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    सत्य एकीकरण भाग-1

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  • RENEW HUMAN           RENEW INDIA                RENEW WORLD

     भारत सरकार के साथ लेकिन सरकार की सोच से हमेशा आगे

    आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण,

    पूर्ण मानव निर्माण व भारत को जगत गुरू बनाने की योजना है - पुनर्निर्माण


    नया, पुराना और वर्तमान

    जिस प्रकार वाहन-कार का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया, पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है परन्तु हैं सभी कार। इसी प्रकार सत्य का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है। परन्तु हैं सभी सत्य। जिस प्रकार वाहन ”कार“ वर्तमान है उसी प्रकार सत्य भी वर्तमान है सिर्फ उसके व्यवहार में लाने के लिए संस्करण नवीन हो रहे है। नवीन संस्करण की पहचान तभी हो सकती है जब पुराने संस्करण की पहचान हो और उसका ज्ञान हो। अन्यथा वह सब पुराना ही लगेगा या नया ही लगेगा। नवीन संस्करण अधिक व्यावहारिक होता है। इसलिए वह अधिक क्रिया-प्रतिक्रियापूर्ण होता है और यदि क्रिया-प्रतिक्रिया पूर्ण नहीं है तो उसके दो कारण होगें। पहला नवीनत्व के पहचानने का अभाव या दूसरा वह संस्करण नवीन ही नहीं है ”कार“ हो या ”सत्य“ उसका नवीन संस्करण तब तक आता रहेगा जब तक कि वह पूर्ण विकसित और व्यावहारिक रूप को प्राप्त नहीं कर लेता। और सिर्फ वही संस्करण स्थिरता और व्यवहार में रहेगा जो पूर्ण व्यावहारिक और विकसित होगा। शेष विकास के क्रम के इतिहास के रूप में जाने जायेंगे। ऐसा ही होता हैं।

    - श्री लव कुश सिंह विश्वमानव

    रचनाकर्ता - लक्ष्य पुनर्निर्माण व उसकी प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम व कार्य योजना

    आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी

    दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न


     

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  • लव कुश सिंह विश्वमानव (16 अक्टुबर 1967 -)


      

                          आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी

                                    अगला दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान  - ”भारत रत्न“

     परिचय - अपने विशेष कला के साथ जन्म लेने वाले व्यक्तियों के जन्म माह अक्टुबर के सोमवार, 16 अक्टुबर 1967 (आश्विन, शुक्ल पक्ष-त्रयोदशी, रेवती नक्षत्र) समय 02.15 ए.एम. बजे को रिफाइनरी टाउनशिप अस्पताल (सरकारी अस्पताल), बेगूसराय (बिहार) में श्री लव कुश सिंह का जन्म हुआ और टाउनशिप के E1-53, E2-53, D2F-76, D2F-45 और साइट कालोनी के D-58, C-45 में रहें। इनकी माता का नाम श्रीमती चमेली देवी तथा पिता का नाम श्री धीरज नारायण सिंह जो इण्डियन आॅयल कार्पारेशन लि0 (आई.ओ.सी. लि.) के बरौनी रिफाइनरी में कार्यरत थे और उत्पादन अभियंता के पद से सन् 1995 में स्वैच्छिक सेवानिवृत हो चुके हंै। जो कि ग्राम - नियामतपुर कलाँ, पुरूषोत्तमपुर, मीरजापुर (उ0प्र0) पिन-231305 के निवासी हैं। दादा का नाम स्व. राजाराम व दादी का नाम श्रीमती दौलती देवी था। जन्म के समय दादा स्वर्गवासी हो चुके थे जो कभी कश्मीर के राजघराने में कुछ समय के लिए सेवारत भी थे। मार्च सन् 1991 में इनका विवाह चुनार क्षेत्र के धनैता (मझरा) ग्राम में शिव कुमारी देवी से हुआ और जनवरी सन् 1994 में पुत्र का जन्म हुआ। मई सन् 1994 में शिव कुमारी देवी की मृत्यु होने के उपरान्त वे लगभग घर की जिम्मेदारीयों से मुक्त रह कर भारत देश में भ्रमण करते हुये चितन व विश्वशास्त्र के संकलन कार्य में लग गये। किसी भी व्यक्ति का नाम उसके अबोध अवस्था में ही रखा जाता है अर्थात व्यक्ति का प्रथम नाम प्रकृति प्रदत्त ही होता है। लव कुश सिंह नाम उनकी दादी स्व0 श्रीमती दौलती देवी के द्वारा उन्हें प्राप्त हुआ। 
    भारत देश के ग्रामीण क्षेत्र से एक सामान्य नागरिक के रूप में सामान्य से दिखने वाले श्री लव कुश सिंह एक अद्भुत नाम-रूप-गुण-कर्म के महासंगम हैं जिसकी पुनरावृत्ति असम्भव है। (क्लिक करें-विस्तार से जानने के लिए देखें। इनकी प्राइमरी शिक्षा न्यू प्राइमरी स्कूल, रिफाइनरी टाउनशिप, बेगूसराय (बिहार), माधव विद्या मन्दिर इण्टरमीडिएट कालेज, पुरूषोत्तमपुर, मीरजापुर, उ0प्र0 (दसवीं -1981, 13 वर्ष 6 माह में), प्रभु नारायण राजकीय इण्टर कालेज, रामनगर, वाराणसी, उ0प्र0 (बारहवीं-1983, 15 वर्ष 6 माह में) और बी.एससी. (जीव विज्ञान) में 17 वर्ष 6 माह के उम्र में सन् 1985 ई0 में तत्कालिन गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध श्री हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, वाराणसी से पूर्ण हुई। तकनीकी शिक्षा में कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग एण्ड सिस्टम एनालिसिस में स्नातकोत्तर डिप्लोमा इण्डिया एजुकेशन सेन्टर, एम-92, कनाॅट प्लेस, नई दिल्ली से सन् 1988 में पूर्ण हुई। परन्तु जिसका कोई प्रमाण पत्र नहीं है वह ज्ञान अद्भुत है। अपने तीन भाई-बहनों व एक पुत्र में वे सबसे बड़े व सबसे कम प्रमाणित शिक्षा प्राप्त हैं। एक अजीब पारिवारिक स्थिति यह है कि प्रारम्भ निरक्षर माँ से होकर अन्त ”विश्वशास्त्र“ को व्यक्त करने वाले श्री लव कुश सिंह तक एक ही परिवार में है।
    सभी धर्मशास्त्रों और भविष्यवक्ताओं के अनुसार और सभी को सत्य रूप में वर्तमान करने के लिए ”विश्वशास्त्र“ को व्यक्त करने वाले श्री लव कुश सिंह समय रूप से संसार के सर्वप्रथम वर्तमान में रहने वाले व्यक्ति हैं क्यूँकि वर्तमान की परिभाषा है-पूर्ण ज्ञान से युक्त होना और कार्यशैली की परिभाषा है-भूतकाल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकतानुसार पूर्णज्ञान और परिणाम ज्ञान से युक्त होकर वर्तमान समय में कार्य करना। स्वयं को आत्म ज्ञान होने पर प्रकृति प्रदत्त नाम के अलावा व्यक्ति अपने मन स्तर का निर्धारण कर एक नाम स्वयं रख लेता है। जिस प्रकार ”कृष्ण“ नाम है ”योगेश्वर“ मन की अवस्था है, ”गदाधर“ नाम है ”रामकृष्ण परमहंस“ मन की अवस्था है, ”सिद्धार्थ“ नाम है ”बुद्ध“ मन की अवस्था है, ”नरेन्द्र नाथ दत्त“ नाम है ”स्वामी विवेकानन्द“ मन की अवस्था है, ”रजनीश“ नाम है ”ओशो“ मन की अवस्था है। उसी प्रकार लव कुश सिंह ने अपने नाम के साथ ”विश्वमानव“ लागाकर मन की अवस्था को व्यक्त किया है और उसे सिद्ध भी किया है। व्यक्तियों के नाम, नाम है ”भोगेश्वर विश्वमानव“ उसकी चरम विकसित, सर्वोच्च और अन्तिम अवस्था है जहाँ समय की धारा में चलते-चलते मनुष्य वहाँ विवशतावश पहुँचेगा ऐसा उनका मानना है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण के जन्म से पहले ही ईश्वरत्व उन पर झोंक दिया गया था अर्थात जन्म लेने वाला देवकी का आठवाँ पुत्र ईश्वर ही होगा, यह श्रीकृष्ण को ज्ञात होने पर जीवनभर वे जनभावना को उस ईश्वरत्व के प्रति विश्वास बनाये रखने के लिए संघर्ष करते रहे, उसी प्रकार इस लव कुश का नाम उन्हें ज्ञात होने पर वें भी इसे सिद्ध करने के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहे जिसका परिणाम आपके समक्ष है। 
    श्री लव कुश सिंह “विश्वमानव” ने कभी किसी पद पर सरकारी नौकरी नहीं की इस सम्बन्ध में उनका कहना था कि - “नौकरी करता तो यह नहीं कर पाता। पद पर रहता तो केवल पद से सम्बन्धित ही विशेषज्ञता आ पाती। वैसे भी पत्र-व्यवहार या पुस्तक का सम्बन्ध ज्ञान और विचार से होता हैं उसमें व्यक्ति के शरीर से क्या मतलब? क्या कोई लंगड़ा या अंधा होगा तो उसका ज्ञान-विचार भी लंगड़ा या अंधा होगा? क्या कोई किसी पद पर न हो तो उसकी सत्य बात गलत मानी जायेगी? विचारणीय विषय है। परन्तु इतना तो जानता हूँ कि यह आविष्कार यदि सीधे-सीधे प्रस्तुत कर दिया जाता तो सभी लोग यही कहते कि इसकी प्रमाणिकता क्या है? फिर मेरे लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि मैं न तो बहुत ही अधिक शिक्षा ग्रहण किया था, न ही किसी विश्वविद्यालय का उच्चस्तर का शोधकत्र्ता था। परिणामस्वरूप मैंने ऐसे पद ”कल्कि अवतार“ को चुना जो समाज ने पहले से ही निर्धारित कर रखा था और पद तथा आविष्कार के लिए व्यापक आधार दिया जिसे समाज और राज्य पहले से मानता और जानता है।”
    भारत अपने शारीरिक स्वतन्त्रता व संविधान के लागू होने के उपरान्त वर्तमान समय में जिस कत्र्तव्य और दायित्व का बोध कर रहा है। भारतीय संसद अर्थात विश्वमन संसद जिस सार्वभौम सत्य या सार्वजनिक सत्य की खोज करने के लिए लोकतन्त्र के रूप में व्यक्त हुआ है। जिससे स्वस्थ लोकतंत्र, समाज स्वस्थ, उद्योेग और पूर्ण मानव की प्राप्ति हो सकती है, उस ज्ञान से युक्त विश्वात्मा श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ वैश्विक व राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के सर्वाेच्च और अन्तिम प्रतीक के रूप मंे व्यक्त हंै।
    निःशब्द, आश्चर्य, चमत्कार, अविश्वसनीय, प्रकाशमय इत्यादि ऐसे ही शब्द उनके और उनके शास्त्र के लिए व्यक्त हो सकते हैं। विश्व के हजारो विश्वविद्यालय जिस पूर्ण सकारात्मक एवम् एकीकरण के विश्वस्तरीय शोध को न कर पाये, वह एक ही व्यक्ति ने पूर्ण कर दिखाया हो उसे कैसे-कैसे शब्दों से व्यक्त किया जाये, यह सोच पाना और उसे व्यक्त कर पाना निःशब्द होने के सिवाय कुछ नहीं है।
    इस शास्त्र के शास्त्राकार श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ अपने परिचितों से केवल सदैव इतना ही कहते रहे कि- ”कुछ अच्छा किया जा रहा है“ के अलावा बहुत अधिक व्याख्या उन्होंने कभी नहीं की। और अन्त में कभी भी बिना इस शास्त्र की एक भी झलक दिखाये एकाएक यह शास्त्र प्रस्तुत कर दिया जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है। जो इस स्तर पर है कि - “विश्व बुद्धि बनाम एकल बुद्धि”। और उसका परिणाम ये है कि भारत को वर्तमान काल में विश्वगुरू और संयुक्त राष्ट्र संघ तक के लिए सार्वभौम सत्य-सैद्धान्तिक स्थापना योग्य मार्गदर्शन अभी ही उपलब्ध हो चुका है जिससे भारत जब चाहे तब उसका उपयोग कर सके।
    जो व्यक्ति कभी किसी वर्तमान गुरू के शरणागत होने की आवश्यकता न समझा, जिसका कोई शरीरधारी प्रेरणा स्रोत न हो, किसी धार्मिक व राजनीतिक समूह का सदस्य न हो, इस कार्य से सम्बन्धित कभी सार्वजनिक रूप से समाज में व्यक्त न हुआ हो, जिस विषय का आविष्कार किया गया, वह उसके जीवन का शैक्षणिक विषय न रहा हो, 48 वर्ष के अपने वर्तमान अवस्था तक एक साथ कभी भी 48 लोगों से भी न मिला हो, यहाँ तक कि उसको इस रूप में 48 आदमी भी न जानते हों, यदि जानते भी हो तो पहचानते न हों और जो पहचानते हों वे इस रूप को जानते न हों, वह अचानक इस शास्त्र को प्रस्तुत कर दें तो इससे बडा चमत्कार क्या हो सकता है।
    जिस व्यक्ति का जीवन, शैक्षणिक योग्यता और कर्मरूप शास्त्र तीनों का कोई सम्बन्ध न हो अर्थात तीनों तीन व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हों, इससे बड़ी अविश्वसनीय स्थिति क्या हो सकती है।
    मूल पाशुपत शैव दर्शन सहित अनेक मतों का सफल एकीकरण के स्वरूप श्री लव कुश सिह “विश्वमानव” के जीवन, कर्म और ज्ञान के अनेक दिशाओं से देखने पर अनेक दार्शनिक, संस्थापक, संत, ऋषि, अवतार, मनु, व्यास, व्यापारी, रचनाकर्ता, नेता, समाज निर्माता, शिक्षाविद्, दूरदर्शिता इत्यादि अनेक रूप दिखते हैं जिसे निम्न पर क्लिक कर विस्तार से जाना जा सकता है-

    (क्लिक करें-विस्तार से जानने के लिए देखें।

     

  • क्लिक करें=>ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास
  • ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास

    विभिन्न मतों या विचारों का अन्त और मूल एक का विचार है। इस एक का विचार से हम सभी और ऊपर नहीं जा सकते। इस एक को वेदान्त में अद्वैत या अव्यक्त एकेश्वर कहा गया और उसी का प्रत्येक में प्रकाश अर्थात् बहुरुप में प्रकाशित एक सत्ता आत्मसात् किया गया, जो अदृश्य आध्यात्म विज्ञान ही नहीं वर्तमान के दृश्य पदार्थ विज्ञान के नवीनतम अविष्कार के फलस्वरुप सिद्ध हो चुका है। इसी एक अदृश्य सत्य को शिव या आत्मा या ईश्वर या ब्रह्म या भगवान कहा गया तथा उसके अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य गुण और दृश्य सार्वजनिक प्रमाणित सिद्धान्त को दृश्य गुण कहा गया। जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की बहुरुप में प्रकाशित एक सत्ता है। उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसका अदृश्य और दृश्य गुण का एक ही सिद्धान्त व्याप्त है। सिद्ध अर्थात् प्रमाणित विषयों और नियमों का अन्त ही सिद्धान्त है। जब अदृश्य आध्यात्म विज्ञान की ओर से सिद्ध विषयों और नियमों को व्यक्त करते हुए एक की ओर जाते हैं, तब वह अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित सिद्धान्त तथा जब दृश्य पदार्थ विज्ञान की ओर से सिद्ध विषयों और नियमों को व्यक्त करते हुये उस एक की ओर जाते हैं, तब वह दृश्य सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय प्रमाणित सिद्धान्त कहलाता है। आध्यात्म की ओर से उस एक तक पहुँचने के बाद सिर्फ ज्ञान और वाणी रुप ही व्यक्त हो पाता है। और वह ”सभी एक ही हैं“, ”बहुरुप में प्रकाशित एक सत्ता“, ”समस्त विश्व एक परिवार है“, ”विश्व-बन्धुत्व“, ”बसुधैव-कुटुम्बकम्“, ”बहुजन हिताय बहुजन सुखाय“, ”एक आत्मा के ही तुम प्रकाश हो“, ”आपस में प्रेम से रहो“, ”एकात्म मानवतावाद“ इत्यादि सत्य शब्द व्यक्त होते हैं, लेकिन यह व्यवहारिक नहीं हो पाते क्योंकि ये ज्ञान का एक फल है, ज्ञान का बीज नहीं जिससे प्रत्येक व्यक्ति इसके महत्व को समझ सके। परिणामस्वरुप ये व्यावहारिक नहीं बन पाते। इसे व्यावहारिकता में लाने के लिए ज्ञान का बीज अर्थात् दृश्य ज्ञान और कर्म ज्ञान अर्थात् सार्वजनिक प्रमाणित एकात्म कर्म-सिद्धान्त की आवश्यकता पड़ती है। ये सार्वजनिक प्रमाणित सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त ही ईश्वर है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसको आविष्कृत करने वाले ऋषि या अवतार हैं और इसके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नियमित करने वाला ब्राह्मण है। इसी सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय प्रमाणित अदृश्य सिद्धान्त को दृश्य करने के लिए समय-समय पर उपयुक्त वातावरण मिलने पर यह सिद्धान्त, सिद्धान्तानुसार ही मानव शरीर धारण, जीवन, कर्म, ज्ञान, ध्यान और सिद्धान्त को व्यक्त करता है। जब तक की वह सिद्धान्त स्वयं को पूर्ण रुप में व्यक्त न कर ले। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि जिस प्रकार साधारण मानव अपनी इच्छा के लिए कर्म कर व्यक्त होता है उसी प्रकार सिद्धान्त स्वयं की इच्छा से स्वयं को व्यक्त करने के लिए कर्म कर व्यक्त होता है। वह शरीर जिसमें ईश्वर या सिद्धान्त का अवतरण होता है उसे ईश्वर का सगुण-साकार-दृश्य रुप कहा जाता है। परन्तु किसी भी स्थिति में शरीर ईश्वर नहीं होेता है क्योंकि प्रत्येक मानव शरीर सिद्धान्तानुसार ही व्यक्त होता है जो सिद्धान्त के ज्ञान से युक्त हो जाते है वे आत्म प्रकाश में होकर सफल जीवन व्यतीत करते हैं जो अज्ञान में रहते हैं वे अपने संकीर्ण ज्ञान व विचार के कारण सीमित चक्र में उलझकर रह जाते हैं। यहीं ज्ञान, कर्म ज्ञान या सत्य-सिद्धान्त की उपयोगिता है।    
    शिव-आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म के गुण सिद्धान्त के अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित से दृश्य सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय प्रमाणित करने के क्रम में तीन गुणों के कर्मों से युक्त हो संक्रमणीय, संग्रहणीय, गुणात्मक रुप से गुजरना पड़ता है वे हैं- एकात्म कर्म, एकात्म ज्ञान और एकात्म ध्यान। चूँकि एकात्म कर्म के बिना एकात्म-ज्ञान का जन्म नहीं होता इसलिए अदृश्य सिद्धान्त से प्रथमतया एकात्म कर्म का अवतरण होता है। पुनः एकात्म कर्म से एकात्म ज्ञान का अवतरण होता है। चूँकि एकात्म-ज्ञान बिना एकात्म-कर्म के सार्वजनिक प्रमाणित नहीं होता। इसलिए एकात्म-ज्ञान और एकात्म कर्म का संयुक्त अवतरण होता है। चूँकि एकात्म-ज्ञान और एकात्म-कर्म सार्वजनिक रुप से प्रमाणित हैं। जो आगे समाज के विकसित हो जाने पर व्यक्तिगत प्रमाणित में ही परिवर्तित हो जाता है। इसलिए सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय रुप से प्रमाणित होने के लिये दृश्य सिद्धान्त संयुक्त रुप से- एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म और एकातम-ध्यान से युक्त हो पूर्ण अवतरित हो जाता है। ब्रह्माण्डीय या सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य सिद्धान्त के अवतरण के लिए ब्रह्माण्डीय एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म और एकात्म- ध्यान की आवश्यकता होती है। इन अवतारों के बीच मूल गुणों के अंशावतार भी होते हैं। 
    उपरोक्त सम्पूर्ण दृश्य व्यक्त होने की क्रिया को ही व्यावहारिक रुप से समझने के लिए पुराणों में ब्रह्मा को एकात्म-ज्ञान से, विष्णु को एकात्म-ज्ञान सहित एकात्म-कर्म से तथा शिव-शंकर को एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म सहित एकात्म-ध्यान से प्रक्षेपित किया गया है। तथा सर्वप्रथम अदृश्य शिव-शंकर (एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म, एकात्म-ध्यान) से विष्णु (एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म), फिर विष्णु (एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म) से ब्रह्मा (एकात्म-ज्ञान) को बहिर्गत अर्थात् ब्रह्मा (एकात्म-ज्ञान) को विष्णु (एकात्म-कर्म, एकात्म-ज्ञान) में और विष्णु (एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म) को शिव-शंकर (एकात्म-कर्म, एकात्म-ज्ञान, एकात्म-ध्यान) में समाहित या समर्पित होते दिखाया गया है। यदि सिर्फ एकात्म-कर्म या एकात्म-ज्ञान में से एक से युक्त कोई अवतरित शरीर है तो उसे विष्णु का अंशावतार समझना चाहिए। यदि सिर्फ एकात्म-ज्ञान और एकात्म-ध्यान या एकात्म-कर्म और एकात्म-ध्यान में से एक से युक्त कोई अवतरित शरीर है तो उसे शिव-शंकर का अंशावतार समझना चाहिए। यदि कोई सिर्फ एकात्म-ध्यान से युक्त अवतरित शरीर है तो उसे शंकर का पूर्णावतार न कि शिव-शंकर का पूर्णावतार समझना चाहिए। चूँकि ब्रह्माण्डीय रुप से निराकार शिव एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म और एकात्म-ध्यान से ही प्रमाणित किये जा सकते हैं इसलिए एकात्म ध्यान के देवता शंकर को ही पुराणों में शिव-शंकर, महादेव, त्रिनेत्र आदि से सर्वोच्च सम्बोधन किया गया है। सिर्फ शिव-शंकर में ही ब्रह्मा और विष्णु समाहित और समर्पित हैं न कि शंकर में। अर्थात् जब विष्णु सक्रिय होते हैं तो ब्रह्मा निष्क्रिय हो जाते हैं और जब शिव-शंकर सक्रिय होते हैं तब विष्णु निष्क्रिय हो जाते हैं और जब शिव-शंकर निष्क्रिय  हो जाते हैं तब समझना चाहिए कि विनाश नजदीक आ रहा है। 
    एकात्म का अर्थ कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रुप से अपनी आत्मा के लिए न समझे, यह समझना एक समय सत्य हो सकता है जब उसमें मन या इच्छा का पूर्ण अभाव हो। इसका सही अर्थ सम्पूर्ण मानव जाति सहित ब्रह्माण्डीय रुप से स्वीकार्य सभी में व्याप्त उस आत्मा से है। इस प्रकार एकात्म ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त विवादमुक्त, एकीकृत, स्वीकृत, सामान्यीकृत ज्ञान से है। एकात्म कर्म का अर्थ एकात्म ज्ञान पर आधारित एकीकृत, स्वीकृत, सामान्याकृत विवादमुक्त रचनात्मक कर्म से है। इसी प्रकार एकात्म ध्यान का अर्थ उस काल चिन्तन से है जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सहित मानव जाति समर्पित, स्वीकृत, एकीकृत, विवादमुक्त होने के लिए विवशता संकट बन जाये। 
    जब बहुरुप में प्रकाशित एक सत्ता है तब प्रत्येक ही व्यक्तिगत रुप से शिव-आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म का अवतार है। अर्थात् प्रत्येक में व्यक्तिगत आत्मा रुप से ज्ञान, कर्म और ध्यान है। मूल गुणों में प्रथम प्रत्येक ही व्यक्तिगत रुप से ब्रह्मा अर्थात् एकातम ज्ञान का अवतार है, इसलिए प्रत्येक को व्यक्तिगत रुप से ”मैं ही ब्रह्म हूँ“ कहने का सत्य अधिकार है परन्तु यह न तो सामाजिक और न ही सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय रुप से प्रमाणित है। क्योंकि इसके लिए सामाजिक या ब्रह्माण्डीय एकात्म ज्ञान चाहिए। द्वितीय- प्रत्येक ही व्यक्तिगत रुप से एकात्म-कर्म अर्थात् विष्णु का अवतार है। इसलिए प्रत्येक को व्यक्तिगत रुप से ”मैं ही विष्णु हूँ“ कहने का सत्य अधिकार है। परन्तु यह न तो सामाजिक और न ही सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय रुप से प्रमाणित है। क्योंकि इसके लिए सामाजिक या ब्रह्माण्डीय एकात्म-ज्ञान और एकात्म-कर्म चाहिए। तृतीय- प्रत्येक ही व्यक्तिगत रुप से एकात्म-ध्यान अर्थात् शंकर का अवतार है, इसलिए प्रत्येक को व्यक्तिगत रुप से ”मैं शंकर हूँ“ कहने का सत्य अधिकार है। परन्तु यह न तो सामाजिक और न ही सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय रुप से प्रमाणित है। क्योंकि इसके लिए सामाजिक या ब्रह्माण्डीय एकात्म-ध्यान अर्थात् काल चिन्तन चाहिए। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के सभी अवतार शिव-ईश्वर-आत्मा-ब्रह्म के व्यक्तिगत रुप से अवतार हैं। इसलिए प्रत्येक को व्यक्तिगत रुप से ”मैं ही शिव हूँ“ या ”मैं ही आत्मा हूँ“ या ”मैं ही ईश्वर हूँ“ कहने का सत्य अधिकार है। परन्तु यह न तो सामाजिक और न ही सार्वजनिक या ब्रह्माण्डीय रुप से प्रमाणित है। क्योंकि इसके लिए संयुक्त रुप से ब्रह्माण्डीय या सार्वजनिक एकात्म-ज्ञान, एकात्म-कर्म और एकात्म ध्यान चाहिए। और दृश्य रुप कांे प्रमाणित करने के लिए ब्रह्माण्डीय या सार्वजनिक प्रमाणित सर्ववयापी दृश्य सिद्धान्त चाहिए। उसके उपरान्त ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शिवमय हो ”सभी शिव हैं“, ”सभी शंकर हैं“, ”सभी विष्णु हैं“, ”सभी ईश्वर हैं“, ”सभी आत्मा हैं“ प्रमाणित हो जाता है। 
  • क्लिक करें=>बुड्ढा कृष्ण - कृष्ण का भाग दो और अन्तिम - 1
  •  कृष्ण का भाग-दो और अन्तिम कड़ी: बुड्ढा कृष्ण


    5 दिसम्बर, 2011 को लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ हस्तिनापुर (मेरठ, उ0 प्र0) गये थें। वे वहाँ के किले के खण्डहर में घंटों घूमते रहे। वहाँ से लौटने के बाद वे अपने निवास पर आकर निम्न दिव्य सत्य अनुभूति को पंक्तिबद्ध किये।

    दिव्य सत्य अनुुभूति- 

    आओ कृष्ण मैं जानती थी कि तुम आओगे, इसलिए ही तो हजारो वर्षो से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ। मैं जानती थी कि जिस व्यक्ति का सम्पूर्ण ध्यान सदैव हस्तिनापुर में ही रमता था, जिसके समस्त लक्ष्यों की केन्द्र बिन्दू थी, वह हस्तिनापुर जरूर आयेगा। - द्रौपदी ने कहा।
    हाँ सखी मैं आ गया, किसी को दिया हुआ वचन मैं कैसे भूल सकता हूँ? मैंने तुम्हें वचन दिया था कि इतिहास तुम्हें चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु भविष्य तुम्हें नारी आदर्श के सर्वोच्च शिखर पर देखेगा, जिसके आगे सम्पूर्ण संसार की नारीयाँ तुम्हारें अंश रूप में जानी जायेंगी। - मैंने कहा।
    एक लक्ष्य से दूसरे बड़े लक्ष्य की ओर मन को स्थित कर देने का स्वभाव आज भी तुममे है। - द्रौपदी ने कहा।
    सखी, यह जीवन ही ऐसा है। जहाँ से मृत्यु होती है फिर वहीं से पूर्णता के लिए अगले लक्ष्य के लिए जीवन आरम्भ होता है और यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि वह पूर्ण होकर मुझमें विलीन होकर मुझ जैसा नहीं हो जाता। देखो, ये मेरे सफेद हुए बाल, ये मेरे आँखों में आँसू, मेरा अकेलापन और मेरा अधूरापन। महाभारत युद्ध के बाद मैं बिल्कुल अकेला हो चुका था, न कोई लक्ष्य, न कौरवों की आवश्यकता, न पाण्डवों की आवश्यकता। जिस अवस्था में मैं तुम्हे छोड़कर गया था, अब यह संसार मुझें वहीं से आगे की ओर बढ़ते हुये देखेगा। - मैंने कहा।
    सखी, मेरे बाल रूप को, मेरे युवा रूप को, मेरे प्रेम रूप को, मेरे गीता उपदेश को यह संसार समझने लगा है। मैं सिर्फ अपना बचा शेष कार्य पूर्ण करने आया हूँ। ”नव मनुष्य और सृष्टि निर्माण“, जिसमें अब न तो पाण्डवों की आवश्यकता है न ही कौरवों की। अब तो न पाण्डव हैं न ही कौरव हैं, वे तो पिछले समय में ही मुक्त हो चुके। अब तो पाण्डव व कौरव एक ही शरीर में विद्यमान हैं। जिस किसी को देखो वह कुछ समय पाण्डव रूप में दिखता है तो अगले समय में वही कौरव रूप में दिखने लगता है। फिर वही पाण्डव रूप में दिखने लगता है। सब कुछ विवशता वश एकीकरण की ओर बढ़ रहा है। अब युद्ध कहाँ, अब तो उस एकीकरण के मार्ग को दिखाना मात्र मेरा शेष कार्य हैं। और इस कार्य में मैं बिल्कुल अकेला, निःसंग, न कोई मेरे लिए जीवन की कामना करने वाला, न ही कोई मेरी मृत्यु की कामना करने वाला, न ही मुझसे मिलने की चेष्टा करने वाला, न ही मुझसे कुछ सुनने वाला, न मुझे कुछ सुनाने वाला और न ही गोपीयाँ हैं। दर असल मैं मृत ही पैदा ही हुआ था, एक मरा हुआ जीवित मनुष्य, यही मेरा इस जीवन का रूप था। और मेरे इस जीवन को संसार बुढ़े कृष्ण के रूप में याद करेगा जो मुझ परमात्मा के पूर्ण कार्य का भाग दो होगा, जिसे लोगों ने देख व जान नहीं पाया था। आज मैं बहुत कुछ बताना चाहता हूँ सखी क्योंकि तुम्हारे सिवा मुझे कौन सुनता ही था और कौन समझता ही था, और कौन विश्वास ही करता था। - मैं बोलता जा रहा था।
    सखी, अब गोपीयाँ भी मेरे साथ नहीं, क्योंकि अब उन्हें हृदय से निकली उस वंशी की मधुर तान समझ में नहीं आती, न ही उस पर सारे बंधनों को तोड़कर नाचना आता है। जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति में प्रकृति नाचती है, उसी प्रकार अब तो मनुष्यों ने आत्मा के स्थान पर करेंसी (मुद्रा) बना लिया है जिसकी उपस्थिति में ही ये आधुनिक प्रकृति के अंश रूपी गोपीयाँ नाचती है। और इसलिए ही ये भोग की वस्तु बनती जा रही हैं। इसके जिम्मेदार भी वे स्वयं ही है। सखी स्त्री हो या पुरूष सभी को सार्वभौम आत्मा से जुड़कर हृदय और बुद्धि के तल पर ही जीना चाहिए। शरीर और आवश्यकता के तल पर जीने से भोग ही होता है, समभोग नहीं। सार्वभौम आत्मा से जुड़कर हृदय और बुद्धि के तल पर जीने से शरीर की स्वस्थता और दीर्घायु भी प्राप्त होती है। 
    परन्तु तुम तो पूर्ण थें, फिर भी तुम मुक्त नहीं हुये। -द्रौपदी ने कहा।
    सखी, मैं मुक्त कहाँ हो पाया। मुक्त तो वे लोग हुये जिनकी इच्छायें पूर्ण हुईं। तुम्हारी भी इच्छा पूर्ण नहीं हो पायी इसलिए तुम भी मुक्त नहीं हो पायी और मेरी भी इच्छा पूर्ण नहीं हुई इसलिए मैं भी मुक्त नहीं हो पाया। मेरे शरीर त्यागने के समय तुम मेरे पास थी और मैं चाहकर भी तुमसे नहीं बताया कि मेरी इच्छा क्या थी क्योंकि इससे तुम्हें दुःख होता। मैं पूर्ण परमात्मा पूर्णावतार सृष्टि करने के उद्देश्य से धरती पर अवतरित हुआ था। सखी, पूर्ण होने के बावजूद भी जब परमात्मा शरीर में होता है तब वह भी अन्य मनुष्य और प्रकृति द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों से भी विवश हो जाता है। उस समय मेरे सामने दो स्थितियाँ ऐसी आयी, जिसके आगे मैं विवश हुआ और मै पूर्ण होते हुये भी अपूर्ण हो गया, फलस्वरूप मुझे फिर आना पड़ा। पहला, मेरा अनुमान था कि महाभारत युद्ध शीघ्र ही समाप्त हो जायेगा और समस्या हल हो जायेगी। फिर मैं दोनों पक्षों के साथ मिल-मिलाकर, ज्ञान, कर्मज्ञान की शिक्षा से नव मनुष्य व सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारम्भ करूँगा। परन्तु हो गया इसका उल्टा, महाविनाश। फिर मैं किसे शिक्षा देता। दूसरा, यह कि जो शिक्षा मुझे युद्ध के उपरान्त देनी थी, वह योद्धा अर्जुन के युद्ध क्षेत्र में शस्त्र रख देने के कारण मुझे ज्ञान, कर्मज्ञान में से अधूरी शिक्षा केवल ज्ञान को अर्जुन को देने पड़े शेष कर्मज्ञान की शिक्षा के लिए कोई शेष योग्य बचा ही नहीं। सखी, ”गीता“ में मैंने सिर्फ इतना ही तो बताया था कि प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम से मुक्त होकर ही मुझ परमात्मा को जाना जा सकता है। अब ”विश्वशास्त्र“ से मैं ये बताने आया हूँ कि परमात्मा को जान लेने के बाद संसार में कर्म कैसे किया जाता है, जो परमात्मा द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में क्रियाशील है। यही कर्मज्ञान है और जो कुछ भी मैंने गीता में कहा था उसका दृश्य रूप है। - मैं बोलता गया।
    तुम नहीं जानती सखी, ये स्थिति मेेरे लिए कितनी विवशतापूर्ण थी। क्या पितामह भीष्म ज्ञानी नहीं थे, क्या गुरू द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महाराज धृतराष्ट्र, शकुनि, कर्ण ज्ञानी नहीं थे। सब ज्ञानी थे परन्तु सभी, मनुष्य और प्रकृति द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों से विवश थे। सखी, युद्ध में योद्धा को कभी भी हृदय की नहीं सुननी चाहिए। तुम्हारा पति और मेरा सखा ही नहीं बल्कि अर्जुन मेरी बहन सुभद्रा का पति था, और युद्ध क्षेत्र में मैं उसका सारथी भी था। यह सब इसलिए ही हुआ था क्योंकि मैं अर्जुन के हृदय को जानता था और युद्ध की अनिवार्यता को भी, फिर भी वह युद्ध क्षेत्र में शस्त्र रखकर मुझे विवश कर दिया, और मुझे अपनी सारी ज्ञान शक्ति उस पर खर्च करनी पड़ी जो मेरी योजना थी ही नहीं। यह ज्ञान शक्ति भी मैंने उसे अकेले में ले जाकर इसलिए कहा क्योंकि अन्य कोई उसे भ्रमित न कर सके।- मैंने कहा।
    सखा, अगर फिर भी अर्जुन युद्ध के लिए न मानता तो क्या होता। - द्रौपदी ने कहा।
    तो मैं अर्जुन का ही वध कर देता, क्योंकि यह भी मेरी विवशता ही होती। मैंने भी अनेको युद्ध लड़े थे, सखी। परन्तु एक योद्धा की तरह, कहीं भी मैंने हृदय की ओर नहीं देखा। क्या कंस मेरे मामा नहीं थे। लोग यह समझते हैं कि मैंने युद्ध के डर से मथुरा छोड़ा था परन्तु मैं तुम्हंे बताना चाहता हूँ कि मैं युद्ध से नहीं बल्कि गोपियों के डर से मथुरा छोड़ा था। ये गोपियाँ मेरे दिल पर युद्ध कर बार-बार मुझे परास्त कर रही थीं, और मैं पल-पल कमजोर होता जा रहा था। हृदय का भाव जब बढ़ता है तब कर्म कमजोर पड़ जाता है सखी। इसलिए ही मैंने मथुरा छोड़ा था और फिर कभी नहीं गया। जाते-जाते गोपियों से मैंने अवश्य कहा था कि जिसे द्वारिका चलना हो चले परन्तु कोई नहीं आया, यह गोपियों के प्रेम की परीक्षा ही थी। अब कोई आत्मा पर विश्वास नहीं करता सभी शरीर पर ही विश्वास करते हैं जबकि मनुष्य की समस्त अभिव्यक्ति उसी आत्मा के कारण ही प्रकाशित हो रही होती है। - मैं लगातार बोलता जा रहा था।
    सखी, जब परमात्मा शरीर मे पूर्ण रूप से प्रकाशित होता है तब भी वह शरीर के माध्यम से ही होता है। इसलिए बहुत से मनुष्य उस पर विश्वास करते हैं, वहीं बहुत से मनुष्य विश्वास नहीं भी करते हैं। इसलिए उस पूर्ण परमात्मा को अपनी उपस्थिति बताने के लिए कर्म करने पड़ते हैं। अगर प्रारम्भ में ही सभी विश्वास कर लें तो युद्ध कैसा और महाभारत क्यों होता। परन्तु इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। इस बार मैं नहीं मेरा अपना रूप, मेरा शास्त्र- ”विश्वशास्त्र“ अनन्त काल तक युद्ध करेगा। जिस प्रकार मेरी ”गीता“ आज तक युद्ध कर रही है। महाभारत युद्ध में मेरे ज्ञान के विश्वरूप योगेश्वर रूप में सभी स्थित थे और अब वर्तमान में मेरे कर्मज्ञान के विश्वरूप भोगेश्वर रूप में सभी शास्त्र, दर्शन, महापुरूष, विचारक समाहित होते चले जायेंगे। और मुझे किसी भी प्रकार की परीक्षा देने की आवश्यकता ही नहीं होगी क्योंकि जब तक मनुष्य इसे समझने की कोशिश करेंगे तब तक मैं अपना काम कर चुका रहूँगा और यह युद्ध किसी पर निर्भर भी नहीं है क्योंकि इस बार समाज स्वयं इसके लिए तैयार है और उसकी विवशता भी है। सखी, इस संसार में कोई विश्वगुरू, विश्वगुरू नहीं बना सकता। सिर्फ कोई गुरू ही विश्वगुरू बना सकता है और गुरू तो एक मात्र परमात्मा ही है। मैं ही हूँ। मेरा सार्वभौम रूप ही है। और इस प्रकार मैं पूर्ण पुरूष और तुम पूर्ण प्रकृति के रूप में सदैव इस संसार के सर्वोच्च ऊँचाई पर स्थित रहेंगे। - मैं धारा प्रवाह बोलता जा रहा था।

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  •   परन्तु कृष्ण ये सब तो तुम कर रहे हो, इससे मुझे कैसे मुक्ति मिलेगी ओर मैं कैसे सर्वोच्च हूँ। - द्रौपदी बोली।

    सखी, यह शरीर पाँच तत्वों से बना है। तुमने पाँच पतियों को धारण कर एकाकार किया था और प्रकृति के गुणों की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी। संसार में तो स्त्रियाँ एक पति को भी संभाल सकने का गुण नहीं रख पा रही है फिर वे तुम से तुलना के योग्य कहाँ हैं। वे तो तुम्हारी अंश मात्र हैं। कहाँ अंश और कहाँ पूर्ण प्रकृति। अंश का लक्ष्य पूर्णता को प्राप्त करना होता है। अन्यथा जीवन यात्रा चलती रहती है। अभी तो पुरूष की पूर्णता का क्रम चल रहा है। उसके बाद प्रकृति की पूर्णता का क्रम चलेगा, और उस यात्रा के अन्त में तुम पहले से ही बैठी मिलोगी। प्रकृति की पूर्ण यात्रा के अन्तिम छोर का स्थान खाली नहीं हैं, उस पर तुम पहले ही आदर्श रूप में विराजमान हो। जब अंश प्रकृति की पूर्णता की यात्रा समाप्त होगी तब तुम्हारे जीवन से शिक्षा ग्रहण कर तुम्हें अपने आदर्श के रूप में देखेंगे। परन्तु सखी, तुमने यह कैसे जाना कि मैं हस्तिनापुर अवश्य आउँगा। - मैं बोला।
    सखा, जो पूर्ण होता है, वह पूर्णता का ही निर्माण करता है। तुमने जो कुछ भी किया वह अंश रूप में किया, किसी को प्रेम दिया, किसी को सखा बनाया, किसी को धन दिया, किसी को ज्ञान दिया, किसी को बल दिया इत्यादि अंश रूप में ही दिया परन्तु किसी को भी अपने जैसा नहीं बनाया। इससे ही मैंने जाना कि उस पूर्णता को पूर्ण करने तुम अवश्य आओगे और इस क्रम में तुम्हारा हस्तिनापुर आना अवश्य होगा। आखिरकार मैं तुम्हारी सखी थी, तुम्हें सदैव देखती, सुनती और समझती थी। मै सदैव तुम्हें अपने पास अनुभव करती थी। हम सदैव साथ-साथ थे। एक समान्तर रेखा की तरह जो कभी मिलीं नहीं परन्तु रहीं साथ-साथ। - द्रौपदी ने कहा।
    सखी, जब दो समानान्तर रेखा दूर तक साथ-साथ जाती हैं, तब रेखाएँ तो जानती हैं कि हम एकाकार नहीं हैं परन्तु दूर से देखने वाला व्यक्ति उसे एकाकार होते ही देखता है। सखी, पितामह भीष्म जब युद्ध क्षेत्र में शरशैया पर लेटे थे तो मैं उनसे मिलने गया था। उन्होंने मुझसे पूछा था। कृष्ण, मैं पिछले 71 जन्मों में झाँककर देख चुका हूँ और मैंने देखा कि मैंने ऐसी कोई गलती नहीं की है जिससे मैं इस दण्ड का भागीदार बनूँ तो तुम बताओ कृष्ण ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ। तब मैंने कहा था सखी, पितामह, आप 72वें जन्म में जाकर देखें, आप एक तितली को काँटा चुभोये थे और इतने जन्मों के बाद वह अनेक काँटों में ब्याज के रूप में बढ़ चुका है, जो अब आपको तीर के रूप में चुभे हुये हैं। तब उन्होंने संतुष्ट होकर कहा था- मान गये द्वारिकाधीश, तुम योगेश्वर परमात्मा हो, तुम्हें प्रणाम। और वे संतोष से लेट गये थे। सखी, तुम बताओ मैंने ऐसा क्यों कहा।
    सखा, पितामह 71 जन्म को जानते थे कि नहीं ये तो वही जान सकते हैं। और आप उनके 72वें जन्म को जानते थे कि नहीं, ये भी आप ही जान सकते हैं। दोनों बाते व्यक्तिगत रूप से प्रमाणित हैं न कि सार्वजनिक रूप से। परन्तु समाज आप दोनों को ही सार्वजनिक रूप से ज्ञानी तो समझती ही है। सखा इस समय भी आपकी उपस्थिति को लोग कैसे जान पायेंगे - द्रोपदी ने कहा। 
    सखी, तुम्हारे उत्तर से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि तुम अब पूर्ण हो चुकी हो। अब तुममे और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। तुममें, मैं और मुझमें, तुम। आदि में, मैं और अन्त में भी, मैं। और अब, सभी में, मैं और मुझमें, सभी। सखी, व्यक्ति, समाज, राज्य की आवश्यकताओं को देखो, भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणीयों को देखो, ये सब मुझे पुकार रही हैं। ग्रहों के चालों, सूर्य व चन्द्र ग्रहण को देखो, ये सब मेरी उपस्थिति को बता रही हैं। मैं आया था, मैंने अपना कार्य पूर्ण किया मैं जा भी रहा हूँ, तुमसे एकाकार होकर। मैं मुक्त था, मैं मुक्त हूँ, मैं मुक्त ही रहूँगा। आओ सखी चलें। यह पूर्ण पुरूष और पूर्ण प्रकृति का महामिलन है। मैं ही योगेश्वर हूँ, मैं ही भोगेश्वर हूँ। आदि में योगेश्वर हूँ और अन्त में भोगेश्वर हूँ। मैं प्रकृति को नियंत्रित कर व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य रूप से विकसित होकर सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य जगत में व्यक्त होता हूँ। अब ईश्वर भी अपने कत्र्तव्य से मुक्त है और प्रकृति भी। जो ईश्वर है वही प्रकृति है। जो प्रकृति है वही ईश्वर है। दोनों एक-दूसरे के अदृश्य और दृश्य रूप हैं। प्रत्येक में दोनों विद्यमान हैं। यही अर्धनारीश्वर है। 

    ध्यान रहे कि 12 ज्येतिर्लिग में से प्रथम साोमनाथ तीर्थ (गुजरात, भारत) के ”भीड़िया तीर्थ“ में एक शिलालेख पर लिखा है कि-”भगवान श्रीकृष्ण ई0 पू0 3102 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (शुक्रवार, 18 फरवरी) के दिन और मध्यान्ह के बाद 2 बजकर 27 मिनट 30 सेकण्ड के समय इस हिरण्य के पवित्र तक से प्रस्थान किये।“ जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण धराधाम से स्वधाम गए। उसी दिन से धरती पर कलियुग का आगमन हो गया और धीरे-धीरे इसका प्रभाव बढ़ने लगा ।

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  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    01. महात्मा गाँधी (2 अक्टुबर, 1869 - 30 जनवरी, 1948)

    गाँधी के विचार
    1. विज्ञान का युद्ध किसी व्यक्ति को तानाशाही, शुद्ध और सरलता की ओर ले जाता है। अहिंसा का विज्ञान अकेले ही किसी व्यक्ति को शुद्ध लोकतन्त्र के मार्ग की ओर ले जा सकता है। प्रेम पर आधारित शक्ति सजा के डर से उत्पन्न शक्ति से हजार गुना अधिक और स्थायी होती है। यह कहना निन्दा करने जैसा होगा कि अहिंसा का अभ्यास केवल व्यक्तिगत तौर पर किया जा सकता है और व्यक्तिवादिता वाले देश इसका कभी भी अभ्यास नहीं कर सकते हैं। शुद्ध अराजकता का निकटतम दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित लोकतन्त्र होगा। सम्पूर्ण अहिंसा के आधार पर संगठित और चलने वाला कोई समाज शुद्ध अराजकता वाला समाज होगा।
    2. मैंने भी स्वीकार किया कि एक अहिंसक राज्य में भी पुलिस बल की जरूरत अनिवार्य हो सकती है। पुलिस रैंकों का गठन अहिंसा में विश्वास रखने वालों से किया जायेगा। लोग उनकी हर सम्भव मदद करेंगे और आपसी सहयोग के माध्यम से वे किसी भी उपद्रव का आसानी से समाना कर लेंगे। श्रम और पूंजी तथा हड़तालों के बीच हिंसक झगड़ें बहुत कम होंगें और हिसंक राज्यों में तो बहुत कम होंगे क्योंकि अहिंसक समाज की बाहुलता का प्रभाव समाज में प्रमुख तत्वों का सम्मान करने के लिए महान होगा। इसी प्रकार साम्प्रदायिक अव्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं होगी।
    3. आध्यात्मिक और व्यवहारिक शुद्धता बड़े पैमाने पर ब्रह्मचर्य और वैराग्यवाद से जुदा होता है। गाँधी जी ने ब्रह्मचर्य को भगवान के करीब आने और अपने को पहचानने का प्राथमिक आधार के रूप में देखा था। अपनी आत्मकथा में वे बचपन की दुल्हन कस्तुरबा के साथ अपनी कामेच्छा और इष्र्या के संघर्षो को बताते हैं। उन्होंने महसूस किया कि यह उनका व्यक्तिगत दायित्व है कि उन्हें ब्रह्मचर्य रहना है ताकि वे बजाय हवस के प्रेम को सिख पायें। गाँधी के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ था- इन्द्रियों के अन्तर्गत विचारों, शब्द और कर्म पर नियंत्रण।
    4. गाँधी जी का मानना था कि अगर एक व्यक्ति समाज सेवा में कार्यरत है तो उसे साधारण जीवन की ओर ही बढ़ना चाहिए जिसे वे ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक मानते हैं। उनकी सादगी ने पश्चिमी जीवन शैली को त्यागने पर मजबूर करने लगा और वे दक्षिण अफ्रीका में फैलने लगे थे इसे वे - खुद को शून्य के स्थिति में लाना, कहते हैं। जिसमें अनावश्यक खर्च, साधारण जीवन शैली को अपनाना और अपने वस्त्र स्वयं धोना आवश्यक है। अपने साधारण जीवन को दर्शाने के लिए उन्होंने बाद में अपनी बाकी जीवन में धोती पहनी।
    5. गाँधी सप्ताह में एक दिन मौन धारण करते थे। उनका मानना था कि बोलने के परहेज से उन्हें आन्तरिक शान्ति मिलती है। उन पर यह प्रभाव हिन्दू मौन सिद्धान्त का है। वैसे दिनों में वे कागज पर लिखकर दूसरों के साथ सम्पर्क करते थे। 37 वर्ष की आयु से साढ़े तीन वर्षो तक गाँधी जी ने अखबारों को पढ़ने से इन्कार कर दिया जिसके जबाब में उनका कहना था कि जगत की आज जो स्थिर अवस्था है, उसने अपनी स्वयं का आन्तरिक अशान्ति की तुलना में अधिक भ्रमित किया है।
    6. नियम के रूप में गाँधी विभाजन की अवधारणा के खिलाफ थे क्योंकि उनके धार्मिक एकता के दृष्टिकोण के प्रतिकूल थी। 6 अक्टुबर, 1946 में हरिजन में उन्होंने भारत का विभाजन, पाकिस्तान बनाने के लिए, के बारे में लिखा- पाकिस्तान की मांग जैसा कि मुस्लीम लीग द्वारा प्रस्तुत किया गया है, गैर इस्लामी है और मैं इसे पापयुक्त कहने से नहीं हिचकूँगा। इस्लाम मानव जाति के भाईचारे ओर एकता के लिए खड़ा है, न कि मानव परिवार के एक्य का अवरोध करने के लिए। इस वजह से जो यह चाहते हैं कि भारत दो युद्ध समूहों में बदल जाये, वे भारत और इस्लाम दोनों के दुश्मन हैं। वे मुझे टुकड़ों में काट सकते हैं, पर मुझे उस चीज के लिए राजी नहीं कर सकते जिसे मै गलत समझता हूँ।
    भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बिना शस्त्र, और सुरक्षा के अहिंसा का सत्य के बल पर व्यवहारिक जीवन में प्रत्यक्ष करने वाला महात्मा जिसने रामराज्य का सपना देखा था जिसे सम्पूर्ण विश्व सम्मान करता है तथा भारत में राष्ट्रपिता के रुप में स्थापित हैं। इनके नाम पर समर्थन कर तथा समर्थन मांग कर लोग स्वार्थ सिद्धि इतनी आसानी से करते आए हैं कि जनता भी अब इन स्वार्थियों को पहचानने लगी है। इनकी दिशा से शेष कार्य यह है कि जो अहिंसा का नाम बेचते हैं वे जरा अपने सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर अहिंसा का प्रदर्शन करें तथा रामराज्य अर्थात् ”परशुराम परम्परा“ की स्थापना करें।

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    सार्वभौम आत्मतत्व से साक्षात्कार या अनुभव कर लेने के बाद कोई भी व्यक्ति एकत्व, अहिंसा और सत्य का ही समर्थक और व्यवहार करने वाला बन जाता है। और यह वहीं समझ सकता है जिसने सार्वभौम आत्मतत्व से साक्षात्कार या अनुभव किया हो। वर्तमान समाज में समस्या है कि बिना ऊँचाई (सार्वभौम आत्मतत्व से साक्षात्कार या अनुभव) पर पहुँचे ही व्यक्ति ऐसे ऊँचाई पर पहुँचे व्यक्ति के बारे में अपनी राय/मत को व्यक्त करने से तनिक भी नहीं हिचकते। वे ये नहीं समझते कि किसी पर्वत की चोटी पर जाकर ही अधिकतम देखा जा सकता है न कि पर्वत की तलहटी में खड़े होकर।
    ईश्वर के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के हिसंात्मक काल के उपरान्त अहिंसा का मार्ग का ही विकास प्रारम्भ हुआ। उनके बाद आये ईश्वर के आठवें अवतार भगवान बुद्ध ने उस अहिंसा के ही मार्ग को आगे बढ़ाया। परन्तु उनके उपरान्त भी हजारों वर्षो तक हिंसक काल ही रहा। निराकार संविधान आधारित लोकतन्त्र के आने के बाद भी विश्व ने विश्व युद्ध तक को देखा है। लेकिन इतने युद्ध के बाद अब स्वतः ही संसार ने अहिंसा के मार्ग को उचित ठहराया है। उसी दौर में आपका (गाँधी जी) सत्य-अहिंसा का सफल प्रयोग, उसी अहिंसा के मार्ग को ही विकास की ओर गति प्रदान किया। अब स्थिति यह है कि जहाँ तक हो सके मानव युद्ध से बचना ही चाहता है और उसी ओर उसके विकास की गति भी है।
    जो ऊँचाई (सार्वभौम आत्मतत्व से साक्षात्कार या अनुभव) पर पहुँच जाता है, उसके सम्बन्ध में आचार्य रजनीश ”ओशो“ की वाणी है - ”कृष्ण शान्तिवादी नहीं हैं, कृष्ण युद्धवादी नहीं है। असल में वाद का मतलब ही होता है कि दो में से हम एक चुनते है। एक अन्य वादी है। कृष्ण कहते हैं, शान्ति में शुभ फलित होता हो तो स्वागत है, युद्ध में शुभ फलित होता हो तो स्वागत है। कृष्ण जैसे व्यक्तित्व की फिर जरुरत है जो कहे कि शुभ को भी लड़ना चाहिए, शुभ को भी तलवार हाथ में लेने की हिम्मत चाहिए निश्चित ही शुभ जब हाथ में तलवार लेता है, तो किसी का अशुभ नहीं होता। अशुभ हो नहीं सकता क्योंकि लड़ने के लिए कोई लड़ाई नहीं है। लेकिन अशुभ जीत न पाये इसलिए लड़ाई है तो धीरे-धीरे दो हिस्सा दुनियाँ के बट जायेंगे, जल्दी ही जहाँ एक हिस्सा भौतिकवादी होगा और एक हिस्सा स्वतंत्रता, लोकतन्त्र, व्यक्ति और जीवन के और मूल्यों के लिए होगा। लेकिन क्या ऐसे दूसरे शुभ के वर्ग को कृष्ण मिल सकते है? मिल सकते हैं। क्योंकि जब भी मनुष्य की स्थितियाँ इस जगह आ जाती है। जहाँ कि कुछ निर्णायक घटना घटने को होती है, तो हमारी स्थितियाँ उस चेतना को भी पुकार लेती हैं, उस चेतना को भी जन्म दे देती है वह व्यक्ति भी जन्म जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कृष्ण का भविष्य के लिए बहुत अर्थ है।“
    ”रामराज्य“, का प्रारूप ”परशुराम परम्परा“ है। ईश्वर के सातवें अवतार भगवान श्रीराम ने ईश्वर के छठें अवतार भगवान परशुराम द्वारा दी गई व्यवस्था का ही प्रसार किये थे। छठें अवतार भगवान परशुराम द्वारा दी गई व्यवस्था इस प्रकार थी-
    1. प्रकृति में व्याप्त तीन गुण- सत्व, रज और तम के प्रधानता के अनुसार मनुष्य का चार वर्णों में निर्धारण। सत्व गुण प्रधान - ब्राह्मण, रज गुण प्रधान- क्षत्रिय, रज एवं तम गुण प्रधान- वैश्य, तम गुण प्रधान- शूद्र।
    2. गणराज्य का शासक राजा होगा जो क्षत्रिय होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति जो रज गुण अर्थात् कर्म अर्थात् शक्ति प्रधान है।
    3. गणराज्य में राज्य सभा होगी जिसके अनेक सदस्य होंगे जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति के सत्व, रज एवं तम गुणों से युक्त विभिन्न वस्तु हैं।
    4. राजा का निर्णय राजसभा का ही निर्णय है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति का निर्णय वहीं है जो सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित निर्णय होता है।
    5. राजा का चुनाव जनता करे क्योंकि वह अपने गणराज्य में सर्वव्यापी और जनता का सम्मिलित रुप है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति सर्वव्यापी है और वह सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित रुप है।
    6. राजा और उसकी सभा राज्य वादी न हो इसलिए उस पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण का नियन्त्रण होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान आत्मा का नियन्त्रण होता है।
    यह व्यवस्था जब तक निराकार आधारित लोकतन्त्र में संविधान का स्वरूप ग्राम से लेकर विश्व तक नहीं होता तब तक रामराज्य नहीं बन सकता। वर्तमान में ईश्वर के अन्तिम और दसवें अवतार द्वारा इसी को अहिंसक मार्ग से दृढ़ता प्रदान की जा रही है। और मानक आधारित समाज का निर्माण ही सत्यरूप में ईश्वरीय व्यवस्था है।
    पूर्ण ईश्वरीय कर्म मार्ग है - पूर्ण प्रत्यक्ष अवतार से पूर्ण प्रेरक अवतार तक। प्रत्यक्ष अवतरण में शारीरिक शक्ति का प्रयोग होता है जबकि पूर्ण प्रेरक अवतरण में आध्यात्मिक सत्य ज्ञान शक्ति का प्रयोग होता है। इस मार्ग का मध्य श्रीकृष्ण थे जिनका जीवन आधा-आधा प्रत्यक्ष और प्रेरक का था।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    02. सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्टुबर, 1875 - 15 दिसम्बर, 1950)

    7 जनवरी 1948 की लखनऊ में सरदार पटेल ने कहा था-
    ”आर0 एस0 एस0 वाले देश की एकता को कमजोर कर रहे हैं उन्हें ठीक रास्ते पर लाना होगा।“
    ”हमें आपसी मतभेद एवं ऊँच-नीच के अन्तर को भूलकर समानता का भाव विकसित करना है। हमें एक ही पिता की संन्तानों की तरह जीवन व्यतीत करना है।“

    इनकी दिशा से शेष कार्य यह है कि विश्व के एकीकरण के लिए प्रयत्न करें जिसका पहला चरण सैद्धान्तिक तथा दूसरा चरण भौगोलिक हो।

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    देश काल स्थिति-परिथति के अनुसार किसी भी व्यक्ति-संगठन के विचार बदलते रहते हैं। आर0 एस0 एस0 (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के आपके काल और वर्तमान काल में 60 वर्षो का अन्तर हो चुका है। आर0 एस0 एस0 उस समय, उसी भाषा-व्यवहार का प्रयोग करता था जिस भाषा-व्यवहार में अन्य व्यक्ति-संगठन स्वयं को व्यक्त करते थे। वर्तमान समय में शिक्षा-विज्ञान-तकनीकी ने ज्ञान-विचार में बहुत अधिक परिवर्तन ला दिया है। उस अनुसार ही आर0 एस0 एस0 ने भी अपने विचार में परिवर्तन ला चुका है। जिसके कारण ही उसके संघ प्रमुख से निम्नलिखित विचार व्यक्त हुये हैं-

    ”हिन्दू चिन्तन पर आधारित नई आचार संहिता बने।“ -श्री के. एस. सुदर्शन, प्रमुख राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ,
    साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 16-03-2000

    ”दुनिया को जीने का सही तरीका बतायेगा भारत “ (उज्जैन महाकुम्भ के अन्तर्राष्ट्रीय विचार महाकुम्भ में) - श्री मोहन भागवत, प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
    साभार - दैनिक जागरण

    इस प्रकार अब आर0 एस0 एस0 अपने ठीक रास्ते पर है। समानता, एकता, वसुधैव-कुटुम्बकम्, विश्व-बन्धुत्व या इसी प्रकार के अन्य विचार एकात्म मानववाद, भाईचारा। सभी विश्व को एक परिवार के रूप में ही व्यक्त करते हैं। इस सम्बन्ध में ही निम्न विचार वैश्विक स्तर के नेताओं द्वारा व्यक्त हुये हैं-

    ”युवाओं विश्व को एक करो“ (”मन की बात“ रेडियो कार्यक्रम द्वारा श्री बराक ओबामा के साथ) - श्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत
    साभार - दैनिक जागरण व काशी वार्ता, वाराणसी संस्करण, दि0 28 जनवरी, 2015

    ”भारत के पहले ग्लोबल यूथ थे स्वामी विवेकानन्द“ - श्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री, भारत
    साभार - दैनिक जागरण व काशी वार्ता, वाराणसी संस्करण, दि0 12-13 जनवरी, 2015

    विश्व का एकीकरण तभी हो सकता है जब हम सब प्रथम चरण में मानसिक रूप से एकीकृत हो जायें। फिर विश्व के शारीरिक (भौगोलिक) एकीकरण का मार्ग खुलेगा। एकीकरण के प्रथम चरण का ही कार्य है - मानक एवं एकात्म कर्मवाद आधारित मानव समाज का निर्माण। जिसका आधार निम्न आविष्कार है जो स्वामी विवेकानन्द के वेदान्त की व्यावहारिकता और विश्व-बन्धुत्व के विचार का शासन के स्थापना प्रक्रिया के अनुसार आविष्कृत है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है।
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है।



  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 02 - सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् - पं0 जवाहर लाल नेहरु
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    03. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् (5 सितम्बर, 1888 - 17 अप्रैल 1975)

    ”हमारे युग की दो प्रमुख विशेषताएँ विज्ञान और लोकतंत्र है। ये दोनों टिकाऊ हैं। हम शिक्षित लोगों को यह नहीं कह सकते कि वे तार्किक प्रमाण के बिना धर्म की मान्यताओं को स्वीकार कर लें। जो कुछ भी हमें मानने के लिए कहा जाए, उसे उचित और तर्क के बल से पुष्ट होना चाहिए। अन्यथा हमारे धार्मिक विश्वास इच्छापूरक विचार मात्र रह जाएंगे। आधुनिक मानव को ऐसे धर्म के अनुसार जीवन बिताने की शिक्षा देनी चाहिए, जो उसकी विवेक-बुद्धि को जँचे, विज्ञान की परम्परा के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त धर्म को लोकतन्त्र का पोषक होना चाहिए, जो कि वर्ण, मान्यता, सम्प्रदाय या जाति का विचार न करते हुए प्रत्येक मनुष्य के बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास पर जोर देता हो। कोई भी ऐसा धर्म, जो मनुष्य-मनुष्य में भेद करता है अथवा विशेषाधिकार, शोषण या युद्ध का समर्थन करता है, आज के मानव को रूच नहीं सकता। स्वामी विवेकानन्द ने यह सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म विज्ञान सम्मत भी है और लोकतन्त्र का समर्थक भी। वह हिन्दू धर्म नहीं, जो दोषों से भरपूर है, बल्कि वह हिन्दू धर्म, जो हमारे महान प्रचारकों का अभिप्रेत था।“ - डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    हिन्दू धर्म, जो सार्वभौम होते हुए भी उसे अन्य धर्मो के भाँति एक सीमित धर्म के रूप में देखा जाने लगा है। इसी की सार्वभौमिकता को स्वामी विवेकानन्द जी ने प्रस्तुत किया था। स्वामी विवेकानन्द जी के इच्छानुसार सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त पर आधारित नव हिन्दू धर्म का निर्माण हो चुका है और अब वह विश्व धर्म के रूप में व्यक्त है। जिसका शास्त्र - विश्वशास्त्र है जिसमें ज्ञान, भाव और व्यष्टि सहित समष्टि के लिए विज्ञान सम्मत व्यावहारिक सिद्धान्त भी हैं। और उसके विश्वव्यापी स्थापना का मार्ग भी उपलब्ध है।
    मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे- ISO-9000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो (Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    04. पं0 जवाहर लाल नेहरु (14 नवम्बर, 1889 - 27 मई, 1964)

    ”यदि हम संसार का मार्ग ग्रहण करेंगे और संसार को और अधिक विभाजित करेंगे तो शान्ति, सहिष्णुता और स्वतन्त्रता के अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते। यदि हम इस युद्ध- विक्षिप्त दुनियाँ को शान्ति और सत्य का प्रकाश दिखाएं तो सम्भव है कि हम संसार में कोई अच्छा परिवर्तन कर सकें। लोकतन्त्र से मेरा मतलब समस्याओं को शान्तिपूर्वक हल करने से है। अगर हम समस्याओं को शान्तिपूर्वक हल नहीं कर पाते तो इसका मतलब है कि लोकतन्त्र को अपनाने में हम असफल रहें हैं।“ - पं0 जवाहर लाल नेहरु

    ”हम अपनी योजनाओं को सक्रिय रुप से क्रियान्वित करंे, इसके लिए मानकों का होना अत्यन्त आवश्यक है तथा यह जरुरी है कि मानकों के निर्धारण व पालन हेतु प्रयत्नशील रहें।“ - पं0 जवाहर लाल नेहरु
    (भारतीय मानक ब्यूरो त्रैमासिकी- ”मानक दूत“, वर्ष-19, अंक-1, 1999 से साभार)

    इनके नाम को बेचने वालों के समक्ष इनकी दिशा से शेष कार्य यह है कि दुनिया को शान्ति और सत्य का प्रकाश दिखाने के लिए सत्य का प्रसार करें तथा समस्याओं को शान्तिपूर्वक हल करना सीखें।

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    वर्तमान समय के भारत तथा विश्व की इच्छा शान्ति का बहुआयामी विचार-अन्तरिक्ष, पाताल, पृथ्वी और सारे चराचर जगत में एकात्म भाव उत्पन्न कर अभय का साम्राज्य पैदा करना और समस्याओं के हल में इसकी मूल उपयोगिता है। साथ ही विश्व में एक धर्म- विश्वधर्म-सार्वभौम धर्म, एक शिक्षा-विश्व शिक्षा, एक न्याय व्यवस्था, एक अर्थव्यवस्था, एक संविधान, एक शास्त्र स्थापित करने में है। भारत के लिए यह अधिक लाभकारी है क्योंकि यहाँ सांस्कृतिक विविधता है। जिससे सभी धर्म-संस्कृति को सम्मान देते हुए एक सूत्र में बाँधने के लिए सर्वमान्य धर्म उपलब्ध हो जायेगा। साथ ही संविधान, शिक्षा व शिक्षा प्रणाली व विषय आधारित विवाद को उसके सत्य-सैद्धान्तिक स्वरूप से हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। साथ ही पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी से संकीर्ण मानसिकता से व्यक्ति को उठाकर व्यापक मानसिकता युक्त व्यक्ति में स्थापित किये जाने में आविष्कार की उपयोगिता है। जिससे विध्वंसक मानव का उत्पादन दर कम हो सके। ऐसा न होने पर नकारात्मक मानसिकता के मानवो का विकास तेजी से बढ़ता जायेगा और मनुष्यता की शक्ति उन्हीं को रोकने में खर्च हो जायेगी। यह आविष्कार सार्वभौम लोक या गण या या जन या स्व का निराकार रूप है इसलिए इसकी उपयोगिता स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग तथा व्यवस्था के सत्यीकरण और स्वराज की प्राप्ति में है अर्थात मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्वमानक की प्राप्ति और ब्रह्माण्ड की सटीक व्याख्या में है। मनुष्य किसी भी पेशे में हो लेकिन उसके मन का भूमण्डलीयकरण, एकीकरण, सत्यीकरण, ब्रह्माण्डीयकरण करने में इसकी उपयोगिता है जिससे मानव शक्ति सहित संस्थागत और शासन शक्ति को एक कर्मज्ञान से युक्त कर ब्रह्माण्डीय विकास में एकमुखी किया जा सके।

    व्यक्ति आधारित समाज व शासन से उठकर मानक आधारित समाज व शासन का निर्माण होगा। अर्थात जिस प्रकार हम सभी व्यक्ति आधारित राजतन्त्र में राजा से उठकर व्यक्ति आधारित लोकतन्त्र में आये, फिर संविधान आधारित लोकतन्त्र में आ गये उसी प्रकार पूर्ण लोकतन्त्र के लिए मानक व संविधान आधारित लोकतन्त्र में हम सभी को पहुँचना है।

    दो या दो से अधिक माध्यमों से उत्पादित एक ही उत्पाद के गुणता के मापांकन के लिए मानक ही एक मात्र उपाय है। सतत् विकास के क्रम में मानकों का निर्धारण अति आवश्यक कार्य है। उत्पादों के मानक के अलावा सबसे जरुरी यह है कि मानव संसाधन की गुणता का मानक निर्धारित हो क्योंकि राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के मन को भी आधुनिक अर्थात् वैश्विक-ब्रह्माण्डीय करना पड़ेगा। तभी मनुष्यता के पूर्ण उपयोग के साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य के सही उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्कृष्ट उत्पादों के लक्ष्य के साथ हमारा लक्ष्य उत्कृष्ट मनुष्य के उत्पादन से भी होना चाहिए जिससे हम लगातार विकास के विरुद्ध नकारात्मक मनुष्योें की संख्या कम कर सकें। भूमण्डलीकरण सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में कर देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि यदि मनुष्य के मन का भूमण्डलीकरण हम नहीं करते तो इसके लाभों को हम नहीं समझ सकते। आर्थिक संसाधनों में सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य ही है। मनुष्य का भूमण्डलीकरण तभी हो सकता है जब मन के विश्व मानक का निर्धारण हो। ऐसा होने पर हम सभी को मनुष्यों की गुणता के मापांकन का पैमाना प्राप्त कर लेगें, साथ ही स्वयं व्यक्ति भी अपना मापांकन भी कर सकेगा। जो विश्व मानव समाज के लिए सर्वाधिक महत्व का विषय होगा। विश्व मानक शून्य श्रृंखला मन का विश्व मानक है जिसका निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है जो यह निश्चित करता है कि समाज इस स्तर का हो चुका है या इस स्तर का होना चाहिए। यदि यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित होगा तो निश्चित ही अन्तिम मानक होगा।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 03 - भीम राव अम्बेडकर
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    05. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 - 6 दिसम्बर, 1956)

    ”शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतन्त्र होने में है। हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं। राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित हे। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा। उनको शिक्षित होना चाहिए। एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अन्दर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी ऊँचाइयों का स्रोत है।“ अपने अनुयायियों को उनका सन्देश था- ”शिक्षित बनो!!!, संगठित रहो!!!, संघर्ष करो!!!“ - बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर

    ”सामाजिक क्रान्ति साकार बनाने के लिए किसी महान विभूति की आवश्यकता है या नहीं यह प्रश्न यदि एक तरफ रख दिया जाय, तो भी सामाजिक क्रान्ति की जिम्मेदारी मूलतः समाज के बुद्धिमान वर्ग पर ही रहती है, इसे वास्तव में कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। भविष्य काल की ओर दृष्टि रखकर वर्तमान समय में समाज को योग्य मार्ग दिखलाना यह बुद्धिमान वर्ग का पवित्र कर्तव्य है। यह कर्तव्य निभाने की कुशलता जिस समाज के बुद्धिमान लोग दिखलाते हैं। वहीं जीवन कलह में टिक सकता है।“ - बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर

    ”सही राष्ट्रवाद है, जाति भावना का परित्याग। सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्निर्माण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अस्पृश्य कभी भी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते। राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगो के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक समरसता व मातत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाय। राष्ट्र का सन्दर्भ में राष्ट्रीयता का अर्थ होना चाहिए- सामाजिक एकता की दृढ़ भावना, अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में इसका अर्थ है - भाईचारा। शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है अतः शिक्षा के दरवाजे प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए खुले होने चाहिए। एक व्यक्ति के शिक्षित होने का अर्थ है- एक व्यक्ति का शिक्षित होना लेकिन एक स्त्री के शिक्षित होने का अर्थ है कि एक परिवार का शिक्षित होना।“ - बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    भगवान बुद्ध, महात्मा कबीर व महात्मा फूले से प्रेरित बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर संविधान के मार्ग से समानता, समता तथा दलितोद्धार का महानतम कार्य किये। परन्तु समर्थक द्वारा मूर्ति लगवाकर स्वार्थ सिद्धि। उन्हें यह नहीं पता जिनकी मूर्तियां अधिक लग जाती हैं। दुर्गति भी उन्हीं की अधिक होती है। इनकी दिशा से शेष कार्य यह है कि ”सामाजिक क्रान्ति“ के लिए बुद्धिमता दिखायें तथा संविधान के माध्यम से समता लाने के लिए संविधान में संशोधन कराकर ग्राम पंचायत तथा नगर पंचायत अध्यक्ष की भाँति जिला पंचायत अध्यक्ष, मुख्यमन्त्री तथा प्रधानमन्त्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा करवाये जो ”परशुराम परम्परा“ के अनुसार है। साथ ही 90 प्रतिशत बहुजन की आवाज उठाने वालों की सीधे सर्वोच्च पद प्राप्त हो जायेगा।
    किसी देश का संविधान, उस देश के स्वाभिमान का शास्त्र तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश की मूल भावना का शिक्षा पाठ्यक्रम उसका अंग न हो। इस प्रकार भारत देश का संविधान भारत देश का शास्त्र नहीं है। संविधान को भारत का शास्त्र बनाने के लिए भारत की मूल भावना के अनुरूप नागरिक निर्माण के शिक्षा पाठ्यक्रम को संविधान के अंग के रूप में शामिल करना होगा। जबकि राष्ट्रीय संविधान और राष्ट्रीय शास्त्र के लिए हमें विश्व के स्तर पर देखना होगा क्योंकि देश तो अनेक हैं राष्ट्र केवल एक विश्व है, यह धरती है, यह पृथ्वी है। भारत को विश्व गुरू बनने का अन्तिम रास्ता यह है कि वह अपने संविधान को वैश्विक स्तर पर विचार कर उसमें विश्व शिक्षा पाठ्यक्रम को शामिल करे। यह कार्य उसी दिशा की ओर एक पहल है, एक मार्ग है और उस उम्मीद का एक हल है। राष्ट्रीयता की परिभाषा व नागरिक कर्तव्य के निर्धारण का मार्ग है। जिस पर विचार करने का मार्ग खुला हुआ है।
    आचार्य रजनीश ”ओशो“ की वाणी है- ”जो एक गुरू बोल रहा है, वह अनन्त सिद्धों की वाणी है। अभिव्यक्ति में भेद होगा, शब्द अलग होगें, प्रतीक अलग होगें मगर जो एक सिद्ध बोलता है, वह सभी सिद्धो की वाणी है। इनसे अन्यथा नहीं हो सकता है। इसलिए जिसने एक सिद्ध को पा लिया, उसने सारे सिद्धो की परम्परा को पा लिया। क्यांेकि उनका सूत्र एक ही है। कुंजी तो एक ही है, जिसमें ताला खुलता है अस्तित्व का।“ इसलिए उन लोगों को सदैव यह ध्यान में रखना चाहिए कि सिद्ध (आध्यात्मिक आविष्कारक) को नहीं बल्कि सिद्ध की वाणी (आविष्कार) को पकड़ना-समझना चाहिए। परन्तु सदैव होता यह इसका उल्टा। लोग सिद्ध की वाणी को नहीं, सिद्ध को पकड़ लेते हैं। विज्ञान में ऐसा नहीं होता। विज्ञान में वैज्ञानिक (भौतिक आविष्कारक) को नहीं पकड़ते बल्कि उत्पाद (आविष्कार) को पकड़ते हैं। इसी कारण पिछड़े-दलित वहीं के वहीं रह जाते हैं और सामाजिक क्रान्ति मात्र भीड़ बनकर ही रह जाती है।
    दृश्य काल के व्यक्तिगत प्रमाणित काल में सार्वजनिक प्रमाणित अंश दृश्य सत्य चेतना से युक्त संघ और योजना आधारित कलियुग के प्रारम्भ में नवें अवतार - बुद्ध अवतार के समय तक एकतन्त्रात्मक राज्यों का विकास, विभिन्न नेतृत्व मनों आधारित जातियों, हिंसा, कर्म का प्राथमिता का विकास हो उसकी दिशा प्रसार की ओर ही थी। कृष्ण के अंश अपूर्ण मन अर्थात् अंश सूक्ष्म शरीर के स्थूल शरीर ही बुद्ध थे परिणामस्वरूप वे स्वयं को पहचानकर कालानुसार आवश्यक मुख्य कार्य अर्थात् जनता द्वारा लोक धर्म शिक्षा और गणराज्य की स्थापना का शुभारम्भ का कार्य कर्मयोगी-वैरागी-सन्यासी की भाॅति पूर्ण किये। लोकधर्म शिक्षा के अन्तर्गत वे व्यक्तिगत कर्म के लिए -सत्यपात्र को दान नैतिकता के नियमों का पालन, अपने पुण्य का भाग दूसरों को देना, दूसरे द्वारा दिये गये पुण्य के भाग को स्वीकारना अपने त्रुटियों का सुधार, सम्यक-सिद्धान्त का श्रवण और प्रसार: सम्यक सिद्धान्त के अन्तर्गत - अन्धविश्वास तथा भ्रम रहित सम्यक दृष्टि, उच्च तथा बुद्धियुक्त सम्यक संकल्प, नम्रता-उत्सुक्तता-सत्यनिष्ठ युक्त सम्यक वचन, शान्तिपूर्ण-निष्ठापूर्ण-पवित्रता युक्त सम्यक कर्म, अहिंसा युक्त सम्यक आजीवन, आत्म निग्रह और आत्म प्रशिक्षण युक्त सम्यक व्यायाम, सक्रीय सचेतन मन युक्त सम्यक स्मृति, जीवन की यर्थाथता पर गहन अध्ययन युक्त सम्यक समाधि तथा यह लोक धर्म शिक्षा अनवरत चलती रहे इसलिए लोक शिक्षकों के रूप में साधुओं और भिक्षुओं का निर्माण सहित ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’ अर्थात् बुद्धि या प्रबुद्धों के शरण मंे जाओ और ‘‘धर्मम् शरणं गच्छामि’’ अर्थात् धर्म के शरण में जाओ का उपदेश देने का कार्य किये। गणराज्य स्थापना के शुभारम्भ के अन्तर्गत ग्राम, सभा, संघ या पंचायत से जुड़ने के लिए ‘‘संघ शरणं गच्छामि’’ का उपदेश देने का कार्य किये।
    कृष्णावतार के समय गणराज्य स्थापना के लिए व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य सत्य चेतना द्वारा अदृश्य मन में तय की गई सम्पूर्ण नीति का वह हिस्सा अर्थात् वह अपूर्ण मन जो कृष्ण पूर्ण नहीं कर पाये थे उसके कुछ प्राथमिक अंश जैसे -सन्यास, लोकधर्म, ध्यान अर्थात् काल चिन्तन और गणराज्य व्यवस्था का बीज जो मानव समाज का नये सिरे से सृष्टि का प्रथम चरण था वही कार्य बुद्धावतार में पूर्व कृष्णावतार से प्राप्त कर्मयोगी मन द्वारा ही बुद्ध ने पूर्ण किया था। बुद्ध द्वारा दिया गया ‘‘सम्यक’’ शब्द एकात्म ध्यान अर्थात् समभाव युक्त काल चिन्तन का ही बीज था जो कृष्ण के जीवन में समाहित था और गीतोपनिषद् में अव्यक्त रहा। चूॅकि एकात्म ध्यान, भगवान शिव-शंकर का स्वरूप है इसलिए वे अगले अवतार की दृष्टि रखते हुये अपने प्रचार का समस्त केन्द्र शिव-शंकर से जुड़ी स्थली के निकट ही रखें। बुद्ध अपने समस्त कार्यो को स्वयं जानते हुये कोई दार्शनिक आधार इसलिए नहीं दिये कि दार्शनिक आधार देने पर वह गीतोपनिषद् और कृष्ण में समाहित हो जाता परिणामस्वरूप कृष्ण का विवशतावश ही सही हिंसक जीवन और हिंसा कर्म की प्रधानता की ओर बढ़ते समाज में अहिंसा आधारित नये मानव समाज की सृष्टि कार्य असफल हो जाता। बुद्ध की कार्यप्रणाली दार्शनिक न होकर व्यावहारिक थी जो कर्मज्ञान अर्थात् कर्मवेद का सूक्ष्म बीज था। जिसकी व्यापकता के लिए उन्होंने हिंसक राजा सम्राट अशोक को अपने शरण में कर आन्दोलन का रूप दिये जो उस समय तक का दार्शनिक दृष्टि से पूर्णमुक्त सबसे बड़ा धर्मिक आन्दोलन था जो उनके महानिर्वाण के बाद इमारतों, मन्दिरों और बौद्ध धर्म में परिणत हो गया। बुद्ध का पूर्व नाम ‘‘सिद्धार्थ’’ अर्थात् ‘‘वह जिसने अपना उद्देश्य पूर्ण कर लिया हो।“ बुद्ध, मन की एक व्यावहारिक अवस्था अर्थात् बुद्धि है जो ज्ञान के साथ काल चिन्तन के संयोग से उत्पन्न होती है। छः वर्षो की साधना उन्होनें उम्र की परिपक्वता, सामाजिक विश्वसनीयता, कालानुसार कार्य और कार्यनीति के निर्धारण के लिए की थी। यदि बुद्ध व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य सत्य चेतना युक्त कृष्ण के अपूर्ण मन न होते तो वे बाह्य कारणों से प्रेरित होकर निष्काम कर्म की ओर बढ़ते परन्तु वे तो स्वयं अन्तः कारणों से प्रेरित थे जो उनमे कृष्ण के अपूर्ण मन का अंश था, से स्वयं अहैतुक कार्य के लिए कर्मयोगी बने थे।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 04 - जय प्रकाश नारायण - लाल बहादुर शास्त्री
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    06. लोकनायक जय प्रकाश नारायण (11 अक्टुबर, 1902 - 8 अक्टुबर, 1979)

    जेपी का ”सम्पूर्ण क्रान्ति“
    पटना के गाँधी मैदान पर लगभग 5 लाख लोगों के अतिउत्साही भीड़ भरी सभा में देश की गिरती हालत, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, महंगाई, अनुपयोगी शिक्षा पद्धति और प्रधानमंत्री द्वारा अपने ऊपर लगाये गए आरोपों का सविस्तार उत्तर देते हुए 5 जून, 1975 की विशाल सभा में जे.पी. ने घोषणा की- ”भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति लाना आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती है जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए। और, सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रान्ति-सम्पूर्ण क्रान्ति आवश्यक है। यह क्रान्ति है मित्रों और सम्पूर्ण क्रान्ति है। विधान सभा का विघटन मात्र इसका उद्देश्य नहीं है। यह तो महज मील का पत्थर है। हमारी मंजिंल तो बहुत दूर है और हमें अभी बहुत दूर तक जाना है। केवल मन्त्रिमण्डल का त्याग पत्र या विधानसभा का विघटन काफी नहीं है, आवश्यकता एक बेहतर राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करने की है। छात्रों की सीमित मांगें जैसे भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी का निराकरण, शिक्षा में क्रान्तिकारी परिवर्तन आदि बिना सम्पूर्ण क्रान्ति के पूरी नहीं की जा सकती। इस व्यवस्था ने जो संकट पैदा किया है वह सम्पूर्ण और बहुमुखी (टोटल एण्ड मल्टीडायमेन्सनल) है, इसलिए इसका समाधान सम्पूर्ण और बहुमुखी ही होगा। व्यक्ति का अपना जीवन बदले, समाज की रचना बदले, राज्य की व्यवस्था बदले, तब कहीं बदलाव पूरा होगा, और मनुष्य सुख और शान्ति का मुक्त जीवन जी सकेगा। हमें सम्पूर्ण क्रान्ति चाहिए, इससे कम नहीं।“ 

    विशाल जनसभा में जे.पी. ने पहली बार ”सम्पूर्ण क्रान्ति“ के दो शबदों का उच्चारण किया। क्रान्ति शब्द नया नहीं था, लेकिन ”सम्पूर्ण क्रान्ति“ नया था। गाँधी परम्परा में ”समग्र क्रान्ति“ का प्रयोग होता था। जे.पी. का ”सम्पूर्ण“, गाँधी का ”समग्र“ है।

    आजीवन पद-प्रतिष्ठा से दूर रहकर ”सम्पूर्ण क्रान्ति“ के उद्घोषक और लोक साहित्य को जिवित रखने के लिए प्रयत्नशील महानतम व्यक्तित्व। इनकी दिशा से शेष कार्य यह है कि व्यक्ति के पूर्णता के लिए साहित्य तथा सम्पूर्ण, सर्वोच्च और अन्तिम व्यवस्था का सूत्र व व्याख्या प्रस्तुत हो ताकि लोक साहित्य तथा सम्पूर्ण क्रान्ति का इनका सपना पूर्ण हो जाये।

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    क्रान्ति के प्रति विचार यह है कि- ”राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थिति में उसकी स्वस्थता के लिए परिवर्तन ही क्रान्ति है, और यह तभी मानी जायेगी जब उसके मूल्यों, मान्यताओं, पद्धतियों और सम्बन्धों की जगह नये मूल्य, मान्यता, पद्धति और सम्बन्ध स्थापित हों। अर्थात क्रान्ति के लिए वर्तमान व्यवस्था की स्वस्थता के लिए नयी व्यवस्था स्थापित करनी होगी। यदि व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन में विवेक नहीं हो, केवल भावना हो तो वह आन्दोलन हिंसक हो जाता है। हिंसा से कभी व्यवस्था नहीं बदलती, केवल सत्ता पर बैठने वाले लोग बदलते है। हिंसा में विवेक नहीं उन्माद होता है। उन्माद से विद्रोह होता है क्रान्ति नहीं। क्रान्ति में नयी व्यवस्था का दर्शन - शास्त्र होता है अर्थात क्रान्ति का लक्ष्य होता है और उस लक्ष्य के अनुरुप उसे प्राप्त करने की योजना होती है। दर्शन के अभाव में क्रान्ति का कोई लक्ष्य नहीं होता।“
    सम्पूर्ण क्रान्ति के लिए ही आविष्कृत है निम्न आविष्कार जिससे आपका सपना पूरा हो सके।
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है। 
    और यह कार्य भी आपके जीवन की भाँति पद-प्रतिष्ठा से दूर रहकर एक आम नागरिक का अपने देश के प्रति कर्तव्य के आधार पर सम्पन्न किया गया है।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    07. लाल बहादुर शास्त्री (2 अक्टुबर, 1904 - 11 जनवरी 1966)

    ”जय जवान-जय किसान“ - लाल बहादुर शास्त्री

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    विश्व का मूल मन्त्र- ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान-जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ 
    प्रगतिशील मानव समाज में मानव का विकास जैसे-जैसे होता गया उसके परिणामस्वरूप विभिन्न सामाजिक-असामाजिक विषय क्षेत्रों का भी विकास होता गया। समाज में प्रत्येक विषय क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। जिसमें किसी भी क्षेत्र को पूर्ण रूप में महत्वहीन नहीं कह सकते न ही पूर्ण रूप से महत्वपूर्ण कह सकते है। क्योंकि क्षेत्र कोई भी हो मानव की अपनी दृष्टि ही उसके उपयोग और दुरूपयोग से उस क्षेत्र को महत्वहीन, महत्वपूर्ण या सामाजिक-असामाजिक रूप में निर्धारण करती है। इसलिए मानव की दृष्टि जब तक विषय क्षेत्र के गुण, अर्थ, उपयोगिता और दुरूपयोगिता के ज्ञान पर केन्द्रीत नहीं होगी तब तक किसी भी क्षेत्र को निश्चित रूप से पूर्ण-महत्वपूर्ण निर्धारण कर पाना असम्भव है। यहाँ यह कहा जा रहा है कि वाह्य विषय क्षेत्र चाहे कोई भी हो वह मूलतः मानव द्वारा ही संचालित, आविष्कृत, नियमित और स्थापित की जाती है। इसलिए मानव का ज्ञान और कर्मज्ञान ही प्रत्येक विषय क्षेत्र की उपयोगिता और दुरूपयोगिता का निर्धारण करता है।
    प्रत्येक विषय का विकास सतत होता रहता है। आज हम जो कुछ भी उत्पाद व्यावहार में देखते है वह और यहाँ तक कि मानव का निर्माण भी एक लम्बे प्रक्रिया, सुधार, परीक्षण, रखरखाव इत्यादि का ही परिणाम है। सतत विकास के परिणामस्वरूप ही वह अपनी पूर्णता और अन्तिम स्वरूप को प्राप्त होता है। भारत के विकास का मूल मन्त्र भी विकास की प्रक्रिया को पार करते हुऐ अपने पूर्ण और अन्तिम स्वरूप में व्यक्त हो चुका है। भारत के पूर्ण मूलमन्त्र के स्वरूप का बीज भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्व0 लाल बहादुर शास्त्री ने ”जय जवान-जय किसान“ का नारा देकर कियेे। यह बीज समयानुसार भारत की मूल आवश्यकता थी, जो आज भी है और आगे भी रहेगी। यहाँ से भारत के मूलमन्त्र के स्वरूप का विकास प्रारम्भ होता है। मई 1998 में परमाणु बम परीक्षण के उपरान्त प्रधानमंन्त्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस मूलमंन्त्र के स्वरूप के विकास क्रम में ”जय विज्ञान“ जोड़कर मूलमन्त्र के स्वरूप को ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान“ के रूप में प्रस्तुत किये। जो समयानुसार आज की आवश्यकता है। जो आगे भी रहेगी।
    ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान“ तक ही भारत के मूलमन्त्र का पूर्ण विकसित अर्थात अन्तिम स्वरूप नहीं है क्योंकि जवान-किसान-विज्ञान तीनों स्थान पर मानव ही बैठा है इसलिए मूलमन्त्र के स्वरूप में जब तक मानव के निर्माण का सूत्र नहीं होगा तब तक मूलमन्त्र का स्वरूप भी पूर्ण नहीं हो सकता। इसी कमी को पूर्ण कर पूर्णता प्रदान करने के लिए ”विश्वबन्धुत्व“, ”वसुधैव-कुटुम्बकम्“, ”बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय“, ”एकात्म मानवतावाद“ की स्थापना के लिए एकात्मकर्मवाद आधारित सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त (धर्मयुक्त नाम - कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृखला अर्थात धर्मनिरपेक्ष-सर्वधर्मसम्भाव नाम- विश्वमानक - शून्य श्रृखंला: मन की गुणवता का विश्व मानक) का आविष्कार कर ”जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ को जोड़कर भारत के मूलमन्त्र को पूर्ण और अन्तिम स्वरूप- ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान-जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ को व्यक्त किया गया है। जो समयानुसार आज की आवश्यकता है जो आगे भी रहेगी। चूँकि भारत का सर्वोच्च और अन्तिम व्यापक रूप ही विश्व है। अर्थात भारत ही विश्व है और विश्व ही भारत है। इसलिए यह मूलमन्त्र भारत का ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का अन्तिम मूलमन्त्र है।
    ”ज्ञान“ जिससे हम अपने विचारो को एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम होते है। जैसा कि मई 1998 में भारत ने परमाणु बम परीक्षण के उपरान्त उठे विश्वव्यापी विवाद को समाप्त करने के लिए ”ज्ञान“ का प्रयोग कर अपने विचारों की समभाव रूप में विश्व में समक्ष रखने में सफल हुआ। ”कर्मज्ञान“ जिससे हम समभाव में स्थित हो कर्म करते है। अर्थात ईश्वरत्व भाव से उपलब्ध संसाधनों पर आधारित हो कर्म करते हैं। ”ज्ञान“ से हम सिर्फ एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य की भाषा बोल सकते हैं जबकि ”कर्मज्ञान“ से कार्य करते हुए एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य की भाषा बोल सकते है। ”ज्ञान“ यथावत् स्थिति बनाये रखते हुए शान्ति का प्रतीक है। तो ”कर्मज्ञान“ विकास करते हुये शान्ति बनाये रखने का प्रतीक है। ज्ञानावस्था में कर्म प्राकृतिक चेतना अर्थात शुद्धरूप से वर्तमान स्थिति में प्राथमिकता से कर्म करना, के अन्तर्गत होता है जबकि कर्मज्ञानावस्था में कर्म प्राकृतिक चेतना समाहित सत्य चेतना अर्थात भूतकाल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकता के साथ प्राथमिकता के साथ वर्तमान में कार्य करना, के अन्तर्गत होता है। वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओ को देखते हुऐ मात्र ”ज्ञान“ से ही अब विकास सम्भव नहीं है। क्यांेकि यह अवस्था ”नीतिविहीन“ अवस्था है। अब ”नीतियुक्त“ अवस्था कर्मज्ञानावस्था की आवश्यकता है। जिसके अभाव के कारण ही संसाधनों के होते हुये भी बेरोजगारी, अपराधों का विकास, विखण्डन इत्यादि विनाशक स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस कर्मज्ञान का आविष्कार सम्पूर्ण विश्व के मानवजाति के लिए महानतम उपलब्धि हैं।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 05 - राम मनोहर लोहिया - आर.वेंकटरामन
  •  भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    08. राम मनोहर लोहिया (23 मार्च, 1910 - 12 अक्टुबर, 1967)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    ”समाजवाद“, एक राजनीतिक शब्द। जिसका अर्थ है - एक समान भाव से रहन-सहन की पद्धति। यह फल है। जब तक मानव के अन्दर एकात्मक विचार का बीज नहीं बोया जायेगा, वह समाजवाद नामक फल नहीं दे सकता। इसके सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी के निम्न विचार विचारणीय हैं-
    ”भारत और समाजवाद विषयक अथवा राजनितिक विचारों से प्लावित करने से पहले यह आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाये। सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य निहित है, उन्हें इन सब ग्रंथों के पृष्ठों से बाहर लाकर, मठों की चहारदिवारियाँ भेदकर, वनों की नीरवता से दूर लाकर, कुछ-सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारो ओर से लपेट लें- उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सब जगह फैल जायें- हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्रा तक सर्वत्र वे धधक उठे।“ - स्वामी विवेकानन्द 
    ”भारत के शिक्षित समाज में मैं इस बात पर सहमत हूँ कि समाज का आमूल परिवर्तन करना आवश्यक है। पर यह किया किस तरह जाये? सुधारकों की सब कुछ नष्ट कर डालने की रीति व्यर्थ सिद्ध हो चुकी है। मेरी योजना यह है, हमने अतीत में कुछ बुरा नहीं किया। निश्चय ही नहीं किया। हमारा समाज खराब नहीं, बल्कि अच्छा है। मैं केवल चाहता हूँ कि वह और भी अच्छा हो। हमे असत्य से सत्य तक अथवा बुरे से अच्छे तक पहुँचना नहीं है। वरन् सत्य से उच्चतर सत्य तक, श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम तक पहुँचना है। मैं अपने देशवासियों से कहता हूँ कि अब तक जो तुमने किया, सो अच्छा ही किया है, अब इस समय और भी अच्छा करने का मौका आ गया है।“ - स्वामी विवेकानन्द

    शासक और मार्गदर्शक आत्मा सर्वव्यापी है। इसलिए एकात्म का अर्थ संयुक्त आत्मा या सार्वजनिक आत्मा है। जब एकात्म का अर्थ संयुक्त आत्मा समझा जाता है तब वह समाज कहलाता है। जब एकात्म का अर्थ व्यक्तिगत आत्मा समझा जाता है तब व्यक्ति कहलाता है। व्यक्ति (अवतार) संयुक्त आत्मा का साकार रुप होता है जबकि व्यक्ति (पुनर्जन्म) व्यक्तिगत आत्मा का साकार रुप होता है। शासन प्रणाली में समाज का समर्थक दैवी प्रवृत्ति तथा शासन व्यवस्था प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र या स्वतन्त्र या मानवतन्त्र या समाजतन्त्र या जनतन्त्र या बहुतन्त्र या स्वराज कहलाता है और क्षेत्र गण राज्य कहलाता है ऐसी व्यवस्था सुराज कहलाती है। शासन प्रणाली में व्यक्ति का समर्थक असुरी प्रवृत्ति तथा शासन व्यवस्था राज्यतन्त्र या राजतन्त्र या एकतन्त्र कहलाता है और क्षेत्र राज्य कहलाता है ऐसी व्यवस्था कुराज कहलाती है। सनातन से ही दैवी और असुरी प्रवृत्तियों अर्थात् दोनों तन्त्रों के बीच अपने-अपने अधिपत्य के लिए संघर्ष होता रहा है। जब-जब समाज में एकतन्त्रात्मक या राजतन्त्रात्मक अधिपत्य होता है तब-तब मानवता या समाज समर्थक अवतारों के द्वारा गणराज्य की स्थापना की जाती है। या यूँ कहें गणतन्त्र या गणराज्य की स्थापना-स्वस्थता ही अवतार का मूल उद्देश्य अर्थात् लक्ष्य होता है शेष सभी साधन अर्थात् मार्ग।
    समाज व्यक्ति के शारीरिक-आर्थिक-मानसिक विकास केन्द्रित है जबकि राजनीति सत्ता प्राप्ति केन्द्रित है। उसके बाद वह विकास की बात करेगी। अब यह उस पर निर्भर है कि एक समान भाव से करती है या पक्षपातपूर्ण या केवल सत्ताधारी स्वंय के लिए। व्यक्तिवाद से बड़ा चक्र समाजवाद है। समाजवाद से बड़ा चक्र राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद से बड़ा चक्र विश्वराष्ट्रवाद है। यह व्यक्ति के अन्दर व्यापक सोच और मस्तिष्क का विस्तार भी है और व्यापक समाज का निर्माण भी। बढ़ते बौद्धिक-ज्ञान के इस युग में छोटे चक्र से निकलना मनुष्य की प्रकृति है। बड़े लक्ष्य के सामने हमेशा छोटा चक्र विलीन हो जाता है, यह प्राकृतिक नियम है।
    सत्य समाजवाद लाने की एक प्रक्रिया ही है हमारा - ”मानक ग्राम“ और ”मानक नगर वार्ड“ का व्यावहारिक सिद्धान्त और उसका क्रियान्वयन।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    09. आर.वेंकटरामन (4 दिसम्बर, 1910 - 27 जनवरी, 2009)

    ‘‘ भारत के लिए फ्रांस की राष्ट्रपति प्रणाली ज्यादा उपयुक्त’’ - श्री आर0 वेंकटरामन, 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0-13-7-98

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ‘‘लोकतन्त्र विचारों को बद्ध कर सार्वजनिक सत्य को उपर करने का तन्त्र है जो विश्व व्यवस्था का अन्तिम सफल तन्त्र है। प्रणाली कोई भी हो जब तक समष्टि मन (विश्वमन या संयुक्तमन या लोकतन्त्र मन) के सभी तन्त्रों को विवादमुक्त करके शिक्षा द्वारा व्यक्ति में स्थापित नहीं किया जाता, तब तक न ही स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग और स्वस्थ लोकतन्त्र की प्राप्ति हो सकती है, न ही कोई भी प्रणाली सफल हो सकती है। प्रणाली कोई भी हो, वर्तमान की कार्यप्रणाली-कार्य के उपरान्त ज्ञान प्राप्त करने पर आधारित है, इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक विकास का कार्य विकास की ओर ही जाता हो, वह विनाश की ओर भी जा सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि नैतिक उत्थान, आत्मनिर्भरता, नेतृत्व क्षमता, प्रबन्धकीय क्षमता इत्यादि गुणों पर आधारित कार्यप्रणाली - ज्ञान के उपरान्त कार्य करने पर आधारित को स्थापित किया जाये जिससे प्रणाली और नेतृत्व कत्र्ता चाहे जैसे भी क्यों न हों, विकास को सतत विकास की ओर तथा भविष्य के नेतृत्वकत्र्ताओं को नैतिकता युक्त बनाया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि विकास दर्शन या विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम या क्रियाकलपों का विश्वमानक या विश्वमानक-शून्य श्रंृखला: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक की स्थापना भारत तथा विश्व में हों।’’

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 06- पं0 दीन दयाल उपाध्याय - इन्दिरा गाँधी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    10. पं0 दीन दयाल उपाध्याय (25 सितम्बर, 1916 - 11 फरवरी, 1968)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
    जब-जब व्यक्ति अपने मन को एकात्मवाद के सर्वोच्च स्तर पर केन्द्रित कर उसे सत्यार्थ करने का प्रयत्न किया तब-तब वह व्यक्ति महापुरूष के रूप में व्यक्त हुए। जबकि औषधि आधारित अर्थववेद में इस एकात्मवाद की उपयोगिता का ज्ञान पहले से ही विद्यमान है। जिसके सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं- ‘‘अतः यदि भारत को महान बनाना है, तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन की, शक्ति संग्रह की और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उसमें समन्वय लाने की। अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ गयी जिसमें कहा गया है, ‘‘तुम सब लोग एक मन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ। एक मन हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है बस इच्छाशक्ति का संचय और उनका समन्वय कर उन्हें एकमुखी करना ही सारा रहस्य है।’’ (देखें ‘‘नया भारत गढ़ो’’ पृष्ठ संख्या-55) एकात्म भाव के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं- ‘‘यह भी न भूलना चाहिए कि हमारे बाद जो लोग आएंगे, वे उसी तरह हमारे धर्म और ईश्वर सम्बन्धी धारणा पर हँसेंगे, जिस तरह हम प्राचीन लोगों के धर्म और ईश्वर की धारणा पर हँसते हैं। यह सब होने पर भी, इन सब ईश्वर सम्बन्धित धारणाओं का संयोग करने वाला एक स्वर्ण सूत्र है और वेदान्त का उद्देश्य है - इस सूत्र की खोज करना। भागवान कृष्ण ने कहा है-‘‘भिन्न भिन्न मणियाँ जिस प्रकार एक सूत्र में पिरोयी जा सकती हैं, उसी प्रकार इन सब विभिन्न भावों के भीतर भी एक सूत्र विद्यमान है।’’ (देखें ‘‘ज्ञानयोग’’, पृष्ठ संख्या - 65) और स्वर्ण सूत्र के सम्बन्ध में स्वामी जी कहते हैं - एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है - मनुष्य के सच्चे स्वरूप को जानना।’’ (देखें ‘‘विवेकानन्द राष्ट्र को आह्वान’’, पृष्ठ सं0 - 48)। पं0 दीनदयाल उपाध्याय जी की अनुभूति भी एकात्मभाव के सर्वोच्च स्तर पर केन्द्रित थी जिसे ‘‘एकात्म मानवतावाद’’ के रूप में जाना जाता है।
    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा इस सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट कहा गया है- ”यदि तुम समग्र जगत के ज्ञान से पूर्ण होना चाहते हो तो पाँच भाव- विचार एवं साहित्य, विषय एवं विशेषज्ञ, ब्रह्माण्ड (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप, मानव (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप तथा उपासना स्थल का सामंजस्य कर एक मुखी कर लो। यही समग्र जगत का ज्ञान है, भविष्य है, रहस्य है, पूर्ण ज्ञान है, समाज गठन है, पुस्तकालय के ज्ञान से सर्वोच्च है।“ विचार के सम्बन्ध में कहा गया है- ”यह अद्वैत (एकत्व) ही धर्मनिरपेक्ष है, सर्वधर्मसमभाव है। वेदान्त तथा मानव का सर्वोच्च दर्शन है। जहाँ से मानव विशिष्टाद्वैत, द्वैत एवं वर्तमान में मतवाद के मानसिक गुलामी में गिरा है परन्तु मानव पुनः इसी के उल्टे क्रम से उठकर अद्वैत में स्थापित हो जायेगा। तब वह धर्म में स्थापित एवं विश्वमन से युक्त होकर पूर्ण मानव अर्थात् ईश्वरस्थ मानव को उत्पन्न करेगा।“ साहित्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”मानव एवं प्रकृति के प्रति निष्पक्ष, संतुलित एवं कल्याणार्थ कर्म ज्ञान के साहित्य से बढ़कर आम आदमी से जुड़ा साहित्य कभी भी आविष्कृत नहीं किया जा सकता। यही एक विषय है जिससे एकता, पूर्णता एवं रचनात्मकता एकात्म भाव से लाई जा सकती है। संस्कृति से राज्य नहीं चलता कर्म ज्ञान से राज्य चलता है। संस्कृति तभी तक स्वस्थ बनी रहती है जब तक पेट में अन्न हो, व्यवस्थाएं सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त युक्त हों, दृष्टि पूर्ण मानव निर्माण पर केन्द्रित हो। संस्कृति कभी एकात्म नहीं हांे सकती लेकिन रचनात्मक दृष्टिकोण एकात्म होता है जो कालानुसार कर्म ज्ञान और कर्म है। अदृश्य काल में अनेकात्म तथा दृश्य काल में एकात्म कर्म ज्ञान अर्थात् एकात्म रचनात्मक दृष्टिकोण होता है यहीं कर्म आधारित भारतीय संस्कृति है जो प्रारम्भ में भी था और अन्त में पुनः स्पष्ट हो रहा है यहीं सभी संस्कृतियों का मूल भी है।“ काल के सम्बन्ध में कहा गया है- ”जब व्यष्टिमन की शान्ति अन्तः विषयों जो सिर्फ अदृश्य विषय मन द्वारा ही प्रमाणित होता है, पर केन्द्रित होती है तो उसे व्यष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब व्यष्टि मन की शान्ति दृश्य विषयों अर्थात् वाह्य विषयों, जो सार्वजनिक रुप से प्रमाणित है पर केन्द्रित होता है तो उसे व्यष्टि दृश्यकाल कहते हैं इसी प्रकार सम्पूर्ण समाज का मन जब अदृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे समष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब सम्पूर्ण समाज का मन जब दृश्य विषयों पर केन्द्रित होता है तो उसे समष्टि दृष्यकाल कहते हैं“ कर्म ज्ञान के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”व्यक्ति जब सम्पूर्ण समष्टि अदृश्य काल में हो तो उसे अदृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार तथा जब सम्पूर्ण समष्टि दृश्य काल में हो तो उसे दृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार कर्म करने चाहिए तभी वह ब्रह्माण्डीय विकास के लिए धर्मयुक्त या एकता बद्ध होकर कार्य करेगा।“ स्वर्ण सूत्र के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”मानक अर्थात् आत्मा अर्थात् सत्य-धर्म-ज्ञान स्थिर रहता है लेकिन मन को इस ओर लाने वाले सूत्र भिन्न-भिन्न होंगे क्योंकि जो उत्पन्न है वह स्थिर नहीं है। अदृश्य काल में यह सूत्र अनेक होंगे लेकिन दृश्य काल के लिए हमेशा एक ही होगा क्योंकि वह सार्वजनिक प्रमाणित होगा।“ स्वर्ण सूत्र के गुण के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”अतः यदि भारत को महान बनना है, विश्वगुरु बनाना है, भारतीय संविधान को विश्व संविधान में परिवर्तित करना है तो एकात्मकर्मवाद पर आधारित दृश्य काल के लिए एक शब्द चाहिए जो परिचित हो, केवल उसकी शक्ति का परिचय कराना मात्र हो, स्वभाव से हो, स्थिर हो, समष्टि हो, दृश्य हो, सम्पूर्ण हो, विवादमुक्त हो, विश्वभाषा में हो, आध्यात्मिक एवं भौतिक कारण युक्त हो, सभी विश्वमन के तन्त्रों, व्यक्ति से संयुक्त राष्ट्र संघ के सच्चे स्वरुप एवं विश्व के न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो, मानव एवं प्रकृति के विकास में एक कड़ी के रुप मंे निर्माण के लिए सक्षम हो, मानव एवं प्रकृति के विकास के कल्याणार्थ, निष्पक्ष, सर्वोच्च दृश्य ज्ञान व दृश्य कर्म ज्ञान का संगम हो अदृश्य काल के विकास के सात चक्रों (पाँच अदृश्य कर्म चक्र एवं दो अदृश्य ज्ञान कर्म चक्र जो सभी सम्प्रदायों और धर्मों का मूल है) को दृश्य काल के सात चक्रों (पाँच दृश्य कर्म चक्र, एक दृश्य ज्ञान कर्म चक्र और एक अदृश्य ज्ञान कर्म चक्र) को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो, को स्थापित करना पड़ेगा। यह भारत सहित नव विश्व निर्माण का सूत्र है, अन्तिम रास्ता है और उसका प्रस्तुतीकरण प्रथम प्रस्तुतीकरण होगा।“ 
    वर्तमान समय में विवादास्पद शब्द ”सेक्युलर“ को स्पष्ट करते हुए लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा कहा गया है कि- ”जब सभी सम्प्रदायों को धर्म मानकर हम एकत्व की खोज करते हैं तब दो भाव उत्पन्न होते हैं। पहला-यह कि सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखें तब उस एकत्व का नाम सर्वधर्मसमभाव होता है। दूसरा-यह कि सभी धर्मों को छोड़कर उस एकत्व को देखें तब उसका नाम धर्म निरपेक्ष होता है। जब सभी सम्प्रदायों को सम्प्रदाय की दृष्टि से देखते हैं तब एक ही भाव उत्पन्न होता है और उस एकत्व का नाम धर्म होता है। इन सभी भावों में हम सभी उस एकत्व के ही विभिन्न नामों के कारण विवाद करते हैं अर्थात् सर्वधर्मसमभाव, धर्मनिरपेक्ष एवं धर्म विभिन्न मार्गों से भिन्न-भिन्न नाम के द्वारा उसी एकत्व की अभिव्यक्ति है। दूसरे रुप में हम सभी सामान्य अवस्था में दो विषयों पर नहीं सोचते, पहला- वह जिसे हम जानते नहीं, दूसरा- वह जिसे हम पूर्ण रुप से जान जाते हैं। यदि हम नहीं जानते तो उसे धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव कहते हैं जब जान जाते हैं तो धर्म कहते हैं। इस प्रकार आई0 एस0 ओ0/डब्ल्यू0 एस0- शून्य श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव नाम तथा कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मयुक्त नाम है तथा इन समस्त कार्यों को सम्पादित करने के लिए जिस शरीर का प्रयोग किया जा रहा है उसका धर्मयुक्त नाम-लव कुश सिंह है तथा धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव सहित मन स्तर का नाम विश्वमानव है जब कि मैं (आत्मा) इन सभी नामों से मुक्त है।“
    विचार प्रसार एवं विचार स्थापना के लिए कहा गया है कि- ”विचार प्रसार एवं विचार स्थापना में एक मुख्य अन्तर है। विचार प्रसार, विचाराधीन होता है। वह सत्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता परन्तु विचार स्थापना सत्य होता है। विचार स्थापना में नीति प्रयोग की जाती है जिससे उसका प्रभाव सत्य के पक्ष में बढ़ता रहता है और यह विचार स्थापक एवं समाज पर निर्भर करता है जबकि विचार प्रसार में किसी नीति का प्रयोग नहीं होता है जिससे उसका प्रभाव पक्ष पर एवं विपक्ष दोनों ओर हो सकता है और वह सिर्फ समाज के उपर निर्भर करता हैै।“
    इस प्रकार एकात्मकर्मवाद सत्य अर्थों में प्राच्य एवं पाश्चात्य, समाज एवं राज्य, धर्म, धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव की एकता के साथ स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग, नैतिक उत्थान, विश्व व्यवस्था, विश्वएकता, विश्व शान्ति, विश्व विकास, विश्व के भविष्य और उसके नवनिर्माण का प्रथम माॅडल है जो वर्तमान समाज की आवश्यकता ही नहीं अन्तिम मार्ग है।

     

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    11. इन्दिरा गाँधी (19 नवम्बर, 1917 - 31 अक्टुबर, 1984)

    ”राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए मानकीकरण एवं गुणता नियन्त्रण अनिवार्य है। ये उत्पाद को उसकी सामग्री और मानवीय साधनों के पूर्ण उपभोग में सहायता करते हैं उपभोक्ता का बचाव करते हैं और आंतरिक व्यवहार तथा निर्यात का स्तर ऊँचा उठाते हैं। इस प्रकार से ये आर्थिक विकास में भागीदार बनते हैं।“ - श्रीमती इन्दिरा गाँधी
    (भारतीय मानक ब्यूरो त्रैमासिकी- ”मानक दूत“, वर्ष-19, अंक- 1’1999 से साभार)


    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    दो या दो से अधिक माध्यमों से उत्पादित एक ही उत्पाद के गुणता के मापांकन के लिए मानक ही एक मात्र उपाय है। सतत् विकास के क्रम में मानकों का निर्धारण अति आवश्यक कार्य है। उत्पादों के मानक के अलावा सबसे जरुरी यह है कि मानव संसाधन की गुणता का मानक निर्धारित हो क्योंकि राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के मन को भी आधुनिक अर्थात् वैश्विक-ब्रह्माण्डीय करना पड़ेगा। तभी मनुष्यता के पूर्ण उपयोग के साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य के सही उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्कृष्ट उत्पादों के लक्ष्य के साथ हमारा लक्ष्य उत्कृष्ट मनुष्य के उत्पादन से भी होना चाहिए जिससे हम लगातार विकास के विरुद्ध नकारात्मक मनुष्योें की संख्या कम कर सकें। भूमण्डलीकरण सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में कर देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि यदि मनुष्य के मन का भूमण्डलीकरण हम नहीं करते तो इसके लाभों को हम नहीं समझ सकते। आर्थिक संसाधनों में सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य ही है। मनुष्य का भूमण्डलीकरण तभी हो सकता है जब मन के विश्व मानक का निर्धारण हो। ऐसा होने पर हम सभी को मनुष्यों की गुणता के मापांकन का पैमाना प्राप्त कर लेगें, साथ ही स्वयं व्यक्ति भी अपना मापांकन भी कर सकेगा। जो विश्व मानव समाज के लिए सर्वाधिक महत्व का विषय होगा। विश्व मानक शून्य श्रृंखला मन का विश्व मानक है जिसका निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है जो यह निश्चित करता है कि समाज इस स्तर का हो चुका है या इस स्तर का होना चाहिए। यदि यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित होगा तो निश्चित ही अन्तिम मानक होगा।
    मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे- ISO-9000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो (Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 07 - शंकर दयाल शर्मा - जाॅन पाल, द्वितीय - के.आर.नारायणन - चन्द्रशेखर
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    12. शंकर दयाल शर्मा (19 अगस्त, 1918 - 26 दिसम्बर, 1999)

    ‘‘आम आदमी से दूर हटकर साहित्य तो रचा जा सकता है, लेकिन वह निश्चित तौर पर भारतीय जन जीवन का साहित्य नहीं हो सकता। आम आदमी से जुड़ा साहित्य ही समाज के लिए कल्याकाणकारी हो सकता हैं।’’ -श्री शंकर दयाल शर्मा, 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0-25-9-97

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ‘‘मानव एवम् प्रकृति के प्रति सन्तुलित कर्मज्ञान के साहित्य से बढ़कर आम आदमी से जुड़ा कोई साहित्य कभी भी आविष्कृत नहीं किया जा सकता। यही एक विषय है जिससे एकता, पूर्णता एवम् रचनात्मकता एकात्म भाव से लायी जा सकती है। कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद आम आदमी से जुड़ा साहित्य ही है। कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचवेद धार्मिक साहित्य है जिसकी स्थापना धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव भारतीय संविधान के अनुसार नहीं हो सकती। इसलिए अब विश्वमानक -शून्य श्रंखलाः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक के रूप में व्यक्त किया गया है जो धर्मनिरपेक्ष भी है और सर्वधर्मसमभाव भी है।’’


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    13. जाॅन पाल, द्वितीय (18 मई, 1920 - 2 अप्रैल 2005)

    ”विश्व का रूपान्तरण तभी सम्भव है जब सभी राष्ट्र मान ले कि मानवता के सामने एक मात्र विकल्प शान्ति, परस्पर समभाव, प्रेम और एकजुटता है। भारतीय धर्मो के प्रतिनिधियों से मित्रवत् सूत्रपात होगा। तीसरी सहस्त्राब्दि में एशियाई भूमि पर ईसाइयत की जड़े मजबूत होंगी। इस सहस्त्राब्दि को मनाने का अच्छा तरीका वही होगा। कि हम धर्म के प्रकाश की ओर अग्रसर हो और समाज के प्रत्येक स्तर पर न्याय और समानता के बहाल के लिए प्रयासरत हो। हम सबको विश्व का भविष्य सुरक्षित रखने और उसे समृद्ध करने के लिए एकजुट होना चाहिए। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी उतनी ही आवश्यक है। धर्म को कदापि टकराव का बहाना नहीं बनाना चाहिए-भारत को आशीर्वाद“ (भारत यात्रा पर) -पोप जान पाल, द्वितीय, 
    साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद, दि0 - 08-11-99

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”आपको जानना चाहिए कि सन् 1893 में भारत का एक युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द अमेरिका और युरोपीय देशों में अन्य धर्मावलम्बीयों के विरोध और बाधा खड़ी करने के बावजुद जो विचार समझाने का प्रयत्न कर रहा था वह था- ‘विश्व बन्धुत्व’, ‘करूणावश दूसरो की भलाई करना अच्छा है पर शिव ज्ञान से जीव सबसे उत्तम’, ‘ मैं उसी को महात्मा कहता हँू कि जिसका हृदय गरीबों के लिए रोता है’। उस समय वह विचार लोगों को कितना प्रभावित किया यह बात अलग है परन्तु 111 वर्ष बाद वर्तमान में जो भी भारत की यात्रा पर आता है या विश्व एकता पर विचार करता है उसकी वाणी में ही विश्व-बन्धुत्व ही अन्य रूपों में व्यक्त होता है। और यही विचार ईसाइयत के भारत सहित एशिया में जड़ मजबूत करने का आधार है। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था- ‘यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म हो सकता है, तो वह ऐसा ही होगा, जो देश-काल से मर्यादित न हो, जो उस अनन्त भगवान के समान ही अनन्त हो, जिस भगवान के सम्बन्ध में वह उपदेश देता है, जिसकी ज्योति श्रीकृष्ण के भक्तों पर और ईसा के प्रेमियों पर, सन्तों पर या पापियों पर समान रूप से प्रकाशित होती है, जो न तो ब्राह्मणों का हो, न बौद्धों का, न ईसाइयों का और न मुसलमानों का वरन् इन सभी वर्गों का समष्टि स्वरूप होते हुये भी जिसमें उन्नति का अनन्तपथ खुला रहें, जो इतना सर्वव्यापक हो कि अपनी असंख्य बाहुओं द्वारा सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य का प्रेम पूर्वक आलिंगन करें। वह विश्व धर्म ऐसा होगा कि उसमें किसी के प्रति विद्वेष अथवा अत्याचार के लिए स्थान न रहेगा, वह प्रत्येक स्त्री और पुरूष के ईश्वरीय स्वरूप को स्वीकार करेगा और उसका सम्पूर्ण बल मनुष्य मात्र को उसकी सच्ची ईश्वरीय प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रीत रहेगा। सभी समाजिक उत्थान करने वाले कम से कम उसके नेतागण, यह प्रयत्न कर रहे है कि उनके समस्त साम्यवाद या समानता स्थापित करने वाले सिद्धान्तों का आधार आध्यात्मिक हो और वह आध्यात्मिक आधार केवल वेदान्त में है। मेरे व्याख्यानों में उपस्थित होने वाले नेताओं ने मुझसे कहा है कि नई रचना के आधार के लिए उन्हें वेदान्त की आवश्यकता है। इस सामंजस्य को लाने के लिए दोनों को ही आदान-प्रदान करना होगा, त्याग करना पड़ेगा, यही नहीं कुछ दुःखद बातों को भी सहन करना पड़ेगा। मैं हिन्दू हूँ, मैं अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा यही समझता हूँ कि मेरा कुआँ सम्पूर्ण संसार है। ईसाई भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा यही समझता है कि सारा संसार उसी के कुएँ में है और मुसलमान भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा उसी को सारा ब्रह्माण्ड मानता है। क्या मैं यह चाहता हूँ। कि ईसाई लोग हिन्दू हो जाये? कदापि नहीं, ईश्वर ऐसा न करें। क्या मेरी इच्छा है कि हिन्दू और बौद्ध लोग ईसाई हो जाय? ईश्वर इस इच्छा से बचाएँ! प्रतिकूल परिस्थितियों को वीरता पूर्वक पराभूति करने में ही आत्मोन्नति की कूंजी है। आध्यात्मिक उन्नति के नियमों को आत्मसात् करना ही जीवन का उद्देश्य है। हिन्दूओं से ईसाई लोग ज्ञान प्राप्त करें। और ईसाई लोग से हिन्दू। संसार के ज्ञान भण्डार में प्रत्येक का बहुमूल्य योग है। एक सच्चा ईसाई, सच्चा हिन्दू होता है और एक सच्चा हिन्दू, सच्चा ईसाई। आज हमें आवश्यकता है वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान की ब्रह्मचर्य के आदर्श और श्रद्धा तथा आत्मविश्वास की। वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य के अन्तर में- एक अबोध शिशु में भी- ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है, केवल उसे जागृत होने की आवश्यकता है और यही आचार्य का काम है। पर इस सब का मूल है धर्म- वही मुख्य है । धर्म तो भात के समान है, शेष सब वस्तुएँ तरकारी और चटनी जैसी है। केवल तरकारी और चटनी, चाटने से अपथ्य हो जाता है, और केवल भात खाने से भी। पिछले महापुरूष अब कुछ प्राचीन हो चले है अब नवीन भारत है जिसमें नीवन ईश्वर, नवीन धर्म और नवीन वेद है। हे भगवान, भूतकाल का निरन्तर ध्यान रखने की आदत से हमारा देश कब मुक्त होगा?’ मात्र इतना ही समझने के लिए काफी होगा। भारतीय धर्मो से नये मित्रवत् सूत्रों को प्रस्तुत किया जा चुका है। जिसे आपकी भाषा में शब्दवेद या सत्यवेद कहते है। धर्म के प्रकाश की ओर शुद्ध सत्य अन्तिम आध्यात्म से जाने के लिए मार्ग वर्तमान व्यवस्था प्रणाली द्वारा ही प्रशस्त है इसलिए सभी धर्मो और देशों की विवशता भी है। भारत, भौतिक रूप से अपनी सीमा तक है परन्तु आध्यात्मिक रूप से विश्व भारत है। भारत, विश्व है। इसलिए इसका प्राकृतिक रूप से ही दो नाम-भारतीय भाषा में- भारत तथा विश्व भाषा में- इण्डिया है। भारत, अपने आपको विश्वरूप में सिद्व करने लिए ही सम्पूर्ण मानवता के दर्शन को सर्वधर्मसमभाव या धर्मनिरपेक्ष ईश्वर नाम- TRADE CENTRE में स्थापित कर दिया है जो विश्व भाषा, आपकी भाषा और आपकी ही संस्कृति द्वारा आविष्कृत है। इसलिए अब मानव शरीर में उसका सत्यरूप वेदान्त रहेगा अर्थात मन-मस्तिष्क वेदान्ती होगा सिर्फ बाह्य आडम्बर अपने-अपने धर्मो के होंगे। भारत तो सनातन से विश्व के लिए आशीर्वाद स्वरूप ही है। उसे आशीर्वाद की क्या आवश्यकता। और यदि कोई आशीर्वाद देता है तो हमारी संस्कृति के अनुसार उसे अपने आर्शीवाद की सत्यता प्रमाणित करने के लिए कर्म करना पड़ता है क्योंकि आशीर्वाद देने वाला अपने वाणी को असत्य नहीं देखना चाहता, चाहे उसके लिए उसे कई जन्म ही क्यों न लेने पड़े। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है?“


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    14. के.आर.नारायणन (27 अक्टुबर, 1920 - 9 नवम्बर, 2005)

    ‘हमारी संस्कृति कभी एकात्म नहीं रही। भारतीय संस्कृति की विशेषता विभिन्न संस्कृतियों को स्वीकार करने और उनके प्रति रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की रही है।’’ - श्री के0 आर0 नारायणन, 
    साभार - आज, वाराणसी, दि0. 23-9-97


    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है - ‘‘अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ गई, जिसमें कहा गया है, तुम सब लोग एक मन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ। एक मन हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है। बस इच्छाशक्ति का संचय और उनका समन्वय कर उन्हें एक मुखी करना ही वह सारा रहस्य है।’’(‘‘नया भारत गढ़ो’’, रामकृष्ण मिशन, पृष्ठ संख्या-55)
    ‘‘संस्कृति से राज्य नहीं चलता। कर्म से राज्य चलता हैं। संस्कृति तभी तक स्वस्थ बनी रहती है, जब पेट मे अन्न हो, व्यवस्थायें सत्य-सिद्धान्त युक्त हों, दृष्टि पूर्ण मानव के निर्माण पर केन्द्रित हो। संस्कृति एकात्म कभी भी नहीं हो सकती लेकिन रचनात्मक दृष्टिकोण एकात्म होता है जो कालानुसार कर्मज्ञान और ज्ञान है। अदृश्यकाल में अनेकात्म और दृश्यकाल में एकत्म कर्म ज्ञान होता है और यहीं भारतीय संस्कृति है। जो प्रारम्भ में थी और पुनः व्यक्त हो रही है। जो सभी संस्कृतियों का मूल है। विश्वमानक शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला उसी एकात्म कर्मज्ञान का शास्त्र साहित्य है। वर्तमान समय कर्म करने का है न कि विचार प्रस्तुत करने का। क्योंकि सभी कुछ व्यक्त किये जा चुके है। सोचने का विषय है- मनुष्य नियमों को बनाता है या नियम, मनुष्य को बनाते हैं।’’


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    15. अशोक सिंघल ( 27 सितम्बर 1926 - 17 नवम्बर 2015)

    ”हिन्दू-बौद्ध एकता से विश्व में बढ़ते ईसाइयों और इस्लाम के विस्तारवादी मनोवृत्ति को रोकने में निश्चित रूप से सफलता“ (लुम्बीनी में आयोजित सभा में) - श्री अशोक सिंघल, अन्तर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी दि- 20-01-2000

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”महोदय, हिन्दूभाव और धर्म सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित है। सत्य सर्वव्यापक, सर्वविद्यमान और सर्वशक्तिमान होता है परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म भी सर्वशक्तिमान है। बस अन्तर होता है उसकी व्यापकता के प्रक्षेपण में। आप सब हिन्दू-हिन्दू चिल्लाते हैं उससे कहीं कम समय चिन्तन, मनन, कालानुसार रूपान्तरण पर प्रयत्न किये होते तो धर्मो की एकता और दूसरे धर्मो को रोकने की उन्मादी प्रवृत्ति से युक्त शब्द वेदी वक्तव्य बोलने की आवश्यकता ही न पड़ती वरन् वर्तमान समय में स्थापित करने की आवश्यकता पड़ती। किसी धर्म को रोकने की आवश्यकता नहीं, सभी को आत्मसात् अर्थात अपने व्यापक स्वरूप में लपेट लेने की आवश्यकता है। अब तो कालानुसार रूपान्तरण भी हो चुका है। अब तो कम से कम स्थापना के लिए कर्मो से न सही शब्दों से ही सही, लग तो जाइये।“
    हिन्दू - बौद्ध एकता के सम्बन्ध में ही स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने अन्तिम समय में जो कहा था वह पूर्ण हो चुका है और सार्वभौम एकीकरण के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित नव हिन्दू धर्म अपने शास्त्र - विश्वशास्त्र के साथ व्यक्त है।

    ”बौद्ध धर्म और नव हिन्दू धर्म के सम्बन्ध के विषय में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। उन विचारों को निश्चित रुप देने के लिए कदाचित् मैं जिवित न रहूँ परन्तु उसकी कार्य प्रणाली का संकेत मैं छोड़ जाऊँगा और तुम्हें और तुम्हारे भातृ-गणों को उस पर काम करना होगा। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-310) - स्वामी विवेकानन्द

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    16. चन्द्रशेखर (1 जुलाई, 1927 - 8 जुलाई, 2007)

    - लोकनायक जयप्रकाश के सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा साकार नहीं हुआ, वे लोक साहित्य को जिवित रखने का प्रयास कर रहे थे। (लोकनायक जयप्रकाश नारायण जन्म शताब्दी समारोह, जय प्रकाश नगर, बलिया (उ0 प्र0), 11 अक्टूबर’2001) -चन्द्रशेखर (पूर्व प्रधानमन्त्री, भारत)

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”महोदय आपकी सत्य दृष्टि ने ठीक पहचाना है। सम्पूर्ण क्रान्ति का अर्थ है- सभी विषयों के नये और अन्तिम अर्थों की स्थापना। और यह मनुष्य जाति के जीवन में सिर्फ एक बार और अन्तिम बार ही घटित होती है। क्योंकि अलग-अलग विषयों का नया अर्थ बार-बार परिष्कृत हो सकता हेै परन्तु एक ही सार्वजनिक प्रमाणित सिद्धान्त से सभी विषयों का सर्वोच्च अन्तिम सत्य अर्थ सिर्फ एक ही बार और अन्तिम बार ही सम्भव है। क्योंकि उसके बाद उसकी परिभाषा परिष्कृत नहीं की जा सकती। लोक साहित्य उसे कहते हैं जो सर्व व्यापी-सार्वभौम हो और प्रत्येक व्यक्ति चाहे जिस जाति-धर्म-देश का हो, से जुड़ा हो। और उसके लिए आवश्यक हो। यह साहित्य ही लोकतन्त्र में से गायब लोक का साकार रुप होगा। जो शुद्धात्माओं के अन्तः में स्थित रहता है। और जो अब विश्वमानक शून्य: मन (मानव संसाधन) की गुणवत्ता का विश्वमानक के विश्व व्यापी स्थानार्थ आधुनिक नाम से व्यक्त हो चुका है।“

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 08 - रोमेश भण्डारी - के. एस. सुदर्शन - विश्वनाथ प्रताप सिंह - अब्दुल कलाम
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    17. रोमेश भण्डारी (29 मार्च, 1928 - 7 सितम्बर, 2013)

    ‘शिक्षा प्रक्रिया मे व्यापक सुधारों की जरूरत है। ‘यह रास्ता दिल्ली की ओर जाता है’ लिखा साइन बोर्ड पढ़ लेना मात्र शिक्षा नहीं है। इसके बारे में चिन्तन करना पड़ेगा और कोई लक्ष्य निर्धारित करना पडे़गा। सामाजिक परिवर्तन किस तरह से, इसकी प्राथमिकताये क्या होगीं? यह तय करना पड़ेगा। इक्कीसवी शताब्दी के लिए हमें कार्यक्रम तय करने पडे़गे। मौजूदा लोकतन्त्र खराब नहीं है परन्तु इसको और बेहतर बनाने की आवश्यकता है।’’ - पूर्व राज्यपाल, उ0 प्र0, श्री रोमेश भण्डारी, 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 11-9-97

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    जब तक समष्टि तंत्रों (विश्वमन या संयुक्त मन या लोकतन्त्र मन या समाज मन का तन्त्र) को विवाद मुक्त कर उसे व्यष्टि (व्यक्ति) में शिक्षा के माध्यम से स्थापित नहीं किया जाता तब तक स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग तो दूर, बेहतर भी नहीं बल्कि बदतर अवस्था को प्राप्त होता रहेगा। यह कार्य इक्कीसवीं शताब्दी और भविष्य का कार्यक्रम, लगातार विकास को विकास की ओर गति देने का लक्ष्य, शिक्षा को पूर्ण बनाने इत्यादि का ही कार्य है।’’

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    18. के. एस. सुदर्शन (18 जून, 1931 - 15 सितम्बर, 2012)

    ”हिन्दू चिन्तन पर आधारित नई आचार संहिता बने।“ -श्री के. एस. सुदर्शन, प्रमुख राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 
    साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 16-03-2000

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”हिन्दू धर्म में जब भी कोई महापुरूष व्यक्त होता है और वर्तमान से भूतकाल में चला जाता है तब वह राष्ट्रीय स्वयं संघ के अधीन पेटेण्ट हो जाता है। सिर्फ जपने के लिए। संघ का बुद्धि 75 वर्षो के अपने कार्यकाल के बाद हिन्दू धर्म के लिए सिर्फ यह व्यक्त करता है, वह भी स्वामी विवेकानन्द के 100 वर्षो बाद और द्वारिकापीठाधीष्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी के मई 1997 में वही व्यक्त करने के बाद कि हिन्दू चिन्तन पर आधारित नई आचार संहिता बने’ तो कोई नई बात नहीं और संघ को क्या कहा जाय। सिर्फ यही कहा जा सकता है कि भूतकाल को जपने वाले अन्ततः भूतकाल की ही बातें करते रहते हैं। फिर आप लोग कहते किससे है? भारतीय संस्कृति का ज्ञाता संघ को ही आचार संहिता बनाना चाहिए। नई आचार संहिता की बात पुरानी हो चुकी है वह भूतकाल बन आपके समक्ष है। अब आपको क्या करना है? यह सोचें। महोदय इसमें आपकी गलती नहीं है। एक ही स्थिति, एक ही विषय, एक ही चिन्तन इत्यादि में लम्बे अवधि तक पड़े रहने से बुद्धिबद्ध हो जाती है। सोचिये संघ ने देश में कितने बुद्धि बद्धों का निर्माण कर दिया है सर्वप्रथम संघ, हिन्दू को भारत की सीमारेखा से परे भी देखना प्रारम्भ करें। आप सभी तो अनेक मत-सम्प्रदायों के समन्वयक-समन्वयाचार्य श्रंृखला के श्रीकृष्ण, श्रीरामकृष्ण, परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के भी चित्र लगाते है और जपते है। सोचिये ऐसा क्यों हुआ? और भारत के इस अन्तिम कार्य में कौन किसके समक्ष समर्पण करेगा या कोई किसी के समक्ष समर्पण न करते हुये ”एक तरफ में रहूँ और दूसरी तरफ मेरी सेना रहे“ द्वारा कार्य सम्पन्न किया जाय। क्योंकि श्रेय को संघ तो खो चुका है ध्येय वह निश्चित रूप से प्राप्त करेगा यह मेेरा आशीर्वाद है“

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    19. विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून, 1931 - 27 नवम्बर, 2008)

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतंत्र और स्वस्थ उद्योग सहित एकता, समता, शान्ति, स्थिरता युक्त सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त द्वारा भारत को इन कठिन चुनौतियों के दिनों में विश्व को नई दिशा देने का दायित्व और विश्व के नेतृत्व के लिए शक्तिशाली बना सके वह सब सर्वाभौम सत्य-सिद्धान्त यहाॅ है। और मैं न नेता हूॅ, न ही आन्दोलन कत्र्ता। मैं हूॅ एक, भारत सहित विश्व का आम नागरिक, जिसने अपना कर्तव्य समझकर देश की ओर से विश्व को कुछ देने के लिए थोड़ा प्रयत्न, स्वयं को कठिन परिस्थितियों में डालकर भी कर रहा हूॅ। परिणामस्वरूप स्थिर सरकार प्राप्त होकर भी व्यवस्था परिवर्तन, तन्त्र परिवर्तन, विचार परिवर्तन और कर्मज्ञान जैसा मूल आवश्यक विषय स्थापित नहीं हो पायेगी। जिससे भारत की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन की सम्भावना नहीं दिखाई पड़ती। वर्तमान संसद की हालत भी तो यह है कि ‘मृत्यु’ जैसा सत्य विषय जिसे व्यक्ति प्रतिदिन देखता है यदि यह मुद्दा कि ‘मृत्यु सत्य है’ मानने के लिए संसद में प्रस्ताव आये तो वह भी विवाद में पड़कर पारित नहीं हो पायेगा। इसलिए आवश्यक है कि या तो सभी दल मिलकर सार्वजनिक सत्य पर आधारित धर्मनिरपेक्ष एवम् सर्वधर्मसमभाव विश्वमानक-शून्य श्रंृखला: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक की विश्वव्यापी स्थापना प्राथमिकता के आधार पर करें। या किसी एक दल को यह सर्वोच्च मुद्दा सौंपकर भयंकर राजनीतिक ज्वार भाटा ला दिया जाये।
    जाति आधारित आरक्षण पर समाजिक समानता लाने का प्रयत्न सामयिक होना चाहिए या उसका लाभ प्राप्त हो जाने के उपरान्त जीवन स्तर उठ जाने के बाद उससे वंचित करने का भी प्राविधान होना चाहिए। देश के स्वतन्त्रता के समय जातिगत आरक्षण की आवश्यकता थी और वह सीमित समय के लिए ही लागू किया गया था परन्तु राजनीतिक लाभ के कारणों से वह वर्तमान तक लागू है। हम समाज से मनुवादी व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं परन्तु एक तरफ आज समाज इससे धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है और दूसरी तरफ संविधान ही इसका समर्थक बनता जा रहा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण व्यवस्था का मापदण्ड जाति आधारित से शारीरिक, आर्थिक और मानसिक आधारित कर देनी चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव भी है और लोकतन्त्र का धर्म भी धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव है। 
    किसी व्यक्ति के बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक है कि उसे भोजन, स्वास्थ्य और निर्धारित आर्थिक आय को सुनिश्चित कर दिया जाय और यह यदि उसके शैक्षिक जीवन से ही कर दिया जाय तो शेष सपने को वह स्वयं पूरा कर लेगा। यदि वह नहीं कर पाता तो उसका जिम्मेदार भी वह स्वयं होगा, न कि अभिभावक या ईश्वर। और यही सबसे बड़ा आरक्षण होगा।


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    20. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (15 अक्टुबर, 1931 - 27 जुलाई 2015)

    ”अच्छी शिक्षा व्यवस्था ही प्रबुद्ध नागरिक पैदा करती है, बच्चों को नेतिक शिक्षा प्रदान की जाय और रोजगार के नये अवसर पैदा किये जायें, राष्ट्रीय शान्ति व सार्वभौमिक सद्भाव के लिए सभी धर्म आध्यात्मिक आन्दोलन में शामिल हो जायें“ -श्री ए.पी.जे, अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति, भारत 
    साभार - दैनिक जागरण, सम्पादकीय, वाराणसी, दि0 8 दिसम्बर 2002

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि अच्छा ”शिक्षा पाठ्यक्रम“ प्रबुद्ध नागरिक पैदा करती है। जब शिक्षा पाठ्यक्रम ही ऐसा रहेगा कि शिक्षार्थी के जीवन से तालमेल ही न मिले तो प्रबुद्ध नहीं बल्कि बुद्धि-बद्ध प्रकार के नागरिक पैदा होगें। शिक्षा क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि जीवन से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण विषय ”व्यापार“, को हम एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर सकें। इसकी कमी का अनुभव उस समय होता है जब कोई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा के उपरान्त किसी कारणवश जैसा कि अधिकतर होता है, आगे की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता। फिर उस विद्यार्थी द्वारा पढ़े गये विज्ञान व गणित के वे कठिन सूत्र उसके जीवन में अनुपयोगी लगने लगते है। यदि वहीं वह व्यापार के ज्ञान से युक्त होता तो शायद वह जीवकोपार्जन का कोई मार्ग सुगमता से खोजने में सक्षम होता।
    अच्छा ”शिक्षा पाठ्यक्रम“ नहीं बल्कि अब ”पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम“ अर्थात ”सत्य मानक शिक्षा“ की आवश्यकता आ गई है। जिससे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ही प्रबुद्ध हों जिससे अपने आप ही प्रबुद्ध नागरिक और नैतिक शिक्षा दोनों का ही कार्य सम्पन्न हो जाये। प्रबुद्ध नागरिक पैदा होने से स्वतः ही रोजगार के नये-नये क्षेत्र रचनात्मक-सकारात्मक दिशा से उत्पन्न होने लगेंगे। मनुष्य की व्यस्तता बढ़ती जा रही है। सभी को कम समय में बहुत कुछ चाहिए। तो ऐसी शिक्षा की भी जरूरत है जो कम समय में पूर्ण शिक्षित बना दे। एक व्यक्ति सामान्यतः यदि स्नातक (ग्रेजुएशन) तक पढ़ता है तो वह कितने पृष्ठ पढ़ता होगा और क्या पाता है? विचारणीय है। एक व्यक्ति इंजिनियर व डाॅक्टर बनने तक कितना पृष्ठ पढ़ता है? यह तो होती है कैरियर की पढ़ाई इसके अलावा कहानी, कविता, उपन्यास, फिल्म इत्यादि के पीछे भी मनुष्य अपना समय मनोरंजन के लिए व्यतीत करता है। और सभी एक चमत्कार के आगे नतमस्तक हो जाते हैं तो पूर्ण मानसिक स्वतन्त्रता और पूर्णता कहाँ है? विचारणीय विषय है। 
    कुल मिलाकर जो व्यक्ति या देश केवल आर्थिक उन्नति को ही सर्वस्व मानता है वह व्यक्ति या देश एक पशुवत् जीवन निर्वाह के मार्ग पर है-जीना और पीढ़ी बढ़ाना। दूसरे रूप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनका लक्ष्य धन रहा था वे अपने धन के बल पर अपनी मूर्ति अपने घर पर ही लगा सकते हैं परन्तु जिनका लक्ष्य धन नहीं था, उनका समाज ने उन्हें, उनके रहते या उनके जाने के बाद अनेकों प्रकार से सम्मान दिया है और ये सार्वजनिक रूप से सभी के सामने प्रमाणित है। पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग शारीरिक-आर्थिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक-बौद्धिक उत्थान होना चाहिए और यही है ही। इस प्रकार भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है।

    राष्ट्र के पूर्णत्व के लिए पूर्ण शिक्षा निम्नलिखित दो शिक्षा का संयुक्त रूप है-
    अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का बौद्धिक विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय सुख में वृद्धि होती है।
    ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का कौशल विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है।

    वर्तमान समय में विशेषीकरण की शिक्षा, भारत में चल ही रहा है और वह कोई बहुत बड़ी समस्या भी नहीं है। समस्या है सामान्यीकरण शिक्षा की। व्यक्तियों के विचार से सदैव व्यक्त होता रहा है कि - मैकाले शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति व पाठ्यक्रम बनना चाहिए। ये तो विचार हैं। पाठ्यक्रम बनेगा कैसे?, कौन बनायेगा? पाठ्यक्रम में पढ़ायेगें क्या? ये समस्या थी। और वह हल की जा चुकी है। जो भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा के रूप में पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है।
    ”राष्ट्रीय शान्ति व सार्वभौमिक सद्भाव के लिए सभी धर्म आध्यात्मिक आन्दोलन में शामिल हो“, आपका यह कथन सत्य आवश्यकता है परन्तु यह सबसे अधिक कठिन कार्य है। एक व्यक्ति का समर्थन वोट द्वारा पूरा विश्व कर सकता है परन्तु धार्मिक-राजनीतिक नेताओं का साथ आकर आध्यात्मिक आन्दोलन करना असम्भव है। क्योंकि आध्यात्मिक आन्दोलन का अर्थ है - आजादी या स्वतन्त्रता। वर्तमान की स्थिति यह है कि व्यक्ति के उपर व्यक्ति, समाज, मत, सम्प्रदाय, राजनीतिक दल इत्यादि अपने स्वयं के उद्देश्य के लिए व्यक्ति के मन का निर्माण कर रहे हैं। और उनका उपयोग/दुरूपयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर रहे हैं। ऐसे में कौन समाज, मत, सम्प्रदाय, राजनीतिक दल चाहेगा कि उसके अनुयायी, समर्थक, भक्त मानसिक स्वतन्त्रता की ओर गति करें। यहाँ तो समाज, मत, सम्प्रदाय के नेतागण दूसरे के साहित्य को भी पढ़ने से मना कर रखे हैं। इसलिए ”पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम“ अर्थात ”सत्य मानक शिक्षा“ ही आध्यात्मिक आन्दोलन एक मात्र उपाय है, जो राष्ट्र की विवशता भी है।

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  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    21. स्वामी शिवानन्द (माघ शुक्ल बसन्त पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव, 1932 ई0 में - )

    ‘‘काशी की प्राचीन सीमा से बाहर ‘नयी काशी’ की स्थापना आध्यात्मिक व धार्मिक दानों दृष्टिकोण से अनुचित है क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर प्रलयकाल तक काशी का स्थान भिन्न नहीं हो सकता ’’ - स्वामी शिवानन्द महाराज, 
    साभार - राष्ट्रीय सहारा, वाराणसी, दि0 8-9-98

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ‘‘स्वामी जी काशी क्या है ? काशी सत्य का प्रतीक है। इसके सत्य अर्थ को समझने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित सृष्टि के उत्पत्ति से प्रलय को व्यक्त करने वाला शिव-शंकर अधिकृत कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद को समझना पड़ेगा। कालभैरव जन्म कथा इसका प्रमाण है। सर्वोच्च मन सें व्यक्त यह पौराणिक कथा स्पष्ट रुप से व्यक्त करती है कि ब्रह्मा और विष्णु से सर्वोच्च शिव-शंकर हैं। चारो वेदों को प्रमाणित करने वाले शिव-शंकर हैं। चार सिर के चार मुखों से चार वेद व्यक्त करने वाले ब्राह्मण ब्रह्मा जब पाँचवे सिर के पाँचवे मुख से अन्तिम वेद पर अधिपत्य व्यक्त करने लगे तब शिव-शंकर के द्वारा व्यक्त उनके पूर्ण रुप कालभैरव ने उनका पाँचवा सिर काट डाला जिससे यह स्पष्ट होता है कि काल ही सर्वोच्च है, काल ही भीषण है, काल ही सम्पूर्ण पापों का नाशक और भक्षक है, काल से ही काल डरता है। अर्थात् पाँचवा वेद काल आधारित ही होगा। पुराणों में ही व्यक्त शिव-शंकर से विष्णु तथा विष्णु से ब्रह्मा को बहिर्गत होते अर्थात् ब्रह्मा को विष्णु के समक्ष तथा विष्णु को शिव-शंकर के समक्ष समर्पित और समाहित होते दिखाया गया है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि शिव-शंकर ही आदि और अन्त हैं। अर्थात् जो पंचम वेद होगा वह अन्तिम वेद होगा, साथ ही प्रथम वेद भी होगा। शिव-शंकर ही प्रलय, स्थिति और सृष्टिकर्ता हैं। चूँकि वेद शब्दात्मक होते हैं इसलिए पंचम वेद शब्द से ही प्रलय, स्थिति और सृष्टिकर्ता होगा। पुराण-शास्त्र को रचने वाले व्यास हैं तो पुराण जिस कला से रची गयी है वह व्यास ही बता सकते हैं या जो शास्त्र रचने की योग्यता रखता हो। सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय या प्रलय और उत्पत्ति की क्रिया उसी भाँति है जैसे जन्म के बाद मृत्यु, पुनः मृत्यु के बाद जन्म अर्थात् उत्पत्ति और प्रलय या जन्म और मृत्यु एक ही विषय हैं इसलिए ही कहा जाता है कि जो प्रथम है वहीं अन्तिम है। कर्मवेद में सृष्टि की उत्पत्ति से प्रलय को व्यक्त किया गया है जिसके बीच सात चरण है और यही सात काशी है। यदि गिने तो प्रलय प्रथम तथा उत्पत्ति अन्तिम व सातवाँ चरण है। इस प्रकार उत्पत्ति व प्रलय अलग-अलग दिखाई पड़ते हुए भी एक हैं। सृष्टि के विकास क्रम में ही मनुष्य की सृष्टि है यह जैसे-जैसे प्राकृतिक नियम से दूर होता जाता है वह पतन की अवस्था को प्राप्त होता जाता है जिसकी निम्नतम अवस्था पशुमानव अर्थात् पूर्णतः इन्द्रिय के वश में संचालित होने वाली अवस्था है। अब यदि यह पशुमानव अवस्था चरम शिवत्व की स्थिति तक उठना चाहे तो उसे मानवीय व प्राकृतिक मूल पाँच चरणों को पार करना पड़ता है। यदि वह अन्तः जगत अर्थात् सार्वभौम सत्य ज्ञान से सृष्टि की उत्पत्ति की ओर जाता है तब वह योगेश्वर की अवस्था प्राप्त करता है। यदि वह वाह्य जगत् अर्थात् सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त ज्ञान से सृष्टि के प्रलय की ओर जाता है तब वह भोगेश्वर की अवस्था प्राप्त करता है। योगेश्वर व भोगेश्वर एक ही हैं बस एक अवस्था में दूसरा प्राथमिकता पर नहीं होता है। इस प्रकार सृष्टि के आदि में काशी और अन्त में सत्यकाशी व्यक्त होता है। इनके बीच पाँच अन्य काशी होती हैं। इस क्रमानुसार काशी: पंचम, प्रथम तथा सप्तम काशी तथा सत्यकाशी: पंचम, अन्तिम तथा सप्तमकाशी की स्थिति में होता है। योगेश्वर अवस्था ही अदृश्य विश्वेश्वर की अवस्था है तथा भोगेश्वर अवस्था ही दृश्य विश्वेश्वर की अवस्था है जबकि दोनों एक हैं और प्रत्येक वस्तु की भाँति एक-दूसरे के दृश्य और अदृश्य रुप हैं। इसलिए ही विष्णु और शिव-शंकर को एक दूसरे का रुप कहते हैं।
    स्वामी जी, बिना गुण के अन्य काशीयों की स्थापना तो आध्यात्मिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से निश्चित ही अनुचित है परन्तु गुण-धर्म से युक्त स्थान व सीमा में काशी की स्थापना अनुचित नहीं उचित है। अब जबकि पाँच मुख वाले महादेव शिव-शंकर का वेद-कर्मवेद व्यक्त हो चुका है। सभी काशीयों का व्यक्त होना भी अतिआवश्यक है। क्योंकि अनेक तीर्थस्थलों को व्यक्त करने से मनुष्य की सृष्टि में कैसे-कैसे लाभ होते हैं यह तो आप सब भली-भाँति जानते हैं। आद्य शंकराचार्य जी ने भी भारत के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना उसी लाभ के लिए किये थे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सभी वस्तु का प्रसार हो रहा है इसलिए अब समय आ गया है कि काशी का भी प्रसार हो क्योंकि प्रसार ही जीवन है। संकुचन ही मृत्यु है। ‘नयी काशी’ योजना का उचित स्थान (रामनगर से पड़ाव) पर निर्माण किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है। क्योंकि रामनगर में शिवभक्त और शिव के अवतार माने जाने वाले महाराजा काशी नरेश तथा पड़ाव में शिव की एक धारा- अघोर के अवधूत भगवान राम का आश्रम व समाधि स्थल है तथा काशी का सम्बन्ध सत्य-धर्म-ज्ञान से है। सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर प्रलयकाल तक काशी का स्थान भिन्न नहीं हो सकता परन्तु काशी एक नहीं बल्कि सात काशियों का संयुक्त रूप है, जो पुराणों में वर्णित भी है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति और अन्त को प्रदर्शित करता शिव अधिकृत कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद में सात सत्य चक्र भी है जो सात काशियों को व्यक्त करते हैै जिसके अनुसार काशी (वाराणसी) पंचम, प्रथम तथा सप्तम एवं (वाराणसी)-विन्ध्याचल-शिवद्वार-सोनभद्र के बीच का सत्यकाशी-पंचम, अन्तिम तथा सप्तम काशी है जो शिव-शक्ति क्षेत्र है और पौराणिक भूमि भी है। सम्पूर्ण विश्व को मार्गदर्शन देने की ज्ञान बुद्धि भी अब सत्यकाशी क्षेत्र से व्यक्त हो चुका है। काशी मोक्षदायिनी जरुर है परन्तु विश्व को जीवन देने वाली जीवनदायिनी तो सत्यकाशी ही है क्योंकि इसी क्षेत्र से जीवन शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त हुआ है। मोक्ष तभी मिलता है जब जीवन मिलता है और जीवन तभी मिलता है जब मोक्ष मिलता है। इसलिए काशी और सत्यकाशी एक ही है अन्तर मात्र प्रसार का है। यह सत्य है कि अदृश्य शिव अकेले रह सकते हैं परन्तु दृश्य शिव-शंकर तो शक्ति के बिना रह नहीं सकते इसका ही परिणाम है शक्ति क्षेत्र-सत्यकाशी में दृश्य शिव-शंकर का व्यक्त होना।
    स्वामी जी, आपने भविष्य पुराण का उदाहरण देते हुए कहा है कि- ‘‘ग्यारह टोपी (राष्ट्रपति) तक मतपत्रों का राज्य चलेगा इसके बाद किसी पार्टी को बहुमत प्राप्त नहीं होगा। माता-पिता, साधु-सन्त, ब्राह्मण-विद्वान अपमानित होंगे। तब भयानक युद्ध होगा। भारत पुनः अपने अस्तित्व में आकर विश्वगुरु पद पर स्थापित होगा।’’ वह समय तो वर्तमान में चल रहा है जो भी अपना गुण-धर्म त्यागता है वह अपमानित होने का रास्ता स्वयं निर्माण करता है। ऐसे ही अपमानित कोई भी नहीं करता बल्कि वे जिस पद जैसे- माता-पिता, साधु-सन्त, ब्राह्मण-विद्वान पर बैठे रहते हैं। उसका भी धर्म निर्वहन नहीं करते परिणामस्वरुप सत्य-धर्म-ज्ञानियों के लिए वे न तो सम्मान के योग्य होंगे न ही अपमान के। भारत पुनः अपने अस्तित्व में आकर विश्व गुरु पद पर स्थापित होगा। यह बात तो सत्य है परन्तु यह स्वतः नहीं हो जायेगा कोई न कोई तो इसका माध्यम अवश्य बनेगा और वह अन्तिम माध्यम ही शिव-शंकर के पूर्णावतार के रूप में होगा क्योंकि ब्रह्मा के पूर्णावतार श्रीराम तथा विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण हो चुके हैं। इसलिए तीसरे नेत्र कीें दृष्टि से सत्यकाशी के निर्माण में काशी को ही अग्रसर होना चाहिए। यह काशी के लिए सम्मानजनक होगा। 
    काशी का स्थान, निर्माण, रक्षा और प्रसार महादेव विश्वेश्वर भगवान भोले शंकर के अधीन है और उनकी पहचान है-अनासक्त एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म एवं एकात्म ध्यान के संगम की व्यक्त अवस्था अर्थात् ऐसा सर्वोच्च और अन्तिम ज्ञान तथा कर्म जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (तीनों लोंको) के काल्याणार्थ अन्तिम रास्ता हो, समस्त विश्व एक मात्र कर्म के लिए बद्ध हो और ज्ञान से मुक्त हो। दर्शन के मुख्य तीन स्तर-अद्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा द्वैत की स्थिति अदृश्य काल में अदृश्य तथा दृश्य काल में दृश्य की स्थिति होती है। वर्तमान समय चक्र की स्थिति दृश्य काल के दृश्य विशिष्टाद्वैत की स्थिति की ओर है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण दृश्य जगत को ही सत्य मानकर व्यक्ति कार्य करते हैं। यही भौतिकवाद की स्थिति भी है। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं। यह भी ध्यान रहे कि व्यासजी द्वारा काशी को शाप देने के कारण विश्वेश्वर ने व्यासजी को काशी से निष्कासित कर दिया था। तब व्यासजी लोलार्क मन्दिर के आग्नेय कोण में गंगाजी के पूर्वी तट पर स्थित हुए। इस घटना का उल्लेख काशी खण्ड में इस प्रकार है-
    लोलार्कादं अग्निदिग्भागे, स्वर्घुनी पूर्वरोधसि। 
    स्थितो ह्यद्यापि पश्चेत्सः काशीप्रासाद राजिकाम्।। 
    - स्कन्दपुराण, काशी खण्ड 96/201

    और गंगा पार क्षेत्र से ही जीवन शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त हुआ है। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं’’

     


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में भूतपूर्व

    22. राजीव गाँधी (20, अगस्त, 1944 - 21 मई, 1991)

    ”यह समय की माँग है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में गुणता के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता हो। हमारी संतुष्टि किसी भी प्रकार के उत्पादन से नहीं अपितु हमारे द्वारा उत्पादित उत्कृष्ट वस्तुओं और दी जाने वाली उत्कृष्ट सेवाओं से हो।“  - श्री राजीव गाँधी
    (भारतीय मानक ब्यूरो त्रैमासिकी- ”मानक दूत“, वर्ष-20, अंक- 1-2, 2000 से साभार)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    दो या दो से अधिक माध्यमों से उत्पादित एक ही उत्पाद के गुणता के मापांकन के लिए मानक ही एक मात्र उपाय है। सतत् विकास के क्रम में मानकों का निर्धारण अति आवश्यक कार्य है। उत्पादों के मानक के अलावा सबसे जरुरी यह है कि मानव संसाधन की गुणता का मानक निर्धारित हो क्योंकि राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के मन को भी आधुनिक अर्थात् वैश्विक-ब्रह्माण्डीय करना पड़ेगा। तभी मनुष्यता के पूर्ण उपयोग के साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य के सही उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्कृष्ट उत्पादों के लक्ष्य के साथ हमारा लक्ष्य उत्कृष्ट मनुष्य के उत्पादन से भी होना चाहिए जिससे हम लगातार विकास के विरुद्ध नकारात्मक मनुष्योें की संख्या कम कर सकें। भूमण्डलीकरण सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में कर देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि यदि मनुष्य के मन का भूमण्डलीकरण हम नहीं करते तो इसके लाभों को हम नहीं समझ सकते। आर्थिक संसाधनों में सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य ही है। मनुष्य का भूमण्डलीकरण तभी हो सकता है जब मन के विश्व मानक का निर्धारण हो। ऐसा होने पर हम सभी को मनुष्यों की गुणता के मापांकन का पैमाना प्राप्त कर लेगें, साथ ही स्वयं व्यक्ति भी अपना मापांकन भी कर सकेगा। जो विश्व मानव समाज के लिए सर्वाधिक महत्व का विषय होगा। विश्व मानक शून्य श्रृंखला मन का विश्व मानक है जिसका निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है जो यह निश्चित करता है कि समाज इस स्तर का हो चुका है या इस स्तर का होना चाहिए। यदि यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित होगा तो निश्चित ही अन्तिम मानक होगा।
    मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे- ISO-9000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो (Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।

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  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में भूतपूर्व

    01. राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967 - 30 नवम्बर 2010)

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    एक आकर्षक, निर्भिक, सत्य स्वरूप, ज्ञानी, बालमन व्यक्तित्व। जिन्होंने अपने जीवन के कम समय में ही बहुत सारे अलग-अलग विषयों से सम्बन्धित सत्य विचार व्यक्त कर दिये। स्वदेश व स्वाभिमान के लिए उनका जीवन समर्पित था। आयें और अपना कर्तव्य पूरा किये। 
    शायद वो जन्म का ग्रह-नक्षत्र, काल अवधि ही ऐसी रही होगी जिसने बाबा रामदेव (25 दिसम्बर, 1965), मैं लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ (16 अक्टुबर 1967) और राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967) का जन्म भारत में हुआ। जो अपने-अपने क्षेत्र में राष्ट्र के लिए विशेष योगदान दिये।
    राजीव भाई से सीधा मेरा कोई परिचय नहीं था लेकिन आजादी बचाओ आन्दोलन के बारे में मैं जानता था। मैं उस समय की एक घटना को बताना चाहूँगा, जब भारत देश में वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) लागू किया जाना था और हथुआ मार्केट, लहुराबीर (वाराणसी) के सामने उनका व्याख्यान चल रहा था। हल्की बारिश हो रही थी और मैं उधर से चेतगंज पैदल जा रहा था। मैं रूका और उनके व्याख्यान को सुनने लगा। वहाँ मैं उनके निम्नलिखित 3 बिन्दुओं पर गौर किया जिस पर साधारणतया आम जनता खुद को सम्बन्धित नहीं समझती परन्तु विचारणीय है-
    1. उनका कहना था कि बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने गईं श्रीमती सोनिया गाँधी, राष्ट्रपति भवन से निकलते ही त्यागमूर्ति कैसे बन गईं। भारत के संविधान के अनुसार भारत देश में जन्म न लेने वाले किसी व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने पर सेना उसके आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। ऐसा तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जी ने उन्हें बताया था। और प्रधानमंत्री बनने गईं श्रीमती सोनिया गाँधी, राष्ट्रपति भवन से निकलते ही त्यामूर्ति बन गईं। और श्री मनमोहन सिंह जी को वो प्रधानमंत्री बना दीं। त्यागमूर्ति भी बन गईं और श्रीमती इन्दिरा गाँधी हत्या काण्ड के समय से कांग्रेस से नाराज सिख समुदाय भी खुश हो गया।
    2. उनका कहना था कि एक प्रधानमंत्री (नाम नहीं लिये थे) जी से मैंने यह कहा कि अनेक प्रकार के टैक्स लगाने से अच्छा है कि देश के नाम पर जनता से दान माँग लिया जाय। भारत की जनता इस प्रवृत्ति की है कि आपके टैक्स वसूली से ज्यादा आपको दान दे देगी। वैसे भी देश पर आये विपत्ति के समय सरकार से पहले और सरकार से ज्यादा तो जनता और व्यावसायिक संगठन पहुँचती भी है और देती भी हैै। तो उन प्रधानमंत्री जी का सीधा जबाब था कि तब हम उन पर डण्डा कैसे चलायेगें? डण्डा चलाने के लिए ये सब टैक्स आवश्यक है।
    3. उनका कहना था कि मेरे एक मित्र मुम्बई के हैं जिनका व्यवसाय बहुत बड़ा है और वे 30 सी.ए. (चार्टड एकाउण्टेन्ट) टैक्स बचाने के लिए लगा रखे थे। मैंने उनसे कहा कि ये 30 सी.ए. पर जितना खर्च आ रहा है उससे तो अच्छा ये है कि टैक्स ही दे दिया जाये। तो मेरे व्यवसायी मित्र ने कहा कि ये 30 सी.ए. को जो मैं दे रहा हूँ वो उनके मेहनत का है पर जो टैक्स चला जायेगा वो उनके पास जायेगा जो हमारे ही दिये पैसे पर एैश करते हैं।
    वाह, राजीव भाई वाह। अमर रहें आप। विचारों का बीज आपने बो दिया है। वह वृक्ष अवश्य बनेगा। समय अपनी कढ़ाही में उसे पकायेगा अवश्य।

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