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    परियोजना- पुनर्निर्माण

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     भारत सरकार के साथ लेकिन सरकार की सोच से हमेशा आगे

    आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण,

    पूर्ण मानव निर्माण व भारत को जगत गुरू बनाने की योजना है - पुनर्निर्माण


    नया, पुराना और वर्तमान

    जिस प्रकार वाहन-कार का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया, पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है परन्तु हैं सभी कार। इसी प्रकार सत्य का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है। परन्तु हैं सभी सत्य। जिस प्रकार वाहन ”कार“ वर्तमान है उसी प्रकार सत्य भी वर्तमान है सिर्फ उसके व्यवहार में लाने के लिए संस्करण नवीन हो रहे है। नवीन संस्करण की पहचान तभी हो सकती है जब पुराने संस्करण की पहचान हो और उसका ज्ञान हो। अन्यथा वह सब पुराना ही लगेगा या नया ही लगेगा। नवीन संस्करण अधिक व्यावहारिक होता है। इसलिए वह अधिक क्रिया-प्रतिक्रियापूर्ण होता है और यदि क्रिया-प्रतिक्रिया पूर्ण नहीं है तो उसके दो कारण होगें। पहला नवीनत्व के पहचानने का अभाव या दूसरा वह संस्करण नवीन ही नहीं है ”कार“ हो या ”सत्य“ उसका नवीन संस्करण तब तक आता रहेगा जब तक कि वह पूर्ण विकसित और व्यावहारिक रूप को प्राप्त नहीं कर लेता। और सिर्फ वही संस्करण स्थिरता और व्यवहार में रहेगा जो पूर्ण व्यावहारिक और विकसित होगा। शेष विकास के क्रम के इतिहास के रूप में जाने जायेंगे। ऐसा ही होता हैं।

    - श्री लव कुश सिंह विश्वमानव

    रचनाकर्ता - लक्ष्य पुनर्निर्माण व उसकी प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम व कार्य योजना

    आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी

    दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न


     

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    RENEW - Real Education National Express Way

    पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग

    राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय - एक मानक व्यवसाय भाग-01

    व्यवसाय को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है- ‘‘व्यवसाय एक ऐसी क्रिया है, जिसमें लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं अथवा सेवाओं का नियमित उत्पादन क्रय-विक्रय तथा विनिमय सम्मिलित है’’ जिसके आर्थिक उद्देश्य, सामाजिक उद्देश्य, मानवीय उद्देश्य, राष्ट्रीय उद्देश्य, वैश्विक उद्देश्य व सामाजिक उत्तरदायित्व होते हैं।
    लोग लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से व्यवसाय चलाते हैं। लेकिन केवल लाभ अर्जित करना ही व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य नहीं होता। समाज का एक अंग होने के नाते इसे बहुत से सामाजिक कार्य भी करने होते हैं। यह विशेष रूप से अपने अस्तित्व की सुरक्षा में संलग्न स्वामियों, निवेशकों, कर्मचारियों तथा सामान्य रूप से समाज व्यवसाय की प्रकृति तथा क्षेत्र व समुदाय की देखरेख की जिम्मेदारी भी निभाता है। अतः प्रत्येक व्यवसाय को किसी न किसी रूप में इनके प्रति जिम्मेदारियों का निर्वाह करना चाहिए। उदाहरण के लिए, निवेशकों को उचित प्रतिफल की दर का आश्वासन देना, अपने कर्मचारियों को अच्छा वेतन, सुरक्षा, उचित कार्य दशाएँ उपलब्ध कराना, अपने ग्राहकों को अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उचित मूल्यों पर उलब्ध कराना, पर्यावरण की सुरक्षा करना तथा इसी प्रकार के अन्य बहुत से कार्य करने चाहिए।
    हालांकि ऐसे कार्य करते समय व्यवसाय के सामाजिक उत्तारदायित्वों के निर्वाह के लिए दो बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। पहली तो यह कि ऐसी प्रत्येक क्रिया धर्मार्थ क्रिया नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यवसाय किसी अस्पताल अथवा मंदिर या किसी स्कूल अथवा कालेज को कुछ धनराशि दान में देता है तो यह उसका सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं कहलाएगा, क्योंकि दान देने से सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह नहीं होता। दूसरी बात यह है कि, इस तरह की क्रियाएँ कुछ लोगों के लिए अच्छी और कुछ लोगों के लिए बुरी नहीं होनी चाहिए। मान लीजिए एक व्यापारी तस्करी करके या अपने ग्राहकों को धोखा देकर बहुत सा धन अर्जित कर लेता है और गरीबों के मुफ्त इलाज के लिए अस्पताल चलाता है तो उसका यह कार्य सामाजिक रूप से न्यायोचित नहीं है। सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि एक व्यवसायी सामाजिक क्रियाओं को सम्पन्न करते समय ऐसा कुछ भी न करे, जो समाज के लिए हानिकारक हो।
    इस प्रकार सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा व्यवसायी को जमाखोरी व कालाबाजारी, कर चोरी, मिलावट, ग्राहकों को धोखा देना जैसी अनुचित व्यापरिक क्रियाओं के बदले व्यवसायी को विवेकपूर्ण प्रबंधन के द्वारा लाभ अर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह कर्मचारियों को उचित कार्य तथा आवासीय सुविधाएँ प्रदान करके, ग्राहकों को उत्पाद विक्रय उपरांत उचित सेवाएँ प्रदान करके, पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करके तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा द्वारा संभव है।
    एक समाज, व्यक्तियों, समूहों, संगठनों, परिवारों आदि से मिलकर बनता है। ये सभी समाज के सदस्य होते हैं। ये सभी एक दूसरे के साथ मिलते-जुलते हैं तथा अपनी लगभग सभी गतिविधियों के लिए एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। इन सभी के बीच एक संबंध होता है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष। समाज का एक अंग होने के नाते, समाज के सदस्यों के बीच संबंध बनाए रखने में व्यवसाय को भी मदद करनी चाहिए। इसके लिए उसे समाज के प्रति कुछ निश्चित उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना आवश्यक है। ये उत्तरदायित्व हैं- समाज के पिछड़े तथा कमजोर वर्गों की सहायता करना, सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करना, रोजगार के अवसर जुटाना, पर्यावरण की सुरक्षा करना, प्राकृतिक संसाधनों तथा वन्य जीवन का संरक्षण करना, खेलों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान प्रोद्यौगिकी आदि के क्षेत्रों में सहायक तथा विकासात्मक शोधों को बढ़ावा देने में सहायता करना।
    उपरोक्त क्रम में हमारा व्यवसाय व्यक्ति से लेकर, देश व विश्वराष्ट्र तक के उत्तरदायित्व को पूर्ण करते हुये एक मानक व्यवसाय के रूप में संचालित है। जिसका पूर्ण विवरण आगे के पृष्ठो में है।

    हमारा व्यवसाय

    डब्ल्यू.एस. (WS)-000

    ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक

    के अनुसार

    एक पूर्ण व्यापारिक संगठन के लिए आवश्यक है कि वह डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक के अनुसार हो। अर्थात उस संगठन की संरचना और कार्य निम्न सभी चक्र को अवश्य ही संचालित करती हो-

    सूत्र-1. ज्ञानातीत चक्र: चक्र -0 - धर्म ज्ञान से बिना युक्त के मुक्त अर्थात् अपना मालिक अन्य और धर्म ज्ञान से युक्त होकर मुक्त अर्थात् अपना मालिक स्वंय की स्थिति। ज्ञानावस्था से होकर यही चक्र 7 भी कहलाता है। यह स्थिति शिशु और ज्ञानी की होती है।
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन का मालिक या तो कोई और (ईश्वर) होता है या उस संगठन में शामिल एक या अनेक ईश्वर (व्यक्ति) होते हैं। जिस प्रकार ईश्वर किसी जीव-निर्जीव, स्त्री-पुरूष, जाति-सम्प्रदाय इत्यादि से बिना भेद-भाव के सभी के लिए कार्य करता है उसी प्रकार एक पूर्ण व्यापारिक संगठन को भी उसी प्रकार कार्य करना चाहिए। जिस प्रकार ईश्वर दिन-रात, वर्षा-सूखा, गर्मी-सर्दी, तूफान-शान्ति इत्यादि बिना किसी भेद-भाव अर्थात एकात्म के द्वारा करता है उसी प्रकार एक पूर्ण व्यापारिक संगठन को भी उसी प्रकार कार्य करना चाहिए। एक शिशु मानव और ज्ञानी मानव दोनों ही समभाव अर्थात एकात्म में स्थित होकर ही क्रियाशील रहते हैं। बस शिशु अज्ञानावस्था में रहता है जबकि ज्ञानी मानव ज्ञानावस्था में रहकर वही करता है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के समभाव में स्थित होकर संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा वर्षा होती है जिसको जितना जल लेना हो ले ले, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी मनुष्यों के लिए है जिसको जितने में शामिल होना है हो लें।

    सूत्र-2. भौतिकवाद या भोगवाद कर्म चक्र:

    चक्र-1. TRANSACTION आदान-प्रदान चक्र। यही ज्ञानावस्था में चक्र-6 कहलाता है।
    उपचक्र 1.1 - शारीरिक
    उपचक्र 1.2 - आर्थिक/संसाधन
    उपचक्र 1.3 - मानसिक
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या -
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-1 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी शारीरिक- आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-1 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-1 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

    चक्र-2. RURAL- ग्रामीण चक्र
    उपचक्र 2.1 - शारीरिक
    उपचक्र 2.2 - आर्थिक/संसाधन
    उपचक्र 2.3 - मानसिक
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - ग्रामीण का व्यापक अर्थ है - वे जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में पीछे हैं।
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-2 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में पीछे हैं, उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में पीछे हैं, उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान जो ईश्वर से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में पीछे हैं। हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में पीछे हैं, उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-2 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-2 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

    चक्र-3. ADVANCEMENT या ADAPTABILITY - आधुनिकता या अनुकूलन चक्र
    उपचक्र 3.1 - शारीरिक
    उपचक्र 3.2 - आर्थिक/संसाधन
    उपचक्र 3.3 - मानसिक
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - आधुनिकता या अनुकूलन का अर्थ है - वे जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे हैं उनके शारीरिक-आर्थिक-मानसिक प्रणाली को स्वीकार या स्वयं को उस अनुसार बनाना।
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-3 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे हैं, उन्हें स्वीकार या स्वयं को उस अनुसार बनाते हुये उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे हैं, उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान जो ईश्वर से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे हैं। हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी जो स्वयं से शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे हैं, उनके लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-3 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-3 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

    चक्र-4. DEVELOPMENT - विकास चक्र
    उपचक्र 4.1 - शारीरिक
    उपचक्र 4.2 - आर्थिक/संसाधन
    उपचक्र 4.3 - मानसिक
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - विकास का अर्थ है - स्वयं को शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने से हैं।
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-4 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर स्वयं कोे शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर स्वयं के शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे बढा़ता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में विकास हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी स्वयं कोे शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे बढ़ाने के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-4 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-4 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

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    पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग

    राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय - एक मानक व्यवसाय भाग-02

     

    चक्र-5. EDUCATION -शिक्षा चक्र
    उपचक्र 5.1 - शारीरिक
    उपचक्र 5.2 - आर्थिक/संसाधन
    उपचक्र 5.3 - मानसिक
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - शिक्षा का अर्थ है - स्वयं को शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र के विषय में मस्तिष्क को चिन्तन स्तर पर लाने से हैं।
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-5 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर स्वयं का शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में शिक्षित करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर स्वयं के शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे बढा़ने के लिए शिक्षित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में शिक्षण हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी स्वयं कोे शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आगेे बढ़ाने के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए शिक्षित करता है और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-5 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में शिक्षित करता करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है। 
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-5 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है। 
    सूत्र-3. आध्यात्मवाद-ज्ञानचक्र: 

    चक्र-6. NATURAL TRUTH - प्राकृतिक सत्य चक्र: यही चक्र अज्ञानावस्था में चक्र-1 कहलाता है।
    उपचक्र-1.1 - अदृश्य प्राकृतिक अर्थात अदृश्य आत्मा
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - 
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-6 उपचक्र-1.1 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर अदृश्य प्राकृतिक या अदृश्य आत्मा के लिए आदान-प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।

    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर अदृश्य प्राकृतिक या अदृश्य आत्मा के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा अदृश्य प्राकृतिक या अदृश्य आत्मा के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी अदृश्य प्राकृतिक या अदृश्य आत्मा के लिए शारीरिक- आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-6 उपचक्र-1.1 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है। 
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-6 उपचक्र-1.1 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

    उपचक्र 1.2 - दृश्य प्राकृतिक अर्थात दृश्य आत्मा
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - 
    सूत्र-1 से युक्त चक्र-6 उपचक्र-1.2 का संचालन - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन सूत्र-1 के भाव (ह्दय) से युक्त होकर दृश्य प्राकृतिक या दृश्य आत्मा के लिए आदान-प्रदान करता है। इसे आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार का है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के आध्यात्मिकता या धर्म या समभाव या एकात्म में स्थित होकर दृश्य प्राकृतिक या दृश्य आत्मा के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा दृश्य प्राकृतिक या दृश्य आत्मा के लिए शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान प्रदान हो रहा है, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी दृश्य प्राकृतिक या दृश्य आत्मा के लिए शारीरिक- आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान विकास के लिए और शामिल हाने वालों के लिए करता है।

    सूत्र-1 से मुक्त चक्र-6 उपचक्र-1.2 का संचालन - सूत्र-1 से मुक्त व्यापारिक संगठन भी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करता है। इसे भौतिकता या अधर्म या असमभाव या अनेकात्म से युक्त व्यवसाय या आदान-प्रदान कहते है। 
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन सूत्र-1 से मुक्त होकर चक्र-6 उपचक्र-1.2 का कार्य नहीं करता। यह उसका विशिष्ट उद्देश्य है।

    सूत्र-4. ज्ञानातीत चक्र: चक्र -7 - RELIGION - धर्मचक्र: अपना मालिक स्वंय की स्थिति। यही अज्ञानावस्था में चक्र-0 भी कहलाता है।
    उपरोक्त सूत्र के अनुसार हमारे व्यवसाय की व्याख्या - एक पूर्ण व्यापारिक संगठन का मालिक या तो कोई और (ईश्वर) होता है या उस संगठन में शामिल एक या अनेक ईश्वर (व्यक्ति) होते हैं। जिस प्रकार ईश्वर किसी जीव-निर्जीव, स्त्री-पुरूष, जाति-सम्प्रदाय इत्यादि से बिना भेद-भाव के सभी के लिए कार्य करता है उसी प्रकार एक पूर्ण व्यापारिक संगठन को भी उसी प्रकार कार्य करना चाहिए। जिस प्रकार ईश्वर दिन-रात, वर्षा-सूखा, गर्मी-सर्दी, तूफान-शान्ति इत्यादि बिना किसी भेद-भाव अर्थात एकात्म के द्वारा करता है उसी प्रकार एक पूर्ण व्यापारिक संगठन को भी उसी प्रकार कार्य करना चाहिए। एक शिशु मानव और ज्ञानी मानव दोनों ही समभाव अर्थात एकात्म में स्थित होकर ही क्रियाशील रहते हैं। बस शिशु अज्ञानावस्था में रहता है जबकि ज्ञानी मानव ज्ञानावस्था में रहकर वही करता है।
    हमारा व्यापार और व्यापारिक संगठन भी इसी प्रकार है। वह अपने कार्यो-योजनाओं-व्यापारिक नियमों को बिना किसी भेद-भाव के समभाव में स्थित होकर संचालित करता है। जिस प्रकार ईश्वर द्वारा वर्षा होती है जिसको जितना जल लेना हो ले ले, उसी प्रकार हमारा व्यापार भी मनुष्यों के लिए है जिसको जितने में शामिल होना है हो लें। और यह सब ज्ञानावस्था अर्थात धर्म में स्थित होकर करता है।

    जिस प्रकार “ओउम” शब्द, उस अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित ईश्वर का नाम है और “ओउम” शब्द की व्याख्या, उस ईश्वर को समझने-जानने का मार्ग है। उसी प्रकार "TRADE CENTRE" शब्द, इस दृश्य सर्वाजनिक प्रमाणित ईश्वर-ब्रह्माण्ड का नाम है और “TRADE CENTRE” शब्द की व्याख्या, इस ईश्वर-ब्रह्माण्ड में सार्वभौम कर्मज्ञान को समझने-जानने का मार्ग है। शब्द “TRADE CENTRE” ब्रह्माण्ड के पर्यायवाची शब्द के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि यह ब्रह्माण्ड ही सबसे बड़ा व्यापार केन्द्र है। शब्द “TRADE CENTRE” की व्याख्या के अनुसार ही इस संसार में व्यक्ति से लेकर संगठन, सरकार और विश्व तक संचालित हो रहे हैं।
    इस प्रकार - जव to stepup TRADE through CENTRE (सभी कर्म व्यापार को सार्वभौम आत्मा केन्द्र के ज्ञान द्वारा आगे बढ़ाना) अर्थात 2. विस्तार में to stepup Transaction, Rural, Advancement(Adoptability), Development, Education through Center for Enhancement of Natural Truth & Religious Education (सभी कर्म आदान-प्रदान, ग्रामीण, आधुनिकता-अनुकूलन, विकास, शिक्षा को प्राकृतिक सत्य और धार्मिक शिक्षा के ज्ञान द्वारा आगेे बढ़ाना) हुआ अर्थात जो व्यक्ति और संस्था समभाव और निष्पक्ष में स्थित होकर सभी शारीरिक, आर्थिक व मानसिंक कर्म आदान-प्रदान, ग्रामीण, आधुनिकता-अनुकूलन, विकास, शिक्षा को सदैव एक साथ करता है वही मानक व्यक्ति और संस्था कहलाता है। 
    इस प्रकार इस सिद्धान्त से देखने पर पायेगें कि जो व्यक्ति और संस्था सफल हैं या सफलता प्राप्त कर रहें हैं उनके मूल में यही सिद्धान्त है। यही नहीं यह किसी देश के कार्य प्रणाली पर भी उतना ही सत्य है। और सिर्फ इतना ही नहीं आॅठवे व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार श्री कृष्ण भी इसी सिद्धान्त से ही अपने जीवन की समग्र योजना का निर्माण किये थे। यही मानव (व्यक्तिगत मन) और संस्था (संयुक्त मन) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक (WS-0000 & WS-000) भी है। जब तक भारत इस सिद्धान्त को स्वयं के लिए प्रयोग नहीं करता तब तक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर ”एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ का निर्माण नहीं हो सकता और जब तक भारत इस सिद्धान्त को विश्व में स्थापित नहीं करता तब तक वह इस दृश्य काल में विश्व गुरू नहीं बन सकता। 
    शब्द “TRADE CENTRE” का दर्शन बहुत ही विस्तृत और शक्तिशाली है। जिसका पूर्ण विवरण ”विश्वशास्त्र - द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज“ के अध्याय-तीन में है। सभी के लिए होते हुये भी उपरोक्त मार्गदर्शक बिन्दु व सिंद्धान्त ही एक आदर्श मानक वैश्विक नागरिक व संस्था के लिए विशेष रूप से मार्गदर्शक बिन्दु व सिंद्धान्त है।
    उपरोक्त मानक के अनुसार ही हमारा व्यवसाय है जिसमें व्यापारिक और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों का समावेश है। प्रत्यक्ष व्यापार और समाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ यह है कि उसमें आविष्कारक श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव” शामिल हैं तथा अप्रत्यक्ष अर्थात प्रेरक का अर्थ उनके मार्गदर्शन से अन्य के लिए उपलब्ध है, जो निम्न प्रकार हैं-

    राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय (प्रत्यक्ष)
    01. सत्य मानक शिक्षा का व्यापार - पुनर्निर्माण (RENEW - Real Education National Express Way)

          अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा 
                01. सत्य शिक्षा (REAL EDUCATION)
                02. सत्य पेशा (REAL PROFESSION)
                03. सत्य पुस्तक (REAL BOOK)
                04. सत्य स्थिति (REAL STATUS)
                05. सत्य एस्टेट एजेन्ट (REAL ESTATE AGENT)
                06. सत्य किसान (REAL KISAN)

         ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा
               01. सत्य कौशल (REAL SKILL)
               02. डिजीटल कोचिंग (DIGITAL COACHING)

         स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK)
               01. डिजिटल ग्राम नेटवर्क (Digital Village Network)
               02. डिजिटल नगर वार्ड नेटवर्क (Digital City Ward Network)
               03. डिजिटल एन.जी.ओ/ट्रस्ट नेटवर्क (Digital NGO/Trust Network)
               04. डिजिटल विश्वमानक मानव नेटवर्क (Digital World Standard Human Network)
               05. डिजिटल नेतृत्व नेटवर्क (Digital Leader Network)
               06. डिजिटल जर्नलिस्ट नेटवर्क (Digital Journalist Network)
               07. डिजिटल शिक्षक नेटवर्क (Digital Teacher Network)
               08. डिजिटल शैक्षिक संस्थान नेटवर्क (Digital Educational Institute Network)
               09. डिजिटल लेखक-ग्रन्थकार-रचयिता नेटवर्क (Digital Author Network)
               10. डिजिटल गायक नेटवर्क (Digital Singer Network)
               11. डिजिटल खिलाड़ी नेटवर्क (Digital Sports Man Network)
               12. डिजिटल पुस्तक विक्रेता नेटवर्क (Digital Book Saler Network)
               13. डिजिटल होटल और आहार गृह नेटवर्क (Digital Hotel & Restaurant Network)

    02. डिजिटल प्रापर्टी और एजेन्ट नेटवर्क (Digital Property & Agent Network)

    03. राष्ट्र निर्माण के पुस्तक

    04. पेय जल 

    05. कैलेण्डर

    राष्ट्र निर्माण का हमारा व्यवसाय (अप्रत्यक्ष)

    01. कार्पोरेट विश्वमानक मानव संसाधन विकास प्रशिक्षण (Corporate World Standard Human Resources Development Training)
    02. सत्यकाशी महायोजना 
    03. फिल्म एवं टी0 वी सिरियल
    04. गीत
    05. राष्ट्र निर्माण के लिए शोध व प्रणाली विकास

          01. नयी पीढ़ी के लिए नया विषय - ईश्वर शास्त्र, मानक विज्ञान, एकात्म विज्ञान
          02. विश्व राजनीति पार्टी संघ (World Political Party Organisation - WPPO)
          03. विश्वशास्त्र पर आधारित आॅडियो-विडियो

    हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व (प्रत्यक्ष)

    01: साधु एवं सन्यासी के लिए - सत्ययोगानन्द मठ (ट्रस्ट)
    02: राजनीतिक उत्थान व विश्वबन्धुत्व के लिए - प्राकृतिक सत्य मिशन (ट्रस्ट)
    03: श्री लव कुश सिंह के रचनात्मक कायों के संरक्षण के लिए - विश्वमानव फाउण्डेशन (ट्रस्ट)
    04: व्यावहारिक ज्ञान पर शोध के लिए - सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (ट्रस्ट) 
    05: ब्राह्मणों के लिए - सत्यकाशी (ट्रस्ट)

    हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व (अप्रत्यक्ष)

    01. वाराणसी (उ0प्र0) - काशी एरिया ब्रेन इन्टीग्रेशन एण्ड रिसर्च चैरिटेबल ट्रस्ट
    02. इलाहाबाद (उ0प्र0) - अविरल सरस्वती प्रवाह एजुकेशन चैरिटेबल ट्रस्ट
    03. मथुरा (उ0प्र0) - श्री श्याम चेतना ट्रस्ट
    04. सहारनपुर (उ0प्र0) - सूर्योदय ट्रस्ट
    05. पालघर (महाराष्ट्र) - श्री सांई कल्कि ट्रस्ट

    राष्ट्र निर्माण का हमारा वैश्विक उत्तरदायित्व (अप्रत्यक्ष)

    वैश्विक एकीकरण, मानक और वैश्विक मानव निर्माण के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित प्रारूप का प्रस्तुतिकरण।

    इस प्रकार हमारा राष्ट्र निर्माण का व्यापार आर्थिक उद्देश्य, सामाजिक उद्देश्य, मानवीय उद्देश्य, राष्ट्रीय उद्देश्य, वैश्विक उद्देश्य व सामाजिक उत्तरदायित्व को पूर्ति करता हुआ एक मानक व्यवसाय है। 

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  •  योजना निर्माता का सन्देश

    वर्तमान समय में शब्द -‘‘निर्माण’’ भूमण्डलीय रुप से परिचित हो चुका है इसलिए हमें अपना लक्ष्य मनुष्य के निर्माण के लिए निर्धारित करना चाहिए। और दूसरी तरफ विवादमुक्त, दृश्य, प्रकाशित तथा वर्तमान सरकारी प्रक्रिया के अनुसार मानक प्रक्रिया उपलब्ध है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मानक हमेशा सत्य का सार्वजनिक प्रमाणित विषय होता है न कि विचारों का व्यक्तिगत प्रमाणित विषय। अर्थात् प्रस्तुत मानक विभिन्न विषयों जैसे- आध्यात्म, विज्ञान, तकनीकी, समाजिक, नीतिक, सैद्धान्तिक, राजनीतिक इत्यादि के व्यापक समर्थन के साथ होगा। ‘‘उपयोग के लिए तैयार’’ तथा ‘‘प्रक्रिया के लिए तैयार’’ के आधार पर प्रस्तुत मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C (World Class Manufactuing–Total Life Maintenance- Satya, Heart, Yoga, Ashram, Meditation.Conceousness) प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total System Involvement-TSI) है औरं विश्वमानक शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला (WS-0 : World Standard of Mind Series) समाहित है। जो और कुछ नहीं, यह विश्व मानव निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी और मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्व मानक है। जैसे- औद्योगिक क्षेत्र में इन्स्टीच्यूट आॅफ प्लान्ट मेन्टीनेन्स, जापान द्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी डब्ल्यू0 सी0 एम0-टी0 पी0 एम0-5 एस (WCM-TPM-5S (World Class Manufacturing-Total Productive Maintenance-Siri (छँटाई), Seton (सुव्यवस्थित), Sesso (स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement) है।) का प्रयोग उद्योगों में विश्व स्तरीय निर्माण प्रक्रिया के लिए होता है। और आई.एस.ओ.-9000 (ISO-9000) तथा आई.एस.ओ.-14000 (ISO-14000) है।
    युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे- महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।
    सिर्फ लक्ष्य निर्धारण से ही कार्य सम्पन्न नहीं हो जाता बल्कि लक्ष्य की सत्यता की प्रमाणिकता के लिए धर्म शास्त्रों, पुराणों, दार्शनिकों, सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्वकत्र्ताओं, विज्ञान व आध्यात्म इत्यादि के विचारों-सिद्धान्तों के द्वारा उसे पुष्टि प्रदान करने की भी आवश्यकता होती है। फिर उसे उस लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए कार्य योजना बनानी पड़ती है।
    वर्तमान समय, सम्पूर्ण पुनर्निर्माण और सत्यीकरण का समय है। हमें प्रत्येक विषय को प्रारम्भ से समझना और समझाना पड़ेगा। तभी व्यक्ति, समाज, देश व विश्व को सत्य दिशा प्राप्त हो सकेगी और इस कार्य को करने वाला काशी-सत्यकाशी क्षेत्र इस वर्तमान समय में राष्ट्र गुरू बनेगा जिसका कारण होगा - ”राष्ट्र को सत्य मार्गदर्शन देना“। और फिर यही कारण भारत को जगतगुरू के रूप में स्थापित कर देगा।
    हम सभी के मोटर वाहनों में, वाहन कितने किलोमीटर चला उसे दिखाने के लिए एक यंत्र होता है। यदि इस यंत्र की अधिकतम 6 अंकों तक किलोमीटर दिखाने की क्षमता हो तब उसमें 6 अंक दिखते है। जो प्रारम्भ में 000000 के रूप में होता है। वाहन के चलते अर्थात विकास करते रहने से 000001 फिर 000002 इस क्रम से बढ़ते हुए पहले इकाई में, फिर दहाई में, फिर सैकड़ा में, फिर हजार में, फिर दस हजार में, फिर लाख में, के क्रम में यह आगे बढ़ते हुये बदलता रहता है। एक समय ऐसा आता है जब सभी अंक 999999 हो जाते हैं फिर क्या होगा? फिर सभी 000000 के अपने प्रारम्भ वाली स्थिति में आ जायेगें। इन 6 अंक के प्रत्येक अंक के चक्र में 0 से 9 अंक के चक्र होते है। जो वाहन के चलने से बदलकर चले हुये किलोमीटर को दिखाते है। यही स्थिति भी इस सृष्टि के काल चक्र की है। सृष्टि चक्र में पहले काल है जिसके दो रूप अदृश्य और दृश्य हैं। फिर इन दोनों काल में कुल 5 युग हैं। 4 अदृश्य काल के 1 दृश्य काल के। और इन दोनों काल में कुल 14 मनु और उनके नाम पर 14 मनवन्तर हैं। 7 अदृश्य काल के 7 दृश्य काल के। फिर इन युगों में युगावतार अवतार होते हैं। फिर व्यास व शास्त्र होते हैं। ये सब वैसे ही है जैसे अंक गणित में इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार, दस हजार, लाख इत्यादि होते हैं। उपर उदाहरण दिये गये यंत्र में जब सभी अंक 999999 हो जाते हैं तब विकास के अगले एक बदलाव से इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार, दस हजार, लाख सभी बदलते हैं। वर्तमान सृष्टि चक्र की स्थिति भी यही हो गयी है कि अब अगले अवतार के मात्र एक विकास के लिए सत्यीकरण के कार्य द्वारा काल, मनवन्तर व मनु, अवतार, व्यास व शास्त्र सभी बदलेगें। इसलिए देश व विश्व के धर्माचार्यो, विद्वानों, ज्योतिषाचार्यों इत्यादि को अपने-अपने शास्त्रों को देखने व समझने की आवश्यकता आ गयी है क्योंकि कहीं ये कार्य वही तो नहीं है? और यदि नहीं तो वह कौन सा कार्य होगा जो इन सबको बदलने वाली घटना को घटित करेगा?
    सामान्य मनुष्य के स्वभाव के विपरीत ”एक व्यक्ति“ सांसारिक कायों से निर्लिप्त रहते हुये 20 वर्षो से ऐसी शोध व योजना पर ध्यान केन्द्रित कर कार्य करने में लगा हुआ था जो भारत को उसके सत्य महानता की ओर ले जाने वाला कार्य है। और ऐसा कार्य भारत सहित विश्व के लिए कितने बड़े समाचार का विषय बनेगा? ”विश्वशास्त्र-द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज“ उसी ”एक व्यक्ति“ का कार्य है जिसमें जन्म-जीवन-पुनर्जन्म-अवतार-साकार ईश्वर-निराकार ईश्वर, अदृश्य और दृश्य ईश्वर नाम, मानसिक मृत्यु व जन्म, भूत-वर्तमान-भविष्य, शिक्षा व पूर्ण शिक्षा, संविधान व विश्व संविधान, ग्राम सरकार व विश्व सरकार, विश्व शान्ति व एकता, स्थिरता व व्यापार, विचारधारा व क्रियाकलाप, त्याग और भोग, राधा और धारा, प्रकृति और अहंकार, कत्र्तव्य और अधिकार, राजनीति व विश्व राजनीति, व्यक्ति और वैश्विक व्यक्ति, ज्ञान व कर्मज्ञान, योग, अदृश्य और दृश्य योग व ध्यान, मानवतावाद व एकात्मकर्मवाद, नायक-शास्त्राकार-आत्मकथा, महाभारत और विश्वभारत, जाति और समाजनीति, मन और मन का विश्वमानक, मानव और पूर्ण मानव एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, आॅकड़ा व सूचना और विश्लेषण, शास्त्र और पुराण इत्यादि अनेकों विषय और उनके वर्तमान समय के शासनिक व्यवस्था में स्थापना स्तर तक की विधि को व्यक्त किया गया है। इस एक ही ”विश्वशास्त्र“ साहित्य के गुणों के आधार पर धर्म क्षेत्र से 90 नाम और धर्मनिरपेक्ष व सर्वधर्मसमभाव क्षेत्र से 141 नाम निर्धारित किये गये हैं।
    जब दुनिया बीसवीं सदी के समाप्ति के समीप थी तब वर्ष 1995 ई0 में कोपेनहेगन में सामाजिक विकास का विश्व शिखर सम्मेलन हुआ था। इस शिखर सम्मेलन में यह माना गया कि -”आर्थिक विकास अपने आप में महत्वपूर्ण विषय नहीं है, उसे समाजिक विकास के हित में काम करना चाहिए। यह कहा गया कि पिछले वर्षो में आर्थिक विकास तो हुआ, पर सभी देश सामाजिक विकास की दृष्टि से पिछड़े ही रहे। जिसमें मुख्यतः तीन बिन्दुओं - बढ़ती बेरोजगारी, भीषण गरीबी और सामाजिक विघटन पर चिन्ता व्यक्त की गई। यह स्वीकार किया गया कि सामाजिक विकास की समस्या सार्वभौमिक है। यह सर्वत्र है, लेकिन इस घोर समस्या का समाधान प्रत्येक संस्कृति के सन्दर्भ में खोजना चाहिए।“ इसका सीधा सा अर्थ यह है कि व्यक्ति हो या देश, आर्थिक विकास तभी सफल होगा जब बौद्धिक विकास के साथ मनुष्य के गुणवत्ता में भी विकास हो। इसी सम्मेलन में भारत ने यह घोषणा की कि - ”वह अपने सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करेगा।“ भारत इस पर तब से कितना अमल कर पाया यह तो सबके सामने है। लेकिन बौद्धिक विकास के साथ मनुष्य के गुणवत्ता में भी विकास के लिए भारत सहित विश्व के हजारों विश्वविद्यालय जिस पूर्ण सकारात्मक एवम् एकीकरण के विश्वस्तरीय शोध को न कर पाये, वह पूर्ण किया जा चुका है और उसे पाठ्यक्रम का रूप देकर पुनर्निर्माण के माध्यम से आपके सामने है। फलस्वरूप एकल सार्वभौमिक रचनात्मक बुद्धि बनाम विश्व बुद्धि का रूप सामने है।
    जगत् की सब गति तरंग के आकार में ही होता है- एक बार उत्थान, फिर पतन। प्रलय और सृष्टि अथवा क्रम संकोच और क्रम विकास (अर्थात एक तन्त्र या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अन्त और आरम्भ) अनन्त काल से चल रहे है।ं अतएव हम जब आदि अथवा आरम्भ की बात करते है तब हम एक कल्प (अर्थात चक्र) आरम्भ की ओर ही लक्ष्य रखते है। यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ईश्वरीय संगठन और उसके प्रेम का प्रतीक है। जिसमें व्यक्ति सहित मानवीय संगठन समर्पित होकर कार्य कर रहेे हैं, चाहे उसका ज्ञान उन्हें हो या न हो और ऐसा भाव हमें यह अनुभव कराता है कि हम सब जाने-अनजाने उसी ईश्वर के लिए ही कार्य कर रहें है जिसका लक्ष्य है- ईश्वरीय मानव समाज का निर्माण जिसमें जो हो सत्य हो, शिव हो, सुन्दर हो और इसी ओर विकास की गति हो। 
    वर्तमान तक का विकासशील मनुष्य सभ्यता एक लम्बी अवधि के संस्कारण या निर्माण प्रक्रिया से गुजरने का परिणाम है जो सदैव चल रहा है। यह निर्माण प्रक्रिया ईश्वर के अवतारों और शास्त्रों, धर्माचार्यों, सिद्धों, संतों, महापुरूषों, भविष्यवक्ताओं, तपस्वीयों, विद्वानों, बुद्धिजिवीयों, व्यापारीयों, दृश्य व अदृश्य विज्ञान के वैज्ञानिकों, सहयोगीयों, विरोधीयों, रक्त-रिश्ता-देश सम्बन्धियों, उन सभी मानवों, समाज व राज्य के नेतृत्वकर्ताओं और विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के संविधान इत्यादि द्वारा सम्पन्न हुयी है। 
    पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) द्वारा संचालित पाठ्यक्रम मानव, भारत व विश्व के पुननिर्माण का आध्यात्मिक सत्य आधारित पाठ्यक्रम हैं। यह पाठ्यक्रम विश्व के उन अभावों की पूर्ति करता है जो देश व विश्व के सामाजिक-राजनैतिक नेतृत्वकर्ताओं द्वारा विचारों व लक्ष्यों के रूप में समय-समय पर व्यक्त होते रहें हैं। ऐसे ही विचार वर्तमान भारत के वर्तमान महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी व प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी व्यक्त हो चुके हंै। पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग, उन विचारों व लक्ष्यों का हल और कार्य रूप में रूपान्तरण है। 
    शास्त्र-साहित्य से भरे इस संसार में कोई भी एक ऐसा मानक पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं था जिससे पूर्ण ज्ञान - कर्म ज्ञान की उपलब्धि हो सके, साथ ही मानव और उसके शासन प्रणाली के सत्यीकरण के लिए अनन्त काल तक के लिए मार्गदर्शन प्राप्त हो सके अर्थात भोजन के अलावा जिस प्रकार पूरक दवा ली जाती है उसी प्रकार ज्ञान - कर्म ज्ञान के लिए पूरक पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं था जिससे व्यक्ति की आजिविका तो उसके संसाधन के अनुसार रहे परन्तु उसका ज्ञान - कर्म ज्ञान अन्य के बराबर हो जाये। इन सबकी पूर्ति करने के उद्देश्य से पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग प्रस्तुत है। 
    वैसे तो यह कार्य भारत सरकार को राष्ट्र की एकता, अखण्डता, विकास, साम्प्रदायिक एकता, समन्वय, नागरिकों के ज्ञान की पूर्णता इत्यादि जो कुछ भी राष्ट्रहित में हैं उसके लिए सरकार के संस्थान जैसे- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.), एन.सी.ई.आर.टी, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्, भारतीय मानक ब्यूरो के माध्यम से ”राष्ट्रीय शिक्षा आयोग“ बनाकर पूर्ण करना चाहिए जो राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए अति आवश्यक और नागरिकों का राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निर्धारण व परिभाषित करने का मार्ग भी है। जो शास्त्रों व अनेक भविष्यवक्ताओं के भविष्यवाणीयों को पूर्णतया सिद्ध करते हुये यह कार्य उसी समय-अवधि में सम्पन्न हुआ है। 
    सामाजिक-आर्थिक प्रणाली और शिक्षा के दायित्व पर आधारित सम्पूर्ण कार्य योजना को राष्ट्र को समर्पित करते हुये और प्रकृति से लिए गये हवा, पानी, धूप इत्यादि का कर्ज उतारते हुये, इस व्यापार पर स्वयं का एकाधिकार न रहे इसलिए इसे, पूरी रूचि से संचालित करने वालों के हाथों में ही सौंप दिया गया है। ज्ञान का व्यापार करें, राष्ट्र सेवा भी हो जायेगी और व्यापार भी हो जायेगा। हमारा सम्पूर्ण कार्य सत्य समाजिक अभियंत्रण (Real Social Engineering-RSE) का सर्वोच्च उदाहरण है जिसमें ”सत्य मानक शिक्षा“ द्वारा लक्ष्य ”पुननिर्माण“ है और विश्व में पहली बार प्रयोग की जा रही भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) द्वारा छात्रवृत्ति, सहायता और रायल्टी भी दी जा रही है।

    धन्यवाद,

    जय भारत देश, जय विश्व राष्ट्र

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  •   शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी

      

                                        अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को एक गरीब अश्वेत परिवार में हुआ था। वे प्रथम रिपबिलकन थे जो अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने। इनका कार्यकाल सन् 1861 से 1865 तक था। उसके पहले वे एक वकील, इलिअन्स स्टेट के विधायक (लेजिस्लेटर), अमेरिका के हाउस आॅफ रिप्रेजेन्टेटिव के सदस्य थे। वे दो बार सीनेट के चुनाव में असफल भी हुए। उन्होंने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट - गृहयुद्ध से पार लगाया। अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय लिंकन को ही जाता है।

               अब्राहम लिंकन, अपने पुत्र के शिक्षक के नाम एक पत्र अंग्रेजी में दिये थे जिसका मधु पन्त द्वारा हिन्दी भावानुवाद ”हिन्दुस्तान“ समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था और http://thumri.blogspot.com/2008/02/blog-post_05.html उस पर भी  उपलब्ध है। उसे हम इस शास्त्र में इसलिए लिख रहें हैं क्योंकि इस शास्त्र का मूल उद्देश्य ”पूर्ण शिक्षा“ है। कोई भी व्यक्ति इस ”विश्वशास्त्र“ का ज्ञाता क्यों न बन जाये परन्तु प्रस्तुत पत्र का भाव यदि उसके हृदय में जन्म नहीं लेता तो वह ईश्वरीय मनुष्य नहीं, मात्र केवल मशीनी मनुष्य ही होगा जो विद्वान तो हो सकता है परन्तु इन्सान नहीं। प्रस्तुत पत्र का भावानुवाद यह सिद्ध करता है कि यही सत्य अर्थ में सत्य-शिक्षा है, ऐसी शिक्षा प्रदान करने वाला ही सत्य-शिक्षक है और ऐसी शिक्षा ग्रहण करने वाला ही सत्य-शिक्षार्थी है। और अगर ऐसा नहीं है तो शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी तीनों स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।

    हे शिक्षक
    मै जानता हूँ और मानता हूँ कि न तो हर व्यक्ति सही होता है
    और न ही होता है सच्चा,
    किन्तु तुम्हें सिखाना होगा कि कौन बुरा है और कौन अच्छा।
    दुष्ट व्यक्ति के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
    स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं,
    दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं,
    हर विरूपता के साथ-साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।
    समय भले ही लग जाये पर यदि सिखा सको तो उसे सिखाना,
    कि पाये हुये पाँच से अधिक मूल्यवान है- स्वयं एक कमाना।
    पायी हुई हार को कैसे झेलें, उसे यह भी सिखाना
    और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियाँ मनाना।
    यदि हो सके तो उसे ईष्र्या या दोष से परे हटाना
    और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ पढ़ाना।
    जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना
    कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है,
    वह भयभीत व चिंतित है क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।
    उसे दिखा सको तो दिखाना- किताबों में छुपा खजाना
    और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए कि आकाश के परे उड़ते पक्षियों का आहलाद,
    सूर्य के प्रकाश में मधुमक्खियों का निनाद, हरी-भरी पहाड़ियों से झाँकते फूलों का संवाद,
    कितना विलक्षण होता है- अविस्मरणीय.....अगाध.......
    उसे यह भी सिखाना-
    धोखे से सफलता पाने से असफल होना सम्माननीय है।
    और अपने विचारों पर भरोसा रखना अधिक विश्वसनीय है।
    चाहे अन्य सभी उसको गलत ठहरायेँ
    परन्तु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे, यह विचारणीय है।
    उसे यह भी सिखाना कि वह सदय के साथ सदय हो
    किन्तु कठोर के साथ कठोर। और लकीर का फकीर बनकर,
    उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो-निरर्थक शोर
    उसे सिखाना
    कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके
    यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुःख में भी मुस्करा सके,
    घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत गा सके।
    उसे यह भी सिखाना, आँसू बहते हों तो बहने दे,
    इसमें कोई शर्म नहीं....कोई कुछ कहता हो...कहने दे।
    उसे सिखाना-
    वह सनकियों को कनखियों से हँसकर टाल सके
    पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे।
    वह अपने बाहुबल व बुद्धिबल का अधिकतम मोल पहचान पाये,
    परन्तु अपनी आत्मा व हृदय की बोली न लगवाए।
    वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बंद कर सके
    और स्वतः की अन्तरात्मा की सही आवाज सुन सके।
    सत्य के लिए लड़ सके और सत्य के लिए अड़ सके।
    उसे सहानुभूति से समझाना पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।
    क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है, ताप पाकर ही सोना निखरता है।
    उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अधीर बने सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।
    उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,
    ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस धरे।
    यह एक बड़ा सा लम्बा-चैड़ा अनुरोध है
    पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध है?
    मेरे और तुम्हारे...दोनों के साथ उसका रिश्ता है,
    सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा सा नन्हा फरिश्ता है।

    ”सत्य प्राकृतिक वाणी या सत्य आकाशीय वाणी, प्रकृति के तीन गुण सत्व-रज-तम जो एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी, एकात्म कर्म-एकात्म प्रेम, एकात्म ध्यान-एकात्म समर्पण से युक्त वाणीयों का संगम - त्रिवाणी (त्रिवेणी) है और यही सत्य रूप में सत्य वाणी (सरस्वती) हैं। वाक्य जिसमें एकात्म ज्ञान का बोध हो वाणी कहलाती है और वाणी एक शक्ति है। शक्ति ही देवी है, वाणी की देवी सरस्वती हैं जिनका स्थान हृदय है। इस प्रकार सरस्वती, का अर्थ हृदय से निकली वाणी है।“ - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ 

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    ”मैं भारत में काफी घूमा हूँ। दाएं-बाएं, इधर-उधर मैंने यह देश छान मारा। और यहाँ मुझे एक भी भिखारी, एक भी चोर देखने को नहीं मिला। यह देश इतना समृद्ध है और इसके नैतिक मूल्य इतने उच्च हैं और यहाँ के लोग इतनी सक्षमता और योग्यता लिए हुए हैं कि हम यह देश कभी जीत सकते हैं यह मुझे नहीं लगा। इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्परा इस देश की रीढ़ है। और हमें यदि यह देश जीतना है तो इसे तोड़ना ही पड़ेगा। उसके लिए इस देश की प्राचीन शिक्षण पद्धति और संस्कृति बदलनी ही पड़ेगी। भारतीय लोग यदि यह मानने लगे कि विदेशी (विशेषतः) जो है श्रेष्ठ है, अपनी स्वयं की संस्कृति से भी ऊँची है तो वे अपना आत्म सम्मान गवाँ बैठेंगे। और फिर वे वही बनेंगे जो हम चाहते हैं - एक गुलाम देश“ (2 फरवरी, 1835 को ब्रिटेन की पार्लियामेन्ट में दिये गए लार्ड मैकाले के भाषण के कुछ अंश)- लार्ड मैंकाले, वर्तमान भारत की शिक्षा प्रणाली इनकी कही जाती है।
    ”जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यह है कि ऐसा चक्र प्रर्वतन कर दूँ जो कि उच्च एवम् श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार-द्वार पर पहुँचा दे। फिर स्त्री-पुरूष को अपने भाग्य का निर्माण स्वंय करने दो। हमारे पूर्वजों ने तथा अन्य देशों ने जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें देखने दो कि और लोग क्या कर रहे हैं। फिर उन्हंे अपना निर्णय करने दो। रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार वे किसी विशेष आकार धारण कर लेगें-परिश्रम करो, अटल रहो। ‘धर्म को बिना हानि पहुँचाये जनता की उन्नति’-इसे अपना आदर्श वाक्य बना लो।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह से ठूंस दी जाये, जो आपस में लड़ने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर हजम न कर सकें। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकंे, मनुष्य बन सके, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सांमजस्य कर सके, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पाँच ही भावों को हजम कर तद्नुसार जीवन और चरित्र गठन कर सके तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कठंस्थ कर ली है।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”उसी मूल सत्य की फिर से शिक्षा ग्रहण करनी होगी, जो केवल यहीं से, हमारी इसी मातृभूमि से प्रचारित हुआ था। फिर एक बार भारत को संसार में इसी मूल तत्व का-इसी सत्य का प्रचार करना होगा। ऐसा क्यों है? इसलिए नहीं कि यह सत्य हमारे शास्त्रों में लिखा है वरन् हमारे राष्ट्रीय साहित्य का प्रत्येक विभाग और हमारा राष्ट्रीय जीवन उससे पूर्णतः ओत-प्रोत है। इस धार्मिक सहिष्णुता की तथा इस सहानुभूति की, मातृभाव की महान शिक्षा प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित सब जाति और वर्ण वाले सीख सकते हैं। तुमको अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर तुम एक हो। तथाकथित समाज-सुधार के विषय में हस्तक्षेप न करना क्योंकि पहले आध्यात्मिक सुधार हुये बिना अन्य किसी भी प्रकार का सुधार हो नहीं सकता, भारत के शिक्षित समाज से मैं इस बात पर सहमत हूँ कि समाज का आमूल परिवर्तन करना आवश्यक है। पर यह किया किस तरह जाये? सुधारकों की सब कुछ नष्ट कर डालने की रीति व्यर्थ सिद्ध हो चुकी है। मेरी योजना यह है, हमने अतीत में कुछ बुरा नहीं किया। निश्चय ही नहीं किया। हमारा समाज खराब नहीं, बल्कि अच्छा है। मैं केवल चाहता हूँ कि वह और भी अच्छा हो। हमे असत्य से सत्य तक अथवा बुरे से अच्छे तक पहुँचना नहीं है। वरन् सत्य से उच्चतर सत्य तक, श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम तक पहुँचना है। मैं अपने देशवासियों से कहता हूँ कि अब तक जो तुमने किया, सो अच्छा ही किया है, अब इस समय और भी अच्छा करने का मौका आ गया है।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”एक बात पर विचार करके देखिए, मनुष्य नियमों कांे बनाता है या नियम मनुष्य को बनाते हैं? मनुष्य रुपया पैदा करता है या रुपया मनुष्य पैदा करता है? मनुष्य कीर्ति और नाम पैदा करता है या कीर्ति और नाम मनुष्य को पैदा करते हैं? मेरे मित्रों, पहले मनुष्य बनिये, तब आप देखेंगे कि वे सब बाकी चीजें स्वयं आपका अनुसरण करेंगी परस्पर के घृणित द्वेषभाव को छोड़िये और सदुद्देश्य, सदुपाय, सत्साहस एवं सदीर्घ का अवलम्बन किजिए। आपने मनुष्य योनि में जन्म लिया है तो अपनी कीर्ति यहीं छोड़ जाइये।-स्वामी विवेकानन्द
    ”निष्क्रियता, हीनबुद्धि और कपट से देश छा गया है। क्या बुद्धिमान लोग यह देखकर स्थिर रह सकते हैं? रोना नहीं आता? मद्रास, बम्बई, पंजाब, बंगाल-कहीं भी तो जीवनी शक्ति का चिन्ह दिखाई नहीं देता। तुम लोग सोच रहे हो, ‘हम शिक्षित हैं’ क्या खाक सीखा है? दूसरों की कुछ बातों को दूसरी भाषा में रटकर मस्तिष्क में भरकर, परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सोच रहे हो कि हम शिक्षित हो गये हैं। धिक्धिक्, इसका नाम कहीं शिक्षा है? तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य क्या है? या तो ? क्लर्क बनना या एक वकील बनना, और बहुत हुआ तो क्लर्की का ही दूसरा रूप एक डिप्टी मजिस्टेªट की नौकरी यही न? इससे तुम्हे या देश को क्या लाभ हुआ? - स्वामी विवेकानन्द
    ”सिर्फ पुस्तकों पर निर्भर रहने से मानव-मन केवल अवनति की ओर जाता है। यह कहने से और घोर नास्तिकता क्या हो सकती है कि ईश्वरीय ज्ञान केवल इस पुस्तक में या उस शास्त्र में आबद्ध है।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”सामाजिक व्याधि का प्रतिकार बाहरी उपायों द्वारा नहीं होगा; हमें उसके लिए भीतरी उपायों का अवलम्बन करना होगा-मन पर कार्य करने की चेष्टा करनी होगी। चाहे हम कितनी ही लम्बी चैड़ी बातें क्यों न करें, हमें जान लेना होगा कि समाज के दोशों को दूर करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं वरन् शिक्षादान द्वारा परोक्ष रूप से उसकी चेष्टा करनी होगी।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”बहुत दिनों तक मास्टरी करने से बुद्धि बिगड़ जाती है। ज्ञान का विकास नहीं होता। दिन रात लड़कों के बीच रहने से धीरे- धीरे जड़ता आ जाती है; इसलिए आगे अब मास्टरी न कर। मेरे पिताजी यद्यपि वकील थे, फिर भी मेरी यह इच्छा नहीं कि मेरे परिवार में कोई वकील बने। मेरे गुरुदेव इसके विरोधी थे एवं मेरा भी यह विश्वास है कि जिस परिवार के कुछ लोग वकील हो उस परिवार में अवश्य ही कुछ न कुछ गड़बड़ी होगी। हमारा देश वकीलों से छा गया है-प्रतिवर्ष विश्वविद्यालयों से सैकड़ों वकील निकल रहे हैं। हमारी जाति के लिए इस समय कर्मतत्परता तथा वैज्ञानिक प्रतिभा की आवश्यकता है। - स्वामी विवेकानन्द
    ”लोगों को यदि आत्मनिर्भरशील बनने की शिक्षा नहीं दी जाय तो जगत के सम्पूर्ण ऐश्वर्य पूर्ण रुप से प्रदान करने पर भी भारत के एक छोटे से छोटे गाँव की भी सहायता नहीं की जा सकती। शिक्षा प्रदान हमारा पहला काम होना चाहिए, चरित्र एवं बुद्धि दोनों के ही उत्कर्ष साधन के लिए शिक्षा विस्तार आवश्यक है“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”अनुभव ही ज्ञान का एक मात्र स्रोत है। विश्व में केवल धर्म ही ऐसा विज्ञान है जिसमें निश्चयत्व का अभाव है, क्योंकि अनुभव पर आश्रित विज्ञान के रूप में उसकी शिक्षा नहीं दी जाती। ऐसा नहीं होना चाहिए। परन्तु कुछ ऐसे लोगों का एक छोटा समूह भी सर्वदा विद्यमान रहता है, जो धर्म की शिक्षा अनुभव के माध्यम से देते हैं। ये लोग रहस्यवादी कहलाते हैं। और वे हरेक धर्म में, एक ही वाणी बोलते हैं। और एक ही सत्य की शिक्षा देते हैं। यह धर्म का यथार्थ विज्ञान है। जैसे गणित शास्त्र विश्व के किसी भी भाग में भिन्न-भिन्न नहीं होते। वे सभी एक ही प्रकार के होते है तथा उनकी स्थिति भी एक ही होती है। उन लोगों का अनुभव एक ही है और यही अनुभव धर्म का रूप धारण कर लेता है।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”आखिर इस उच्च शिक्षा के रहने या न रहने से क्या बनता बिगड़ता है? यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि यह उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी के दफ्तरों को खाक छानने के बजाय लोग थोड़ी सी यान्त्रिक शिक्षा प्राप्त करे जिससे काम-धन्धे में लगकर अपना पेट तो भर सकेंगे।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”राष्ट्र निर्माण... इस महान कार्य में राजनीति तो केवल एक अंग है। हम केवल राजनीति को ही अर्पित नहीं होगें, न केवल सामाजिक समस्याओं, न ईश्वर-मीमांसा या दर्शन या साहित्य या विज्ञान को बल्कि हम इन सबको एक ”सत्व“ में एक अस्तित्व में शामिल करेगें और हमें विश्वास है कि यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यही हमारा राष्ट्रीय धर्म है। जिसके सार्वभौम होने का विश्वास भी हमें है। एक चीज जिसे हमें सबसे पहले प्राप्त करना है वह है शक्ति-शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्ति और सर्वोपरि रूप से आध्यात्मिक शक्ति, जो दूसरी सारी शक्तियों का अक्षय स्रोत है। अगर हममें शक्ति है तो दूसरी हर चीज बहुत आसानी और स्वाभाविकता के साथ हमसे जुड़ जायेगी।“ - महर्षि अरविन्द

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  •  01. शिक्षा से सम्बन्धित विचार  भाग-02

    ”इस देश को कुछ बाते समझनी होगी। एक तो इस देश को यह बात समझनी होगी कि तुम्हारी परेशानियों, तुम्हारी गरीबी, तुम्हारी मुसीबतों, तुम्हारी दीनता के बहुत कुछ कारण तुम्हारे अंध विश्वासों में है, कम से कम डेढ़ हजार साल पिछे घिसट रहा है। ये डेढ़ हजार साल पूरे होने जरूरी है। भारत को खिंचकर आधुनिक बनाना जरूरी है। मेरी उत्सुकता है कि इस देश का सौभाग्य खुले, यह देश भी खुशहाल हो, यह देश भी समृद्ध हो। क्योंकि समृद्ध हो यह देश तो फिर राम की धुन गुंजे, समृद्ध हो यह देश तो फिर लोग गीत गाँये, प्रभु की प्रार्थना करें। समृद्ध हो यह देश तो मंदिर की घंटिया फिर बजे, पूजा के थाल फिर सजे। समृद्ध हो यह देश तो फिर बाँसुरी बजे कृष्ण की, फिर रास रचे! यह दीन दरिद्र देश, अभी तुम इसमें कृष्ण को भी ले आओंगे तो राधा कहाँ पाओगे नाचनेवाली? अभी तुम कृष्ण को भी ले आओगें, तो कृष्ण बड़ी मुश्किल में पड़ जायेगें, माखन कहाँ चुरायेगें? माखन है कहाँ? दूध दही की मटकिया कैसे तोड़ोगें? दूध दही की कहाँ, पानी तक की मटकिया मुश्किल है। नलों पर इतनी भीड़ है! और एक आध गोपी की मटकी फोड़ दी, जो नल से पानी भरकर लौट रही थी, तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देगी कृष्ण की, तीन बजे रात से पानी भरने खड़ी थी नौ बजते बजते पानी भर पायी और इन सज्जन ने कंकड़ी मार दी। धर्म का जन्म होता है जब देश समृद्ध होता है। धर्म समृद्ध की सुवास है। तो मैं जरूर चाहता हँू यह देश सौभाग्यशाली हो लेकिन सबसे बड़ी अड़चन इसी देश की मान्यताएं है। इसलिए मैं तुमसे लड़ रहा हँू। तुम्हारे लिए। आज भारत गरीब है। भारत अपनी ही चेष्टा से इस गरीबी से बाहर नहीं निकल सकेगा, कोई उपाय नहीं है। भारत गरीबी के बाहर निकल सकता हैं, अगर सारी मनुष्यता का सहयोग मिले। क्योंकि मनुष्यता के पास इस तरह के तकनीक, इस तरह का विज्ञान मौजूद है कि इस देश की गरीबी मिट जाये। लेकिन तुम अकड़े रहे कि हम अपनी गरीबी खुद ही मिटायेगें, तो तुम ही तो गरीबी बनाने वाले हो, तुम मिटाओंगे कैसे? तुम्हारी बुद्धि इसकी भीतर आधार है, तुम इसे मिटाओगे कैसे? तुम्हें अपने द्वार-दरवाजे खोलने होगें। तुम्हें अपना मस्तिष्क थोड़ा विस्तार करना होगा। तुम्हें मनुष्यता का सहयोग लेना होगा। और ऐसा नहीं कि तुम्हारे पास कुछ देने को नहीं है। तुम्हारे पास कुछ देने को है दुनिया को। तुम दुनिया को ध्यान दे सकते हो। अगर अमेरिका को ध्यान खोजना है तो अपने बलबूते नहीं खोज सकेगा अमेरिका। उसे भारत की तरफ नजर उठानी पड़ेगी। मगर वे समझदार लोग हैं। ध्यान सीखने पूरब चले आते हैं। कोई अड़चन नहीं है उन्हें बाधा नहीं है। बुद्धिमानी का लक्षण यहीं है कि जो जहाँ से मिल सकता हो ले लिया जाये। यह सारी पृथ्वी हमारी हैं। सारी मनुष्यता इकट्ठी होकर अगर उपाय करे तो कोई भी समस्या पृथ्वी पर बचने का कोई भी कारण नहीं है। दुनिया में दो तरह की शिक्षायें होनी चाहिए, अभी एक ही तरह की शिक्षा है। और इसलिए दुनिया में बड़ा अधुरापन है। बच्चों को हम स्कूल भेजते है, कालेज भेजते है, युनिवर्सिटी भेजते है, मगर एक ही तरह की शिक्षा वहाँ- कैसे जियो? कैसे आजिविका अर्जन करेें? कैसे धन कमाओं? कैसे पद प्रतिष्ठा पाओं। जीवन के आयोजन सिखाते हैं जीवन की कुशलता सिखाते है। दूसरी इससे भी महत्वपूर्ण शिक्षा वह है- कैसे मरो? कैसे मृत्यु के साथ आलिंगन करो? कैसे मृत्यु में प्रवेश करो? यह शिक्षा पृथ्वी से बिल्कुल खो गयी। ऐसा अतीत में नहीं था। अतीत में दोनों शिक्षाएं उपलब्ध थीं। इसलिए जीवन को हमने चार हिस्सों में बाटा था। पच्चीस वर्ष तक विद्यार्थी का जीवन, ब्रह्मचर्य का जीवन। गुरू के पास बैठना। जीवन कैसे जीना है, इसकी तैयारी करनी है। जीवन की शैली सीखनी है। फिर पच्चीस वर्ष तक गृहस्थ का जीवन जो गुरू के चरणों में बैठकर सिखा है उसका प्रयोग, उसका व्यावहारिक प्रयोग। फिर जब तुम पचास वर्ष के होने लगो तो तुम्हारे बच्चे पच्चीस वर्ष के करीब होने लगेगें। उनके गुरू के गृह से लौटने के दिन करीब होने लगेगें। अब उनके दिन आ गये कि वे जीवन को जिये। फिर भी पिता और बच्चे पैदा करते चला जाये तो यह अशोभन समझा जाता था। यह अशोभन है। अब बच्चे, बच्चे पैदा करेंगे। अब तुम इन खिलौनों से उपर उठो। तो पच्चीस वर्ष वानप्रस्थ। जंगल की तरफ मुँह- इसका अर्थ होता है कि अभी जंगल गये नहीं, अभी घर छोड़ा नहीं लेकिन घर की तरफ पीठ जंगल की तरफ मुँह। ताकि तुम्हारे बेटों को तुम्हारी सलाह की जरूरत पड़े तो पूछ लें। अपनी तरफ से सलाह मत देना। वानप्रस्थी स्वयं सलाह नहीं देता। फिर पचहत्तर वर्ष के जब तुम हो जाओगे, तो सब छोड़कर जंगल चले जाना। वे शेष अंतिम पचीस वर्ष मृत्यु की तैयारी थे। उसी का नाम सन्यास था। पचीस वर्ष जीवन के प्रारम्भ में जीवन की तैयारी, और जीवन के अंत में पच्चीस वर्ष मृत्यु की तैयारी। उपाधियाँ मिलती है- पी0 एच0 डी0, डी0 लिट0 और डी0 फिल0। और उनका बड़ा सम्मान होता है। उनका काम क्या है? उनका काम यह है कि वे तय करते हैं कि गोरखनाथ कब पैदा हुए थे। कोई कहता है दसवीं सदी के अंत में, कोई कहता है ग्यारहवीं सदी के प्रारम्भ में। इस पर बड़ा विवाद चलता है। बड़े-बड़ विश्वविद्यालयों के ज्ञानी सिर खपा कर खोज में लगे रहते है। शास्त्रो की, प्रमाणों की, इसकी, उसकी। उनकी पूरी जिन्दगी इसी में जाती है। इससे बड़ा अज्ञान और क्या होगा? गोरख कब पैदा हुए, इसे जानकर करोगे क्या? इसे जान भी लिया तो पाओगे क्या? गोरख न भी पैदा हुए, यह भी सिद्ध हो जाये, तो भी क्या फायदा? हुए हों या न हुए हों, अर्थहीन है। गोरख ने क्या जिया उसका स्वाद लो। इसलिए तुम्हारे विश्वविद्यालय ऐसी व्यर्थता के कामों में संलग्न है कि बड़ा आश्चर्य होता है कि इन्हें विश्वविद्यालय कहो या न कहो। इनका काम ही........तुम्हारे विश्वविद्यालय में चलने वाली जितनी शोध है, सब कूड़ा-करकट है।“- आचार्य रजनीश ”ओशो“
    ”सुधर्मा, जरूरत है इस युग में अनगढ़ मानव को गढ़ने की। मनुष्य स्वार्थी, संकीर्णता से ग्रसित हो गया है। इन दुर्बलताओं के आक्रान्त मनमानी शक्ल दिखने में अक्सर आते हैं। पेट और परिवार को आदर्श मान बैठे हैं।“-अवधूत भगवान राम 
    ”मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा। हम बदलेंगे- युग बदलेगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा। इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।“ - पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवार 
    ”यदि हम संसार का मार्ग ग्रहण करेंगे और संसार को और अधिक विभाजित करेंगे तो शान्ति, सहिष्णुता और स्वतन्त्रता के अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते। यदि हम इस युद्ध-विक्षिप्त दुनियाँ को शान्ति और सत्य का प्रकाश दिखाएं तो सम्भव है कि हम संसार में कोई अच्छा परिवर्तन कर सकें। लोकतन्त्र से मेरा मतलब समस्याओं को शान्तिपूर्वक हल करने से है। अगर हम समस्याओं को शान्तिपूर्वक हल नहीं कर पाते तो इसका मतलब है कि लोकतन्त्र को अपनाने में हम असफल रहें हैं।“ - पं0 जवाहर लाल नेहरू
    ”हमारे युग की दो प्रमुख विषेशताएँ विज्ञान और लोकतंत्र है। ये दोनों टिकाऊ हैं। हम शिक्षित लोगों को यह नहीं कह सकते कि वे तार्किक प्रमाण के बिना धर्म की मान्यताओं को स्वीकार कर लें। जो कुछ भी हमें मानने के लिए कहा जाए, उसे उचित और तर्क के बल से पुष्ट होना चाहिए। अन्यथा हमारे धार्मिक विश्वास इच्छापूरक विचार मात्र रह जाएंगे। आधुनिक मानव को ऐसे धर्म के अनुसार जीवन बिताने की शिक्षा देनी चाहिए, जो उसकी विवेक-बुद्धि को जँचे, विज्ञान की परम्परा के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त धर्म को लोकतन्त्र का पोशक होना चाहिए, जो कि वर्ण, मान्यता, सम्प्रदाय या जाति का विचार न करते हुए प्रत्येक मनुष्य के बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास पर जोर देता हो। कोई भी ऐसा धर्म, जो मनुष्य-मनुष्य में भेद करता है अथवा विशेषाधिकार, शोषण या युद्ध का समर्थन करता है, आज के मानव को रूच नहीं सकता। स्वामी विवेकानन्द ने यह सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म विज्ञान सम्मत भी है और लोकतन्त्र का समर्थक भी। वह हिन्दू धर्म नहीं, जो दोषों से भरपूर है, बल्कि वह हिन्दू धर्म, जो हमारे महान प्रचारकों का अभिप्रेत था। मात्र जानकारियाँ देना शिक्षा नहीं है। यद्यपि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीकी की जानकारी महत्वपूर्ण भी है तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतान्त्रिक भावना का भी बड़ा महत्व है। ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती है। शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरन्तर सीखते रहने की प्रवृति। वह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान व कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है। करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हों। शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्यापन करके संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर अर्जित करना चाहिए। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।“- डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    (5 सितम्बर को भारत देश में शिक्षक दिवस इनके जन्म दिवस को ही मनाया जा जाता है)
    ”समाजिकता और संस्कृति का मापदण्ड समाज में कमाने वाला द्वारा अपने कत्र्तव्य के निर्वाह की तत्परता है। अर्थव्यवस्था का कार्य इस कत्र्तव्य के निर्वाह की क्षमता पैदा करना है। मात्र धन कमाने के साधन तथा तरीके बताना-पढ़ाना ही अर्थव्यवस्था का कार्य नहीं है। यह मानवता बढ़ाना भी उसका काम है। कि कत्र्तव्य भावना के साथ कमाने वाला खिलाये भी। यहाँ यह स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि वह कार्य और दायित्व की भावना से करें न कि दान देने या चंदा देने की भावना से।“ - पं0 दीन दयाल उपाध्याय
    ”शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतन्त्र होने में है। हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं। राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा। उनको शिक्षित होना चाहिए। एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अन्दर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी ऊँचाइयों का स्रोत है। ”शिक्षित बनो!!!, संगठित रहो!!!, संघर्ष करो!!! सामाजिक क्रान्ति साकार बनाने के लिए किसी महान विभूति की आवश्यकता है या नहीं यह प्रश्न यदि एक तरफ रख दिया जाय, तो भी सामाजिक क्रान्ति की जिम्मेदारी मूलतः समाज के बुद्धिमान वर्ग पर ही रहती है, इसे वास्तव में कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। भविष्य काल की ओर दृष्टि रखकर वर्तमान समय में समाज को योग्य मार्ग दिखलाना यह बुद्धिमान वर्ग का पवित्र कर्तव्य है। यह कर्तव्य निभाने की कुशलता जिस समाज के बुद्धिमान लोग दिखलाते हैं। वहीं जीवन कलह में टिक सकता है। सही राष्ट्रवाद है, जाति भावना का परित्याग। सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्निर्माण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अस्पृश्य कभी भी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते। राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगो के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक समरसता व मातत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाय। राष्ट्र का सन्दर्भ में राष्ट्रीयता का अर्थ होना चाहिए- सामाजिक एकता की दृढ़ भावना, अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में इसका अर्थ है - भाईचारा। शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है अतः शिक्षा के दरवाजे प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए खुले होने चाहिए। एक व्यक्ति के शिक्षित होने का अर्थ है- एक व्यक्ति का शिक्षित होना लेकिन एक स्त्री के शिक्षित होने का अर्थ है कि एक परिवार का शिक्षित होना।“ - बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर 
    ‘‘आम आदमी से दूर हटकर साहित्य तो रचा जा सकता है, लेकिन वह निश्चित तौर पर भारतीय जन जीवन का साहित्य नहीं हो सकता। आम आदमी से जुड़ा साहित्य ही समाज के लिए कल्याकाणकारी हो सकता हैं।’’-श्री शंकर दयाल शर्मा, पूर्व राष्ट्रपति
    ”विश्व का रूपान्तरण तभी सम्भव है जब सभी राष्ट्र मान ले कि मानवता के सामने एक मात्र विकल्प शान्ति, परस्पर समभाव, प्रेम और एकजुटता है। भारतीय धर्मो के प्रतिनिधियों से मित्रवत् सूत्रपात होगा। तीसरी सहस्त्राब्दि में एशियाई भूमि पर ईसाइयत की जड़े मजबूत होंगी। इस सहस्त्राब्दि को मनाने का अच्छा तरीका वही होगा। कि हम धर्म के प्रकाश की ओर अग्रसर हो और समाज के प्रत्येक स्तर पर न्याय और समानता के बहाल के लिए प्रयासरत हो। हम सबको विश्व का भविष्य सुरक्षित रखने और उसे समृद्ध करने के लिए एकजुट होना चाहिए। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी उतनी ही आवश्यक है। धर्म को कदापि टकराव का बहाना नहीं बनाना चाहिए-भारत को आशीर्वाद“ (भारत यात्रा पर) -पोप जान पाल, द्वितीय
    ‘शिक्षा प्रक्रिया मे व्यापक सुधारों की जरूरत है। ‘यह रास्ता दिल्ली की ओर जाता है’ लिखा साइन बोर्ड पढ़ लेना मात्र शिक्षा नहीं है। इसके बारे में चिन्तन करना पड़ेगा और कोई लक्ष्य निर्धारित करना पडे़गा। सामाजिक परिवर्तन किस तरह से, इसकी प्राथमिकताये क्या होगीं? यह तय करना पड़ेगा। 21वीं शताब्दी के लिए हमें कार्यक्रम तय करने पडे़गे, मौजूदा लोकतन्त्र खराब नहीं है परन्तु इसको और बेहतर बनाने की आवश्यकता है।’’- श्री रोमेश भण्डारी, पूर्व राज्यपाल, उ0प्र0, भारत

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  •  01. शिक्षा से सम्बन्धित विचार  भाग-03

    ‘‘देश के सभी विद्यालयों में वेद की शिक्षा दी जायेगी’’ -श्री मुरली मनोहर जोशी, पूर्व मानव संसाधन मंत्री, भारत
    ‘‘शिक्षा में दूरदृष्टि होनी चाहिए तथा हमारी शिक्षा नीति और शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे हम भविष्य देख सके और भविष्य की आवश्यकताओं को प्राप्त कर सकें। - श्री केशरीनाथ त्रिपाठी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष, उ0प्र0, भारत 
    ”भारत में आध्यात्मिकता का बोलबाला हजारों सालों से है इसके बावजूद भी यहाँ किसी भी धर्म को छुये बिना नैतिक मूल्यों की शिक्षा धर्म निरपेक्ष रूप से विकसित हुई है। यह आधुनिक युग में विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन है। आज विश्व को ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष नैतिक मूल्यों की शिक्षा की सख्त जरूरत है। बीसवीं सदी रक्तपात की सदी थी। 21वीं सदी संवाद की सदी होनी चाहिए। इससे कई समस्यायें अपने आप समाप्त हो जाती है। दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करते हैं इसलिए यह जरूरी है कि सेक्यूलर इथिक्स (धर्मनिरपेक्ष नैतिकता) को प्रमोट (बढ़ाना) करें जो वास्तविक और प्रैक्टिकल एप्रोच (व्यावहारिक) पर आधारित हो। धार्मिक कर्मकाण्डों के प्रति दिखावे का कोई मतलब नहीं है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में मानव मूल्यों का अभाव है। यह सिर्फ मस्तिष्क के विकास पर जोर देती है। हृदय की विशालता पर नहीं। करूणा तभी आयेगी जब दिल बड़ा होगा। दुनिया के कई देशों ने इस पर ध्यान दिया है। कई विश्वविद्यालयों में इस पर प्रोजेक्ट चल रहा है।“ 
    (सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में ”21वीं सदी में शिक्षा“ विषय पर बोलते हुये। इस कार्यक्रम में केंन्द्रीय तिब्बती अघ्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति पद्मश्री गेशे नवांग समतेन, पद्मश्री प्रो.रामशंकर त्रिपाठी, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति प्रो. अवधराम, दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर के पूर्व कुलपति प्रो. वेणी माधव शुक्ल, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विष्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र और वर्तमान कुलपति प्रो. वी.कुटुम्ब शास्त्री, प्रति कुलपति प्रो.नरेन्द्र देव पाण्डेय, प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी, प्रो. यदुनाथ दूबे इत्यादि उपस्थित थे।) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू ”अच्छी शिक्षा व्यवस्था ही प्रबुद्ध नागरिक पैदा करती है, बच्चों को नैतिक शिक्षा प्रदान की जाय और रोजगार के नये अवसर पैदा किये जायें, राष्ट्रीय शान्ति व सार्वभौमिक सद्भाव के लिए सभी धर्म आध्यात्मिक आन्दोलन में शामिल हो जायें“-श्री ए.पी.जे, अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति, भारत 
    ”शिक्षा का स्वदेशी माॅडल चाहिए” (गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में) - श्री लाल कृष्ण आडवाणी 
    ”महामना की सोच मानवीय मूल्य के समावेश वाले युवाओं के मस्तिष्क का विकास था, चाहे वह इंजिनियर हो, विज्ञान या शिक्षाविद्।“-डाॅ0 कर्ण सिंह, प्रख्यात चिंतक व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उ0प्र0, भारत के चांसलर
    ”ज्ञान के लिए शिक्षा अर्जित की जानी चाहिए और देश के युवाओं के विकास के लिए शिक्षा पद्धति में समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाना जरूरी है। इसका मकसद युवाओं को बौद्धिक और तकनीकी दृष्टि से सक्षम बनाना होना चाहिए।“ (विज्ञान व आध्यात्मिक खोज पर राष्ट्रीय सम्मेलन, नई दिल्ली के उद्घाटन में बोलते हुए) -श्रीमती प्रतिभा पाटिल, पूर्व राष्ट्रपति, भारत 
    ”शिक्षा का नया माॅडल विकसित करना होगा। पिछले 25 वर्षो से हम अमीर लोगों की समस्या सुलझा रहे हैं। अब हमें गरीबों की समस्या सुलझानें का नैतिक दायित्व निभाना चाहिए। देश में 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोग हैं। हमें सोचना होगा कि हम उन्हें नौकरी और प्रशिक्षण कैसे देगें। भौतिकी, रसायन, गणित जैसे पारम्परिक विषयों को पढ़ने का युग समाप्त हो गया। अब तो हमें रचनात्मकता, समन्वय, लीडरशिप, ग्लोबल तथा प्रोफेशनल विषयों को पढ़ने तथा सूचना तकनीक के जरिए पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है। हमारे देश में जो अध्यापक हैं, वे शोध नहीं करते और जो शोध करते हैं वे पढ़ाते नहीं। हमें पूरी सोच को बदलनी है।“- सैम पित्रोदा, अध्यक्ष, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्
    ”विश्वविद्यालय को कुलपतियों और शिक्षकों को शिक्षा का स्तर और उन्नत करना चाहिए। एक बार अपना दिल टटोलना चाहिए कि क्या वाकई उनकी शिक्षा स्तरीय है। हर साल सैकड़ों शोधार्थियों को पीएच.डी की उपाधि दी जा रही है, लेकिन उनमें से कितने नोबेल स्तर के हैं। साल में एक-दो शोध तो नोबेल स्तर के हों।“(रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, उ0प्र0, के दीक्षांत समारोह में)-श्री बी.एल. जोशी, पूर्व राज्यपाल, उ0प्र0, भारत 
    ”भारतवासियों के रूप में हमें भूतकाल से सीखना होगा, परन्तु हमारा ध्यान भविष्य पर केन्द्रित होना चाहिए। मेरी राय में शिक्षा वह मंत्र है जो कि भारत में अगला स्वर्ग युग ला सकता है। हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों ने समाज के ढांचे को ज्ञान के स्तम्भों पर खड़ा किया गया है। हमारी चुनौती है, ज्ञान को देश के हर एक कोने में पहुँचाकर, इसे एक लोकतांत्रिक ताकत में बदलना। हमारा ध्येय वाक्य स्पष्ट है- ज्ञान के लिए सब और ज्ञान सबके लिए। मैं एक ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ जहाँ उद्देश्य की समानता से सबका कल्याण संचालित हो, जहाँ केन्द्र और राज्य केवल सुशासन की परिकल्पना से संचालित हों, जहाँ लोकतन्त्र का अर्थ केवल पाँच वर्ष में एक बार मत देने का अधिकार न हो, बल्कि जहाँ सदैव नागरिकों के हित में बोलने का अधिकार हो, जहाँ ज्ञान विवेक में बदल जाये, जहाँ युवा अपनी असाधारण ऊर्जा तथा प्रतिभा को सामूहिक लक्ष्य के लिए प्रयोग करे। अब पूरे विश्व में निरंकुशता समाप्ति पर है, अब उन क्षेत्रों में लोकतन्त्र फिर से पनप रहा है जिन क्षेत्रों को पहले इसके लिए अनुपयुक्त माना जाता था, ऐसे समय में भारत आधुनिकता का माॅडल बनकर उभरा है। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने सुप्रसिद्ध रूपक में कहा था कि- भारत का उदय होगा, शरीर की ताकत से नहीं, बल्कि मन की ताकत से, विध्वंस के ध्वज से नहीं, बल्कि शांति और प्रेम के ध्वज से। अच्छाई की सारी शक्तियों को इकट्ठा करें। यह न सोचें कि मेरा रंग क्या है- हरा, नीला अथवा लाल, बल्कि सभी रंगों को मिला लें और सफेद रंग की उस प्रखर चमक को पैदा करें, जो प्यार का रंग है।“ (प्रथम भाषण का संक्षिप्त अंश) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
    ”क्या आर्थिक विकास ही विकास है? आज विकास का जो स्वरूप दिख रहा है, इसका वीभत्स परिणाम भी ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर का पिघलना, मौसम मे बदलाव आदि के रूप में सामने दिख रहा है। हमें यह देखना होगा कि विकास की इस राह में हमने क्या खोया और क्या पाया। समाज शास्त्री विमर्श कर यह राह सुझायें जिससे विकास, विविधता व लोकतंन्त्र और मजबूत बनें। विकास वह है जो समाज के अन्तिम व्यक्ति को भी लाभान्वित करे। भारत में एकता का भाव, व्यक्ति का मान होना चाहिए क्योंकि इसमें ही देश का सम्मान निहित है। समाज के लोग आगे आयें और सरकारों पर दबाव बनायें। विविधता भारत की संस्कृति की थाती है। भारत की यह संस्कृति 5000 वर्ष से अधिक पुरानी व जीवन्त है। काशी ज्योति का शहर है क्योंकि यहाँ बाबा का ज्योतिर्लिंग है। यह ज्ञान व एकता की ज्योति है। इसके प्रकाश से यह शहर ही नहीं, बल्कि पूरा देश आलोकित हो रहा है। यह शहर ज्ञान की असीम पूँजी लिए देश को अपनी ओर बुला रहा है।“ - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
    ”देश विविधता से भरा है। इसमें आस्था ऐसा पहलू है जो एका बनाता है। भले ही बोली भाषा, पहनावा, संस्कृति में भिन्नता हो पर माँ गंगा के प्रति आस्था तो एक जैसी है। इसे विकास से जोड़ने का यह उपयुक्त वक्त है। काशी की इसी धरती पर आदि शंकराचार्य को अद्वैत ज्ञान मिला था। यहाँ के कण-कण में पाण्डित्य व्याप्त है जो हमें संस्कृति की ओर आकर्षित करता है। देश में भले ही विभिन्न राज्यों की अपनी संस्कृति और सम्प्रभुता है मगर काशी, देश के सभी राज्यों को अद्वैत भाव से एकता के साथ लेकर आगे बढ़ती है। देश को एकता के साथ विकास का भाव जगाने के लिए काशी की ओर देखना चाहिए।“ - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत
    ”अच्छी शिक्षा, शिक्षकों से जुड़ी है। शिक्षक को हर परम्पराओं का ज्ञान होना चाहिए। हम विश्व को अच्छे शिक्षक दे सकते हैं। विगत छह महीने से पूरा विश्व हमारी ओर देख रहा है। ऋषि-मुनियों की शिक्षा पर हमें गर्व है। 21वीं सदी में विश्व को उपयोगी योगदान देने की माँग है। पूर्णत्व के लक्ष्य को प्राप्त करना विज्ञान हो या तकनीकी, इसके पीछे परिपूर्ण मानव मन की ही विश्व को आवश्यकता है। रोबोट तो पाँच विज्ञानी मिलकर भी पैदा कर देगें। मनुष्य का पूर्णत्व, तकनीकी में समाहित नहीं हो सकता। पूर्णता मतलब जनहित। कला-साहित्य से ही होगा नवजागरण।“ (बी.एच.यू, वाराणसी में) - श्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत
    ”किसी देश का संविधान, उस देश के स्वाभिमान का शास्त्र तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश की मूल भावना का शिक्षा पाठ्यक्रम उसका अंग न हो। इस प्रकार भारत देश का संविधान भारत देश का शास्त्र नहीं है। संविधान को भारत का शास्त्र बनाने के लिए भारत की मूल भावना के अनुरूप नागरिक निर्माण के शिक्षा पाठ्यक्रम को संविधान के अंग के रूप में शामिल करना होगा। जबकि राष्ट्रीय संविधान और राष्ट्रीय शास्त्र के लिए हमें विश्व के स्तर पर देखना होगा क्योंकि देश तो अनेक हैं राष्ट्र केवल एक विश्व है, यह धरती है, यह पृथ्वी है। भारत को विश्व गुरू बनने का अन्तिम रास्ता यह है कि वह अपने संविधान को वैश्विक स्तर पर विचार कर उसमें विश्व शिक्षा पाठ्यक्रम को शामिल करे। यह कार्य उसी दिशा की ओर एक पहल है, एक मार्ग है और उस उम्मीद का एक हल है। राष्ट्रीयता की परिभाषा व नागरिक कर्तव्य के निर्धारण का मार्ग है। जिस पर विचार करने का मार्ग खुला हुआ है।“ - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

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  • 02. शिक्षा, शिक्षा माध्यम, शिक्षक/गुरू, विद्यार्थी/छात्र और शिक्षा पाठ्यक्रम

    एक कोशिका से दूसरे कोशिका को ज्ञान के अग्रसरण/संचरण के द्वारा विकसित हो रहे जीवों में मानव, ज्ञान क्रान्ति के अन्तिम लक्ष्य के पास पहुँच रहा है। जीव आते हैं, जाते हैं, और समय की धारा में ज्ञान, संसाधन और अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ा कर चले जाते हैं। कुल मिलाकर मनुष्य केवल प्रकृति के अदृश्य ज्ञान को दृश्य ज्ञान में परिवर्तित करने का माध्यम मात्र है। मानव की मात्र इतनी ही कहानी होते हुये भी वह आर्थिक लाभ पाने के मानवीय चक्र में ज्ञान पाने के ईश्वरीय चक्र से इतना दूर होते जा रहा है कि उसे यह नहीं पता कि वह स्वयं मानव जाति के अस्तित्व को ही इस कमलरूपी पृथ्वी पर विराजमान होने से पहले ही मिटा देना चाहता है।
    इस क्रम में ज्ञान के अदृश्य संचरण से प्रारम्भ हुआ जीवन, फिर संकेत, फिर मौखिक, फिर भाषा लिपि, फिर हस्तलिखित पुस्तक, फिर मुद्रित पुस्तक से अब हम सभी डिजिटल विडियो-आॅडियो तक पहुँच चुके हैं। जहाँ हमारी यात्रा एक दृश्य जीव शिक्षक/गुरू से शुरू हुयी थी वहीं अब हम सभी एक अदृश्य मानव निर्मित अजीव शिक्षक/गुरू (डिजिटल विडियो-आॅडिया शैक्षणिक सामग्री) की ओर बढ़ रहे हैं। इस क्रम से सबसे बड़ा नुकसान ”समझ“ का हुआ। ”समझ“ गिरती गयी और मानव निर्मित संस्था द्वारा प्रमाणित योग्यता सबको प्राप्त होती गयी। और शब्दों के अर्थ ”समझ“ के अनुसार बदलते गये। एक कोशिका से दूसरे कोशिका को ज्ञान के अग्रसरण/संचरण का प्राकृतिक नियम व्यापार में बदल गया। शिक्षक/गुरू भी आर्थिक प्रणाली से संचालित होने लगे साथ ही विद्यार्थी/छात्र भी। जिस प्रकार मुख्य आत्मा के उपस्थिति में ब्रह्माण्ड संचालित और प्रकृति नाच रही है उसी प्रकार मनुष्य निर्मित ”मुद्रा“ से ब्रह्माण्ड तो संचालित नहीं हो सकता लेकिन मनुष्य जरूर नाच रहा है। विद्या अर्जन के इस विकास क्रम में जो बातें आयीं वे हैं- शिक्षा माध्यम, शिक्षक/गुरू, विद्यार्थी/छात्र और शिक्षा पाठ्यक्रम।

    शिक्षा माध्यम
    शिक्षा माध्यम उस माध्यम से सम्बन्धित है जिसके द्वारा एक शिक्षक/गुरू अपने विद्यार्थी/छात्र में ज्ञान का संचरण करता है जो भाषा, चित्र, संकेत, आवाज इत्यादि हो सकते हैं। इसके अलावा शिक्षक/गुरू की अपनी समझ की कला भी हो सकती है जिससे वह आसानी से अपने विद्यार्थी/छात्र में ज्ञान का संचरण कर दे।

    शिक्षक/गुरू
    स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”हम गुरु के बिना कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। अब बात यह है कि यदि मनुष्य, देवता अथवा कोई स्वर्गदूत हमारे गुरु हो, तो वे भी तो ससीम हैं, फिर उनसे पहले उनके गुरु कौन थे? हमें मजबूर होकर यह चरम सिद्धान्त स्थिर करना ही होगा कि एक ऐसे गुरु हैं जो काल के द्वारा सीमाबद्ध या अविच्छिन्न नहीं हैं। उन्हीं अनन्त ज्ञान सम्पन्न गुरु को, जिनका आदि भी नहीं और अन्त भी नहीं, ईश्वर कहते हैं। गुरु के सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि उन्हें शास्त्रो का मर्म ज्ञान हो। वैसे तो सारा संसार ही बाइबिल, वेद, पुराण पढ़ता है, पर वे तो केवल शब्द राशि है। धर्म की सूखी ठठरी मात्र है। जो गुरु शब्दाडंबर के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिनका मन शब्दों की शक्ति में बह जाता है, वे भीतर का मर्म खो बैठते हैं। जो शास्त्रों के वास्तविक मर्मज्ञ हैं, वे ही असल में सच्चे धार्मिक गुरु हैं। संसार के प्रधान आचार्यों में से कोई भी शास्त्रों की इस प्रकार नानाविध व्याख्या करने के झमेले में नहीं पड़ा। उन्होनें श्लोकों के अर्थ में खींचातानी नहीं की। वे शब्दार्थ और भावार्थ के फेर मंे नहीं पड़े। फिर भी उन्होंने संसार को बड़ी सुन्दर शिक्षा दी। इसके विपरीत, उन लोगों ने जिनके पास सिखाने को कुछ भी नहीं, कभी एकाध शब्द को ही पकड़ लिया और उस पर तीन भागों की एक मोटी पुस्तक लिख डाली, जिसमें सब अनर्थक बातें भरी हैंे। भगवान श्रीरामकृष्ण कहते थे- ‘जब एक बहुत बड़ी लहर आती है, तो छोटे-छोटे नाले और गड्ढे अपने आप ही लबालब भर जाते हैं। इसी प्रकार जब एक अवतार जन्म लेता है, तो समस्त संसार मंे आध्यात्मिकता की एक बड़ी बाढ़ आ जाती है और लोग वायु के कण-कण में धर्मभाव का अनुभव करने लगते हैं। अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेश-दर्शिनी (Single Dimensional) होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी (Multi Dimensional) होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“
    कुल मिलाकर जैसी शिक्षा, वैसा शिष्य और अन्त में वैसा ही शिक्षक क्योंकि शिक्षा प्राप्ति के बाद बहुत से विद्यार्थी/छात्र अलग-अलग व्यापार के साथ ”पढ़ो और पढ़ाओ“ वाले व्यापार में भी जाते है और शिक्षक भी बनते हैं। अन्त में हल यही निकलेगा कि अदृश्य मानव निर्मित अजीव शिक्षक/गुरू (डिजिटल विडियो-आॅडिया शैक्षणिक सामग्री) के रूप में सामने आयेगा और सरकारी शिक्षा संस्थान मात्र एक पंजीकरण केन्द्र, परीक्षा केन्द्र संचालक और प्रमाण-पत्र दाता बनेगा।
    शब्दों के अर्थ ”समझ“ के अनुसार बदलते रहने से शब्द ”आशीर्वाद“ के भी अर्थ बदल गये। वर्तमान में ”आशीर्वाद“ यूँ ही मिल जाते हैं। प्रारम्भ में यह ”आशीर्वाद“ ऋषि-मुनि-गुरू जन सिर्फ योग्य को ही प्रदान करते थे ताकि उनके शब्द कभी असत्य न हों। और यदि असत्य होने की सम्भावना दिखे तो उसे वे सत्य में परिवर्तित करने के लिए भी हर नीति का प्रयोग करते थे। ऐसे ही गुरू थे- गुरू द्रोणाचार्य। जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का ”आशीर्वाद“ अपने शिष्य अर्जुन को दिया था। और वे अपने ”आशीर्वाद“ को सत्य में परिवर्तित करने के लिए बीच में आ गये एकलव्य का नीति के अन्तर्गत अँगूठा माँगकर अपने ”आशीर्वाद“ की रक्षा की। यह मात्र एक सन्देश है- शब्द ”आशीर्वाद“ के सही अर्थ का।

    विद्यार्थी/छात्र
    स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है उसे शिष्य कहते हैं।” हमारे दृष्टि में छात्र वे हैं जो किसी शैक्षणिक संस्थान के किसी शैक्षणिक पाठ्यक्रम में प्रवेश ले कर अध्ययन करतेे है। और विद्यार्थी वे हैं जो सदैव अपने ज्ञान व बुद्धि का विकास कर रहे हैं और उसके वे इच्छुक भी हैं। इस प्रकार सभी मनुष्य व जीव, जीवन पर्यन्त विद्यार्थी ही बने रहते हैं चाहे उसे वे स्वीकार करें या ना करें। जबकि छात्र जीवन पर्यन्त नहीं रहा जा सकता।
    कहा जाता है - ”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“, लेकिन कौन सी शक्ति? उसकी कौन सी दिशा? तोड़-फोड़, हड़ताल, या अनशन वाली या समाज व राष्ट्र को नई दिशा देने वाली? स्वामी विवेकानन्द को मानने व उनके चित्र लगाकर छात्र राजनीति द्वारा राष्ट्र को दिशा नहीं मिल सकती बल्कि उन्होंने क्या कहा और क्या किया था, उसे जानने और चिन्तन करने से राष्ट्र को दिशा मिल सकती है और ”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“ की बात सत्य हो सकती है। हम सभी ज्ञान युग और उसी ओर बढ़ते समय में हैं इसलिए केवल प्रमाण-पत्रों वाली शिक्षा से काम नहीं चलने वाला है।
    छात्रों की विवशता है कि उनके शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय जो पाठ्यक्रम तैयार करेगें वहीं पढ़ना है और छात्रों की यह प्रकृति भी है कि वही पढ़ना है जिसकी परीक्षा ली जाती हो। जिसकी परीक्षा न हो क्या वह पढ़ने योग्य नहीं है? बहुत बढ़ा प्रश्न उठता है। तब तो समाचार पत्र, पत्रिका, उपन्यास इत्यादि जो पाठ्यक्रम के नहीं हैं उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय तो एक विशेष पाठ्यक्रम के लिए ही विशेष समय में परीक्षा लेते हैं परन्तु ये जिन्दगी तो जीवन भर आपकी परीक्षा हर समय लेती रहती है तो क्या जीवन का पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य नहीं है?

    शिक्षा पाठ्यक्रम
    जो व्यक्ति या देश केवल आर्थिक उन्नति को ही सर्वस्व मानता है वह व्यक्ति या देश एक पशुवत् जीवन निर्वाह के मार्ग पर है-जीना और पीढ़ी बढ़ाना। दूसरे रूप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनका लक्ष्य धन रहा था वे अपने धन के बल पर अपनी मूर्ति अपने घर पर ही लगा सकते हैं परन्तु जिनका लक्ष्य धन नहीं था, उनका समाज ने उन्हें, उनके रहते या उनके जाने के बाद अनेकों प्रकार से सम्मान दिया है और ये सार्वजनिक रूप से सभी के सामने प्रमाणित है। पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग शारीरिक-आर्थिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक-बौद्धिक उत्थान होना चाहिए और यही है ही। इस प्रकार भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है।

  • क्लिक करें=>03. व्यापार और शिक्षा का व्यापार
  • हमारा लक्ष्य - जन-धन का सही उपयोग एवं राष्ट्रीय बौद्धिक विकास द्वारा आर्थिक स्वतन्त्रता

    व्यापार और शिक्षा का व्यापार

    जहाँ भी, कुछ भी आदान-प्रदान हो रहा हो, वह सब व्यापार के ही अधीन है। व्यक्ति का जितना बड़ा ज्ञान क्षेत्र होता है ठीक उतना ही बड़ा उसका संसार होता है। फलस्वरूप उस ज्ञान क्षेत्र पर आधारित व्यापार का संचालन करता है इसलिए ही ज्ञान क्षेत्र को विस्तार के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति ही व्यापारी है और वही दूसरे के लिए ग्राहक भी है। यदि व्यक्ति आपस में आदान-प्रदान कर व्यापार कर रहें हैं तो इस संसार-ब्रह्माण्ड में ईश्वर का व्यापार चल रहा है और सभी वस्तुएँ उनके उत्पाद है। उन सब वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा है जिसके व्यापारी स्वयं ईश्वर है, ये सत्य-सिद्धान्त है।
    शिक्षा क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि जीवन से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण विषय ”व्यापार“, को हम एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर सकें। इसकी कमी का अनुभव उस समय होता है जब कोई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा के उपरान्त किसी कारणवश, आगे की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता। फिर उस विद्यार्थी द्वारा पढ़े गये विज्ञान व गणित के वे कठिन सूत्र उसके जीवन में अनुपयोगी लगने लगते है। यदि वहीं वह व्यापार के ज्ञान से युक्त होता तो शायद वह जीवकोपार्जन का कोई मार्ग सुगमता से खोजने में सक्षम होता।
    प्रत्येक व्यापार के जन्म होने का कारण एक विचार होता है। पहले विचार की उत्पत्ति होती है फिर उस पर आधारित व्यापार का विकास होता है। किसी विचार पर आधारित होकर आदान-प्रदान का नेतृत्वकर्ता व्यापारी और आदान-प्रदान में शामिल होने वाला ग्राहक होता है। ”रामायण“, ”महाभारत“, ”रामचरितमानस“ इत्यादि किसी विचार पर आधारित होकर ही लिखी गई है। यह वाल्मिीकि, महर्षि व्यास और गोस्वामी तुलसीदास का त्याग है तो अन्य के लिए यह व्यापार का अवसर बना। 
    ज्ञान के वर्तमान और उसी ओर बढ़ते युग में व्यापार के तरीके भी बदल रहें हैं। ऐसी स्थिति में स्वयं को भी बदलते हुये अपने ज्ञान को बढ़ाना होगा अन्यथा प्रतियोगिता भरे जीवन के संघर्ष में पिछे रह जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं होगा। वर्तमान समय में गाँवो तक भी कम्प्यूटर व इन्टरनेट की पहुँच तेजी से बढ़ रही है। कम्प्यूटर व इन्टरनेट केवल चला लेना ही ज्ञान नहीं है। चलाना तो कला है। कला को व्यापार में बदल देना ही सत्य में ज्ञान-बुद्धि है। हम कम्प्यूटर व इन्टरनेट से किस प्रकार व्यापार कर सकते हैं, इस पर अध्ययन-चिंतन-मनन करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में भारत रत्न एवं पूर्व राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम का कथन पूर्ण सत्य है कि- ”नवीनता के द्वारा ही ज्ञान को धन में बदला जा सकता है।“
    प्रत्येक मनुष्य के लिए 24 घंटे का दिन और उस पर आधारित समय का निर्धारण है और यह पूर्णतः मनुष्य पर ही निर्भर है कि वह इस समय का उपयोग किस गति से करता है। उसके समक्ष तीन बढ़ते महत्व के व्यापार के स्तर हंै- 1. शरीर आधारित व्यापार, 2. धन/अर्थ आधारित व्यापार और 3. ज्ञान आधारित व्यापार। इन तीनों के विकास की अपनी सीमा, शक्ति, गति व लाभ है। शरीर के विकास के उपरान्त मनुष्य को धन के विकास की ओर, धन के विकास के उपरान्त मनुष्य को ज्ञान के विकास की ओर बढ़ना चाहिए अन्यथा वह अपने से उच्च स्तर वाले का गुलाम हो जाता है।
    दुनिया बहुत तेज (फास्ट) हो गई है। मनुष्य की व्यस्तता बढ़ती जा रही है। सभी को कम समय में बहुत कुछ चाहिए। तो ऐसी शिक्षा की भी जरूरत है जो कम समय में पूर्ण शिक्षित बना दे। एक व्यक्ति सामान्यतः यदि स्नातक (ग्रेजुएशन) तक पढ़ता है तो वह कितने पृष्ठ पढ़ता होगा और क्या पाता है? विचारणीय है। एक व्यक्ति इंजिनियर व डाॅक्टर बनने तक कितना पृष्ठ पढ़ता है? यह तो होती है कैरियर की पढ़ाई इसके अलावा कहानी, कविता, उपन्यास, फिल्म इत्यादि के पीछे भी मनुष्य अपना समय मनोरंजन के लिए व्यतीत करता है। और सभी एक चमत्कार के आगे नतमस्तक हो जाते हैं तो पूर्ण मानसिक स्वतन्त्रता और पूर्णता कहाँ है? विचारणीय विषय है। ऐसे व्यक्ति जिनका धनोपार्जन व्यवस्थित चल रहा है वे ज्ञान की आवश्यकता या उसके प्राप्ति की आवश्यकता के प्रति रूचि नहीं लेते परन्तु वे भूल जाते हैं कि ज्ञान की आवश्यकता तो उन्हें ज्यादा है जिनके सामने भविष्य पड़ा है और उन्हें आवश्यकता है जो देश-समाज-विश्व के नीति का निर्माण करते हैं। ऐसे आधार की आवश्यकता है जिससे आने वाली पीढ़ी और विश्व निर्माण के चिन्तक दोनों को एक दिशा प्राप्त हो सके। वे जो मशीनवत् लग गये हैं वे जहाँ लगे हैं सिर्फ वहीं लगे रहें, आखिर में वे भी तो संसार के विकास में ही लगे है उन्हें न सही उनके बच्चों को तो ज्ञान की जरूरत होगी। जिसके लिए वे एक लम्बा समय और धन उनपर खर्च करते हैं। गरीबी, बेरोजगारी इत्यादि का बहुत कुछ कारण ज्ञान, ध्यान, चेतना जैसे विषयों का मनुष्य के अन्दर अभाव होने से ही होता है। मनुष्य जीवन पर्यन्त रोजी-रोटी, धनार्जन इत्यादि के लिए भागता रहता है परन्तु यदि मात्र 6 महीने वह ज्ञान, ध्यान, चेतना जैसे विषयों पर पहले ही प्रयत्न कर ले तो उसके सामने विकास के अनन्त मार्ग खुल जाते हैं। ज्ञान, ध्यान, चेतना की यही उपयोगीता है जिसे लोग निरर्थक समझते हैं। बचपन से अनेक वर्षो तक माता-पिता-अभिभावक अपने बच्चों के विद्यालय में धन भेजते हैं, बच्चा वहाँ से कौन सा सामान लाता है, विचारणीय विषय है? बच्चा वहाँ से जो लाता है उस सामान का नाम है-”शिक्षा“ और वह जहाँ से लाता है, वह है-”शिक्षा का व्यापार केन्द्र“। इस प्रकार अलग-अलग शिक्षा और विद्या के व्यापार केन्द्र, आज के और आने वाले समय में विकास की ओर अग्रसर ज्ञानयुग में चल और खुल रहे हैं। बहुत से विद्यार्थी अलग-अलग व्यापार के साथ ”पढ़ो और पढ़ाओ“ वाले व्यापार में भी जाते हैं जो मनुष्य के धरती पर रहने तक चलता रहेगा। इस क्रम में जब तक परीक्षा में नकल होते रहेगें तब तक शिक्षा व्यापार विकास करता रहेगा और साथ ही जब तक सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाते रहेगें, सरकार पर बेरोजगारी का बोझ बढ़ता रहेगा। और सरकार रिक्त पदों की भर्ती वाला व्यापार करती रहेगी।

    ”जो दिखता है वो तो बिकता ही है लेकिन जो नहीं दिखता वो सबसे अधिक बिकता है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ईश्वर, आस्था और ज्ञान है। प्रत्येक मनुष्य का निर्माण सर्वप्रथम न दिखने वाले विषय के खरीदने से ही हुआ है जिसके लिए धन प्रत्येक घर से जाता है और जो आता है वह दिखता नहीं है जिसे शिक्षा कहते है।“ - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

     
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    सत्य शिक्षा का व्यापार - एक अन्तहीन व्यापार

    एक नदी पर पुल था जिसे कोई व्यक्ति पैदल दो घण्टे में पार करता था। यह पुल पैदल यात्रीयों के लिए रोक दिया गया था जिसके लिए पुल के ठीक मध्य (एक घण्टे की यात्रा) पर एक गार्ड नियुक्त था। गार्ड एक घण्टे सोता था और एक घण्टे जागता था। एक चालाक व्यक्ति को पुल से नदी पार करना अति आवश्यक था। इसलिए गार्ड जब सोया तब वह यात्रा प्रारम्भ किया जैसे ही गार्ड के जागने का समय आया, वह वापस लौटने लगा। गार्ड समझा कि वह दूसरे किनारे से आ रहा है इसलिए उसने उस यात्री को पकड़ा और दूसरी ओर भेज दिया। इस प्रकार यात्री नदी पार हो गया।
    यदि हम में से किसी को तैरकर नदी पार करना हो और आधे से पहले ही हमारा हिम्मत टूटने लगे तो हम वापस ही आना चाहेगें। यदि आधे से अधिक तैरने के बाद हिम्मत टूटने लगेगा तो हौसला बढ़ाकर आगे ही बढकर पार करना चाहेगें।
    इसी प्रकार मनुष्य के विकास क्रम में हम सब अदृश्य विज्ञान (आध्यात्म) से दृश्य विज्ञान (भौतिक) की ओर बढ़ गये हैं। नदी या पुल का एक किनारा अदृश्य विज्ञान है तो दूसरा किनारा दृश्य विज्ञान। वर्तमान का हमारा अधिकतम जीवन नदी के दूसरे किनारे दृश्य विज्ञान की ओर है, हर पल। जन्म से ही हम अधिकतम वे सब वस्तुएँ प्रयोग कर रहे हैं जिसका कच्चा माल भले ही ईश्वरकृत हो परन्तु उपयोग का रूप मनुष्यकृत है और विज्ञान द्वारा निर्मित है। इस प्रकार मनुष्य निर्माता के रूप में अपना रूप व्यक्त कर ईश्वर की ओर ही बढ़ रहा है। 
    नदी के पुल पर बैठे उस गार्ड का काम और तैरने वाले का निर्णय ”सत्य शिक्षा“ है। वर्तमान में मनुष्य समाज अदृश्य काल से चलकर दृश्य काल में आ चुका है। आधे से वापस किनारे जाना ”सत्य“ को पाना है। और आधे से दूसरे किनारे पार हो जाना ”सिद्धान्त“ को पाना है। इन्हीं सिद्धान्त को पाने के बाद संविधान-नियम-कानून का जन्म होता है जिससे आज हम सभी संचालित व प्रभावित है। इस ”सत्य-सिद्धान्त“ की शिक्षा ही ”सत्य शिक्षा“ है।
    विज्ञान व तकनीकी का उपयोग कर जीवन की गति और सघनता (काम्पैक्ट) में तेजी से विकास हो रहा है। इसलिए ऐसी शिक्षा और पाठ्य पुस्तक की भी आवश्यकता आ चुकी थी जिससे कम समय में बहुत कुछ क्रमिक रूप से जाना व समझा जा सके अर्थात शास्त्र-साहित्य से भरे इस संसार में कोई भी एक ऐसा मानक शास्त्र उपलब्ध नहीं था जिससे ”पूर्णज्ञान-कर्मज्ञान“ की उपलब्धि हो सके साथ ही मानव और उसके शासन प्रणाली के सत्यीकरण के लिए अनन्त काल तक के लिए मार्गदर्शन प्राप्त हो सके अर्थात भोजन के अलावा जिस प्रकार पूरक दवा ली जाती है उसी प्रकार ”पूर्णज्ञान-कर्मज्ञान“ के लिए पूरक शास्त्र उपलब्ध नहीं था जिससे व्यक्ति की आजिविका तो उसके संसाधन के अनुसार रहे परन्तु उसका ”पूर्णज्ञान-कर्मज्ञान“ अन्य के बराबर हो जाये। ईश्वर से साक्षात्कार करने के ”ज्ञान“ के अनेक शास्त्र उपल्ब्ध हो चुके थे परन्तु साक्षात्कार के उपरान्त कर्म करने के ज्ञान अर्थात ईश्वर के मस्तिष्क का ”कर्मज्ञान“ का शास्त्र उपलब्ध नहीं हुआ था अर्थात ईश्वर के साक्षात्कार का शास्त्र तो उपलब्ध था परन्तु ईश्वर के कर्म करने की विधि का शास्त्र उपलब्ध नहीं था। मानव को ईश्वर से ज्यादा उसके मस्तिष्क की आवश्यकता है। शिक्षा में शिक्षा पाठ्यक्रम को बदले बिना एक पूरक शास्त्र मनुष्य को चाहिए जिससे वह अपने कर्मो के विश्लेषण व तुलना से जान सके कि वह पूर्ण ईश्वरीय कार्य के अंश जीवन यात्रा में कितनी यात्रा तय कर चुका है और वह यात्रा इस जीवन में पूर्ण करना चाहता है या यात्रा जारी रखना चाहता है। पृथ्वी के मानसिक विवादों को समाप्त कर मनुष्य, समाज व शासन को एक संतुलित कर्मज्ञान चाहिए जिससे एकात्मकर्मवाद का जन्म हो सके। जिससे ब्रह्माण्डीय विकास के लिए सम्पूर्ण कर्म और मनुष्यता की सम्पूर्ण शक्ति एक दिशा की ओर हो। व्यक्ति आधारित समाज व शासन से उठकर मानक आधारित समाज व शासन अर्थात जिस प्रकार हम सभी व्यक्ति आधारित राजतन्त्र में राजा से उठकर व्यक्ति आधारित लोकतन्त्र में आये, फिर संविधान आधारित लोकतन्त्र में आ गये उसी प्रकार पूर्ण लोकतन्त्र के लिए मानक व संविधान आधारित लोकतन्त्र में हम सभी को पहुँचना है।
    वर्तमान में जीने का अर्थ होता है-विश्व ज्ञान जहाँ तक बढ़ चुका है वहाँ तक के ज्ञान से अपने मस्तिष्क को युक्त करना। तभी डेढ़ हजार वर्ष पुराने हमारे मस्तिष्क का आधुनिकीकरण हो पायेगा। सिर्फ वर्तमान में तो पशु रहकर कर्म करते हैं। ”सत्य शिक्षा“ मनुष्य के मस्तिष्क के आधुनिकीकरण की शिक्षा है या विज्ञान की भाषा में कहें तो मस्तिष्क के आधुनिकीकरण का साफ्टवेयर या माइक्रोचिप्स (Integrated Circuit-I.C.) है। वर्तमान की अब नवीनतम परिभाषा है-”पूर्ण ज्ञान से युक्त होना“ और कार्यशैली की परिभाषा है-”भूतकाल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकतानुसार पूर्णज्ञान और परिणाम ज्ञान से युक्त होकर वर्तमान समय में कार्य करना।“
    ”सत्य शिक्षा“, विकास क्रम के उत्तरोत्तर विकास के क्रमिक चरणों के अनुसार लिखित है जिससे पृथ्वी पर हुए सभी व्यापार को समझा जा सके। फलस्वरूप मनुष्य के समक्ष व्यापार के अनन्त मार्ग खुल जाते हैं। किसी भी सिनेमा अर्थात फिल्म को बीच-बीच में से देखकर डाॅयलाग की भावना व कहानी को पूर्णतया नहीं समझा जा सकता। मनुष्य समाज में यही सबसे बड़ी समस्या है कि व्यक्ति कहीं से कोई भी विचार या वक्तव्य या कथा उठा लेता है और उस पर बहस शुरू कर देता है। जबकि उसके प्रारम्भ और क्रमिक विकास को जाने बिना समझ को विकसित करना असम्भव होता है। सामाजिक विकास के क्षेत्र मंा परिवर्तन, देश-काल के परिस्थितियों के अनुसार किया जाता रहा है जबकि सत्यीकरण मूल सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से जोड़कर किया जाने वाला कार्य है। 
    ”पुर्ननिर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग“ एक ऐसी ही प्रणाली है जिसकी आवश्यकता धरती पर मनुष्य के रहने तक है और इसका व्यापार भी वहीं तक अन्तहीन है। इस शिक्षा प्रणाली में छात्रवृत्ति, व्यापार, सुविधा, समाजसेवा, अन्दर के नवोन्मेष को बाहर लाने की सुविधा इत्यादि का समावेश है। 

    ज्ञान के इस युग में शिक्षा-विद्या-कला का व्यापार मनुष्य के धरती पर रहने तक रहेगा। ऐसी स्थिति में हमारा यह व्यापार भी उस समय तक के लिए स्थायित्व में है। शिक्षा-विद्या-कला कोई प्रापर्टी नहीं है कि पिता जी ग्रहण कर चुके हैं तो पुत्र को हिस्सा प्राप्त हो जायेगा। पुत्र को भी वहीं से अर्थात अक्षर ज्ञान से शुरू होना पड़ेगा जहाँ से पिता ने शुरू किया था। इस प्रकार ”सत्य शिक्षा“ के व्यापार की योजना - ”पुर्ननिर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग“ एक अन्तहीन व्यापार है जो मनुष्य के पृथ्वी पर रहने तक चलता रहेगा।

    ”व्यापार, व्यापार के नियमों से चलता है न कि विश्वास से। विश्वास से तो ईश्वर और आस्था चलता है। चाय की दुकान पर किसी व्यक्ति के विश्वास न करने से वह बन्द नहीं हो जायेगी क्योंकि वह व्यापार के नियम पर आधारित है न कि विश्वास पर।“  - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

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  • 05. पुनर्निर्माण - राष्ट्र निर्माण का व्यापार

    राष्ट्र निर्माण या सामाजिक क्रान्ति या विकास सहित पूर्ण मानव निर्माण की प्रक्रिया एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है इसके लिए दूरगामी आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए कार्य करने की विधि के लिए बिन्दु का निर्धारण होता है। जो हमारे मार्गदर्शक होते हैं-
    1. औद्योगिक क्षेत्र में Japanese Institute of Plant Engineers (JIPE) द्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी- WCM-TPM-5S (World Class Manufacturing-Total Productive Maintenance-Siri (छँटाई), Seton (सुव्यवस्थित), Sesso (स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement) है। ये 5S मार्गदर्शक बिन्दु हैं।
    2. श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C (World Class Manufactuing–Total Life Maintenance- Satya, Heart, Yoga, Ashram, Meditation.Conceousness) प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total System Involvement-TSI) है। ये SHYAM.C मार्गदर्शक बिन्दु हैं।
    3. सोमवार, 9 जून 2014 को भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधित करते हुये श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत ने विकास व लक्ष्य प्राप्ति के कार्य के लिए अनके बिन्दुओं को देश के समक्ष रखें। जिसमें मुख्य था - 1. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना। 2. सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश। 3. सबका साथ, सबका विकास। 4. 100 नये माॅडल शहर बसाना। 5. 5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology) और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र।
    राष्ट्र निर्माण का व्यापार राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत किये गये मार्गदर्शक बिन्दुओं का सम्मिलित रूप है। नये शहर के रूप में वाराणसी के दक्षिण थ्री इन वन ”सत्यकाशी नगर“ की योजना उस क्षेत्र के विकास पर आधारित है तो आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत के सपने को साकार करने के लिए पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW- Real Education National Express Way) द्वारा राष्ट्र निर्माण का व्यापार समाजवाद पर आधारित भारत देश के आम आदमी के लिए प्रस्तुत है। किसी व्यक्ति के बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक है कि उसे भोजन, स्वास्थ्य और निर्धारित आर्थिक आय को सुनिश्चित कर दिया जाय और यह यदि उसके शैक्षिक जीवन से ही कर दिया जाय तो शेष सपने को वह स्वयं पूरा कर लेगा। यदि वह नहीं कर पाता तो उसका जिम्मेदार भी वह स्वयं होगा, न कि अभिभावक या ईश्वर। पुनर्निर्माण, इसी सुनिश्चिता पर आधारित है।
    मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र ISO-9000, ISO-14000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।
    जो व्यक्ति या देष केवल आर्थिक उन्नति को ही सर्वस्व मानता है वह व्यक्ति या देष एक पशुवत् जीवन निर्वाह के मार्ग पर है-जीना और पीढ़ी बढ़ाना। दूसरे रूप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनका लक्ष्य धन रहा था वे अपने धन के बल पर अपनी मूर्ति अपने घर पर ही लगा सकते हैं परन्तु जिनका लक्ष्य धन नहीं था, उनका समाज ने उन्हें, उनके रहते या उनके जाने के बाद अनेकों प्रकार से सम्मान दिया है और ये सार्वजनिक रूप से सभी के सामने प्रमाणित है। पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग शारीरिक-आर्थिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक-बौद्धिक उत्थान होना चाहिए और यही है ही। इस प्रकार भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है। राष्ट्र के पूर्णत्व के लिए पूर्ण शिक्षा निम्नलिखित दो शिक्षा का संयुक्त रूप है-
    अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - ज्ञान के लिए - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का बौद्धिक विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय सुख में वृद्धि होती है।
    ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - कौशल के लिए - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का कौशल विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है।
    स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK) - समाज में प्रकाशित होने के लिए
    वर्तमान समय में विशेषीकरण की शिक्षा, भारत में चल ही रहा है और वह कोई बहुत बड़ी समस्या भी नहीं है। समस्या है सामान्यीकरण शिक्षा की। व्यक्तियों के विचार से सदैव व्यक्त होता रहा है कि - मैकाले शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति व पाठ्यक्रम बनना चाहिए। ये तो विचार हैं। पाठ्यक्रम बनेगा कैसे?, कौन बनायेगा? पाठ्यक्रम में पढ़ायेगें क्या? ये समस्या थी। और वह हल की जा चुकी है। जो भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा के रूप में पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है। जो राष्ट्र निर्माण का व्यापार है।

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  • 06. पुनर्निर्माण क्यों?

    राष्ट्र निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को तथा उसके निवास क्षेत्र से ही पूर्णता के निर्माण के लिए ज्ञान और कौशल विकास की उपलब्धता छात्रवृत्ति सहित अन्य सहायता व सुविधा के साथ पहुँचाने के उद्देश्य से पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग प्रणाली को विकसित किया गया है। प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान से युक्त करने की आवश्यकता भारत सहित विश्व को आ गई है इसलिए पुनर्निर्माण आवश्यक है।

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  • 07. प्रवेश पंजीकरण की योग्यता (Eligibility)

    1. कोई भी व्यक्ति/संस्था उपरोक्त वेबसाइट पर पंजीकरण (Registraion) और लाॅगइन (Login) कर सकता है। पंजीकृत प्रत्येक व्यक्ति/संस्था हमारा विद्यार्थी कहलाता है। पंजीकरण के उपरान्त अपना विवरण भरें।
    2. एक माह के अन्दर पाठ्यक्रम शुल्क भुगतान कम्पनी या अपने नजदीकी डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र (Postal area Admission Center-PAC) को करें।
    3. पहले पंजीकृत व्यक्ति/संस्था पहले छात्रवृत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होगा चाहे वह पाठ्यक्रम शुल्क का भुगतान अन्य के बाद ही क्यों न किया हो।
    4. कोई भी व्यक्ति/संस्था एक साथ अनेक पाठ्यक्रम में प्रवेश ले सकता है। प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग पंजीकरण करना होगा।
    5. पाठ्यक्रम प्रारम्भ होने की निर्धारित तिथि के उपरान्त ही कार्यक्रमानुसार पाठ्य सामग्री भेजी जाती है।

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  • 08. छात्रवृत्ति (स्कालरशिप), सहायता और रायल्टी देने का हमारा आधार

    राष्ट्र निर्माण का हमारा कार्य एक महान और ऐतिहासिक उद्देश्य के लिए व्यक्ति से लेकर विश्व के चहुमुखी विकास के लिए विकसित की गयी है जिसका सपना सत्य रूप में अपने देश भारत से प्रेम करने वाले देखते होेगें। हमारा कार्य नागरिकों को कैसे और किन क्षेत्रों में लाभ देता है इसके लिए निम्नलिखित का क्रमिक अध्ययन आवश्यक है-
    1. व्यापार का जन्म विचार से होता है। विचार पहले किसी एक व्यक्ति के अन्दर जन्म लेता है उसके उपरान्त भले ही वह कई व्यक्ति के समूह का बन जाये, अलग बात है। जब समूह का बन जाता है तब वह कम्पनी, कार्पोरेशन, एन.जी.ओ., ट्रस्ट और यदि अधिक शक्तिशाली हो तो राष्ट्र का व्यापार बन समाज के सामने आता है। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
    - राजनीतिक क्षेत्र में एक ग्राम प्रधान/सभासद, क्षेत्र पंचायत सदस्य, क्षेत्र प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, सांसद, मंत्री इत्यादि बनने का विचार सर्वप्रथम उस व्यक्ति के मन में आता है। फिर वह बाहर व्यक्त होता है और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह धन, सम्बन्ध, जन आधार इत्यादि का प्रयोग करता है।
    - व्यापारिक क्षेत्र में व्यापार के वस्तु का विचार सर्वप्रथम व्यक्ति के अन्दर आता है फिर वह बाहर प्रोप्राइटरश्पि, पार्टनरशिप, प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी, लिमिटेड कम्पनी इत्यादि के रूप में बाहर आता है और उस व्यापार के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह सरकारी प्रक्रिया, कार्यालय, उत्पाद निर्माण, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार, कर्मचारी वेतन, योजना, प्रलोभन इत्यादि पर धन खर्च करता है।
    - धार्मिक क्षेत्र में भी आजकल स्वयं के विचार के अनुसार स्वयं को लक्ष्य के अनुसार स्थापित करने के लिए व्यक्ति सरकारी प्रक्रिया, कार्यालय, उत्पाद निर्माण, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार, कर्मचारी वेतन, योजना, प्रलोभन इत्यादि पर धन खर्च करता है।
    उपरोक्त कर्म करने के बाद भी बहुत से व्यक्ति अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त कर पाते फिर भी वे कोशिश जारी रखते हैं। जिस प्रकार भारत सरकार हो या प्रदेश सरकार घाटे में भी चलने के बावजूद अपना व्यापार, सामाजिक-जन कल्याण का कार्य बन्द नहीं करती बल्कि कर्ज लेकर भी उसे चलाते रहती है।
    2. राष्ट्र निर्माण के इस व्यापार में भी उपरोक्त के अनुसार इसके आविष्कारक ने आविष्कार की स्थापना और अपने कार्य पर भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ को प्राप्त (लक्ष्य) करने के लिए सरकारी प्रक्रिया, कार्यालय, उत्पाद निर्माण, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार, कर्मचारी वेतन, योजना, प्रलोभन इत्यादि पर धन खर्च कर रहा है। जिसके निम्न स्रोत हैं-
    अ. आविष्कारक का स्वयं का धन।
    ब. आविष्कारक के शुभचिन्तकों द्वारा प्राप्त आर्थिक सहयोग।
    स. आविष्कार के स्थापनार्थ स्थापित प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में शामिल शेयरधारकों द्वारा निवेश किया गया धन।
    द. व्यापार के सशक्त प्रणाली के कारण अन्य स्थापित प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी व मल्टीनेशनल कम्पनी से समझौता।
    द. व्यापार प्रारम्भ होने से प्राप्त धन व लाभ को व्यापार विकास में निवेश करने की प्रबल इच्छा।
    अर्थात हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने तक अपने व्यापार में शामिल लोगों के साख को सदैव निभाने में पूर्णतया सक्षम हैं।
    उदाहरण स्वरूप सभी शिक्षा संस्थान, शिक्षा देने के बदले एक शुल्क लेते हैं। उसमें से शिक्षकों का वेतन, अन्य खर्चों इत्यादि देने के बाद जो बचता है। वह उस शिक्षा संस्थान का लाभ होता है। छात्रवृत्ति, सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। बहुत कम लेकिन ऐसे शिक्षा संस्थान भी हैं जो सभी छात्रों को शिक्षण शुल्क का शत-प्रतिशत छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं। ये छात्रवृत्ति की राशि उन्हें सरकार, औद्यौगिक व व्यापारिक समूहों द्वारा शिक्षा के विकास के लिए प्राप्त होती है जो कहीं न कहीं से जनता के साथ किये गये व्यापार द्वारा ही उन्हें प्राप्त होता है। एक तरफ व्यापार, दूसरी तरफ समाज सेवा और लक्ष्य विकास और करने वाले की प्रसिद्धि यही एक पूर्ण व्यापार का कर्मज्ञान है। यदि यह आप समझ गये तो आपको व्यापार समझ में आ जायेगा।
    हमारे ”सत्य मानक शिक्षा“ प्रणाली में हम छात्रवृत्ति, बाद के छात्र से प्राप्त शुल्क में से लाभ को पहले के छात्रों में छात्रवृत्ति के रूप में वितरित करते रहते हैं। स्पष्ट है हम विद्यार्थी से जो शुल्क पाते हैं उसमें हमारा लाभ भी है। हम अपने खर्चो को सम्भालते हुए, शेष राशि को छात्रवृत्ति के रूप में प्रदान करते रहते हैं जिससे इस शिक्षा के प्रति रूचि बढ़े। शिक्षा संस्थान ऐसा नहीं करते लेकिन हम ऐसा कर रहे हैं। भारत में ऐसा कोई कानून नहीं कि उत्पाद का मूल्य सरकार निर्धारित करे। और ऐसी स्थिति में तो और भी मुश्किल है जब उत्पाद का आविष्कार किसी व्यक्ति का स्वयं का हो।
    पुनर्निर्माण, राष्ट्र निर्माण का व्यापार है इसे उसी प्रकार किया जा रहा है जिस प्रकार एक कम्पनी का प्रबन्ध और मार्केटिंग की जाती है। आम जनता से जुड़ा हुआ जब कोई व्यापार होता है तब कम्पनी एक निर्धारित धन विज्ञापन व प्रचार-प्रसार में खर्च करती है जो पम्फलेट, पोस्टर, बैनर, पत्रिका, समाचार-पत्र, प्रदर्शन, पुस्तिका इत्यादि के रूप में होती है। इस व्यापार के प्रचार-प्रसार में भी समय-समय पर इनका प्रयोग सदैव होता ही रहेगा। इन सब के साथ एक और विधि प्रयोग की जा रही है जिससे हमें प्रचार-प्रसार का लाभ प्राप्त होता है वह है नगद राशि (छात्रवृत्ति)। यह छात्रवृत्ति इस व्यापार के प्रचार-प्रसार के अन्तर्गत विज्ञापन खर्च का ही हिस्सा है। जिसकी राशि भी समूह व कम्पनी के अन्य परियोजनाओं के प्रचार-प्रसार व मार्केटिंग विकास के कारण व्यापारिक, ऋण, निवेश व अनुदान के रूप में प्राप्त होती है और उसका प्रयोग हम नगद राशि (छात्रवृत्ति) व सामाजिक सहायता के रूप में प्रदान करते रहते हैं।
    कोई अपने व्यापार से प्राप्त लाभ को अपने व अपने परिवार के लिए संचित करता है। यदि कोई अपने व्यापार से प्राप्त लाभ को सम्पूर्ण रूप से समाज पर ही खर्च कर दें तो उस पर भारत का कौन सा कानून काम करेगा? व्यापार से अलग साख का लाभ गोपनीय और बेहिसाब होता है। अगर उसे हमें समाज को देना है तो वह मनुष्य को ही दिया जाता है। इसलिए पता तो हो किसे दिया जाय, जिसके लिए पंजीकरण आवश्यक है।
    हमारे आय व धन आदान-प्रदान के विभिन्न परियोजनाएँ भी हैं।

  • क्लिक करें=>09. पाठ्यक्रम शुल्क (Course Fees)
  • 09. पाठ्यक्रम शुल्क (Course Fees)

    प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क अलग-अलग हैं जिसे तीन किस्त प्रथम 25 प्रतिशत, द्वितीय 50 प्रतिशत, अन्तिम 25 प्रतिशत के तीन किस्त में दिया जा सकता है। अलग-अलग पाठ्यक्रमों के शुल्क अलग-अलग होते हैं।
    प्रत्येक पाठ्यक्रम पर छात्र द्वारा चुनी गयी सहायता जैसे छात्रवृत्ति सहायता (Scholarship Help), शिक्षा सहायता (Education Help), पर्यटन सहायता (Tourism Help), घरेलू पुस्तकालय सहायता (Home Library Help), स्वास्थ्य सहायता (Health Help) में से एक दी जाती है।

  • क्लिक करें=>10. छात्रवृत्ति और रायल्टी (Scholarship & Royalty)
  • 10. छात्रवृत्ति और रायल्टी (Scholarship & Royalty)

    1. वेबसाइट पर पंजीकृत सभी व्यक्ति/संस्था छात्रवृत्ति और सहायता के क्रम में आते हैं। छात्रवृत्ति और सहायता प्राप्त करने के लिए पाठ्यक्रम शुल्क का भुगतान अनिवार्य है।
    2. पंजीकरण के साथ ही आपका पाठ्यक्रम में प्रवेश हो जाता है और आपको अनुक्रमांक व पासवर्ड प्राप्त हो जाता है। साथ ही पाठ्यक्रम के व्यापार से प्राप्त होने वाले लाभ द्वारा छात्रवृत्ति और सहायता के लिए आप स्वतः ही साफ्टवेयर द्वारा स्वचलित छात्रवृत्ति और सहायता वितरण प्रणाली से जुड़ जाते हैं। पंजीकरण के उपरान्त यदि आप पाठ्यक्रम का पूर्ण शुल्क (तीनो किस्त) एक माह के अन्दर अपने डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र (Postal Area Admission Centre - PAC) पर नहीं जमा करते हैं तो प्रतिदिन विलम्ब शुल्क रू0 25/-, मूल शुल्क में जुड़ने लगता है। बिलम्ब शुल्क के साथ शुल्क जमा करने के लिए हम आपकी प्रतीक्षा करते है जबकि हम आपको इस दौरान छात्रवृत्ति और सहायता देते रहते हैं जिसे आप अपने अनुक्रमांक व पासवर्ड से सदैव देख सकते हैं परन्तु आपके शुल्क जमा न करने के कारण वह आपको भुगतान नहीं हो पाता है।
    3. विद्यार्थी पाठ्यक्रम शुल्क जमा करने के तीन माह बाद आवश्यकता पड़ने पर शुल्क वापस ले सकते हैं और फिर जमा भी कर सकते है परन्तु उस समय तक आवश्यक है कि आप कम से कम दो नये विद्यार्थी का प्रवेश करा चुके हों। इस अवधि में आपकी छात्रवृत्ति और सहायता तो बनती है परन्तु वह भुगतान नहीं होता। भुगतान तभी होता है जब पाठ्यक्रम शुल्क और बिलम्ब शुल्क (इस स्थिति में रू0 100/- प्रतिदिन) आप जमा करते हैं।
    4. दूसरे पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने से पूर्व में लिए गये पाठ्यक्रम में प्रवेश की छात्रवृत्ति और सहायता बन्द नहीं होती।
    5. छात्रवृत्ति और सहायता तभी बन्द होती है जब आप स्वयं डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र (Postal Area Admission Centre - PAC) पर जाकर अपना पाठ्यक्रम शुल्क वापस लेते हैं और छात्रवृत्ति और सहायता प्रणाली से बाहर होने के लिए कहते हैं और उस समय तक आप कम से कम दो नये विद्यार्थी का प्रवेश करा चुके होते हैं।
    6. शत प्रतिशत छात्रवृत्ति और सहायता प्राप्त करने के लिए शिक्षार्थी की वेबसाइट पर 50 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है। 50 प्रतिशत से कम उपस्थिति होने पर छात्रवृत्ति की राशि से 10 प्रतिशत की कटौती निर्धारित है। शिक्षार्थी की उपस्थिति विज्ञापनों के बाद आने वाले प्रश्नों के उत्तर देने से हमें ज्ञात होता है। प्रतिदिन एक प्रश्न दोपहर के 12 बजे आपके लिए आते हैं जो अगले दिन दोपहर 12 बजे तक दूसरे प्रश्न के आने तक आपके लाॅगइन एरिया में रहता है। माह में कुल 30 प्रश्न आते हैं जिसमें से 15 प्रश्नों (वर्ष में 180 प्रश्न) के उत्तर देने पर आपकी उपस्थिति 100 प्रतिशत मानी जाती है और आप शत प्रतिशत छात्रवृत्ति और सहायता प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं।
    7. कोई भी शिक्षार्थी किसी अन्य शिक्षार्थी का प्रवेश पंजीकरण वेबसाइट पर करा सकता है यह नया शिक्षार्थी जब भी अपना पाठ्यक्रम शुल्क जमा करता है तब प्रवेश कराने वाले पुराने शिक्षार्थी को शुल्क का 10 प्रतिशत का अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है और जब नया शिक्षार्थी छात्रवृत्ति रू0 5,000/- प्राप्त करता है तब प्रवेश कराने वाले पुराने शिक्षार्थी को छात्रवृत्ति रू0 5,000/- का 10 प्रतिशत का अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त होता है। इस प्रकार ”पढ़ने और पढ़ाने“ के इस कार्य में ज्ञान के साथ आर्थिक लाभ का व्यापार भी है।
    8. पाठ्यक्रम के बदले में छात्रवृत्ति चुनने व पाठ्यक्रम शुल्क जमा करने पर एक वर्ष में न्यूनतम रू0 5,000/- दी जाती है।
    9. वर्ष में एक बार छात्रवृत्ति रू0 5,000/- प्राप्त करने के उपरान्त हमारे व्यापार के लाभांस/रायल्टी को सदैव प्राप्त करने के लिए जीवन में एक बार दो नये विद्यार्थीयों को पाठ्यक्रम के बारे में बताना व उनका प्रवेश कराना अनिवार्य है। जब तक आप दो नये विद्यार्थीयों को पाठ्यक्रम के बारे में बताना व उनका प्रवेश नहीं करा देते तब तक लाभांस/रायल्टी का भुगतान नहीं होता परन्तु लाभांस/रायल्टी बनती रहती है। जब आप हमारे विद्यार्थी रहते हैं तब आपको छात्रवृत्ति या चुनी गई सहायता प्राप्त होती है। जब हमारे लिए आप व्यापार करते हैं तब आप रायल्टी की योग्यता में आते हैं।
    10. लाभांस/रायल्टी की राशि रू0 5,000/- के गुणक में ही दी जाती है जिसकी अधिकतम सीमा प्रवेश लेने वाले विद्यार्थीयों की संख्या पर निर्भर करता है।

  • क्लिक करें=>11. ये पाठ्यक्रम क्या है? - अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - ज्ञान के लिए
  • 11. ये पाठ्यक्रम क्या है? 
    व्यक्ति के पूर्णता के लिए निम्न तीन प्रकार के पाठ्यक्रम उपलब्ध है-
    अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - ज्ञान के लिए
    ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - कौशल के लिए
    स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK) - समाज में प्रकाशित होने के लिए

    11. ये पाठ्यक्रम क्या है? - अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - ज्ञान के लिए

    भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा के रूप में पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है। जो राष्ट्र निर्माण का व्यापार है।
    इसके अन्तर्गत REAL EDUCATION, REAL PROFESSION, REAL BOOK, REAL STATUS, REAL ESTATE AGENT, REAL KISAN की शिक्षा पाठ्यक्रम हैं। जो पत्राचार द्वारा संचालित है। यह व्यक्ति के स्वयं अपने बुद्धि के विकास से सम्बन्धित पाठ्यक्रम है।
    हम सभी व्यक्ति आधारित राजतन्त्र में राजा से उठकर व्यक्ति आधारित लोकतन्त्र में आये, फिर संविधान आधारित लोकतन्त्र में आ गये। अब पूर्ण लोकतन्त्र के लिए मानक आधारित लोकतन्त्र में हम सभी को पहुँचने की अटलनीय यात्रा का चक्र है। अर्थात और व्यक्ति आधारित समाज व शासन से उठकर मानक आधारित समाज व शासन के निर्माण की यात्रा है। वर्तमान तक के धार्मिक-सामाजिक-राजनैतिक नेतागण जिस पूर्ण लोकतन्त्र और परफेक्ट देश या विश्व का सपना देखते हैं, पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग, उसी को पूर्ण करने का मार्ग है। और यह विश्व व उसके नागरिकों की विवशतापूर्ण आवश्यकता भी है। ”सत्य मानक शिक्षा व पूर्ण ज्ञान“ सेे मानवों को शिक्षित करने की एक प्रणाली व पाठ्यक्रम है पाठ्यक्रम को 20 वर्षो के मेहनत से तैयार किया गया है। इस पाठ्यक्रम को अन्य रूप में
    1. व्यवस्था परिवर्तन व सत्यीकरण का प्रथम पाठ्यक्रम
    2. ”पूर्ण ज्ञान का पूरक पाठ्यक्रम“ और ”आम आदमी का समाजवादी पाठ्यक्रम“
    3. काल, मनवन्तर और युग परिवर्तन का कल्कि अवतार द्वारा व्यक्त पाठ्यक्रम
    4. सम्पूर्ण क्रान्ति की कार्य योजना का पाठ्यक्रम
    5. विश्व शान्ति, एकता व विश्व सरकार का मार्गदर्शक मानक पाठ्यक्रम भी कहा जाता है।
    यह कार्य भारतीय संविधान की धारा-51 (ए): नागरिक का मूल कत्र्तव्य के अनुसार 
    राष्ट्र और मानव का ”आध्यात्मिक सत्य“ आधारित सर्वोच्च कत्र्तव्य का उदाहरण है।
    इस पाठ्यक्रम से क्या लाभ है?
    1. ज्ञान-ध्यान-चेतना के वर्तमान और भविष्य के युग में आपको पूर्णता प्रदान करता है।
    2. आप चाहे जो भी शिक्षा व प्रोफेशनल शिक्षा प्राप्त किये हों, ये आपको पूरक शिक्षा देकर पूर्ण बनाता है।
    3. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के विषय के तत्व को समझने की दिव्य-दृष्टि प्रदान करता है।
    4. पृथ्वी पर हुये और हो रहे समस्त व्यापार को एक साथ आपके सामने रखता है।
    5. आपको अपना मालिक स्वयं बनाता है।
    यह पाठ्यक्रम किसके लिए है?
    1. यह पाठ्यक्रम उन सभी विश्व के नागरिकों के लिए है जो इस पृथ्वी पर रहते हैं।
    2. विशेषकर उनके लिए है जो ज्ञान के लिए ही अपना समय व धन खर्च करने के लिए विद्यालय, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय की शरण में हैं।
    3. यह उनके लिए भी है जो शिक्षा क्षेत्र में शिक्षक हैं और वे भी जो सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व के क्षेत्र में हैं।
    4. यह उनके लिए नहीं है जो धन एकत्रित करने के क्षेत्र में सफल हो चुके हैं और जो धन को ही ज्ञान समझते हैं।

    इस पाठ्यक्रम की मान्यता क्या है?
    1. यह पाठ्यक्रम किसी भी देश के सरकारी संस्थान द्वारा मान्य नहीं है न ही इससे कोई सरकारी नौकरी आपको प्राप्त होनी है।
    2. वर्तमान की सरकारी शिक्षा प्रणाली आपको अगली कक्षा में प्रवेश और परीक्षा पास कर निर्भरता देने वाली है।
    3. यह पाठ्यक्रम आपको जीवन की परीक्षा पास करने व आप में आत्मनिर्भरता देने वाली है।
    4. यह पाठ्यक्रम विश्व के बुद्धिजीवियों से मान्यता प्राप्त व उनके सपनों का पाठ्यक्रम है।
    5. यह पाठ्यक्रम ईश्वरीय मान्यता प्राप्त है।
    परन्तु हमारा सदैव प्रयत्न रहेगा कि ये पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार से मान्यता प्राप्त होकर विद्यालयों के शिक्षा पाठ्यक्रम अनिवार्य विषय के रूप में शामिल हो जिससे विश्व स्तरीय मानव का निर्माण प्रारम्भ हो सके जिसकी आवश्यकता पूरे विश्व में है। जिस ओर विश्व की बौद्धिक शक्ति की गति भी है।
    सत्य शिक्षा (REAL EDUCATION)
    01. पूर्ण ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Complete Knowledge-CCK)
    02. ईश्वर शास्त्र व व्यापार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Godics & Business Knowledge-CGBK)
    03. अवतार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Avatar Knowledge-CAK)
    04. गुरू ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Guru Knowledge-CGK)
    05. संस्थागत धर्म में डिप्लोमा (Diploma in Institutional Religion-DIR)
    06. पूर्ण शिक्षा में स्नातक (Bachelor in Complete Education-BCE)
    07. पूर्ण शिक्षा में परास्नातक (Master in Complete Education-MCE)
    सत्य पेशा (REAL PROFESSION)
    08. दृश्य योग, ध्यान और चेतना में प्रमाण पत्र (Certificate in visible Yoga, Meditation & Consciousness - CVYMC)
    09. डब्ल्यू.सी.एम-टी.एल.एम-श्याम.सी में प्रमाण पत्र (Certificate in WCM-TLM-SHYAM.C Technology-CWT)
    10. डब्ल्यू.एस.ओ-0 और कर्मज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in WSO-0 & Work Knowledge-CWWK)
    11. पुराण लेखन कला में प्रमाण पत्र (Certificate in Art of Puran writing-CAPW)
    12. सार्वभौम विचार पर आधारित फिल्म लेखन में प्रमाण पत्र (Certificate in Art of Universal thought based Film writing-CAUFW)
    सत्य पुस्तक (REAL BOOK)
    13. विशाल ज्ञान विज्ञान सबका समाधान (Vishal Gyan Vigyan sabka samadhan-VGVSS)
    14. विश्वशास्त्र: द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज (VISHWSHASTRA : THE KNOWLEDGE OF FINAL KNOWLEDGE - VKFK)
    सत्य स्थिति (REAL STATUS)
    15. जीवन का पैमाना (Scale Your Life) - ईश्वर चक्र पर स्वयं की स्थिति का ज्ञान (Know Your Position on GOD CYCLE -KYPGC)
    सत्य एस्टेट एजेन्ट (REAL ESTATE AGENT)
    16. रियल इस्टेट एजेन्ट में प्रमाण पत्र (Certificate in Real Estate Agent - CRE)
    सत्य किसान (REAL KISAN)
    17. रियल किसान में प्रमाण पत्र (Certificate in Real Kisan - CRK)

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  • 11. ये पाठ्यक्रम क्या है? - ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - कौशल के लिए

    इसके अन्तर्गत सत्य कौशल (REAL SKILL) की शिक्षा पाठ्यक्रम हैं जो विद्यार्थी के निवास क्षेत्र में ही संस्थागत रूप से संचालित है। यह व्यक्ति के स्वयं अपने आजिविका के विकास से सम्बन्धित पाठ्यक्रम है। व्यक्ति कितना भी ज्ञानी क्यों न हो जाये उसे अपने आजीविका के लिए काम तो करना ही पड़ता है। इसलिए उसे युगानुसार कौशल सम्बन्धित पाठ्यक्रम की आवश्यकता होती है।

    इस पाठ्यक्रम से क्या लाभ है?
    इन पाठ्यक्रमों से व्यक्ति कौशल का विकास करता है और अपनी आजिवीका के लिए सक्षम बनते हुए राष्ट्र के विकास में भागीदार बनता है।
    यह पाठ्यक्रम किसके लिए है?
    इन पाठ्यक्रमों को कोई भी व्यक्ति अपने कौशल विकास के लिए कर सकता है और अपनी आजिवीका के लिए स्वयं को सक्षम बना सकता है।
    इस पाठ्यक्रम की मान्यता क्या है?
    सत्य कौशल (REAL SKILL) का सभी शिक्षा पाठ्यक्रम भारत सरकार के से मान्यता प्राप्त है।
    सत्य कौशल (REAL SKILL)

    A- Computer Courses - Certificate Programme in Computer Applications, Computer Hardware & Networking, Desk Top Publishing (DTP), Office Automation through ICT, Programme in Website Design, Certificate Programme in AutoCAD, Multi-Media / Graphic Design Training , Certificate in Computer Concepts, Certificate course in Computerized Accounting, C, C++ and OOPs, Core Java, Advanced Java, Visual Basic with Access, Oracle, SQL and PL SQL, MS.NET, Computer Teacher Training Course, Computer Teacher Training Course, Diploma In Computer Application, Diploma In Computer Hardware And Networking, Certificate Programme in 3ds Max 3, Certificate Program me in CATIA V5, Certificate Programme in graphics, Asp.NET, Visual Basic, Adobe Photo & Flash

    B- Conventional Training - Plumbing, Electrician, Sheet metal works, Welding (gas & electric resistance), Welding (gas & electric resistance), Fitter, Machinist, Turner, Draftsman (civil), CNC Programming & Operation, Certificate Programme in Pro- Engineering, Diesel mechanic, Tools & Die maker, Motor Vehicle Mechanic, Scooter & auto cycle mechanic, Book binder, Digital Photography, Carpenter, Spray Painting, Powder Coating, Pneumatics operation training, Hydrailics operation training

    C- Electronic Courses - Mobile Repairing, Radio and TV repair, Repairing of electrical gadgets, Repair of refrigerator & AC, Electrical appliances repairing.

    D- Leather Technology - Foot Wear Designing & Pattern Cutting (Manual), Foot Wear Designing & Pattern Cutting (CAD & Manual), Shoe CAD Designing Course, Leather Goods Manufacture, Textiles and Leather Garments Manufacture, Foot Wear Machine Maintenance, Shoe Upper Clicking, Shoe Upper Closing, Foot Wear Lasting, Making & Finishing, Foot Wear Making / Different Foot Wear Constructions.

    E- Miscellaneous Courses - Beauty Parlor, Soft toys making, Fashion designing, Fashion Designing, Embroidery & needle work, Boutique, Health & fitness centre, Watch & clock mechanic, Cookery, Modern Secretarial Practice

    F- Incubation - Incubation for Small Enterprise Establishment

    सत्य डिजीटल कोचिंग (REAL DIGITAL COACHING)
    ”डिजिटल कोचिंग“ विज्ञान के तकनीकी द्वारा प्रस्तुत एक मानव निर्मित अजीव शिक्षक/गुरू (डिजिटल विडियो-आॅडिया शैक्षणिक सामग्री) है। जो उपरोक्त शिक्षा को विद्यार्थीयों के अन्दर ज्ञान का संचरण कराता है। जिसके लिए आवश्यक उपकरण निम्नप्रकार हैं-
    1. दृश्य माध्यम - एल.सी.डी - 40 इंच या इससे बड़ा
    2. हाई स्पीड कम्प्यूटर सी.पी.यू, कीबोर्ड, माउस, स्पीकर
    3. बिजली की उपलब्धता के लिए - यू.पी.एस, इन्वर्टर, बिजली/जेनरेटर
    4. कक्षा - 200 वर्ग फीट से 400 वर्ग फीट

    पाठ्यक्रम -
    1. विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - इसके अन्तर्गत कक्षा-12 तक के सभी पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं।
    2. सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - इसके अन्तर्गत पुनर्निर्माण के सभी पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं।

    छात्रवृत्ति -
    यह डिजिटल कोचिंग कोई भी व्यक्ति प्रारम्भ कर सकता है। यदि उसका डिजिटल कोचिंग भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) सेे जुड़ता है तो प्रत्येक छात्र छात्रवृत्ति, सहायता और रायल्टी प्राप्त कर सकता है। अन्यथा वह अपने अनुसार डिजिटल कोचिंग का शुल्क निर्धारित करने के लिए स्वतन्त्र है।

     

  • क्लिक करें=>11. ये पाठ्यक्रम क्या है? - स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK) - समाज में प्रकाशित होने के लिए
  • 11. ये पाठ्यक्रम क्या है? - स - सत्य नेटवर्क (REAL NETWORK)

     समाज में प्रकाशित होने के लिए

    किसी भी युग में अवतार, महापुरूष, संत या किसी भी व्यक्ति के गुण को सीधे देखकर पहचानने की क्षमता किसी भी व्यक्ति के अन्दर नहीं रही है। उस व्यक्ति को, स्वयं के अपने गुणों को ज्ञान, कर्म, जीवन के माध्यम द्वारा व्यक्त करना होता है। उसके बाद ही कुछ लोग उन्हें पहचानते हैं और उनके साथ एक-दूसरे के सदुपयोग के लिए साथ आते रहे हैं। प्राचीन समय में यह कार्य बहुत कठिन होता था इसके लिए वे अनेक प्रकार के आयेजन करते थे।
    वर्तमान युग में भी अनेक प्रकार सेमिनार, सम्मेलन, प्रदर्शनी, मेले, परीक्षाएँ इत्यादि द्वारा अपनी योग्यता प्रदर्शित किये जाते हैं। परन्तु यह सब समय लेने वाला और आम नागरिक के योग्यता को व्यक्त करने का माध्यम नहीं बन पाता। दुनिया बहुत तेज हो चुकी है। स्वयं को प्रकाशित करें और दूसरे के प्रकाश में स्वयं को लायें।
    01. डिजिटल ग्राम नेटवर्क (Digital Village Network)
    02. डिजिटल नगर वार्ड नेटवर्क (Digital City Ward Network)
    03. डिजिटल एन.जी.ओ/ट्रस्ट नेटवर्क (Digital NGO/Trust Network)
    04. डिजिटल विश्वमानक मानव नेटवर्क (Digital World Standard Human Network)
    05. डिजिटल नेतृत्व नेटवर्क (Digital Leader Network)
    06. डिजिटल जर्नलिस्ट नेटवर्क (Digital Journalist Network)
    07. डिजिटल शिक्षक नेटवर्क (Digital Teacher Network)
    08. डिजिटल शैक्षिक संस्थान नेटवर्क (Digital Educational Institute Network)
    09. डिजिटल लेखक-ग्रन्थकार-रचयिता नेटवर्क (Digital Author Network)
    10. डिजिटल गायक नेटवर्क (Digital Singer Network)
    11. डिजिटल खिलाड़ी नेटवर्क (Digital Sports Man Network)
    12. डिजिटल पुस्तक विक्रेता नेटवर्क (Digital Book Saler Network)
    13. डिजिटल होटल और आहार गृह नेटवर्क (Digital Hotel & Restaurant Network)

  • क्लिक करें=>12. पुनर्निर्माण - 3-एफ विपणन प्रणाली से युक्त
  • 12. पुनर्निर्माण - 3-एफ विपणन प्रणाली से युक्त

    राष्ट्र निर्माण के लिए पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3F-Fuel-Fire-Fuel) से युक्त है अर्थात इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति/संस्था को शिक्षा के साथ-साथ, छात्रवृत्ति और रायल्टी या सहायता निश्चित रूप से प्राप्त होती है।

  • क्लिक करें=>13. हमारा उद्देश्य क्या है?
  • 13. हमारा उद्देश्य क्या है?

    1. हमारा उद्देश्य इस पाठ्यक्रम के पुस्तकों को आप तक पहुँचाना है जिससे आप ज्ञान-ध्यान-योग-चेतना के सैद्धान्तिक ज्ञान से युक्त हो जायें, जो आपके लिए अति आवश्यक है परन्तु आपको उसका ज्ञान नहीं है।
    2. इन पाठ्यक्रम के पुस्तकों को पहुँचाने के क्रम में पैदा हुये व्यापार में आपको उसके लाभ का हिस्सेदार बनाना हमारा उद्देश्य है।
    3. इसके ज्ञान के उपरान्त जो इच्छुक होगें वे ”सत्यकाशी यूनिवर्सल इन्टीग्रेशन साइंस यूनिवर्सिटी“ की परीक्षा पास कर उसके द्वारा खोले जाने वाले केन्द्र में नौकरी पाने के लिए अधिकृत होंगे।

  • क्लिक करें=>14. मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) का आधार
  • 14. मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) का आधार


    किसी भी मल्टी लेवेल मार्केटिंग कम्पनी में एक प्रोडक्ट (उत्पाद) होता है जिसे आधार बनाकर मुद्रा का आदान-प्रदान किया जाता है यह प्रोडक्ट, पैण्ट-शर्ट-बैग, मेडिसिन, वर्चुअल करेंसी जैसे-सर्वे में वर्चुअल डाॅलर, सोशल हेल्प प्रोग्राम में मावरो, करेंसी प्वाईण्ट, एड पोस्टिंग, ई-मेल, एस.एम.एस भेजना, एजुकेशनल सी.डी इत्यादि के रूप मंे होता है। जो आपके सामने आ चुका है

  • क्लिक करें=>15. पुनर्निर्माण - मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) नहीं हैं।
  • 15. पुनर्निर्माण - मल्टी लेवेल मार्केटिंग (MLM) नहीं हैं।


    1. क्योंकि हम बाइनरी या इस प्रकार का कोई चेन नहीं चलाते।
    2. क्योंकि हम केवल इसके व्यापार करने वाले को प्रवेश (सेल्स) पर कमीशन देते हैं जैसा कि शिक्षण संस्थानों में होता है।
    3. क्योंकि हम केवल अपने विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति (स्कालरशिप) देते हैं जैसा कि शिक्षण संस्थानों में होता है।

  • क्लिक करें=>16. आपकी समस्या और हमारा उपाय
  • 16. आपकी समस्या और हमारा उपाय

    हम ये अच्छी प्रकार जानते हैं कि आपको ज्ञान की नहीं धन की जरूरत है। इसलिए ज्ञान के इस पाठ्यक्रम को हम सभी भूलकर इसके व्यापार के बारे में समझने की कोशिश करते हैं। ज्ञान का पुस्तक तो इस व्यापार के साथ आप तक पहुँच ही जायेगा। सिर्फ ये सोचकर कि यह राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षा पाठ्यक्रम का व्यापार है कौन करेगा और कौन पढ़ेगा, आपकी बहुत बड़ी भूल होगी।
    क्या आप पैण्ट-शर्ट वाला कम्पनी किये थे तो उसके पहले आपके पास कपड़े नहीं थे? क्या आप दवा वाला कम्पनी जब किये थे तो क्या आप बीमार थे? इत्यादि...........।

    नहीं, केवल उस व्यापार को आपने इसलिए किया था क्योंकि उसमें धन कमाने के अवसर थे।
    आइये अब राष्ट्र निर्माण को ही व्यापार बना लें। और ”पढ़ों और पढ़ाओं” वाले व्यापार को अपनायें।

  • क्लिक करें=>17. पुनर्निर्माण - छात्रवृत्ति, सहायता व रायल्टी वितरण तिथि
  • 17. पुनर्निर्माण - छात्रवृत्ति, सहायता व रायल्टी वितरण तिथि

    प्रत्येक माह के 01 तारीख को आपकी छात्रवृत्ति की राशि आपके लाॅगइन एरिया में दिखने लगता है जो उस माह को छोड़कर अगले माह छात्रवृत्ति, पाठ्य सामग्री व सहायता वितरण तिथि के कार्यक्रमानुसार आपके बैंक खाते में भेज दिया जाता है। पाठ्य सामग्री व सहायता भी कार्यक्रमानुसार आपको भेज दी जाती है। सभी सहायता पाठ्यक्रम शुल्क जमा करने के तीसरे माह से प्रारम्भ होता है।

  • क्लिक करें=>18. पुनर्निर्माण - प्रणाली की विशेषताएँ
  • 18. पुनर्निर्माण - प्रणाली की विशेषताएँ

    1. बिना पंजीकरण/लाॅगइन के विभिन्न क्षेत्र स्तर पर कुल पंजीकृत विद्यार्थी और लाभांस प्राप्त कर रहे विद्यार्थी की सूची देख सकते हैं।
    2. बिना पंजीकरण/लाॅगइन के पिन कोड स्तर पर कुल पंजीकृत विद्यार्थी और लाभांस प्राप्त कर रहे विद्यार्थी की सूची देख कर परियोजना-पुनर्निर्माण के विभिन्न पदों का अनुमानित लाभ को देख सकते हैं।
    3. बिना पंजीकरण/लाॅगइन के परियोजना-पुनर्निर्माण के विभिन्न पदों के लाभ के अनुमान से उस क्षेत्र में परियोजना-पुनर्निर्माण के विभिन्न पद नियुक्त है या नहीं यह देख सकते हैं।
    4. बिना पंजीकरण/लाॅगइन के आपके जीवन से सम्बन्धित ज्ञान के विकास के लिए जानकारी का विस्तृत पृष्ठ और हमारे द्वारा योजनाबद्ध परियोजनाओं की जानकारी पढ़ सकते हैं।
    5. हमारा विद्यार्थी सार्वभौम पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर मानसिक स्वतन्त्रता के मुख्यधारा के मार्ग पर चलते हुये शिक्षित, विचारशील, रचनात्मक और नेतृत्वशील बनेगा।
    6. हमारा विद्यार्थी ”सत्य शिक्षा“ का व्यापार करे या ना करे, दोनों स्थिति में छात्रवृत्ति और सहायता को प्राप्त करता रहेगा।
    7. हमारा कोई विद्यार्थी, हमारे से जुड़े 1. रेस्टूरेण्ट (Restaurants) 2. चिकित्सक (Doctors) 3. मेडिकल स्टोर (Medical Store) 4. दैनिक प्रयोग के दुकान (FMCG Store) 5. जैविक स्टोर (Organic Store) 6. हमारा विद्यार्थी (Our Student) या किसी भी डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र से आवश्यकता पड़ने पर सप्ताह में 1 बार और अधिकतम रू0 500.00 की नगद राशि या सेवा या वस्तु प्राप्त कर सकता है जो लेने वाले के छात्रवृत्ति से समायोजित हो जाती है।
    8. हमारा विद्यार्थी, यदि किसी भी प्रकार का व्यापार या समाजसेवा इत्यादि से है तो वह अपना विज्ञापन देकर अपने जिला क्षेत्र तक आसानी से पहुँच सकता है।
    9. हमारा विद्यार्थी, अपने व्यवसाय और स्थान के अनुसार पूरे देश के अन्य विद्यार्थी से सम्पर्क कर सकता है और वर्गीकृत विज्ञापन में सूचीबद्ध हो सकता है।
    10. हमारा विद्यार्थी, ब्लाॅग (Blog) के माध्यम से अपने किसी परियोजना (Project), फिल्म स्क्रिप्ट (Film Script), पुरातन, विलक्षण एवं दुर्लभ सूचना (Antique, Unique & Rare Information), पुस्तक (Book), सामान्य (General) को पूरे देश के सामने ला सकता है और लोगों के सम्पर्क में आ सकता है।
    11. हमारा विद्यार्थी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक स्थिति से स्वतन्त्र होकर पूरे भारत देश में भ्रमण कर सकता है।

    ज्ञान के इस युग में ज्ञान और उसके व्यापार की ओर चलें।

  • क्लिक करें=>नियम व शर्त (Terms & Condition)
  • नियम व शर्त (Terms & Condition)

    सामाजिक क्रान्ति या विकास सहित पूर्ण मानव निर्माण की प्रक्रिया एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है इसके लिए दूरगामी आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) प्रारम्भ किया गया है। इस ”सत्य मानक शिक्षा“ प्रणाली में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी के लिए निम्नलिखित नियम व शर्ते है जो उन्हें स्वीकार करना अनिवार्य है -
    01. पाठ्यक्रम में प्रवेश भारत के किसी भी नागरिक/संस्था के लिए खुला है।
    02. कोई भी नागरिक/संस्था किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए स्वतन्त्र है परन्तु उसका पाठ्य सामग्री उसे पाठ्यक्रम प्रारम्भ होने की निर्धारित तिथि के बाद ही भेजी जायेगी।
    03. प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क अलग-अलग हैं जिसे तीन किस्त प्रथम 25 प्रतिशत, द्वितीय 50 प्रतिशत, अन्तिम 25 प्रतिशत के तीन किस्त में दिया जा सकता है। प्रत्येक पाठ्यक्रम के बदले छात्रवृत्ति सहायता (Scholarship Help), शिक्षा सहायता (Education Help), स्वास्थ्य सहायता (Health Help), घरेलू पुस्तकालय सहायता (Home Library Help), पर्यटन सहायता (Tourism Help) में से एक ही दी जाती है।
    04. पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित शुल्क, उस पाठ्यक्रम का मूल्य है। प्रवेश लेने वाला विद्यार्थी है जिसे यह पाठ्यक्रम बेचा जाता है अर्थात कम्पनी इन पाठ्यक्रमों का व्यापार करती है और दायित्वों से मुक्त हे। शेष सभी सहायता व वेबसाइट www.moralrenew.com पर उपलब्ध सुविधा विद्यार्थी के विकास व आपस में व्यापार के विकास के लिए सुविधा है। छात्रवृत्ति व सहायता कम्पनी इसके प्रसार के लिए देती है जिसका कोई निर्धारित नियम नहीं और देने के लिए बाध्य भी नहीं है परन्तु कम्पनी सत्य शिक्षा के प्रसार के लिए छात्रवृत्ति व सहायता उपलब्ध कराती रहेगी।
    05. आप अपना पाठ्यक्रम शुल्क कम्पनी (Company) व देश के किसी डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र(Postal area Admission Centre - PAC) के माध्यम से ही जमा कर सकते है और जमा रसीद प्राप्त कर सकते हैं।
    06. कम्पनी (Company) व डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र (Postal area Admission Centre - PAC) के अलावा किसी भी स्तर के प्रवेश प्रेरक ग्राम/नगर वार्ड प्रेरक (Ward / Village Catalyst - VC), विश्वशास्त्र मन्दिर (Vishwshastra Temple - V.T), ब्राण्ड फ्रैन्चाइजी (Brand Franchisee - B.F), जिला प्रेरक (District Catalyst - Dt.C), मण्डल प्रेरक (Division Catalyst - Dv.C) प्रवेश शुल्क लेने के लिए अधिकृत नहीं है।
    07. एक साथ अनेक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने पर उनके सभी पाठ्यक्रम की सहायता प्राप्त होती रहती है अर्थात एक साथ कई सहायता प्राप्त की जा सकती है।
    08. छात्रवृत्ति व सहायता प्राप्त करने के लिए विवरणिका (Prospectus) में दिये गये नियमों के अनुसार वेबसाइट www.moralrenew.com पर उपस्थिति अनिवार्य है।
    09. समाजिक सहायता के रूप में विकलांग, विधुर (60 वर्ष से कम), वरिष्ठ नागरिक (60 वर्ष से अधिक), अनाथ (14 वर्ष या इससे कम उम्र के बच्चे जिनके माता-पिता नहीं है।) और नवजात शिशु (बच्चे के जन्म होने पर नाम के स्थान पर NEWBORN लिख कर) किसी भी प्रकार के शुल्क से मुक्त हैं। सामाजिक सहायता के लिए ये अपने ग्राम/नगर वार्ड प्रेरक (Ward / Village Catalyst - VC) से प्रमाण के साथ सम्पर्क करें।
    10. प्रत्येक माह के 01 तारीख को आपकी छात्रवृत्ति की राशि यदि बनी है तो आपके लाॅगइन एरिया में दिखने लगता है जो उस माह को छोड़कर अगले माह वेबसाइट www.moralrenew.com पर छात्रवृत्ति, पाठ्य सामग्री व सहायता वितरण तिथि के कार्यक्रमानुसार आपके बैंक खाते में भेज दिया जाता है। पाठ्य सामग्री व सहायता भी कार्यक्रमानुसार आपको भेज दी जाती है। सभी सहायता पाठ्यक्रम शुल्क जमा करने के तीसरे माह से प्रारम्भ होता है।
    11. किसी भी प्रकार की सहायता - छात्रवृत्ति, सहायता व समाजिक सहायता प्राप्त करने के लिए फार्म के साथ एक फोटो, निवास पहचान पत्र, पहचान प्रमाण पत्र व सामाजिक सहायता की स्थिति में आवष्यक प्रमाण पत्र डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र (Postal Area Admission Centre - PAC) पर जमा करना अनिार्य है अन्यथा आपकी सुविधा तब तक रूकी रहेगी जब तक आप ये कागजात जमा नहीं करते।
    12. किसी भी विद्यार्थी द्वारा विज्ञापन व ब्लाॅग (Blog) के माध्यम से दिये गये परियोजना (Project), फिल्म स्क्रिप्ट(Film Script), पुरातन, विलक्षण एवं दुर्लभ सूचना (Antique, Unique & Rare Information), पुस्तक (Book), सामान्य (General) का जिम्मेदार वह विद्यार्थी स्वयं होगा और उससे उत्पन्न विवाद व व्यापार से कम्पनी का कोई सम्बन्ध नहीं होगा।
    13. आपके शारीरिक-आर्थिक-मानसिक विकास के लिए कम्पनी आपको, आपके बिना अनुमति के अन्य सुविधा उपलब्ध कराने का अधिकार सुरक्षित रखती है अर्थात कम्पनी आपको और भी सुविधा उपलब्ध कराती रहेगी, चाहे उसका उपयोग आप करें या न करें।
    14. किसी भी पंजीकृत विद्यार्थी का प्रवेश बिना कारण बताये निरस्त करने तथा नियमों व शर्तो में परिवर्तन का सर्वाधिकार कम्पनी के पास सुरक्षित है।
    15. किसी भी व्यापारिक विवाद की स्थिति में न्याय क्षेत्र वाराणसी (उ0प्र0) भारत तथा पाठ्य सामग्री में लिखित सामग्री से सम्बन्धित विवाद की स्थिति में न्याय क्षेत्र मीरजापुर (उ0प्र0) भारत होगा।

    प्रबन्ध निदेशक

  • क्लिक करें=>छात्रों के नाम खुला पत्र एवं हमारे विद्यार्थी की शक्ति सीमा
  • छात्रों के नाम खुला पत्र एवं हमारे विद्यार्थी की शक्ति सीमा

    प्रिय छात्रों व विद्यार्थीयों,
    हमारे दृष्टि में छात्र वे हैं जो किसी शैक्षणिक संस्थान के किसी शैक्षणिक पाठ्यक्रम में प्रवेश ले कर अध्ययन करतेे है। और विद्यार्थी वे हैं जो सदैव अपने ज्ञान व बुद्धि का विकास कर रहे हैं और उसके वे इच्छुक भी हैं। इस प्रकार सभी मनुष्य व जीव, जीवन पर्यन्त विद्यार्थी ही बने रहते हैं चाहे उसे वे स्वीकार करें या ना करें। जबकि छात्र जीवन पर्यन्त नहीं रहा जा सकता।
    कहा जाता है - ”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“, लेकिन कौन सी शक्ति? उसकी कौन सी दिशा? तोड़-फोड़, हड़ताल, या अनशन वाली या समाज व राष्ट्र को नई दिशा देने वाली? स्वामी विवेकानन्द को मानने व उनके चित्र लगाकर छात्र राजनीति द्वारा राष्ट्र को दिशा नहीं मिल सकती बल्कि उन्होंने क्या कहा और क्या किया था, उसे जानने और चिन्तन करने से राष्ट्र को दिशा मिल सकती है और ”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“ की बात सत्य हो सकती है। हम सभी ज्ञान युग और उसी ओर बढ़ते समय में हैं इसलिए केवल प्रमाण-पत्रों वाली शिक्षा से काम नहीं चलने वाला है।
    छात्रों की विवशता है कि उनके शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय जो पाठ्यक्रम तैयार करेगें वहीं पढ़ना है और छात्रों की यह प्रकृति भी है कि वही पढ़ना है जिसकी परीक्षा ली जाती हो। जिसकी परीक्षा न हो क्या वह पढ़ने योग्य नहीं है? बहुत बढ़ा प्रश्न उठता है। तब तो समाचार पत्र, पत्रिका, उपन्यास इत्यादि जो पाठ्क्रम के नहीं हैं उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय तो एक विशेष पाठ्यक्रम के लिए ही विशेष समय में परीक्षा लेते हैं परन्तु ये जिन्दगी तो जीवन भर आपकी परीक्षा हर समय लेती रहती है तो क्या जीवन का पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य नहीं है? परन्तु यह पाठ्यक्रम मिलेगा कहाँ? निश्चित रूप से ये पाठ्यक्रम अब से पहले उपलब्ध नहीं था लेकिन इस संघनित (Compact) होती दुनिया में ज्ञान को भी संघनित (Compact) कर पाठ्यक्रम बना दिया गया है। इस पाठ्यक्रम का नाम है - ”सत्य शिक्षा“ और आप तक पहुँचाने के कार्यक्रम का नाम है - ”पुनर्निर्माण-सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) यह वही पाठ्यक्रम है जोे मैकाले शिक्षा पाठ्यक्रम (वर्तमान शिक्षा) से मिलकर पूर्णता को प्राप्त होगा। इस पाठ्यक्रम का विषय वस्तु जड़ अर्थात सिद्धान्त सूत्र आधारित है न कि तनों-पत्तों अर्थात व्याख्या-कथा आधारित। जिसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- मैकेनिक जो मोटर बाईडिंग करता है यदि वह केवल इतना ही जानता हो कि कौन सा तार कहाँ जुड़ेगा जिससे मोटर कार्य करना प्रारम्भ कर दें, तो ऐसा मैकेनिक विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार नहीं कर सकता जबकि विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार केवल वही कर सकता है जो मोटर के मूल सिद्धान्त को जानता हो। ऐसी ही शिक्षा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेशदर्शिनी (Single Dimensional) होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी (Multi Dimensional) होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“
    यह शिक्षा आप तक पहुँचे और आपकी रूचि बनी रहे इसलिए इसमें पाठ्यक्रम के शुल्क के बदले छात्रवृत्ति व अन्य सहायता के साथ बहुत सी ऐसी सुविधा दी गईं है जो आपके शारीरिक-आर्थिक-मानसिक विकास व स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक है। ये सुविधा व सहायता हमारे विद्यार्थीयों को संतुष्टि, स्वतन्त्रता और शक्ति सम्पन्न बनाती है। जिससे वे जिस क्षेत्र में चाहे अपना मार्ग चुन सकते हैं। ”पुनर्निर्माण-सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) के विद्यार्थी बनते ही विद्यार्थी को निम्न शक्ति प्राप्त हो जाती है चाहे उसका उपयोग - प्रयोग करें या ना करें-
    1. हमारा विद्यार्थी सार्वभौम पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर मानसिक स्वतन्त्रता के मुख्यधारा के मार्ग पर चलते हुये शिक्षित, विचारशील, रचनात्मक और नेतृत्वशील बनेगा।
    2. हमारा विद्यार्थी ”सत्य शिक्षा“ का व्यापार करे या ना करे, दोनों स्थिति में छात्रवृत्ति और सहायता को प्राप्त करता रहेगा।
    3. हमारा कोई विद्यार्थी, हमारे से जुड़े 1. रेस्टूरेण्ट (Restaurants) 2. चिकित्सक (Doctors) 3. मेडिकल स्टोर (Medical Store) 4. दैनिक प्रयोग के दुकान (FMCG Store) 5. जैविक स्टोर (Organic Store) 6. हमारा विद्यार्थी (Our Student) या किसी भी डाक क्षेत्र प्रवेश केन्द्र से आवश्यकता पड़ने पर सप्ताह में 1 बार और अधिकतम रू0 500.00 की नगद राशि या सेवा या वस्तु प्राप्त कर सकता है जो लेने वाले के छात्रवृत्ति से समायोजित हो जाती है।
    4. हमारा विद्यार्थी, यदि किसी भी प्रकार का व्यापार या समाजसेवा इत्यादि से है तो वह अपना विज्ञापन देकर अपने जिला क्षेत्र तक आसानी से पहुँच सकता है।
    5. हमारा विद्यार्थी, अपने व्यवसाय और स्थान के अनुसार पूरे देश के अन्य विद्यार्थी से सम्पर्क कर सकता है और वर्गीकृत विज्ञापन में सूचीबद्ध हो सकता है।
    7. हमारा विद्यार्थी, ब्लाॅग (Blog) के माध्यम से अपने किसी परियोजना (Project) फिल्म स्क्रिप्ट (Film Script) पुरातन, विलक्षण एवं दुर्लभ सूचना (Antique, Unique & Rare Information) पुस्तक (Book) सामान्य (General) को पूरे देश के सामने ला सकता है और लोगों के सम्पर्क में आ सकता है।
    8. हमारा विद्यार्थी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक स्थिति से स्वतन्त्र होकर पूरे भारत देश में भ्रमण कर सकता है।

     

    जय छात्र शक्ति, जय राष्ट्र शक्ति

    मानने से, मानने वाले का कोई कल्याण नहीं होता,
    कल्याण तो सिर्फ जानने वालों का ही होता रहा है, होता है और होता रहेगा।

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