा और उसने विध्न डालने वाली तमाम झाड़ियों को काट गिराया। अब वह पौधा तेजी से बढ़ने लगा। उसे ऊपर उठता देख सूर्य कुपित हो उठे और बोले - ‘मेरे प्रचण्ड ताप के कारण भारी वृक्ष तक सूख जाते हैं। आखिर तू कब तक मेरे ताप को झेल पायेगा? कर्मठ-कर्मयोगी पौधा कुछ नहीं बोला और निरन्तर बढ़ता रहा। उसमें प्रथम कलिका विकसित हुई और फिर संसार ने देखा कि जो बीज की तरह अपने आप को गलाना जानता है, जो बाधाओं से टक्कर लेना जानता है, प्रतिघातों से भी जो उत्तेजित और विचलित नहीं होता, तितिक्षा से जो कतराता नहीं, उसी का जीवन सौरभ बनकर प्रस्फुटित होता है, देवत्व की अभ्यर्थना करता है और संसार को ऐसी सुगन्ध से भर देता है, जिससे जन-जन का मन पुलकित और प्रफुल्लित हो उठता है।“ इसी पुष्प बीज की भाँति रहा है श्री लव कुश सिह ”विश्वमानव“ का जीवन। महानता-अमरता जैसी वस्तु कोई विरासत या उपहार या आशीर्वाद में मिलने वाली वस्तु नहीं है। वह तो इसी पुष्प बीज वालेे जीवन मार्ग से ही मिलता रहा है, मिलता ही है और मिलता ही रहेगा।

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  •  “विश्वशास्त्र” साहित्य समीक्षा     भाग-03

    हम समीक्षक द्वय इस बात पर पूर्ण सहमत है कि वर्तमान समय में विश्वविद्यालय में हो रहे शोध मात्र शोध की कला सीखाने की संस्था है न कि ऐसे विषय पर शोध सिखाने की कला जिससे सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक विकास को नई दिशा प्राप्त हो जाये। यहाँ एक बात और बताना चाहते हैं कि यह शास्त्र अनेक ऐसे शोध विषयों की ओर दिशाबोध भी कराता है जो मनुष्यता के विकास में आने वाले समय के लिए अति आवश्यक है। हम अपने पीएच.डी. की डिग्रीयों पर गर्व अवश्य कर सकते हैं परन्तु यह केवल स्वयं के लिए रोजगार पाने के साधन के सिवाय कुछ नहीं है और वह भी संघर्ष से। जबकि हम डिग्रीधारीयों का समाज को नई दिशा देने का भी कत्र्तव्य होना चाहिए। आखिरकार हम डिग्रीधारी और सामज व देश के नेतृत्वकर्ता यह कार्य नहीं करेगें तो क्या उनसे उम्मीद की जाय जो दो वक्त की रोटी के संघर्ष के लिए चिंतित रहते है? आखिरकार सार्वजनिक मंचो से हम किसको यह बताना चाहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए?
    हम समीक्षक द्वय अपने आप को इस रूप में सौभाग्यशाली समझते हैं कि हमें ऐसे शास्त्र की समीक्षा करने का अवसर प्राप्त हुआ जिसके योग्य हम स्वयं को नहीं समझते। ईश्वर को तो सभी चाहते हैं परन्तु उनके भाग्य को क्या कहेगें जो ईश्वर द्वारा स्वयं ही महान ईश्वरीय कार्य के लिए चुन लिए जाते हैं। शायद हम लोगों के पूर्वजन्म का कोई अच्छा कार्य ही हमें इस पूर्णता की उपलब्धि को पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया गया हो। या महायोग-महामाया से युक्त श्री लव कुश सिह ”विश्वमानव“ के लिए हम समीक्षक द्वय भी उसी का नाम-रूप-गुण-कर्म (कन्हैया, राम, व्यास, पी.एच.डी, योग, समाजशास्त्र और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) से हिस्सा बन गये हों। यही समझकर हम अपने अल्प ज्ञान से इस समीक्षा को यहीं समाप्त करते हैं। विश्व के यथार्थ कल्याण के लिए हम सभी को दिशा बोध प्राप्त हो, यही हम सब का प्रकाश हो, यही हम समीक्षक द्वय की मनोकामना है।

    - डाॅ. कन्हैया लाल, एम.ए., एम.फिल.पीएच.डी (समाजशास्त्र-बी.एच.यू.)
    निवास - घासीपुर बसाढ़ी, अधवार, चुनार, मीरजापुर (उ0 प्र0)-231304, भारत


    - डाॅ. राम व्यास सिंह, एम.ए., पीएच.डी (योग, आई.एम.एस-बी.एच.यू.)
    निवास - कोलना, चुनार, मीरजापुर (उ0 प्र0)-231304, भारत

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  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    विषय-प्रवेश
     
    मेरे प्रेरक विश्व राष्ट्र पुत्र स्वामी विवेकानन्द
    विभिन्न धर्मो के वर्तमान धर्म गुरूओं को समर्पित ”विश्वशास्त्र“ साहित्य और मेरी अन्तिम इच्छा
    विश्व कल्कि ओलंपियाड (World Kalki Olympiad-WKO)
    एकात्म ध्यान (अदृश्य) एवं एकात्म समर्पण (दृश्य)
    मेरा प्रकाट्य
    विश्व के सभी देशों व नागरिकों को सार्वजनिक सूचना
    सार्वजनिक घोषणा
    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
    ”विश्वशास्त्र“: विषय प्रवेश की भूमिका
     
    भाग-1
    सत्यीकरण का आधार
     
    01.प्रारम्भ के पहले दिव्य-दृष्टि
    02.व्यवस्था के परिवर्तन या सत्यीकरण का पहला प्रारूप और उसकी कार्य विधि
    03.क्या नई घटना घटित हुई थी 21 दिसम्बर, 2012 को?
    04.एक ही मानव शरीर के जीवन, ज्ञान और कर्म के विभिन्न विषय क्षेत्र से मुख्य नाम
    05.विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार
    06.पुस्तक का मुख-पृष्ठ श्याम (काला)-श्वेत (सफेद) क्यों?
    07.जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो
    08.शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी
    09.शिक्षण विधि और आशीर्वाद
    10.मानव और पूर्ण मानव
    11.जीवन जीने की संचालन विधि
    12.इच्छा और आॅकड़ा
    13.ईश्वर, अवतार और मानव की शक्ति सीमा
     
    भाग-2
    सत्यीकरण का शास्त्र
     
    01.”विश्वशास्त्र“: भूमिका
    02.”विश्वशास्त्र“: शास्त्र-साहित्य समीक्षा
    03.”विश्वशास्त्र“ संगठन
    04.”विश्वशास्त्र“ की स्थापना
    05.”विश्वशास्त्र“-कुछ तथ्य
      अ. रचना क्यों?
    ब. आविष्कार किस प्रकार हुआ?
    स. उपयोगिता क्या है? 
    द. बाद का मनुष्य, समाज और शासन
    य. कितना छोटा और कितना बड़ा?
    र. एक ही शास्त्र-साहित्य के विभिन्न नाम
    ल. विश्वव्यापी स्थापना का स्पष्ट मार्ग
    व. सम्बन्धित स्थान ?
    स. उत्पन्न नयी प्रणाली और व्यापार
    06.विश्व या जगत्
    07.ब्रह्माण्ड या व्यापार केन्द्र: एक अनन्त व्यापार क्षेत्र
    08.ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
    09.ब्लैक होल और आत्मा
    10.सौर मण्डल
    11.पृथ्वी
    12.युगानुसार धर्म, प्रवर्तक और धर्मशास्त्र
    13.धर्मशास्त्र-व्यष्टि और समष्टि
    14.भारतीय शास्त्रों कीे एक वाक्य में शिक्षा
    15.विश्वात्मा/विश्वमन का विखण्डन व संलयन
    अ. सांख्य दर्शन
    ब. धर्म विज्ञान (स्वामी विवेकानन्द)
    स. आत्मा और विश्वात्मा
    1.रज मन
    2.तम मन 
    3.सत्व मन 
    क. निवृत्ति मार्गी 
    ख. प्रवृत्ति मार्गी 
    4. अवतारी मन
    द. विकासवाद
    य. अवतारवाद
    16.”सम्पूर्ण मानक“ का विकास भारतीय आध्यात्म-दर्शन का मूल और अन्तिम लक्ष्य
    17.ईश्वर या काल चक्र
    18.पुर्नजन्म चक्र मार्ग के
    01. सत्व मार्ग से-श्रीकृष्ण और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    02. रज मार्ग से-स्वामी विवेकानन्द और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    03. तम मार्ग से-रावण और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    19.काल चक्र मार्ग के 
    01. प्रथम-अदृश्य काल में विश्वात्मा का प्रथम जन्म-योगेश्वर श्रीकृष्ण
    02. द्वितीय-दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का पहला भाग-स्वामी विवेकानन्द
    03. द्वितीय-दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का अन्तिम भाग-भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ 
    20.विश्व का सर्वोच्च आविष्कार-मन का विश्वमानक तथा पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी
    01. आविष्कार क्यों हुआ?
    02. आविष्कारक कौन है? 
    क. भौतिक रूप से
    ख. आर्थिक रूप से
    ग. मानसिक रूप से
    घ. नाम रूप से
    च. समय रूप से
    03. आविष्कार विषय क्या है?
    04. आविष्कार की उपयोगिता क्या है? 
    05. आविष्कार किस प्रकार हुआ? 
    21.युग परिवर्तन और परिवर्तनकर्ता का शास्त्रीय आधार
    01.सनातन / हिन्दू शास्त्र व मान्यता के अनुसार
    अ. वेद व पुराण के अनुसार 
    ब. महर्षि दयानन्द के अनुसार
    स. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार 
    द. नाड़ी ताड़ पत्ते ;छंकप च्ंसउ स्मंअमेद्ध के अनुसार
    य. अन्य के अनुसार
    02.बौद्ध धर्म के अनुसार
    03.यहूदी शास्त्र के अनुसार
    04.ईसाई शास्त्र के अनुसार
    05.इस्लाम शास्त्र के अनुसार
    06.सिक्ख धर्म के अनुसार
    07.मायां कैलण्डर के अनुसार
    22.युग परिवर्तन और परिवर्तनकर्ता का भविष्यवाणियों का आधार
    01.प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस के अनुसार
    02.ज्योतिषि श्री बेजन दारूवाला के अनुसार
    03.पुस्तक-”अमर भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
    04.पुस्तक-”विश्व की आश्चर्यजनक भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
    05.पुस्तक-”दुर्लभ भविष्यवाणियाँ“ के अनुसार
    06.अन्य भविष्यवक्ताओं के अनुसार
    23.युग परिवर्तन और परिवर्तनकर्ता का शास्त्र व भविष्यवाणियों के आँकड़ों पर व्याख्या
    24.सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त के अनुसार काल, युग बोध एवं अवतार
    25.कल्कि अवतार-महाअवतार क्यों?
    26.काल और युग परिवर्तक कल्कि महाअवतार एवं अन्य स्वघोषित कल्कि अवतार
    27.कल्कि अवतार और लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    28.शास्त्रार्थ, शास्त्र पर होता है, शास्त्राकार से और पर नहीं
    29.अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार का काशी-सत्यकाशी क्षेत्र से विश्व शान्ति का अन्तिम सत्य-सन्देश
    30.अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का मानवों के नाम खुला चुनौती पत्र
     

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
     
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति को एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
     
    - लव कुश सिंह “विश्वमानव”
    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”
                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न”
  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र साहित्य - अध्याय-एक
  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    अध्याय - एक
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - अध्याय एक की भूमिका
     
    भाग - 1: ईश्वर, अवतार और पुनर्जन्म
    01. ईश्वर, ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास और ईश्वर के अवतार
    02. अवतार और पुनर्जन्म
    03. ब्रह्मा के अवतार 
    04. विष्णु के अवतार
    05. शंकर के अवतार
     
    भाग - 2: विष्णु के प्रथम नौ अवतार
    पहलायुगः सत्ययुग
    अ. व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्ण प्रत्यक्ष अवतार
    01. प्रथम अवतार : मत्स्य अवतार
    02. द्वितीय अवतार : कूर्म / कच्छपावतार
    03. तृतीय अवतार : बाराह अवतार
    04. चतुर्थ अवतार : नृसिंह अवतार
    05. पंाचवाँ अवतार : वामन अवतार
    ब. सार्वजनिक प्रमाणित अंश प्रत्यक्ष अवतार
    06. छठा अवतार : परशुराम अवतार
    दूसरायुगः त्रेतायुग
    स. सार्वजनिक प्रमाणित पूर्ण प्रत्यक्ष अवतार
    07. सातवाँ अवतार : श्री राम अवतार - रामायण (मानक व्यक्ति चरित्र)
    तीसरायुगः द्वापरयुग
    द. व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्ण प्रेरक अवतार
    08. आठवाँ अवतार : श्री कृष्ण अवतार - महाभारत (मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र)
    चैथायुगः कलियुग
    य. सार्वजनिक प्रमाणित अंश प्रेरक अवतार 
    09. नौवाँ अवतार : बुद्ध अवतार 

    भाग - 3: विष्णु के दसवें और अन्तिम अवतार के समय विश्व, भारत देश, अन्तर्राष्ट्रीय, राज्य अर्थात् शासन, भारतीय समाज, भारतीय परिवार, भारतीय व्यक्ति स्तर पर निम्न विषयों की स्थिति
    01. राज्य अर्थात शासन की स्थिति
    02. विज्ञान की स्थिति 
    03. धर्म की स्थिति
    04. व्यापार की स्थिति 
    05. समाज की स्थिति
    06. परिवार केी स्थिति
    07. व्यक्ति की स्थिति 
     
    भाग - 4: विष्णु के दसवें और अन्तिम अवतार के समय स्थिति के विकास की स्थिति 
     
    भाग - 5: विष्णु के दसवें और अन्तिम अवतार के समय विश्व, भारत देश, अन्तर्राष्ट्रीय, राज्य अर्थात् शासन, भारतीय समाज, भारतीय परिवार, भारतीय व्यक्ति स्तर पर निम्न विषयों का परिणाम
    01. राज्य अर्थात् शासन का परिणाम
    02. विज्ञान का परिणाम 
    03. धर्म का परिणाम
    04. व्यापार का परिणाम 
    05. समाज का परिणाम
    06. परिवार का परिणाम 
    07. व्यक्ति का परिणाम
    08. स्थिति के विकास का परिणाम 
      09़. विज्ञान का राज्य और धर्म पर प्रभाव
    10. ब्रह्माण्डीय स्थिति और परिणाम
    11. विश्व के समक्ष भारत की स्थिति और परिणाम
    12. दृश्य पदार्थ विज्ञान और अदृश्य आध्यात्म विज्ञान-स्थिति एवं परिणाम
    13. सार्वभौम एकीकरण-स्थिति एवं परिणाम

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
     
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति को एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
     
    - लव कुश सिंह “विश्वमानव”
    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”
                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न”
  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र साहित्य - अध्याय-दो
  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    अध्याय - दो: जीवन परिचय
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - अध्याय दो की भूमिका
     
    भाग - 1
    विष्णु के दसवें और अन्तिम अवतार
    भविष्य के लिए प्रक्षेपित कल्कि अवतार की कथा
    कल्कि पुराण
    कल्कि अवतार महाअवतार क्यों?
    काल और युग परिवर्तक कल्कि महाअवतार एवं अन्य स्वघोषित कल्कि अवतार
    वैष्णों देवी की कथा
    कल्कि अवतार एवं वैष्णों देवी का सम्बन्ध
    कलयुगनाशिनी सार्वभौम देवी - माँ कल्कि देवी
    माँ कल्कि देवी की कथा
    माँ कल्कि देवी का परिचय एवं रूप
    पाँचवाँयुगः स्वर्णयुग/सत्ययुग
    र. सार्वजनिक प्रमाणित पूर्ण प्रेरक अवतार 
    10. दसवाँ और अन्तिम कल्कि अवतार-लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    - विश्वभारत (मानक वैश्विक व्यक्ति चरित्र)
    वर्तमान में व्यक्त कल्कि अवतार की कथा
    सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त अनुसार कल्कि अवतार की कथा
     
    भाग - 2
    मानव सभ्यता 
    01. मानव सभ्यता का विकास और जाति की उत्पत्ति
    02. वंश
    अ. पौराणिक वंश
    1. मनुर्भरत वंश की प्रियव्रत शाखा
    2. मनुर्भरत वंश की उत्तानपाद शाखा 
    ब. ऐतिहासिक वंश
    1. ब्रह्म वंश
    2. सूर्य वंश
    3. चन्द्र वंश 
    स. भविष्य के वंश
    03. गोत्र
    04. कूर्मवंशी क्षत्रिय रियासतें
    05. कूर्मवंशी क्षत्रिय वंश के महान विभूतियाँ, संत, अमर शहीद
     
     
    भाग-3
    काशी
    उप भाग-1: काशी (सत्व)
             01. काशी-मोक्षदायिनी काशी और जीवनदायिनी सत्यकाशी: अर्थ व प्रतीक चिन्ह
             02. तीसरी आँख (Third Eye)
             03. योगेश्वर (ज्ञान का विश्वरूप) और भोगेश्वर (कर्मज्ञान का विश्वरूप)
             04. ज्योतिर्लिंग: अर्थ और द्वादस (12) ज्योतिर्लिंग
             05. ज्योतिर्लिंगों का स्थान
     
    उप भाग-2: मोक्षदायिनी काशी (रज) (www.kashikatha.com)
          01. विश्वेश्वर (योगेश्वरनाथ): प्रथम ज्योतिर्लिंग क्यों?
          02. मोक्षदायिनी काशी: पंचम, प्रथम एवं सप्तम काशी 
          03. मोक्षदायिनी काशी: वाराणसी
                    काशी विश्वनाथ मन्दिर
                    रामनगर
                    काशी (वाराणसी)-घटना क्रम की दृष्टि में
                    काशी (वाराणसी) में श्रीकृष्ण
                    काशी (वाराणसी) में भगवान बुद्ध
                    काशी (वाराणसी) में स्वामी विवेकानन्द
                    काशी (वाराणसी) में श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
                    काशी चैरासी कोस यात्रा 
          04. सोनभद्र
          05. शिवद्वार
          06. विन्ध्य पर्वत, क्षेत्र और धाम: विन्ध्यक्षेत्र से तय होता है भारत का मानक समय
     
    उप भाग-3: जीवनदायिनी सत्यकाशी (तम) (www.satyakashi.com)
       01. भोगेश्वरनाथ: 13वाँ और अन्तिम ज्योतिर्लिंग क्यों?
       02. जीवनदायिनी सत्यकाशी: पंचम, अन्तिम और सप्तम काशी
       03. जीवनदायिनी सत्यकाशी: काशी (वाराणसी)-सोनभद्र-शिवद्वार-विन्ध्याचल के बीच का क्षेत्र
                    मीरजापुर 
                    चुनार एवं चुनार क्षेत्र 
                    सत्यकाशी में श्रीराम
                    सत्यकाशी में श्रीकृष्ण
                    सत्यकाशी में भगवान बुद्ध
                    सत्यकाशी में स्वामी विवेकानन्द
                    सत्यकाशी में श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
                    जरगो नदी और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    भाग - 4
    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ : पृष्ठभूमि एवं जन्म
    01. पृष्ठभूमि, जन्म एवं निवास स्थल
    02. जन्म कुण्डली
    03. हथेली व पैर के तलवे का चित्र
    04. शिक्षा, भ्रमण व देशाटन, मित्र व सहयोगी
    05. जीवन यात्रा के कुछ रोचक चरित्र व घटनायें
     
    भाग-5
    सत्यकाशी: दृश्य काल के प्रथम और अन्तिम युग का तीर्थ
    (www.satyakashi.com)
    01. क्षेत्र वासीयों गर्व से कहो-”हम सत्यकाशी निवासी हैं“
    02. सत्यकाशी क्षेत्र से व्यक्त हुये मुख्य विषय
    03. व्यक्ति, एक विचार और अरबों रूपये का व्यापार
    04. सत्यकाशी महायोजना
    01. चार शंकराचार्य पीठ के उपरान्त 5वाँ और अन्तिम पीठ ”सत्यकाशी पीठ“ । 
    02. ”सत्यकाशी महोत्सव“ व ”सत्यकाशी गंगा महोत्सव“ आयोजन।
    03. सार्वभौम देवी माँ कल्कि देवी मन्दिर-माँ वैष्णों देवी की साकार रूप
    04. भोगेश्वर नाथ-13वाँ और अन्तिम ज्योतिर्लिंग
    05. सत्यकाशी पंचदर्शन
    06. ज्ञान आधारित मनु-मनवन्तर मन्दिर
    07. ज्ञान आधारित विश्वात्मा मन्दिर
    08. विश्वधर्म मन्दिर-धर्म के व्यावहारिक अनुभव का मन्दिर
    09. नाग मन्दिर
    10. विश्वशास्त्र मन्दिर (Vishwshastra Temple)
    11. एक दिव्य नगर-सत्यकाशी नगर
    12. होटल शिवलिंगम्-शिवत्व का एहसास
    13. इन्द्रलोक-ओपेन एयर थियेटर
    14. हस्तिनापुर-महाभारत का लाइट एण्ड साउण्ड प्रोग्राम
    15. सत्य-धर्म-ज्ञान केन्द्र: ताश्रीरामण्डल की भाँति शो द्वारा कम समय में पूर्ण ज्ञान
    16. सत्यकाशी आध्यात्म पार्क
    17. वंश नगर-मनु से मानव तक के वंश पर आधारित नगर
    18. 8वें सांवर्णि मनु-सम्पूर्ण एकता की मूर्ति (Statue of Complete Unity)
    19. विस्मृत भारत रत्न स्मारक (Forgotten Bharat Ratna Memorial)
    20. विश्वधर्म उपासना स्थल-उपासना और उपासना स्थल के विश्वमानक (WS-00000) पर आधारित 
    21. सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (www.su-isu.org)
                  (Satyakashi Universal Integration Science University-SUISU)
    05. पाँचवें युग-स्वर्णयुग के तीर्थ सत्यकाशी क्षेत्र में प्रवेश का आमंत्रण
    01. सत्यकाशी क्षेत्र निवासीयों को आमंत्रण
    02. काशी (वाराणसी) को आमंत्रण
    03. धार्मिक संगठन/संस्था को आमंत्रण
    04. रियल इस्टेट/इन्फ्रास्ट्रक्चर व्यवसायिक कम्पनी को आमंत्रण
    05. रियल इस्टेट एजेन्ट को आमंत्रण
    06. सत्यकाशी महायोजना-प्रोजेक्ट को पूर्ण करने की योजना
    07. धर्म स्थापनार्थ दुष्ट वध और साधुजन का कल्याण कैसे और किसका?
    08. अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार का काशी-सत्यकाशी क्षेत्र से विश्व शान्ति द्वारा अन्तिम सत्य-सन्देश
     
     
     

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
     
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति को एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
     
    - लव कुश सिंह “विश्वमानव”
    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”
                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न”

     

  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र साहित्य - अध्याय-तीन
  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    अध्याय - तीन: ज्ञान परिचय
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - अध्याय तीन की भूमिका
     
    भाग -1: धर्म
    01. धर्म का अर्थ, धर्म और रिलिजन  
    02. धर्म की परिभाषा, तत्व चिंतन और आवश्यकता
    03. धर्म एवं दर्शन, धर्मदर्शन, विज्ञान, नैतिकता
    04. धर्म में वस्तु तत्व एवं प्रतीक 
    05. धर्मसमभाव की अवधारणा और विश्वधर्म का आधार
     
    भाग -2: शास्त्र एवं पुराण रहस्य
    01. शास्त्र, महर्षि व्यास और उनका शास्त्र लेखन कला 
    02. पुराणः धर्म, धर्मनिरपेक्ष एवम् यथार्थ अनुभव की अन्तिम सत्य दृष्टि
    क. पुराणों की सत्य दृष्टि  
    ख. ब्रह्मा अर्थात् एकात्मज्ञान परिवार 
    ग. विष्णु अर्थात एकात्म ज्ञान सहित एकात्म कर्म परिवार
    घ. शिव-शंकर अर्थात एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म सहित एकात्म ध्यान परिवार
    च. ब्रह्माण्ड परिवार
    03. श्रीमदभवद्गीता की शक्ति सीमा तथा कर्मवेद: पंचमवेद समाहित विश्वशास्त्र के प्रारम्भ का आधार
    04. कालभैरव कथा: यथार्थ दृष्टि
    05. मानक चरित्र
    क. मानक और मानक चरित्र
    ख. शिव और जीव
    ग. मानव और पूर्ण मानव
    घ. पौराणिक देवी-देवता: मनुष्य समाज के विभिन्न पदों के मानक चरित्र
    च. भारतीय शास्त्रों कीे एक वाक्य में शिक्षा
     
    भाग -3: विश्व-नागरिक धर्म का धर्मयुक्त धर्मशास्त्र - कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेदीय श्रृंखला

    भाग -4: विश्व-राज्य धर्म का धर्मनिरपेक्ष धर्मशास्त्र - विश्वमानक शून्य-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला
    उप भाग-1: मानक एवं मानकीकरण संगठन परिचय
    01. मानक एवं  मानकीकरण संगठन
    02. अन्तर्राष्ट्रीय माप-तौल ब्यूरो
    03. अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO)
    04. भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)
    05. मानक के सम्बन्ध में विभिन्न वक्तव्य - व्यक्ति भी हो सकते हैं आई. एस. ओ. मार्का
    01. पं0 जवाहर लाल नेहरु
    02. श्री मती इन्दिरा गाँधी
    03. श्री राजीव गाँधी
    04. डब्ल्यू0.टी.कैबेनो.
    05.  श्री कोफी अन्नान (नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित) पूर्व महासचिव, संयुक्त राष्ट्र संघ
    पहले मानक के सम्बन्ध में विभिन्न वक्तव्य और अब अन्त में मेरा वक्तव्य और विश्वमानक 
    उप भाग-2: गणराज्य व संघ परिचय
    01. राज्य व गणराज्य: उत्पत्ति और अर्थ
    02.  भारत गणराज्य: संक्षिप्त शासकीय परिचय
    03. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) : परिचय, उद्देश्य एवम् कार्यप्रणाली
    01. वीटो पावर - संयुक्त राज्य अमेरिका (US)  
    02. वीटो पावर - फ्रांस
    03. वीटो पावर - रूस
    04. वीटो पावर - चीन
    05. वीटो पावर - ब्रिटेन (UK)
    04. गणराज्य: अन्तिम विश्व शासन प्रणाली
    05. ग्राम सरकार व विश्व सरकार: एक प्रारूप
    उप भाग-3: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक परिचय
    01.  आविष्कार विषय और उसकी उपयोगिता
    02.  विश्वकल्याणार्थ आविष्कार की स्थापना कब और कैसे?
    03. वैश्विक मानव निर्माण तकनीकी- WCM-TLM-SHYAM.C प्रणाली
    तकनीकी का नाम SHYAM.C क्यों?
    S - SATYA ( सत्य )
    H- HEART ( हृदय )
    Y- YOG ( योग )
    A - ASHRAM ( आश्रम )
    M - MEDITATION ( ध्यान )
    . - DOT  ( बिन्दु या डाॅट या दशमलव या पूर्णविराम )
    C - CONCIOUSNESS  ( चेतना )
    04. आदर्श वैश्विक मानव/जन/गण/लोक/स्व/मैं/आत्मा/तन्त्र का सत्य रूप
    05. विश्व मानक-शून्य (WS-0) : मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृखंला
    01. डब्ल्यू.एस. (WS)-0: विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    02. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    03. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    ईश्वर नाम
    अदृश्य एवं दृश्य ईश्वर नाम
    अदृश्य ईश्वर नाम-”ऊँ“ शब्द का दर्शन
    दृश्य ईश्वर नाम- TRADE CENTRE शब्द का दर्शन
    ट्रेड सेन्टर के सात चक्र
    ट्रेड सेन्टर के सात चक्र की व्याख्या
    दृश्य सात चक्र के आधार पर संचालक के प्रकार
    दृश्य योग और दृश्य ध्यान
    शासन प्रणाली का विश्वमानक
    संचालक का विश्वमानक
    गणराज्य या लोकतन्त्र के स्वरूप का विश्वमानक
    संविधान के स्वरूप का विश्वमानक
    शिक्षा व शिक्षा पाठ्यक्रम के स्वरूप का विश्वमानक
                                    विपणन प्रणाली का विश्वमानक
    04. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    05. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000: उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    उप भाग-4: विश्व शान्ति
    01. विश्व शान्ति 
    02. विश्व धर्म संसद
    01. विश्व धर्म संसद-सन् 1893 ई0 परिचय
    स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान, 
    01. धर्म महासभा स्वागत भाषण का उत्तर, दिनांक 11 सितम्बर, 1893
    02. हमारे मतभेद का कारण, 15 सितम्बर, 1893
    03. हिन्दू धर्म, 19 सितम्बर, 1893
    04. धर्म भारत की प्रधान आवश्यकता नहीं, 20 सितम्बर, 1893
    05. बौद्ध धर्म, 26 सितम्बर, 1893
    06. धन्यवाद भाषण, 27 सितम्बर, 1893
    02. विश्व धर्म संसद-सन् 1993 ई0 परिचय
    03. विश्व धर्म संसद-सन् 1999 ई0 परिचय
    04. विश्व धर्म संसद-सन् 2004 ई0 परिचय
    05. विश्व धर्म संसद-सन् 2009 ई0 परिचय
    03. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित सहस्त्राब्दि सम्मेलन-2000 ई0
    01. राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन
    02. धार्मिक एवं आध्यात्मिक नेताओं का सम्मेलन
    04. विश्व शान्ति के लिए गठित ट्रस्टों की स्पष्ट नीति
    05. श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा विश्व शान्ति का अन्तिम सत्य-सन्देश 
    उप भाग-5: ईश्वर का मस्तिष्क, मानव का मस्तिष्क और कम्प्यूटर 
     
    भाग -5: विश्व शान्ति का अन्तिम मार्ग
    01. एकात्मकर्मवाद और विश्व का भविष्य
    02. विश्व का मूल मन्त्र- ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान-जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ 
    03. विश्वमानक-शून्य श्रंृखला (निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम)
    04. भारत का संकट, हल, विश्वनेतृत्व की अहिंसक स्पष्ट दृश्य नीति, सर्वोच्च संकट और विवशता
    05. गणराज्य-संघ को मार्गदर्शन
    01.   गणराज्यों के संघ-भारत को सत्य और अन्तिम मार्गदर्शन
    02.   राष्ट्रो के संघ - संयुक्त राष्ट्र संघ को सत्य और अन्तिम मार्गदर्शन
    03.  अवतारी संविधान से मिलकर भारतीय संविधान बनायेगा विश्व सरकार का संविधान
    04.  ”भारत“ के विश्वरूप का नाम है-”इण्डिया (INDIA)“
    05.  विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार
    - शून्य का प्रथम आविष्कार का परिचय
    - शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार का परिचय

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
     
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति को एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
     
    - लव कुश सिंह “विश्वमानव”
    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”
                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न”
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  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    अध्याय - चार: कर्म परिचय
     
    (सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य महायज्ञ)
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - अध्याय चार की भूमिका
     
    भाग - 01. व्यापार
    उप भाग - 01. 
    01. व्यापार का अर्थ और उसका मूल आधार
    02. सफलता का पैमाना
    03. सफलता का नाम विशेषज्ञता नहीं
    04. लांचिग (Launching), प्री-लांचिग (Pre-Launching) और प्री-आर्गनाइजेशन (Pre-Organisation)
    05. व्यवसाय का लेखांकन (एकाउण्ट बुक किपिंग) - दोहरी प्रविष्टि प्रणाली
    उप भाग - 02. 
    01. व्यवसाय की विशेषताएँ, उद्देश्य एवं उत्तरदायित्व
    02. व्यवसाय आरंभ करने का विचार और योजना बनाना
    03. व्यवसाय संगठनों के स्वरूप
    अ. पूर्ण स्वामित्व प्रतिष्ठान
    ब. साझेदारी प्रतिष्ठान
    स. सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी)
    द. निजी (प्राइवेट) लिमिटेड कंपनी
    य. सार्वजनिक (पब्लिक) लिमिटेड कंपनी
    04. व्यवसाय संगठन - सामान्य दिशानिर्देश एवं प्रबंधन
    05. सामाजिक उत्तरदायित्व संगठन - समिति एवं ट्रस्ट
    उप भाग - 03. पारिश्रमिक 
    01. गुलाम का अर्थ व दास प्रथा (पाश्चात्य)
    02. वैश्विक बौद्धिक विकास के साथ बदला गुलामी का स्वरूप
    03. पारिश्रमिक का इतिहास और वेतन (सैलरी), मजदूरी, भत्ते और मानदेय, प्रोत्साहन, सौदागर, अभिकर्ता, विशेषाधिकार, दलाली का अर्थ
    04. रायल्टी - अर्थ और प्रकार, ईश्वर, पुनर्जन्म और रायल्टी 
    05. क्या आपकों वस्तु खरीदने पर कम्पनी रायल्टी देती है जबकि कम्पनी आपके कारण हैं?
    उप भाग - 04. सर्वेक्षण (Survey)
    01. आॅकड़ा (Data)
    02. सर्वेक्षण (Survey) - अर्थ एवं प्रकार
    03. आधुनिक जीवन में सर्वेक्षण का प्रयोग व उपयोगिता
    04. भारत में अध्ययन/सर्वेक्षण/प्रतिवेदन
    05. जनमत से अलग सर्वेक्षण के आधार
    उप भाग - 05. विज्ञापन (Advertisement)
    01. विज्ञापन
    02. विज्ञापन रचना-प्रक्रिया
    03. दूरदर्शन (टी.वी) - विज्ञापन
    04. ऑनलाइन विज्ञापन
    05. विज्ञापन और व्यापार

    भाग - 02. उत्पाद
    उप भाग - 01. उत्पाद - अर्थ एवं प्रकार
    उप भाग - 02. ईश्वर निर्मित उत्पाद
    01. खनिज आधारित ईश्वर निर्मित उत्पाद
    02. वन आधारित ईश्वर निर्मित उत्पाद
    03. जीव आधारित ईश्वर निर्मित उत्पाद
    04. कृषि आधारित ईश्वर निर्मित उत्पाद
    05. वायुमण्डल आधारित ईश्वर निर्मित उत्पाद
    उप भाग - 03. मानव निर्मित उत्पाद
    01. शरीर आधारित मानव निर्मित उत्पाद
    02. धन आधारित मानव निर्मित उत्पाद
    1. बैंकिग उत्पाद और उसका व्यापारिक गणित
    2. शेयर, डिबेन्चर तथा म्यूचुल फण्ड और उसका व्यापारिक गणित
    3. वायदा बाजार और उसका व्यापारिक गणित
    4. सट्टा, पेपर एवं आॅन लाइन लाॅटरी और उसका व्यापारिक गणित
    5. बाजी और उसका व्यापारिक गणित
    03. मन आधारित मानव निर्मित उत्पाद
    04. मनोरंजन आधारित मानव निर्मित उत्पाद
    05. मशीन आधारित मानव निर्मित उत्पाद
    उप भाग - 04. एन्टीक एवं सुपर एन्टीक उत्पाद - अर्थ, प्रकार एवं पहचान
    उप भाग - 05. विचार, रचनात्मक विचार और लाभ की शक्ति

    भाग - 03. बाजार एवं विपणन प्रणाली (Market & Marketing System)
    01. पारम्परिक बाजार - अर्थ एवं प्रकार
    02. आभासी बाजार - अर्थ एवं प्रकार
    03. पारम्परिक विपणन प्रणाली (Traditional Marketing System)
    04. प्रत्यक्ष विपणन प्रणाली (Direct Marketing System)
    05. मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) - एक परिचय, संचालक कौन? और आधार

    भाग - 04. राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय - एक मानक व्यवसाय
    उप भाग - 01. कल्कि महाअवतार से उत्पन्न नयी प्रणाली और व्यापार 
    अ. ज्ञान से जुड़ा - नयी प्रणाली और व्यापार
    01. भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणालीः 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel)
    02. कार्पोरेट विश्वमानक मानव संसाधन विकास प्रशिक्षण (Corporate World Standard Human Resources Development Training)
    03. विश्व राजनीति पार्टी संघ (World Political Party Organisation - WPPO)
    04. नयी पीढ़ी के लिए नया विषय - ईश्वर शास्त्र, मानक विज्ञान, एकात्म विज्ञान
    05. विश्वशास्त्र पर आधारित आॅडियो-विडियो
    06. मनोरंजन 
    01. फिल्म 
    02. टी0 वी सिरियल
    03. गीत
    ब. जीवन से जुड़ा - रियल स्टेट - नयी प्रणाली और व्यापार
    01. सत्यकाशी महायोजना
    02. डिजिटल प्रापर्टी और एजेन्ट नेटवर्क (Digital Property & Agent Network)
    स. कर्म से जुड़ा व्यापार - नयी प्रणाली और व्यापार
    01. उत्पाद ब्राण्ड 
    01. ब्राण्ड
    02. कैलेण्डर 
    02. शिक्षा ब्राण्ड - सत्य मानक शिक्षा
    03. राष्ट्र निर्माण के पुस्तक

    उप भाग - 02. राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय (प्रत्यक्ष)
    01. सत्य मानक शिक्षा का व्यापार - पुनर्निर्माण ((RENEW - Real Education National Express Way)
    01. शिक्षा से सम्बन्धित विचार
    02. शिक्षा, शिक्षा माध्यम, शिक्षक/गुरू, विद्यार्थी/छात्र और शिक्षा पाठ्यक्रम
    03. ”व्यापार“ और ”शिक्षा का व्यापार“
    04. ”सत्य मानक शिक्षा का व्यापार“ - एक अन्तहीन व्यापार
    05. पुनर्निर्माण - राष्ट्र निर्माण का व्यापार
    06. पुनर्निर्माण क्यों?
    07. प्रवेश पंजीकरण की योग्यता (Eligibility)
    08. छात्रवृत्ति (स्कालरशिप), सहायता और रायल्टी देने का हमारा आधार
    09. पाठ्यक्रम शुल्क (Course Fees)
    10. छात्रवृत्ति और रायल्टी (Scholarship & Royalty)
    11. ये पाठ्यक्रम क्या है?
    अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा 
    01. सत्य शिक्षा (REAL EDUCATION)
    02. सत्य पेशा (REAL PROFESSION)
    03. सत्य पुस्तक (REAL BOOK)
    04. सत्य स्थिति (REAL STATUS)
    05. सत्य एस्टेट एजेन्ट (REAL ESTATE AGENT)
    06. सत्य किसान (REAL KISAN)
    ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा
    01. सत्य कौशल (REAL SKILL)
    02. डिजीटल कोचिंग (DIGITAL COACHING)
    स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK)
    01. डिजिटल ग्रंाम नेटवर्क (Digital Village Network)
    02. डिजिटल नगर वार्ड नेटवर्क (Digital City Ward Network)
    03. डिजिटल एन.जी.ओ/ट्रस्ट नेटवर्क (Digital NGO/Trust Network)
    04. डिजिटल विश्वमानक मानव नेटवर्क (Digital World Stanadard Human Network)
    05. डिजिटल नेतृत्व नेटवर्क (Digital Leader Network)
    06. डिजिटल जर्नलिस्ट नेटवर्क (Digital Journalist Network)
    07. डिजिटल शिक्षक नेटवर्क (Digital Teacher Network)
    08. डिजिटल शैक्षिक संस्थान नेटवर्क (Digital Educational Institute Network)
    09. डिजिटल लेखक-ग्रन्थकार-रचयिता नेटवर्क (Digital Author Network)
    10. डिजिटल गायक नेटवर्क (Digital Singer Network)
    11. डिजिटल खिलाड़ी नेटवर्क (Digital Sports Man Network)
    12. डिजिटल पुस्तक विक्रेता नेटवर्क (Digital Book Saler Network)
    13. डिजिटल होटल और आहार गृह नेटवर्क (Digital Hotel & Restaurant Network)
    12. पुनर्निर्माण - 3-एफ विपणन प्रणाली से युक्त
    13. हमारा उद्देश्य क्या है? 
    14. मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) का आधार
    15. पुनर्निर्माण - मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) नहीं हैं।
    16. आपकी समस्या और हमारा उपाय
    17. पुनर्निर्माण - छात्रवृत्ति, सहायता व रायल्टी वितरण तिथि
    18. पुनर्निर्माण - प्रणाली  की विशेषताएँ
    19. पुनर्निर्माण के प्रेरक (Catalyst)
    02. डिजिटल प्रापर्टी और एजेन्ट नेटवर्क (Digital Property & Agent Network)
    03. राष्ट्र निर्माण के पुस्तक
    04. पेय जल 
    05. कैलेण्डर
     
    उप भाग - 03. राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय (अप्रत्यक्ष)
    01. कार्पोरेट विश्वमानक मानव संसाधन विकास प्रशिक्षण (Corporate World Standard Human Resources Development Training)
    02. सत्यकाशी महायोजना
    03. फिल्म एवं टी0 वी सिरियल
    04. गीत
    05. राष्ट्र निर्माण के लिए शोध व प्रणाली विकास
    1. नयी पीढ़ी के लिए नया विषय - ईश्वर शास्त्र, मानक विज्ञान, एकात्म विज्ञान
    2. विश्व राजनीतिक पार्टी संघ (World Political Party Organisation - WPPO)
    3. विश्वशास्त्र पर आधारित आॅडियो-विडियो

    उप भाग - 04. राष्ट्र निर्माण का हमारा सामाजिक एवं वैश्विक उत्तरदायित्व
    01. विश्व शान्ति के लिए गठित ट्रस्टों की स्पष्ट नीति
    02. मेरे विश्व शान्ति के कार्य हेतू बनाये गये सभी ट्रस्ट मानवता के लिए सत्य-कार्य एवं दान के लिए सुयोग्य पात्र 
    03. राष्ट्र निर्माण का हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व (अप्रत्यक्ष)
    01. साधु एवं सन्यासी के लिए - सत्ययोगानन्द मठ (ट्रस्ट)
    02. राजनीतिक उत्थान व विश्वबन्धुत्व के लिए - प्राकृतिक सत्य मिशन (ट्रस्ट)
    1. राष्ट्रीय रचनात्मक आन्दोलन: स्वायत्तशासी उपसमिति / संगठन
    I.  प्राकृतिक सत्य एवं धार्मिक शिक्षा प्रसार केन्द्र (CENTRE)
    II. ट्रेड सेन्टर (TRADE CENTRE)
    III. विश्व राजनीतिक पार्टी संघ (WPPO)
    (क) परिचय, 
    (ख) राष्ट्रीय क्रान्ति मोर्चा, 
    (ग) राष्ट्रीय सहजीवन आन्दोलन
    (घ) स्वराज-सुराज आन्दोलन, 
    (च) विश्व एकीकरण आन्दोलन (सैद्धान्तिक)
    2. प्राकृतिक सत्य मिशन के विश्वव्यापी स्थापना का स्पष्ट मार्ग
    3. राम कृष्ण मिशन और प्राकृतिक सत्य मिशन 
    03. श्री लव कुश सिंह के रचनात्मक कायों के संरक्षण के लिए - विश्वमानव फाउण्डेशन (ट्रस्ट)
    04. व्यावहारिक ज्ञान पर शोध के लिए - सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (ट्रस्ट) (www.su-isu.org)
    05. ब्राह्मणों के लिए - सत्यकाशी (ट्रस्ट)
    04. राष्ट्र निर्माण का हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व (अप्रत्यक्ष)
                                      01. वाराणसी (उ0प्र0) - काशी एरिया ब्रेन इन्टीग्रेशन एण्ड रिसर्च चैरिटेबल ट्रस्ट
                           02. इलाहाबाद (उ0प्र0) - अविरल सरस्वती प्रवाह एजुकेशन चैरिटेबल ट्रस्ट
                           03. गाजीपुर (उ0प्र0) - भारत सत्य मिशन ट्रस्ट
                           04. सहारनपुर (उ0प्र0) - सूर्योदय ट्रस्ट
                           05. थाने (महाराष्ट्र) - विश्व सेवा तीर्थ ट्रस्ट (www.vishwasevatirth.org)
    05. राष्ट्र निर्माण का हमारा वैश्विक उत्तरदायित्व (अप्रत्यक्ष)

    उप भाग - 05. निवेशक
    01. निवेश (Investment)
    02. निवेशक (Investor)
    03. निवेश के तरीके
    04. रियल इस्टेट (प्रापर्टी) में निवेश
    05. राष्ट्र निर्माण का हमारे द्वारा उच्च लाभ देने वाले प्रोजेक्ट और निवेश

    भाग - 05. राष्ट्र निर्माण का हमारा आमंत्रण
    01. काशी (वाराणसी)-सत्यकाशी को आमंत्रण
    02. धार्मिक संगठन/संस्था को आमंत्रण
    03. रियल इस्टेट/इन्फ्रास्ट्रक्चर व्यवसायिक कम्पनी व एजेन्ट को आमंत्रण
    04. छात्रों, बेरोजगारों व एम.एल.एम नेटवर्कर को आमंत्रण
    05. सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्ण करने हेतू आमंत्रण

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

     
  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र साहित्य - अध्याय-पाँच
  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    अध्याय-पाँच: सार्वजनिक प्रमाणित विश्वरूप
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - अध्याय पाँच की भूमिका
     
    भाग - 01. धर्म प्रवर्तक और उनका धर्म चक्र मार्ग से 
    धर्म ज्ञान का प्रारम्भ
    01. वैदिक धर्म-ऋषि-मुनि गण-ईसापूर्व 6000-2500
    सत्ययुग के धर्म 
    02. ब्राह्मण धर्म-ब्राह्मण गण-ईसापूर्व 6000-2500
    त्रेतायुग के धर्म
    03. वैदिक धर्म-श्रीराम-ईसापूर्व 6000-2500
    द्वापरयुग के धर्म
    04. वेदान्त अद्वैत धर्म-श्रीकृष्ण-ईसापूर्व 3000
    कलियुग के धर्म
    05. यहूदी धर्म, 
    06 .पारसी धर्म-जरथ्रुस्ट-ईसापूर्व 1700
    07. बौद्ध धर्म-भगवान बुद्ध-ईसापूर्व 1567-487
    08. कन्फ्यूसी धर्म-कन्फ्यूसियश-ईसापूर्व 551-479
    09. टोईज्म धर्म-लोओत्से-ईसापूर्व 604-518
    10. जैन धर्म-भगवान महावीर-ईसापूर्व 539-467
    11. ईसाइ धर्म-ईसा मसीह-सन् 33 ई0
    12. इस्लाम धर्म-मुहम्मद पैगम्बर-सन् 670 ई0
    13. सिक्ख धर्म-गुरु नानक-सन् 1510 ई0
    स्वर्णयुग धर्म (धर्म ज्ञान का अन्त)
    पहले विभिन्न धर्म प्रवर्तक और अब अन्त में मैं और मेरा विश्वधर्म
    14.विश्व/सत्य/धर्मनिरपेक्ष/लोकतन्त्र धर्म-लव कुश सिंह”विश्वमानव“-सन् 2012 ई0
    भाग - 02. आचार्य और दर्शन चक्र मार्ग से
    01. आस्तिक ईश्वर कारण है अर्थात ईष्वर को मानना
    अ. स्वतन्त्र आधार 
    1. कपिल मुनि - संाख्य दर्शन 
    2. पतंजलि - योग दर्शन 
    3. महर्षि गौतम- न्याय दर्शन  
    4. कणाद- वैशेशिक दर्शन  
    ब. वैदिक ग्रन्थों पर आधारित
    अ. कर्मकाण्ड पर आधारित
    1. जैमिनि- मीमांसा दर्शन  
    ब. ज्ञानकाण्ड अर्थात उपनिषद् पर आधारित
    1. द्वैताद्वैत वेदंात दर्शन - श्रीमद् निम्बार्काचार्य
    2. अद्वैत वेदंात दर्शन - आदि शंकराचार्य 
    3. विशिष्टाद्वैत वेदंात दर्शन - श्रीमद् रामानुजाचार्य 
    4. द्वैत वेदंात दर्शन - श्रीमद् माध्वाचार्य
    5. शुद्धाद्वैत वेदंात दर्शन - श्रीमद् वल्लभाचार्य
    02. नास्तिक - ईश्वर कारण नहीं है अर्थात ईश्वर को न मानना
              1. चार्वाक- चार्वाक दर्शन
    2. भगवान महावीर- जैन दर्शन
    3. भगवान बुद्ध- बौद्ध दर्शन
    पहले विभिन्न आचार्य तथा उनके दर्शन और अब अन्त में मैं और मेरा कर्म वेदांत और विकास दर्शन
    भाग - 03. गुरू चक्र मार्ग से
    01. श्री रामकृष्ण परमहंस एवं श्रीमाँ शारदा देवी
    02. महर्षि अरविन्द
    03. आचार्य रजनीश ”ओशो“ 
    04. श्री सत्योगानन्द उर्फ भुईधराबाबा
    05. श्री श्री रविशंकर 
    पहले विभिन्न गुरू और अब अन्त में मैं
    भाग - 04. संत चक्र मार्ग से
    01. संत श्री रामानन्द
    02. गोरक्षनाथ
    03. धर्म सम्राट करपात्री जी 
    04. सांई बाबा शिरडी वाले
    05. अवधूत भगवान राम 
    पहले विभिन्न संत और अब अन्त में मैं
    भाग - 05. समाज और सम्प्रदाय चक्र मार्ग से
    01. राजाराम मोहन राय-ब्रह्म समाज
    02. केशवचन्द्र सेन-प्रार्थना समाज 
    03. स्वामी दयानन्द-आर्य समाज
    04. श्रीमती एनीबेसेन्ट-थीयोसोफीकल सोसायटी 
    05. स्वामी विवेकानन्द-राम कृष्ण मिशन 
    पहले विभिन्न समाज सुधारक और अब अन्त में मेरा ईश्वरीय समाज
    भाग - 06. सत्य शास्त्र-साहित्य चक्र मार्ग से
    01. श्री हरिवंश राय बच्चन - ”मधुशाला“
    02. स्वामी अड़गड़ानन्द - ”यथार्थ गीता“
    03. श्री मनु शर्मा - ”कृष्ण की आत्मकथा“
    04. श्री बिल गेट्स - ”बिजनेस @ द स्पीड आॅफ थाॅट“
    05. श्री स्टीफेन हाॅकिंग -”समय का संक्षिप्त इतिहास“
    पहले विभिन्न सत्य शास्त्र-साहित्य और अब अन्त में मेरा विश्वशास्त्र
    भाग - 07. कृति चक्र मार्ग से
    01. पं0 मदन मोहन मालवीय - ”काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (वाराणसी)“
    02. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य - ”अखिल विश्व गायत्री परिवार (ऋृषिकेश)“
    03. नानाजी देषमुख - ”दीनदयाल शोध संस्थान (चित्रकूट)“
    04. महर्षि महेश योगी - ”महर्षि यूनिवर्सिटी आॅफ मैनेजमेन्ट“
    05. बाबा रामदेव - ”पंतजलि योगपीठ (हरिद्वार)“
    पहले विभिन्न कृति और अब अन्त में मेरी कृति-सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (www.su-isu.org)
    भाग - 08. भूतपूर्व धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक नेतृत्वकर्ता चक्र मार्ग से 
    (भारत तथा विश्व के नेत्तृत्वकत्र्ताओं के चिंतन पर दिये गये वक्तव्य का स्पष्टीकरण)
    अ. भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व नेतृत्वकर्ता
    01. महात्मा गाँधी (2 अक्टुबर, 1869 - 30 जनवरी, 1948)
    02. सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्टुबर, 1875 - 15 दिसम्बर, 1950)
    03. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् (5 सितम्बर, 1888 - 17 अप्रैल 1975)
    04. पं0 जवाहर लाल नेहरु (14 नवम्बर, 1889 - 27 मई, 1964)
    05.. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 - 6 दिसम्बर, 1956)
    06. लोकनायक जय प्रकाश नारायण (11 अक्टुबर, 1902 - 8 अक्टुबर, 1979)
    07. लाल बहादुर शास्त्री (2 अक्टुबर, 1904 - 11 जनवरी 1966)
    08. राम मनोहर लोहिया (23 मार्च, 1910 - 12 अक्टुबर, 1967)
    09. आर.वेंकटरामन (4 दिसम्बर, 1910 - 27 जनवरी, 2009)
    10. पं0 दीन दयाल उपाध्याय (25 सितम्बर, 1916 - 11 फरवरी, 1968)
    11. इन्दिरा गाँधी (19 नवम्बर, 1917 - 31 अक्टुबर, 1984)
    12. शंकर दयाल शर्मा (19 अगस्त, 1918 - 26 दिसम्बर, 1999)
    13. जाॅन पाल, द्वितीय (18 मई, 1920 - 2 अप्रैल 2005)
    14. के.आर.नारायणन (27 अक्टुबर, 1920 - 9 नवम्बर, 2005)
    15. अशोक सिंघल ( 27 सितम्बर 1926 - 17 नवम्बर 2015)
    16. चन्द्रशेखर (1 जुलाई, 1927 - 8 जुलाई, 2007)
    17. रोमेश भण्डारी (29 मार्च, 1928 - 7 सितम्बर, 2013)
    18. के. एस. सुदर्शन (18 जून, 1931 - 15 सितम्बर, 2012)
    19. विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून, 1931 - 27 नवम्बर, 2008)
    20. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (15 अक्टुबर, 1931 - 27 जुलाई 2015)
    21. स्वामी शिवानन्द (माघ शुक्ल बसन्त पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव, 1932 ई0 में - )
    22. राजीव गाँधी (20, अगस्त, 1944 - 21 मई, 1991)
    ब. भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में भूतपूर्व नेतृत्वकर्ता
    01. राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967 - 30 नवम्बर 2010)
    पहले विभिन्न भूतपूर्व धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक नेतृत्वकर्ता और अब अन्त में मैं
     
    भाग - 09. वर्तमान धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक नेतृत्वकर्ता चक्र मार्ग से
    (भारत तथा विश्व के नेत्तृत्वकत्र्ताओं के चिंतन पर दिये गये वक्तव्य का स्पष्टीकरण)
    अ. भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में नेतृत्वकर्ता
               01. स्वामी स्वरूपानन्द (2 सितम्बर, 1924 - )
           02. श्री अटल बिहारी वाजपेयी ( 25 दिसम्बर, 1926 - )
           03. श्री लाल कृष्ण आडवाणी (8 नवम्बर, 1927 - )
           04. डाॅ0 कर्ण सिंह (9 मार्च, 1931 - )
           05. श्री वी.एस.नाॅयपाल (17 अगस्त, 1932 - )
           06. श्री मुरली मनोहर जोशी (5 जनवरी, 1934 - )
           07. श्री केशरी नाथ त्रिपाठी (10 नवम्बर, 1934 - )
           08. श्री हामिद अंसारी (1 अप्रैल, 1934 - )
           09. श्रीमती प्रतिभा पाटिल (19 दिसम्बर, 1934 - )
          10. श्री राम नाइक (16 अप्रैल 1934 - )
           11. दलाई लामा (6 जुलाई, 1935 - )
          12. स्वामी जयेन्द्र सरस्वती (18 जुलाई, 1935 - )
          13. श्री प्रणव मुखर्जी (11 दिसम्बर 1935 - )
          14. श्री बी.एल.जोशी (27 मार्च, 1936 - )
          15. श्री गिरधर मालवीय (14 नवम्बर 1936 - )
          16. श्री कौफी अन्नान (8 अप्रैल, 1938 - )
          17. श्रीमती शीला दीक्षित (31 मार्च, 1938 - )
          18. श्री अन्ना हजारे (15 जनवरी, 1940 - )
          19. श्री सैम पित्रोदा (4 मई 1942 - )
          20. श्री यदुनाथ सिंह (6 जुलाई, 1945 - )
          21. श्रीमती सोनिया गाँधी (9 दिसम्बर 1946 - )
          22. श्री बिल क्लिन्टन (19 अगस्त, 1946 - )
    ब. भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में नेतृत्वकर्ता
            01. भारतीय संविधान
            02. भारतीय संसद
    03. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
    04. भारतीय शिक्षा प्रणाली
    05. भारतीय विपणन प्रणाली
    06. भारतीय मीडिया (चैथा स्तम्भ - पत्रकारिता)
    07. सहस्त्राब्दि विश्व शान्ति सम्मेलन
    08. श्री फर्दिनो इनासियो रिबेलो (31 जुलाई 1949 - )
    09. श्री नरेन्द्र मोदी (17 सितम्बर 1950 - )
    10. श्री राज नाथ सिंह (10 जुलाई, 1951 - )
    11. श्री बराक ओबामा (4 अगस्त, 1961 - )
    12. बाबा रामदेव (25 दिसम्बर, 1965 - )
    13. अमर उजाला फाउण्डेशन प्रस्तुति ”संवाद“
    पहले विभिन्न वर्तमान धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक नेतृत्वकर्ता और अब अन्त में मैं
    भाग - 10. सत्यमित्रानन्द गिरी - ”भारत माता मन्दिर (ऋृषिकेश)“
    पहले भारतमाता मन्दिर और अब अन्त में उसमें मैं और मेरा धर्म के व्यवहारिक अनुभव का विश्वधर्म मन्दिर
    भाग - 11. काल और पुर्नजन्म चक्र मार्ग से 
    01. सत् मार्ग के श्री कृष्ण
    02. रज मार्ग के स्वामी विवेकानन्द
    03. तम मार्ग के रावण
     पहले सर्वोच्च सत्-रज-तम मार्ग के श्रीकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द एवं रावण और अब अन्त में उनका पुनर्जन्म मैं
    01. सत्व मार्ग से - श्री कृष्ण और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    02. रज मार्ग से - स्वामी विवेकानन्द और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    01. स्वामी विवेकानन्द की वाणीयाँ जो भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के जीवन में सत्य हुईं।
    02. स्वामी विवेकानन्द और भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के जीवन काल का घटना-चक्र: एक आश्चर्यजनक समानता
    03. तम मार्ग से - रावण और श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
    पहले सर्वोच्च काल मार्ग के श्रीकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द और अब अन्त में मैं
    01. प्रथम भाग - अदृश्य काल में विश्वात्मा का प्रथम जन्म - योगेश्वर श्री कृष्ण 
    02. द्वितीय और अन्तिम भाग - दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का पहला भाग - स्वामी विवेकानन्द
    03. द्वितीय और अन्तिम भाग - दृश्य काल में विश्वात्मा के जन्म का अन्तिम भाग - भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ 
    भाग - 12. आत्मा चक्र मार्ग से 
            पहले सभी आत्मा और अब अन्त में मैं विश्वात्मा
    भाग - 13. मनु चक्र मार्ग से 
    पहले अदृश्य सात मनु और अब दृश्य आठवाँ सांवर्णि मनु मैं
    भाग - 14. पहले मै और अब अन्त में मै ही मै
     

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

     
  • क्लिक करें=>विश्वशास्त्र साहित्य - परिशिष्ट
  •  (द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य ”नवसृजन“ के

     प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ के बाद कलियुग में
     
    द्वितीय और अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“ और ”पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“)


    विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज
     
    परिशिष्ट
     
     
    ”विश्वशास्त्र“ - परिशिष्ट की भूमिका
     
    परिशिष्ट - अ (साभार-राम कृष्ण मिशन प्रकाशन)
    स्वामी विवेकानन्द 
     
    भाग - 1: धर्म और योग
    01. धर्म-विज्ञान 
    02. योग क्या है? 
    03. ज्ञान योग 
    04. राजयोग 
    05. भक्ति योग 
    06. प्रेम योग 
    07. कर्मयोग
     
    भाग - 2: वेद, ईश्वर, अवतार, गुरू और मरणोत्तर जीवन
    01. वेद
    02. वेदान्त 
    03. ईश्वर 
    04. गुरु, शिष्य, अवतार और मन्त्र 
    05. मरणोत्तर जीवन
     
    भाग - 3: संमाज
    01. विज्ञान और आध्यात्मिकता
    02. प्राच्य और पाश्चात्य 
    03. जाति, संस्कृति और समाजवाद 
    04. समाज नीति
    05. भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध
     
    भाग - 4: संग, सान्निध्य और पत्रावली
     
    भाग - 5: समर नीति और समन्वयाचार्य श्री रामकृष्ण ”परमहंस“
     
    परिशिष्ट - ब
    व कुश सिंह ”विश्वमानव“
     
    भाग - 1: मेरा मार्ग
    01. निर्माण के मार्ग
    02. मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा
    03. लक्ष्य - गणराज्यों का संघ - देश और देशों का संघ - विश्व राष्ट्र
    04. पाँचवें युग - स्वर्णयुग में प्रवेश का आमंत्रण
    05. मैं-विश्वात्मा ने भारतीय संविधान की धारा-51 (ए): नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य अनुसार अपना धर्म कत्र्तव्य निभाया
     
    भाग - 2: वार्ता, वक्तव्य, दिशाबोध, पत्रावली एवं जनहित याचिका
    उप भाग - 1. वार्ता
    01. विश्वमानव से वार्ता  - 1
    02. विश्वमानव से वार्ता  - 2
    03. विश्वमानव से वार्ता  - 3
    उप भाग - 2. वक्तव्य
    01. विश्व शान्ति के लिए मन का मानकीकरण केवल शब्द नहीं बल्कि उसके मानक का निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है।
    02. मैं भारत और अमेरिका के हताश होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ
    03. रचनात्मक पत्रकारिता - पत्रकारिता का सत्य-रूप
    04. 21 दिसम्बर, 2012 को सर्वनाश नहीं बल्कि पाँचवें युग - स्वर्ण युग और सत्यकाशी तीर्थ व्यक्त हुआ है
    05. मेरे विश्व शान्ति के कार्य हेतू बनाये गये पाँच ट्रस्ट मानवता के लिए सत्य-कार्य एवं दान के लिए सुयोग्य पात्र
    उप भाग - 3. दिशाबोध
                            01.नागरिकों को आह्वान
                    02.विचारकों को आह्वान
                    03.शिक्षण क्षेत्र से जुड़े आचार्याे को आह्वान
                    04.प्रबंध शिक्षा क्षेत्र को आह्वान
                    05.शिक्षा पाठ्यक्रम निर्माता को आह्वान
                    06.पत्रकारिता को आह्वान
                    07.मानकीकरण संगठन और औद्योगिक जगत को आह्वान
                    08.फिल्म निर्माण उद्योग को आह्वान
                    09.धर्म क्षेत्र को आह्वान
                    10.राजनीतिक दलों को आह्वान
                    11.सरकार / शासन को आह्वान
                    12.संसद को आह्वान
                    13. सर्वोच्च न्यायालय को आह्वान
    उप भाग - 4. पत्रावली
                            01.समय-समय पर भेजे गये पत्र
                    02. समय-समय पर प्राप्त पत्र
                    03. सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के पोस्ट
    उप भाग - 5. जनहित याचिका
                            क्या है जनहित याचिका (PIL- Public Interesat Litigation)
                    जनहित याचिका-01. पूर्ण शिक्षा का अधिकार
                    जनहित याचिका-02. राष्ट्रीय शास्त्र
                    जनहित याचिका-03. नागरिक मन निर्माण का मानक
                    जनहित याचिका-04. सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त
                    जनहित याचिका-05. गणराज्य का सत्य रूप
     
    भाग - 3: सत्य-अर्थ एवम् मार्गदर्शन
     
    भाग - 4: वाणीयाँ एवम् उद्गार
     
    भाग - 5: मैं (व्यक्तिगत या सार्वभौम)
    01. क्यों असम्भव था व्यक्ति, संत-महात्माओं-धर्माचार्यो, राजनेताओं और विद्वानों द्वारा यह अन्तिम कार्य ?
    02. भोगेश्वर रुप (कर्मज्ञान का विश्वरुप): मैं एक हूँ परन्तु अनेक नामों से जाना जाता हूँ 
    03. एक ही मानव शरीर के जीवन, ज्ञान और कर्म के विभिन्न विषय क्षेत्र से मुख्य नाम (सर्वोच्च, अन्तिम और दृश्य)
    04. एक ही ”विश्वशास्त्र“ साहित्य के विभिन्न नाम और उसकी व्याख्या
    05. बसुधैव कुटुम्बकम् 

     
    “प्रस्तुत शास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”

    भारत सरकार के लिए सार्वजनिक घोषणा
     
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति को एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
     
    - लव कुश सिंह “विश्वमानव”
    आविष्कारक - “मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी (WCM-TLM-SHYAM.C)”
                             अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - “भारत रत्न”
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