0123

    सत्य एकीकरण भाग-2

  • क्लिक करें=>इस भाग की सूची
  • RENEW HUMAN           RENEW INDIA                RENEW WORLD

     भारत सरकार के साथ लेकिन सरकार की सोच से हमेशा आगे

    आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण,

    पूर्ण मानव निर्माण व भारत को जगत गुरू बनाने की योजना है - पुनर्निर्माण


    नया, पुराना और वर्तमान

    जिस प्रकार वाहन-कार का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया, पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है परन्तु हैं सभी कार। इसी प्रकार सत्य का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है। परन्तु हैं सभी सत्य। जिस प्रकार वाहन ”कार“ वर्तमान है उसी प्रकार सत्य भी वर्तमान है सिर्फ उसके व्यवहार में लाने के लिए संस्करण नवीन हो रहे है। नवीन संस्करण की पहचान तभी हो सकती है जब पुराने संस्करण की पहचान हो और उसका ज्ञान हो। अन्यथा वह सब पुराना ही लगेगा या नया ही लगेगा। नवीन संस्करण अधिक व्यावहारिक होता है। इसलिए वह अधिक क्रिया-प्रतिक्रियापूर्ण होता है और यदि क्रिया-प्रतिक्रिया पूर्ण नहीं है तो उसके दो कारण होगें। पहला नवीनत्व के पहचानने का अभाव या दूसरा वह संस्करण नवीन ही नहीं है ”कार“ हो या ”सत्य“ उसका नवीन संस्करण तब तक आता रहेगा जब तक कि वह पूर्ण विकसित और व्यावहारिक रूप को प्राप्त नहीं कर लेता। और सिर्फ वही संस्करण स्थिरता और व्यवहार में रहेगा जो पूर्ण व्यावहारिक और विकसित होगा। शेष विकास के क्रम के इतिहास के रूप में जाने जायेंगे। ऐसा ही होता हैं।

    - श्री लव कुश सिंह विश्वमानव

    रचनाकर्ता - लक्ष्य पुनर्निर्माण व उसकी प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम व कार्य योजना

    आविष्कारकर्ता - मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी

    दावेदार - भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न


     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 11 - स्वामी स्वरूपानन्द (द्वारिका पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य)
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    01. स्वामी स्वरूपानन्द (2 सितम्बर, 1924 - )

    ‘‘हिन्दू धर्म की जो पकड़ थी, वह इस समय कमजोर पड़ गयी है क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के समय से राजनेताओं का वर्चस्व बढ़ा और उन्होंने धर्म रक्षको को दबा दिया, जिसके परिणामस्वरूप 163 साल तक शंकराचार्य की पदवी खाली रही। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा के क्षेत्र में धर्म की स्थापना हो। स्वस्थ एवं श्रेष्ठ साहित्य का सृजन हो। महापुरूषों को घूम-घूम कर सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करना चाहिए जिससे लोगो के हृदय में भारतीय धर्म-शास्त्र के प्रति आस्था-विश्वास बढ़े।’’ - स्वामी स्वरूपानन्द (द्वारिका पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य)
    साभार - आज, वाराणसी, दि0 10-5-97

    ‘‘सांई को भगवान कहना शास्त्र और वेद सम्मत नहीं है। इसलिए उनको भगवान, संत और गुरू नहीं माना जा सकता। सनातन धर्म ने देश को एक बनाया है। गंगा ने पूरे देश में एकता का पाठ सिखाया। लोग सांई को अवतार मान रहे हैं, जबकि अवतार उसे माना जाता है जो अपनी इच्छा से शरीर का धारण करते हैं।’’ (कबीरधाम, कवर्धा, छत्तीसगढ़, में आयोजित धर्म संसद का निर्णय) - स्वामी स्वरूपानन्द (द्वारिका पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य एवं संरक्षक, काशी विद्वत परिषद्)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    ‘ईश्वर के मानवीयकरण व मानव के ईश्वरीयकरण के लिए आपके भौतिक शरीर से व्यक्त विश्वात्मा की इच्छा को ”विश्वशास्त्र“ के रूप में पूर्ण किया जा चुका है। धर्म क्षेत्र से नाम कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद है। जिसमें पुराणों का धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव रूप भी सम्पूर्ण मानव जाति को स्पष्ट दृष्टिगत होगा। परिणामस्वरूप भारतीय धर्म शास्त्रो के प्रति विश्वव्यापी आस्था बढ़ना स्वाभाविक है। साथ ही अनेक सत्य-साहित्यों की रचना के लिए भी मार्ग प्रशस्त कर दिये गये हैं। परिणामस्वरूप सत्य-साहित्यों की रचना की वातावरण भी बनेगा। परन्तु समर्पण वही करायेगा जो अन्तिम सार्वभौम और मूल सत्य-साहित्य होगा। स्वामी जी मेरी दृष्टि में स्वस्थ व श्रेष्ठ शास्त्र-साहित्य का नाम 01.कर्मवेद 02.शब्दवेद 03.सत्यवेद 04.सूक्ष्मवेद 05.दृश्यवेद 06. पूर्णवेद 07.अघोरवेद 08.विश्ववेद 09.ऋृषिवेद 10.मूलवेद 11.शिववेद 12.आत्मवेद 13.अन्तवेद 14.जनवेद 15.स्ववेद 16.लोकवेद 17. कल्किवेद 18.धर्मवेद 19.व्यासवेद 20.सार्वभौमवेद 21.ईशवेद 22.ध्यानवेद 23.प्रेमवेद 24.योगवेद 25.स्वरवेद 26.वाणीवेद 27.ज्ञानवेद 28.युगवेद 29.स्वर्णयुगवेद 30.समर्पणवेद 31.उपासनावेद 32. शववेद 33.मैंवेद 34.अहंवेद 35.तमवेद 36.सत्वेद 37.रजवेद 38.कालवेद 39.कालावेद 40.कालीवेद 41.शक्तिवेद 42.शून्यवेद 43.यथार्थवेद 44.कृष्णवेद सभी प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद इत्यादि भी गुणों के नाम से अच्छे नाम है।

    सत्य से सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त तक का मार्ग अवतारों का मार्ग है। सार्वभौम सत्य-सिंद्धान्त की अनुभूति ही अवतरण है। इसके अंश अनुभूति को अंश अवतार तथा पूर्ण अनुभूति को पूर्ण अवतार कहते है। ग्रन्थों में अवतारों की कई कोटि बतायी गई है जैसे अंशाशावतार, अंशावतार, आवेशावतार, कलावतार, नित्यावतार, युगावतार इत्यादि, जो भी सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को व्यक्त करता है वे सभी अवतार कहलाते हैं। व्यक्ति से लेकर समाज के सर्वोच्च स्तर तक सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को व्यक्त करने के क्रम में ही विभिन्न कोटि के अवतार स्तरबद्ध होते है। अवतार मानव मात्र के लिए ही कर्म करते हैं न कि किसी विशेष मानव समूह या सम्प्रदाय के लिए। अवतार, धर्म, धर्मनिरपेक्ष व सर्वधर्मसमभाव से युक्त अर्थात एकात्म से युक्त होते है। इस प्रकार अवतार से उत्पन्न शास्त्र मानव के लिए होते हैं, न कि किसी विशेष मानव समूह के लिए। उत्प्रेरक, शासक और मार्गदर्शक आत्मा सर्वव्यापी है। इसलिए एकात्म का अर्थ संयुक्त आत्मा या सार्वजनिक आत्मा है। अवतारों के प्रत्यक्ष और प्रेरक दो कार्य विधि हैं। प्रत्यक्ष अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का प्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब अधर्म का नेतृत्व एक या कुछ मानवों पर केन्द्रित होता है। प्रेरक अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का अप्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण जनता एवं नेतृत्वकर्ता के माध्यम से करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब समाज में अधर्म का नेतृत्व अनेक मानवों और नेतृत्वकर्ताओं पर केन्द्रित होता है।

    इन विधियों में से कुल दस अवतारों में से प्रथम सात (मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम) अवतारों ने समाज का सत्यीकरण प्रत्यक्ष विधि के प्रयोग द्वारा किया था। आठवें अवतार (श्रीकृष्ण) ने दोनों विधियों प्रत्यक्ष ओर प्रेरक का प्रयोग किया था। नवें (भगवान बुद्ध) और अन्तिम दसवें अवतार की कार्य विधि प्रेरक ही है।
    महाविष्णु के 24 अवतारों (1. सनकादि ऋषि (ब्रह्मा के चार पुत्र), 2. नारद, 3. वाराह, 4. मत्स्य, 5. यज्ञ (विष्णु कुछ काल के लिये इंद्र रूप में), 6.नर-नारायण, 7. कपिल, 8. दत्तात्रेय, 9. हयग्रीव, 10. हंस पुराण, 11. पृष्णिगर्भ, 12. ऋषभदेव, 13. पृथु, 14. नृसिंह, 15. कूर्म, 16. धनवंतरी, 17. मोहिनी, 18. वामन, 19. परशुराम, 20. राम, 21. व्यास, 22. कृष्ण, बलराम, 23. गौतम बुद्ध (कई लोग बुद्ध के स्थान पर बलराम को कहते है, अन्यथा बलराम शेषनाग के अवतार कहलाते हैं), 24. कल्कि) में एक मात्र शेष 24वाँ तथा प्रमुख 10 अवतारों (1.मत्स्य, 2.कूर्म, 3.वाराह, 4.नृसिंह, 5.वामन, 6.परशुराम, 7.राम, 8.श्रीकृष्ण, 9.बुद्ध और 10.कल्कि) में एक मात्र शेष दसवाँ और अन्तिम कल्कि अवतार, महाअवतार क्यों कहलायेगें इसे समझना आवश्यक है।
    सभी अवतार अपने शारीरिक-आर्थिक-मानसिंक कर्म द्वारा ही पहचाने जाते हैं। किसी मनुष्य या सिंद्ध पुरूष-गुरू के अन्दर इतनी दृष्टि क्षमता किसी भी युग में नहीं रही कि वे देखते ही पहचान लें। प्रत्येक अवतार ने अपना परिचय शारीरिक-आर्थिक-मानसिंक कर्म द्वारा स्वंय दिया है।
    वह अवतार जो युग के आवश्यकतानुसार युग परिवर्तन के लिए सत्य-सिद्धान्त व्यक्त करता है उसे अंश युगावतार तथा जो काल सहित युग परिवर्तन के लिए अन्तिम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त व्यक्त करता है वह दृश्य पूर्ण महाअवतार कहलाता है।

    सनातन अद्वैत दर्शन के अनुसार यह जगत ही ईश्वर का दृश्य रूप है। ऐसे में सभी ईश्वर हैं। सभी ईश्वर के बहुरूप हैं और सभी में प्रकाशित वही ईश्वरीय सत्ता है। सार्वभौम एकात्म की ओर ले जाने वाले सभी प्रक्षेपित मानक चरित्र सनातन हैं जैसे ब्रह्मा परिवार, विष्णु परिवार और महेश परिवार। इस सार्वभौम एकात्म की ओर विचार व्यक्त करने वाला अर्थात उसी का प्रचार-प्रसार व स्थापना करने वाला युगावतार तो नहीं हो सकता लेकिन वह अवतार अवश्य होता है क्योंकि उसने भी उस सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का साक्षात्कार किया है।
    आपने कहा कि-”अवतार उसे माना जाता है जो अपनी इच्छा से शरीर का धारण करते हैं“ यह मान भी लिया जाये तो कैसे सिद्ध होगा कि अपनी इच्छा से कोई शरीर धारण किया है कि नहीं। इसे सिद्ध करने के लिए स्वामी विवेकानन्द जी के इस वाणी से शायद कुछ सहायता प्राप्त हो सकती है-

    ”फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्कराः प्राक्तना इव“ फल को देखकर ही कार्य का विचार सम्भव है। जैसे कि फल को देखकर पूर्व संस्कार का अनुमान किया जाता है। - स्वामी विवेकानन्द
    एक विशेष प्रवृत्ति वाला जीवात्मा ‘योग्य योग्येन युज्यते’ इस नियमानुसार उसी शरीर में जन्म ग्रहण करता है जो उस प्रवृत्ति के प्रकट करने के लिए सबसे उपयुक्त आधार हो। यह पूर्णतया विज्ञान संगत है, क्योंकि विज्ञान कहता है कि प्रवृत्ति या स्वभाव अभ्यास से बनता है और अभ्यास बारम्बार अनुष्ठान का फल है। इस प्रकार एक नवजात बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का कारण बताने के लिए पुनः पुनः अनुष्ठित पूर्व कर्मो को मानना आवश्यक हो जाता है और चूंकि वर्तमान जीवन में इस स्वमाव की प्राप्ति नहीं की गयी, इसलिए वह पूर्व जीवन से ही उसे प्राप्त हुआ है। - स्वामी विवेकानन्द
    शास्त्र कहते है कि कोई साधक यदि एक जीवन में सफलता प्राप्त करने में असफल होता है तो वह पुनः जन्म लेता है और अपने कार्यो को अधिक सफलता से आगे बढ़ाता है। - स्वामी विवेकानन्द
    सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का कोई शरीर नहीं होता, वह अपनी इच्छा से जिस शरीर में अवतरित होता है उसे ही अवतार कहते हैं। और इसको ही स्वयं अपनी इच्छा से शरीर धारण करना कहते हैं। उसका स्थिति के अनुसार रूपान्तरण ही उसे अंशाशावतार, अंशावतार, आवेशावतार, कलावतार, नित्यावतार, युगावतार इत्यादि के रूप में व्यक्त करता है।
    साई बाबा ने अपने जीवन काल में कुछ ही व्यक्ति के बीच अपने विचार ”सबका मालिक एक है“ का मंत्र दिया। कुछ व्यक्तियों के लिए व्यक्तिगत प्रमाणित चमत्कृत घटनायें भी हुई होगीें। लेकिन इन सबसे उन्हें युगावतार तो नहीं माना जा सकता। संत माना जा सकता है। गुरू भी माना जा सकता है क्योंकि -

    भक्त वही, जो भगवान को बेच सके,
    चेला वही, जो गुरू से कुछ ले सके,
    संत वही, जो समाज को कुछ दे सके,
    और
    अवतार वही, जो पृथ्वी की आवाज सुन सके।

    वर्तमान में साई बाबा को लोग बेच रहे हैं इसलिए भक्त बहुत हैं क्योंकि साई बाबा को विभिन्न प्रकार से बेचने पर उन्हें लाभ हो रहा है। उनके चेले हैं क्योंकि वे बाराबर साई बाबा से प्राप्त कर रहे हैं। साई बाबा ने समाज को ”सबका मालिक एक है“ का मंत्र दिया है-ये सभी को जानना, समझना चाहिए। वे युगावतार नहीं हैं इसलिए कि अगर होते तो अवतारों का कार्य ही समाप्त हो गया होता।
    स्वामी जी साईं बाबा ने अपने जीवन काल में कोई समाज, सम्प्रदाय, मत नहीं चलाया जिससे समाज बँट रहा हो। समाज को बाँटने वाले जो अलग-अलग रंग के वस्त्र, भोजन विधि, मंत्र, मत बनाकर जातिवाद से भी घातक समाज बना डाले हैं और अपना खेती-बारी अपने भक्तों से करवा रहें है। उनके बारे में सोचें जो आपका धर्म-कत्र्तव्य है। मेरा तो स्वरूप ही अलग है -
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देख चुका हूँ,
    अक्षय-अनन्त है मेरी हाला।
    कण-कण में हूँ-”मैं ही मैं“,
    क्षयी-ससीम है तेरी प्याला ।
    जिस भी पथ-पंथ-ग्रन्थ से गुजरेगा तू,
    हो जायेगा, बद्ध-मस्त और मत वाला।
    ”जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ की आवाज,
    सुनाती, मेरी यह अक्षय-अनन्त मधुशाला।

    और अब स्थिति तो ये है कि अपने-अपने धर्म शास्त्र-उपनिषद्-पुराण इत्यादि का अध्ययन करें कहीं ऐसा तो नहीं कि-

    1. नये मनवन्तर - 8वें सांवर्णि के प्रारम्भ के लिए ”सार्वभौम“ गुण से युक्त होकर मनु का आगमन हो चुका है।
    2. नये काल - दृश्य काल के प्रारम्भ के लिए ”सार्वभौम“ गुण से युक्त होकर काल का आगमन हो चुका है।
    3. नये युग - स्वर्ण युग के प्रारम्भ के लिए ”सार्वभौम“ गुण से युक्त होकर कल्कि अवतार का आगमन हो चुका है।
    4. नये धर्म - विश्वधर्म के प्रारम्भ के लिए ”सार्वभौम“ गुण से युक्त होकर धर्म स्थापक का आगमन हो चुका है।
    5. नये शास्त्र - विश्वशास्त्र के प्रारम्भ के लिए ”सार्वभौम“ गुण से युक्त होकर व्यास का आगमन हो चुका है।

    यदि ऐसा नहीं तो -

    1. तुम्हारे शास्त्रों में दिये वचन और शास्त्र झूठे हो जायेंगे।
    2. तुम्हारे भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणीयाँ झूठी हो जायेंगी।
    3. तुम्हारे युग और काल गणना झूठे हो जायेंगे।
    4. तुम्हारे अवतार-ईशदूत-ईशपुत्र-पुनर्जन्म सिद्धान्त झूठे हो जायेगें।
    5. तुम्हारे ईश्वर सम्बन्धी अवधारणा झूठे हो जायेंगे।



  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 12 - श्री अटल विहारी वाजपेयी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    02. श्री अटल बिहारी वाजपेयी ( 25 दिसम्बर, 1926 - )

    ‘‘कुछ लोग कहते हैं कि हमारी सरकार भूमण्डलीकरण के खिलाफ है, लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूॅ कि मैं गीता के संन्देश को सारे भूमण्डल में प्रसारित करने का हिमायती हूॅ।’’ (दिल्ली के एक सार्वजनिक सभा में) - श्री अटल विहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री, भारत)
    साभार - आज, वाराणसी, दि0-11-4-98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ‘‘गीता का सन्देश ‘समभाव (अद्वैत) में स्थित होकर कर्म करो और परिणाम की इच्छा मुझ (आत्मा) पर छोड़ दो।’ जिसे आप सारे भूमण्डल में फैलाना चाहते हैं। वह कर्म वेदान्त के विकास का प्रथम चरण था। जिसे बहुत से धार्मिक संगठन, ज्ञानी जन लगातार सारे भूमण्डल में फैला रहे है। गीता का सन्देश व्यष्टि (व्यक्ति) के लिए था। कर्म वेदान्त का अगला चरण स्वामी विवेकानन्द द्वारा वेदान्त की व्यावहारिकता पर जोर था। तथा अन्तिम चरण कर्मवेदान्त का पूर्ण रूप- कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद है। जो कालानुसार व्यष्टि के लिए है। भूमण्डलीकरण ‘भूमण्डलीकरण’ शब्द से नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त विषय कर्म और ज्ञान आधारित सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त या विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम या विकास दर्शन या निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम से होगा। वही पूर्ण रूप से विवादमुक्त होगा। वह है-कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद (धर्मयुक्त नाम) अर्थात् विश्वमानक-शून्य श्रंृखलाः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक (धर्मनिरपेक्ष एवम् सर्वधर्म समभाव नाम) और उसका सन्देश- ‘परिणाम के ज्ञान से युक्त एवम् समभाव (अद्वैत) में स्थित होकर कर्म करो और परिणाम की इच्छा मुझ (आत्मा) पर छोड़ दो ।’ जिसकी घोषणा भारत की ओर से करने पर ही ‘‘गीता का सन्देश‘ विश्वव्यापी रूप से प्रसारित होगा न कि गीता पुस्तक को भेंट करने से। गीता पुस्तक तो अनेक संस्थाओं द्वारा बहुत वर्षो से व्यापारिक माध्यम से फैल ही रही है।

    ”हिन्दुत्व महज धर्म नहीं, जीवन शैली है 
    आने वाली सदी में हिन्दुत्व ही विश्व को रास्ता दिखाएगा।’ - श्री अटल बिहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री, भारत)

    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 28-9-98

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ‘‘समस्त विषयों को व्यक्त, मूल्यांकित और वर्गीकृत कर्ता मानव ही है। मानव ने ही मन (व्यक्तिगत सत्य या मत) को व्यक्त किया तथा मानव ने ही मन की चरम विकसित स्थिति-आत्मा (सार्वजनिक सत्य या धर्म या मानक) को व्यक्त करेगा। सत्य भाव जो व्यक्तिगत और सार्वजनिक सत्य का संयुक्त भाव है, जिस मानव सम्प्रदाय के द्वारा आविष्कृत हुआ उन्हें हिन्दू तथा आविष्कृत भाव हिन्दू धर्म के रूप में व्यक्त हुआ। व्यक्तिगत सत्य या मन या मत से जुड़ना योग है तथा व्यक्तिगत सत्य सहित सार्वजनिक सत्य या आत्मा या सत्य-धर्म-ज्ञान से जुड़ना योगेश्वर है। योगेश्वर, योग का ही चरम विकसित और अन्तिम बाह्य चक्र है। सत्य-धर्म-ज्ञान अर्थात् एकता- शान्ति- स्थिरता- ईश्वर- मानवता- समता- समभाव- अद्वैत- वेदान्त। जो सर्वव्याप्त है, शाश्वत से पीठासीन है। धर्म कोई भी हो उसमें सत्य का होना उसकी शाश्वतता है अन्यथा नश्वरता। धर्म का ही दृश्यरूप जीवन शैली है। व्यक्तिगत सत्य से जुड़ी जीवनशैली भोग है तथा व्यक्तिगत सत्य सहित सार्वजनिक सत्य या आत्मा या सत्य-धर्म-ज्ञान से जुड़ना भोगेश्वर है। भोगेश्वर, योगेश्वर का ही दृश्य रूप है। योगेश्वर व्यक्तिगत सत्य तो भोगेश्वर सार्वजनिक सत्य-सिद्धान्त है, मानक है, अन्त है, उसी योगेश्वर भाव अर्थात सत्य-र्धम- ज्ञान- एकता- स्थिरता- ईश्वर- मानवता- समता- समभाव- अद्वैत- वेदान्त का दृश्य रूप भोगेश्वर भाव अर्थात सिद्धान्त- कर्मज्ञान- कर्मवेद- क्रियाकलापों का विश्वमानक- विकास दर्शन- निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम- विश्वमानक: शून्य श्रृंखला-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक -विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम-ऐजेन्डा 2012$ -शिक्षा 2012$-विवादमुक्त तन्त्रों पर आधारित संविधान है। सत्य चर्चा का विषय नहीं आत्मासात् का विषय होता है। सत्यभाव जिस प्रकार सर्वव्याप्त है उसी प्रकार सिद्धान्त भी सर्वव्यापी है। सिद्धान्त से ही सिद्धान्त को व्यक्त करने वाला सिद्धान्त को व्यक्त कर रहा है। भोगेश्वर, उपलब्ध संसाधनों का ईश्वरत्व भाव से भोग है। एक सर्वोच्च अन्तिम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त चक्र में सम्पूर्ण को समभाव से समेट लेना जिससे भोगकत्र्ता और भोग विषय दोनों ही ईश्वरत्व की ओर बढ़े। जब जब जिस मानव शरीर से ये सिद्धान्त स्तरीय रूप में व्यक्त हुआ वे ही महानता का प्राप्त हुये। यह सत्य है कि ‘हिन्दुत्व महज धर्म नहीं, जीवन शैली है’ लेकिन इस सम्पूर्ण सत्य में जो भाग अभी पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं हुआ है वह है- ‘जीवन शैली’ । इस श्रृंखला में धर्मज्ञान का अन्त हो चुका है। अब उसके दृश्य रूप कर्मज्ञान के व्यक्त होने का समय चल रहा है। अर्थात् ‘सम्पूर्ण जीवन शैली’, भोगेश्वर रूप में व्यक्त होने की ओर है। जिसमें गति और और विश्व व्यापी स्थापना की घोषणा करना ही भारत का सत्यरूप और भारत का धर्म है। धर्म वही है जो समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और ब्रह्माण्ड उसे धारण किये हुये है। उसी का आविष्कार करना ऋषियों का कार्य है। वर्तमान रूप में धर्म कोई भी हो लेकिन ब्रह्माण्ड में व्याप्त उसी धर्म को व्यक्ति धारण किये हुये हैं बस उन्हें उनका ज्ञान नहीं है। वह धर्म ही विश्वधर्म के रूप में व्यक्त हुआ है।’’ 

    ‘‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’’ - श्री अटल विहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री, भारत)
    परमाणु बम परीक्षण ‘मई’ 98 के बाद भारत के लिए 

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ‘‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान से अभी भारत का पूर्ण रूप व्यक्त नहीं हुआ है। भारत का पूर्ण रूप ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय ज्ञान, जय कर्मज्ञान’ है। विवाद और बेरोजगारी के मूल दो कारण है- जय ज्ञान और जय कर्मज्ञान का उपलब्ध न होना । अज्ञान के कारण ही व्यक्ति अपने कर्मो के कारण को व्यक्त और विवाद मुक्त नहीं कर पाता तथा कर्मज्ञान के न होने के कारण ही कार्य कुशलता और योजना निर्माण का ज्ञान शक्तिशाली नहीं जिससे संसाधन होते हुये भी बेरोजगारी और निर्भरता बढ़ रही है। जय ज्ञान और जय कर्मज्ञान के लिए ही भारत अधुरा है और विश्व भूखा है।’’

    ”अकेेले राजशक्ति के सहारे समाजिक बदलाव सम्भव नहीं“ - श्री अटल विहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री, भारत)
    (30 जून, 1999 को लखनऊ मंे राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण वाहिनी के शुभारम्भ मंे)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    सतयुग में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी, हुआ यह कि एक प्रतापी, धर्मपरायण, प्रजावत्सल, सेवाभावी, दानवीर, सौम्य, सरल यानी सर्वगुण सम्पन्न राजा हुआ-बलि। लोग इसके गुण गाने लगे और समाजवादी राज्यवादी होने लगे। राजा बलि का राज्य बहुत अधिक फैल गया। समाजवादियों के समक्ष यानी मानवजाति के समक्ष एक गम्भीर संकट पैदा हो गया कि अगर राज्य की अवधारणा दृढ़ हो गयी तो मनुष्य जाति को सदैव दुःख, दैन्य व दारिद्रय में रहना होगा क्योंकि अपवाद को छोड़कर राजा स्वार्थी होगें, परमुखपेक्षी व पराश्रित होगे। अर्थात अकर्मण्य व यथास्थिति वादी होगे। यह भयंकर स्थिति होगी परन्तु समाजवादी असहाय थे। राजा बलि को मारना संभव न था और उसके रहते समाजवादी विचारधारा का बढ़ना सम्भव न था। ऐसी स्थिति में एक पुरूष की आत्मा अदृश्य प्राकृतिक चेतना द्वारा निर्मित परिस्थितियों में प्राथमिकता से वर्तमान में कार्य करना, में स्थापित हो गयी। वह राजा बलि से थोड़ी सी भूमि समाज या गणराज्य के लिए माॅगा। चूँकि राजा सक्षम और निश्ंिचत था कि थोड़ी भूमि में समाज या गणराजय स्थापित करने से हमारे राज्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए उस पुरूष को राजा ने थोड़ी भूमि दे दी। जिस पर उस पुरूष ने स्वतन्त्र, सुखी, स्वराज आधारित समाज-गणराज्य स्थापित किया और उसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया और वह राजा बलि के सुराज्य को भी समाप्त कर दिया और समाज या गणराज्य की स्थापना की गयी। चूँकि यह पुरूष बौना अर्थात् छोटे कद का तथा स्वभाव और ज्ञान में ब्राह्मण गुणों से युक्त था इसलिए कालान्तर में इसे ”समाज“ शब्द का जन्मदाता बामन अवतार का नाम दिया गया। राजा बलि द्वारा इस अवतार को दी गई भूमि का क्षेत्र ही वर्तमान का उ0प्र0 के मीरजापुर जनपद का चुनार क्षेत्र है। जिस पर इस अवतार के कार्य का प्रथम चरण प्रारम्भ हुआ था जिसके कारण ही चुनार का प्रचीन नाम चरणाद्रिगढ़ था। जहाॅ आज भी मूल मानव जाति कूर्मि का बाहुल्य हैं।
    महोदय आपके विचार सत्य हैं। राजशक्ति को ये भ्रम है कि वही जनता का कल्याणकर्ता है। जबकि पृथ्वी पर बहुत से ऐसे देश हैं जो राजशक्ति पर कम औद्योगिक व व्यवसायिक घरानों पर अधिक विश्वास रखती है। जब तक समाज शक्ति अपने देश-राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी ना निभाये, राजशक्ति केवल एक देश-राष्ट्र के प्रबन्धक के सिवा कुछ नहीं हैं। राजशक्ति को सदैव अपने नागरिक के बौद्धिक शक्ति को बढ़ाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए नहीं तो राजशक्ति पर रोजगार देने का बोझ बढ़ता जायेगा और राजशक्ति की क्षमता से बाहर होने पर उससे विश्वास ही हटेगा। प्रत्येक देश के राजशक्ति को चाहिए कि वो अपने देश के प्रति समर्पित नागरिक के निर्माण के लिए शिक्षा पाठ्यक्रम को संविधान का अंग बनाये जिससे एक समान बौद्धिक शक्ति का निर्माण हो और देश-राष्ट्र शक्तिशाली बने।

    ”लोकनायक का सम्पूर्ण जीवन एक प्रयोगशाला था। उन्होंने विचारों से अधिक मूल्यों को महत्व दिया। “- श्री अटल बिहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री, भारत)

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”महोदय जिन्हें समाज को कुछ देना होता है वे अपने जीवन को प्रयोगशाला की भाँति ही संचालित करते हैं। और जिन्हें कुछ पाना होता है वे ऐसे प्रयोगशाला से खोजे गये सूत्रों को लाभ उठाने के लिए पकड़ते हैं न कि उनके जीवन शैली को। और जिन्हें समाज कांे कुछ देना नहीं होता वे आजीवन उसी विषय क्षेत्र में रहकर भी कुछ नहीं दे पाते हैं। और अपने स्वार्थ की पूर्ति करते रहते हैं। विचार तो प्रत्येक व्यक्ति के हो सकते हैं जैसे- ओसामा बिन लादेन के, जार्ज डब्ल्यू0 बुश के, कोफी अन्नान के, वी0 एस0 नायपाल के और आपके भी, परन्तु किसी के विचार को आतंकवादी, किसी को नोबेल पुरस्कार, किसी को सही कदम तथा किसी को स्त्रीयोचित कह दिया जाता है। क्योंकि निम्नतम स्तर-विध्वंसक विचार से सर्वोच्च स्तर- सकारात्मक, रचनात्मक, समन्वयात्मक के जितना करीब होता है। उसमें उतना ही मूल्य होता है।“

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 13 - श्री लाल कृष्ण आडवाणी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    03. श्री लाल कृष्ण आडवाणी (8 नवम्बर, 1927-)

    -शासन में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्र आगे आएं। - लाल कृष्ण आडवाणी, केन्द्रीय गृह मन्त्री, भारत

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    महोदय, मान लिजिए छात्र आगे आ गये, अब वे क्या करेंगे यह भी तो बताएं? आप सरकार में हैं। आपका शासन है। तो भ्रष्टाचार को छात्र कैसे दूर करेंगे? यदि आप छात्र द्वारा भ्रष्टाचारीयों की पिटाई को अपराध से मुक्त रखने की घोषणा भी कर देंगे तो भी भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। कारण, भ्रष्टाचारी के घर भी तो छात्र हैं फिर अपनों के विरुद्ध आवाज उठाने से तो उनका चरित्र ही गिर जायेगा जो आपके श्रीराम के चरित्र के विरुद्ध हो जायेगा। क्योंकि आपके श्रीराम के अनुसार बड़ों का आदर (चाहें वे कैसे भी हों?) करना ही तो धर्म है। हाँ, भ्रष्टाचार मिटाने का यह उपाय है कि- जिस प्रकार आप लोगों ने 18 वर्ष की उम्र को वोट (मत) देने का अधिकार दिया है उसी प्रकार 25 वर्ष के उम्र पर पैत्रिक सम्पत्ति का अधिकार तथा नैतिक उत्थान के लिए पूर्ण ज्ञान - कर्म ज्ञान आधारित विश्वमानक शून्य: मन (मानव संसाधन) की गुणवत्ता का विश्वमानक की शिक्षा सहित ‘शिक्षा का सही अर्थ धन अर्जित कर लेना ही नहीं है बल्कि समाज को उचित आवश्यकता प्रदान करना, अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठानी भी है जो अपनत्व की भावना से पूर्णतया मुक्त हो।“ का प्रसार करना पड़ेगा। परन्तु क्या आप यह करेंगे, नहीं। क्योंकि यह तो सत्य कार्य हो जायेगा और इससे आपको लगेगा कि यह तो मेरा कार्य हो गया।

    ”शिक्षा का स्वदेशी माॅडल चाहिए” (गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में) - लाल कृष्ण आडवाणी, केन्द्रीय गृह मन्त्री, भारत
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 8-06-2008

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है।
    राष्ट्र के पूर्णत्व के लिए पूर्ण शिक्षा निम्नलिखित दो शिक्षा का संयुक्त रूप है-
    अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का बौद्धिक विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय सुख में वृद्धि होती है।
    ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का कौशल विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है।
    वर्तमान समय में विशेषीकरण की शिक्षा, भारत में चल ही रहा है और वह कोई बहुत बड़ी समस्या भी नहीं है। समस्या है सामान्यीकरण शिक्षा की। व्यक्तियों के विचार से सदैव व्यक्त होता रहा है कि - मैकाले शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति व पाठ्यक्रम बनना चाहिए। ये तो विचार हैं। पाठ्यक्रम बनेगा कैसे?, कौन बनायेगा? पाठ्यक्रम में पढ़ायेगें क्या? ये समस्या थी। और वह हल की जा चुकी है। जो भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा के रूप में पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है। जो शिक्षा का स्वदेशी माॅडल है।
    मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे- ISO-9000, ISO-14000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो (Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way)“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है। 
    वैसे तो यह कार्य भारत सरकार को राष्ट्र की एकता, अखण्डता, विकास, साम्प्रदायिक एकता, समन्वय, नागरिकों के ज्ञान की पूर्णता इत्यादि जो कुछ भी राष्ट्रहित में हैं उसके लिए सरकार के संस्थान जैसे- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.), एन.सी.ई.आर.टी, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्, भारतीय मानक ब्यूरो के माध्यम से ”राष्ट्रीय शिक्षा आयोग“ बनाकर पूर्ण करना चाहिए जो राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए अति आवश्यक और नागरिकों का राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निर्धारण व परिभाषित करने का मार्ग भी है।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    04. डाॅ0 कर्ण सिंह (9 मार्च, 1931 - )

    ”विश्व एक परिवार है न कि बाजार। भारतीय मानको में गुरू-शिष्य परम्परा की अवधारणा को मजबूती देने की जरूरत है। शैक्षणिक संस्थानों में नई चेतना, विचारधारा निकालनी होगी जिससे सामाजिक व राष्ट्रीय उत्थान को बल मिले। शान्ति, मूल्यों की शिक्षा ही आज की आवश्यकता है“ , ”महामना की सोच मानवीय मूल्य के समावेश वाले युवाओं के मस्तिष्क का विकास था, चाहे वह इंजिनियर हो, विज्ञान या शिक्षाविद्। यहाँ के छात्र दुनिया में मानवीय मूल्य के राजदूत बनें ताकि देश में नम्बर एक बना बी.एच.यू. अब दुनिया के लिए आदर्श बने। इस विश्वविद्यालय सरीखा दूसरा कोई उत्कृष्ट संस्थान ही नहीं जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा यूनेस्को चेयर फार पीस एंड इंटरकल्चर अंडरस्टैण्डिंग की स्थापना हुई। विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर मुख्य परिसर की सिर्फ कापी भर नहीं है, बल्कि यह तो भविष्य में“ नये विश्वविद्यालय का रूप लेगा“ -डाॅ0 कर्ण सिंह, 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 26 दिसम्बर, 2010

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    भौतिकवादी समाज विश्व को एक बाजार समझता है लेकिन आध्यात्मवादी समाज विश्व को परिवार समझता है। इस समझ के कारण ही भारत ने ”वसुधैव-कुटुम्बकम्“, ”बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय“, ”विश्वबन्धुत्व“, ”एकात्म मानवतावाद“ जैसे शब्दो का प्रयोग किया है। गुरू-शिष्य परम्परा की अवधारणा-भावना तभी स्वतः स्फूर्त होगी जब शिक्षा पाठ्यक्रम मस्तिष्क को विश्व व्यापक बनाने वाली हो, जिससे ऐसे मनुष्य का निर्माण हो जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपना स्वरूप समझता हो, और शिक्षा को मात्र रोजगार पाने की सीमा तक न समझता हो। और जब ऐसा होगा तभी शैक्षणिक संस्थानों में नई चेतना, विचारधारा निकलेगी जिससे सामाजिक व राष्ट्रीय उत्थान को बल मिलेगा।
    महामना की सोच बहुत व्यापक थी परन्तु संस्थापक के जाने के बाद अक्सर ऐसा होता है कि संस्था अपने मार्ग से भटक जाती है। जहाँ समन्वयात्मक मस्तिष्क का निर्माण करना था वहाँ विशेषीकृत मस्तिष्क का निर्माण प्रारम्भ हो गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू), देश का नम्बर एक विश्वविद्यालय है इसमें कोई शक नहीं परन्तु जो शोध-आविष्कार इस विश्वविद्यालय को करना था वह माधव विद्या मन्दिर इण्टरमीडिएट कालेज, पुरूषोत्तमपुर, मीरजापुर, उ0प्र0 (दसवीं -1981, 13 वर्ष 6 माह में), प्रभु नारायण राजकीय इण्टर कालेज, रामनगर, वाराणसी, उ0प्र0 (बारहवीं-1983, 15 वर्ष 6 माह में) और हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, वाराणसी, उ0प्र0 (बी.एससी.ं, सन्-1985, 17 वर्ष 6 माह में) के कालेज, के मार्ग से शिक्षित व्यक्ति ने कर डाला। 
    अब महामना को सच्ची श्रद्धांजली तभी मिलेगी जब विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर को ”सत्यकाशी हिन्दू विश्ववि़द्यालय (एस.एच.यू)“ के रूप में नये विश्वविद्यालय का रूप दिया जाये।

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 14 - वी.एस.नाॅयपाल
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    05. श्री वी.एस.नाॅयपाल (17 अगस्त, 1932 - )

    ”भारत बौद्धिक विस्फोट के मुहाने पर खड़ा है। हर क्षेत्र में भारतीयों का दखल हो रहा है। वह दिन समय नहीं, जब भारत भी पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाएगा। हालांकि इसका लाभ उठाने के लिए भारत को अतीत की पहेलीयों को सुलझाना होगा।“ -वी. एस. नाॅयपाल, (साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित) 
    साभार - अमर उजाला, वाराणसी, दि0 31 अक्टूबर 2000

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    महोदय, आपकी दूरदृष्टि बिलकुल सत्य है। भारत बौद्धिक विस्फोट और अपने विश्व गुरूता के लिए अपने सभी अतीत के पहेलीयों को सुलझा चुका है। और वह ”विश्वधर्म“ के लिए ”विश्वशास्त्र“ के रूप में प्रकाशित है। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था -
    ”हिन्दू भावों को अंग्रेजी में व्यक्त करना, फिर शुष्क दर्शन, जटिल पौराणिक कथाएं और अनूठे आश्चर्यजनक मनोविज्ञान से ऐसे धर्म का निर्माण करना, जो सरल, सहज और लोकप्रिय हो और उसके साथ ही उन्नत मस्तिष्क वालों को संतुष्ट कर सके- इस कार्य की कठिनाइयों को वे ही समझ सकते हैं, जिन्होंने इसके लिए प्रयत्न किया हो। अद्वैत के गुढ़ सिद्धान्त में नित्य प्रति के जीवन के लिए कविता का रस और जीवन दायिनी शक्ति उत्पन्न करनी है। अत्यन्त उलझी हुई पौराणिक कथाओं में से जीवन प्रकृत चरित्रों के उदाहरण समूह निकालने हैं और बुद्धि को भ्रम में डालने वाली योगविद्या से अत्यन्त वैज्ञानिक और क्रियात्मक मनोविज्ञान का विकास करना है और इन सब को एक ऐसे रुप में लाना पड़ेगा कि बच्चा-बच्चा इसे समझ सके।“ - स्वामी विवेकानन्द 
    ”यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म हो सकता है, तो वह ऐसा ही होगा, जो देश या काल से मर्यादित न हो, जो उस अनन्त भगवान के समान ही अनन्त हो, जिस भगवान के सम्बन्ध में वह उपदेश देता है, जिसकी ज्योति श्रीकृष्ण के भक्तों पर और ईसा के प्रेमियों पर, सन्तों पर और पापियों पर समान रूप से प्रकाशित होती हो, जो न तो ब्राह्मणों का हो, न बौद्धों का, न ईसाइयों का और न मुसलमानों का, वरन् इन सभी धर्मों का समष्टिस्वरूप होते हुए भी जिसमें उन्नति का अनन्त पथ खुला रहे, जो इतना व्यापक हो कि अपनी असंख्य प्रसारित बाहूओं द्वारा सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य का प्रेमपूर्वक आलिंगन करें।... वह विश्वधर्म ऐसा होगा कि उसमें किसी के प्रति विद्वेष अथवा अत्याचार के लिए स्थान न रहेगा, वह प्रत्येक स्त्री और पुरूष के ईश्वरीय स्वरूप को स्वीकार करेगा और सम्पूर्ण बल मनुष्यमात्र को अपनी सच्ची, ईश्वरीय प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रित रहेगा। हमें दिखलाना है- हिन्दुओं की आध्यामिकता, बौद्धो की जीवदया, ईसाइयों की क्रियाशीलता एवं मुस्लिमों का बन्धुत्व, और ये सब अपने व्यावहारिक जीवन के माध्यम द्वारा। हमने निश्चय किया- हम एक सार्वभौम धर्म का निर्माण करेंगें।“ - स्वामी विवेकानन्द
    ”हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्धान्तों की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य हो सकें। हमें ऐसी सर्वांगसम्पन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी-जो भी तुम्हे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दुर्बलता लाए, उसे जहर की भांति त्याग दो; उसमें जीवन-शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है। सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो हृदय के अन्धकार को दूर कर दे, जो हृदय में स्फूर्ति भर दें। उसी मूल सत्य की फिर से शिक्षा ग्रहण करनी होगी, जो केवल यहीं से, हमारी इसी मातृभूमि से प्रचारित हुआ था। फिर एक बार भारत को संसार में इसी मूल तत्व का-इसी सत्य का प्रचार करना होगा। ऐसा क्यों है? इसलिए नहीं कि यह सत्य हमारे शास्त्रों में लिखा है वरन् हमारे राष्ट्रीय साहित्य का प्रत्येक विभाग और हमारा राष्ट्रीय जीवन उससे पूर्णतः ओत-प्रोत है। इस धार्मिक सहिष्णुता की तथा इस सहानुभूति की, मातृभाव की महान शिक्षा प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित सब जाति और वर्ण वाले सीख सकते हैं। तुमको अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर तुम एक हो। मैं जिस आत्मतत्व की बात कर रहा हूँ वहीं जीवन है, शक्तिप्रद है और अत्यन्त अपूर्व है। केवल वेदान्त में ही वह महान तत्व है जिससे सारे संसार की जड़ हिल जायेगी और जड़ विज्ञान के साथ धर्म की एकता सिद्ध होगी।“ - स्वामी विवेकानन्द
    यह सनातन धर्म का देश है। देश गिर अवश्य गया है, परन्तु निश्चय फिर उठेगा। और ऐसा उठेगा कि दुनिया देखकर दंग रह जायेगी। (विवेकानन्दजी के संग में, पृष्ठ-159) - स्वामी विवेकानन्द

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 15 - श्री मुरली मनोहर जोशी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    06. श्री मुरली मनोहर जोशी (5 जनवरी, 1934-)

    ‘‘काल का बोध न रखने वाले राष्ट्र का आत्मबोध व दिशाबोध भी समाप्त हो जाता है।’’ - श्री मुरली मनोहर जोशी, 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 10-7-98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ‘‘जब व्यष्टि मन की शान्ति, स्थिरता और एकता अन्तः अदृश्य विषयों पर केन्द्रित होता है तो उसे व्यष्टि अदृश्य काल कहते हैं। जब व्यष्टि मन की शान्ति, स्थिरता और एकता बाह्य दृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे व्यष्टि दृश्य काल कहते हैं। इसी प्रकार जब अधिकतम व्यष्टि के मन की शान्ति, स्थिरता और एकता अन्तः अदृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे समष्टि अदृश्य काल कहते हैं और बाह्य दृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे समष्टि दृश्य काल कहते हैं। अदृश्य काल के लिए अनेक ईश्वर नाम तथा दृश्य काल के लिए एक ईश्वर नाम होते हैं। इस ईश्वर नाम या शब्द का दर्शन ही मानव तथा राष्ट्र को आत्मबोध वा दिशाबोध प्रदान करता है। अदृश्य काल से दृश्य काल में परिवर्तन की सूचना व्यक्तिगत स्तर से सार्वजनिक पत्र मुद्रित कराकर केन्द्रिय सचिवालय, दिल्ली, पी0 टी0 आई0 भवन, दिल्ली, मथुरा व वाराणसी के मन्दिरों व पत्र द्वारा सम्पूर्ण देश में वितरित किये गये थे और समष्टि स्तर से ब्रह्माण्ड द्वारा दिंनाक -18-11-97 से 22-11-97 (पाॅच दिन) खगोल विज्ञान द्वारा प्रमाणित सभी ग्रहों का एक सीध में आना द्वारा सूचित किया जा चुका है। कालानुसार ज्ञान द्वारा मानव को पूर्ण मानव में विकसित न करना मानवाधिकार का स्पष्ट हनन है। यह सत्य है कि काल का बोध न रखे वाले राष्ट्र का का आत्मबोध व दिशाबोध भी समाप्त हो जाता है। परन्तु इस काल की वर्तमान स्थिति से जन साधारण को परिचित कौन करायेगा? सरकार और मानव संसाधन मंत्री तो आप हैं। वेद या ज्ञान या सत्य की बातें सत्य होती हैं परन्तु व्यावहारिक नहीं। मात्र व्यावहारिक सत्य ही आत्मबोध या दिषाबोध दे सकता है।’’

    ‘‘मैं आवाहन करता हूॅ-देश की युवा पीढ़ी का, जो इस महान गौरवशाली देश का नेतृत्व करें और संकीर्णता, भय, आसमानता, असहिष्णुता से ऊपर उठकर राष्ट्र को ज्ञान-विज्ञान के ऐसे धरातल पर स्थापित करे कि लोग कहें यही तो भारत महान है।’’ (विज्ञापन द्वारा प्रकाशित अपील) - श्री मुरली मनोहर जोशी
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 11-8-98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ‘‘देश में युवा हैं जो इस गौरवशाली देश का नेतृत्व बिना किसी पद पर बैठे ही सकीर्णता, भय, असमानता, असहिष्णुता से ऊपर उठकर राष्ट्र को ज्ञान-विज्ञान के ऐसे धरातल पर स्थापित कर सकते हैं, जिससे भारत की महानता सार्वजनिक रूप से सिद्ध हो सकती है। या यूॅ कहें कि भारत का वर्तमान रूप राम, कृष्ण, आादि शंकर, स्वामी विवेकान्द, स्वामी दयानन्द, भगत सिंह, रजनीश इत्यादि जैसे युवाओं ने वैचारिक और प्रत्यक्ष क्रान्ति द्वारा ही, अपने जीवन को अन्य जीवन के लोगो से अलग रखकर व्यक्त किया है। और जब भी भारत अपनी महानता को स्थापित करेगा वह युवा के द्वारा ही होगा क्योंकि कोई भी यहाॅ जन्म लेकर और पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त कर भारत को महानता नहीं दिला सकता क्योंकि फिर इतने बड़े कार्य के लिए एक जीवन तो ज्ञान की खोज में ही निकल जायेगा-फिर कर्म कब होगा? ऐसे युवा जिन्होनें अपने जीवन को बलिदान स्वरूप रखकर भारत को सतत महानता की ओर ले जाने के लिए प्रयत्न किये है वे तो सिर्फ कर्म करने आये, ज्ञान तो, उन्हें पूर्वजन्म से ही प्राप्त था। आपने आवाहन किया जो एक अच्छा कदम है लेकिन समस्या है कि कोई युवा आपसे मिलने आये तो आपके पास समय न होगा और उस युवा के चेहरे पर लिखा भी न होगा कि भारत को महानता दिलाने वाला यही युवा है। यदि पत्र दे तो भी वह कुड़ेदान में चला जायेगा लेकिन भारत के कार्यो में यदि भारत के नेतृत्व कत्र्ता ही साथ न दे तो भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। हाॅ पत्रों के प्रति निष्क्रियता-आपके निष्क्रियता का प्रमाणपत्र अवश्य बन जाती है। ऐसा ही पत्र आपको आपके आवाहन के जवाव में भेजा गया था’’


    ‘‘देश के सभी विद्यालयों में वेद की शिक्षा दी जायेगी’’ - श्री मुरली मनोहर जोशी
    साभार - आज, वाराणसी, दि0 10/12/98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ”सत्य के अनुभूति का साहित्य वेद है। ऋगवेद-ज्ञान से सत्य की ओर, सामवेद-गायन से सत्य की ओर, यजर्वुेद-व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य कर्म से सत्य की ओर, अथर्ववेद-औषधि से सत्य की ओर और कर्मवेद-सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य कर्म से सत्य की ओर जाने का साहित्य है। प्रथम चार वेद में ज्ञान, विज्ञान और व्यक्तिगत प्रमाणित मानव एवम् प्रकृति के सन्तुलन के लिए कर्मज्ञान हैं। जिस पर आधारित और सत्य की ओर ले जाने वाले अनेकों साहित्य-संहिता, ब्राह्मण, अरण्यक, पुराण, उपनिषद् आदि हैं। इतने साहित्यों के उपरान्त वेदो और उपनिषदों के सत्य के मूलरूप को व्यक्त करता और कर्म की ओर प्रेरित करता साहित्य गीता है। उसके उपरान्त कर्म ज्ञान पर आधारित शुद्ध और अन्तिम सार्वजनिक सत्य-सिद्धान्त का साहित्य कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद अर्थात् विश्वमानक -शून्य श्रंृखला: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक है। हजारों वर्षो से समयानुसार आवश्यकतानुसार परिष्कृत होकर व्यक्त हुआ सत्य जो व्यक्ति को सीधे पूर्ण ज्ञान से जोड़ सकता है, वह वेद विद्यालयों में शिक्षा देने योग्य है कि वह जो हजारों वर्ष पूर्व का वेद है जिसकी एक एक ऋचा को समझने में और सत्य की अनुभूति करने में अधिकतम समय लगता हैै। यह सोचने का विषय है- वर्तमान समय में व्यक्ति इतने अधिक नियम, कानून, समस्या, दायित्व और कत्र्तव्यों से घिरा है कि वह न्यूनतम समय में अधिकतम प्राप्त करना चाहता है। ऐसे में समयानुसार और आवश्यकतानुसार ही सम्पूर्ण मानव समाज को सर्वाधिक विवादस्पद सत्य-धर्म-ज्ञान से विवादमुक्त करने और कर्मज्ञान-दृश्य कर्मज्ञान को स्थापित करने के लिए कर्मवेद व्यक्त हुआ है। जिसकी शिक्षा आने वाली पीढ़ी और वर्तमान के व्यक्तियों के बीच नेतृत्व कर्ताओं को स्वेच्छा से स्थापित उसी भाॅति करना चाहिए जिस प्रकार एक माता-पिता अपने अबोध सन्तान को आवश्यकतानुसार एवम समयानुसार विषयों को उपलव्ध कराते हैं। जिसके प्रति किसी प्रकार का आन्दोलन स्वयं माता-पिता और नेतृत्वकत्र्ताओं के नैतिकता पर प्रश्न उठा सकता है। इसलिए इसके प्रति आन्दोलन न करना ही मेरा मार्ग है।’’ 

    ”प्रधानमंत्री ने भी भारत के कायाकल्प के लिए अंतरनिहित सिद्धांतों को स्पष्ट किया है। उन्होंने हजारों वर्षों से चली आ रही भारतीय परंपराओं से अनुभव हासिल करने वाले विशेषज्ञों, जनता के सुझावों और विपरीत विचारों को ध्यानपूर्वक सुनने का सुझाव दिया है। यदि हमने ऐसा कर दिया तो हम नीतियों और योजनाओं को न सिर्फ विफल होने से बचा लेंगे, बल्कि भविष्य के जोखिमों से भी इन्हें सुरक्षित कर देंगे। इन सबका अर्थ है भविष्य की योजनाओं और विकास के लिए जरूरी बुनियादी बातों को फिर से परिभाषित करना और उन्हें नए रूप में रचना। इसके लिए सोच के एक नए स्तर की जरूरत होती है। यह किस तरह होगा, यह बहुत कुछ आयोग की टीम की रूपरेखा और दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग की टीम के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश तय किए हैं। अब नीति आयोग पर निर्भर करता है कि वह आशाओं के अनुरूप आचरण करे और परिणाम दे। (”अगली सदी की तैयारी“ शीर्षक से दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख) - डॉ. मुरली मनोहर जोशी, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    महोदय, नीति आयोग के लिए एकदम सत्य दृष्टि। ”आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ का निर्माण इस विचार के बिना नहीं हो सकता। और यह ईश्वर के अवतारों के अधीन है। ये कार्य नौकरी पेशा विद्वानों के वश का है ही नहीं क्योंकि भारत ऐसे लागों से निर्मित नहीें बल्कि ऋषि निर्मित है।
    नीति आयोग, भारत सरकार के पास क्या ऐसे अनुभवी व्यक्ति हैं यदि नहीं तो आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत का सपना छोड़ दें- ये है हमारे ”एक“ का सृष्टि के प्रारम्भ से अब तक के 10 जन्मों का अनुभव -
    मछलियों ंके स्वभाव जल की धारा के विपरीत दिशा (राधा) में गति करने से ज्ञान (अर्थात राधा का सिद्धान्त) प्रथम अवतार मत्स्य अवतार का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। एक सहनशील, शांत, धैर्यवान, लगनशील, दोनों पक्षो के बीच मध्यस्थ की भूमिका वाला गुण सहित प्रथम अवतार के गुण सहित वाला गुण द्वितीय अवतार कूर्म अवतार का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। एक मेधावी, सूझ-बुझ, सम्पन्न, पुरूषार्थी, धीर-गम्भीर, निष्कामी, बलिष्ठ, सक्रिय, शाकाहारी, अहिंसक और समूह प्रेमी, लोगों का मनोबल बढ़ाना, उत्साहित और सक्रिय करने वाला गुण सहित द्वितीय अवतार के समस्त गुण से युक्त वाला गुण तृतीय अवतार वाराह अवतार का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। प्रत्यक्ष रूप से एका-एक लक्ष्य को पूर्ण करने वाले गुण सहित तृतीय अवतार के समस्त गुण से युक्त वाला गुण चतुर्थ अवतार नरसिंह अवतार का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। भविष्य दृष्टा, राजा के गुण का प्रयोग करना, थोड़ी सी भूमि पर गणराज्य व्यवस्था की स्थापना व व्यवस्था को जिवित करना, उसके सुख से प्रजा को परिचित कराने वाले गुण सहित चतुर्थ अवतार के समस्त गुण से युक्त गुण पाँचवें अवतार का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। गणराज्य व्यवस्था को ब्रह्माण्ड में व्याप्त व्यवस्था सिद्धान्तों को आधार बनाने वाले गुण और व्यवस्था के प्रसार के लिए योग्य व्यक्ति को नियुक्त करने वाले गुण सहित पाँचवें अवतार के समस्त गुण से युक्त वाला गुण छठें अवतार परशुराम का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। आदर्श चरित्र के गुण तथा छठें अवतार तक के समस्त गुण को प्रसार करने वाला गुण सातवें अवतार श्रीराम का गुण था जो अगले अवतार में संचरित हुई। आदर्श सामाजिक व्यक्ति चरित्र के गुण, समाज मंे व्याप्त अनेक मत-मतान्तार व विचारों के समन्वय और एकीकरण से सत्य-विचार के प्रेरक ज्ञान को निकालने वाले गुण सहित सातवें अवतार तक के समस्त गुण आठवें अवतार श्रीकृष्ण का गुण था। जिससे व्यक्ति, व्यक्ति पर विश्वास न कर अपने बुद्धि से स्वयं निर्णय करें और प्रेरणा प्राप्त करता रहे। प्रजा को प्रेरित करने के लिए धर्म, संघ और बुद्धि के शरण में जाने की मूल शिक्षा देना नवें अवतार भगवान बुद्ध का गुण था। आदर्श वैश्विक व्यक्ति चरित्र सहित सभी अवतारों का सम्मिलित गुण व मन निर्माण की प्रक्रिया से निर्मित अन्तिम मन स्वामी विवेकानन्द के मन के गुण मिलकर दसवें अन्तिम अवतार श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ में व्यक्त हुआ। 
    पुराण पढें और देखें है न, पृथ्वी की समस्या पहले ब्रह्मा के पास जाती है। यदि वह उनसे हल नहीं हो पाती तो अपने उच्च अधिकारी विष्णु के पास फाइल फरवार्ड की जाती है। यदि उनसे भी नहीं हल होती तो मुख्य कार्यालय शिव-शंकर के कार्यालय में भेज दी जाती है। जब सभी अन्धे होते हैं तो काना (एक आॅख) वाला शासन करता है। जब सभी काने होते हैं तो दो आॅख वाला शासन करता है। जब सभी दो आॅख वाले होते हैं तब तीसरे नेत्र वाले का शासन आता है। जबकि सभी शासक अपने समय के अनुसार सर्वश्रेष्ठ ही होते हैं। नीति आयोग दो आॅख वालों का समूह है, अब उसे काशी-सत्यकाशी से तीसरे नेत्र का प्रकाश माॅगना चाहिए। ससम्मान निवेदन करें या अपनी क्षमता-बौद्धिकता पेश करें।


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    07. श्री केशरी नाथ त्रिपाठी (10 नवम्बर, 1934 - )

    ‘‘शिक्षा में दूरदृष्टि होनी चाहिए तथा हमारी शिक्षा नीति और शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे हम भविष्य देख सके और भविष्य की आवश्यकताओं को प्राप्त कर सकें। - श्री केशरीनाथ त्रिपाठी 
    साभार - आज, वाराणसी, दि0-25-12-98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ‘‘बिल्कुल सत्य दृष्टि है परन्तु व्यावहारिक और स्थापना स्तर तक लाने के लिए उसका प्रारूप क्या होगा? उसके विषय क्या होंगे? विवादमुक्त कैसे होगा? उसके प्रारूप की उत्पति किस विवादमुक्त सूत्र से होगी? इन सब का उत्तर ही कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद अर्थात् विश्वमानक -शून्य श्रंृखलाः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक है और उस पर पर आधारित विवादमुक्त तन्त्रों पर आधारित भारत का संविधान भाग-2 होगा। यह सब नव काल, नव युग, इक्कीसंवीं सदी और भविष्य के लिए नव अविष्कृत है। सत्य वाणी सत्य होती है। लेकिन व्यावहारिक सिद्धान्त को कौन प्रस्तुत करेगा? यदि प्रस्तुत हो भी गया तो उसके स्थापना में आपका योगदान क्या होगा?’’

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 16 - श्री हामिद अंसारी - श्रीमती प्रतिभा पाटिल
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    08. श्री हामिद अंसारी (1 अप्रैल, 1934 - )

    ”पिछली सदी में राष्ट्रवाद की अवधारणा काफी प्रबल रही। यह अलग बात है कि सदी के बीच में ही परस्पर अंतर निर्भरता ने विश्वग्राम की चेतना को जन्म दिया। इस चेतना ने राष्ट्रवाद की अवधारणा को काफी हद तक बदल दिया है। आज निरपेक्ष व सम्पूर्ण संप्रभुता का युग समाप्त हो गया है। राजनीतिक प्रभुता को भी विश्व के साथ जोड़ दिया है। आज मामले अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय को सौंपे जा रहे हैं। मानवाधिकारों के नये मानक लागू हो रहे हैं। इन सबसे ऐसा लगता है जैसे राज्यों का विराष्ट्रीकरण हो रहा है। आज समस्याएं राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर चली गई है। महामारी, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट आदि पूरे विश्व को प्रभावी कर रहा है। इनका हल वैश्विक स्तर पर बातचीत व सहयोग से ही संभव है। इसको देखते हुए हमें राष्ट्रवाद व अन्तर्राष्ट्रीयतावाद के विषय में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इन स्थितियों को देखते हुए नई सदी में विज्ञान, प्रौद्योगिकी व नवप्रवर्तन राष्ट्र की सम्पन्नता के लिए खासे महत्वपूर्ण साबित होगें। छात्रों से इस दिशा में प्रयास करने व लीक से हटकर नया सोचने का आह्वान करता हूँ। “ (बी.एच.यू के 93वें दीक्षांत समारोह व कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन, वाराणसी में बोलते हुए) - श्री हामिद अंसारी 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 13 मार्च, 2011

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    इस पृथ्वी का अब आगे का समय वैश्विक मानक आधारित है जिसमें ”विश्वमानक व्यक्ति“, ”विश्वमानक शिक्षा“, ”विश्वमानक संविधान“, ”विश्वमानक प्रबन्ध“, ”विश्वमानक क्रियाकलाप“, ”विश्वमानक देश“, ”विश्वमानक ग्राम“, ”विश्वमानक नगर“ इत्यादि का है। और सब आविष्कृत किया जा चुका है। जिसका आधार ही लीक से हटकर नयी सोच है। इसलिए ही कहा गया है - ”एक आइडिया जो बदल दे पूरी दुनिया, जोश सत्य का और तरक्की के लिए नया और अन्तिम नजरिया“। जो एक मात्र शेष दसवें और अन्तिम अवतार - कल्कि अवतार द्वारा अहिंसक और शान्ति रूप से इसलिए व्यक्त किया गया है क्योंकि वर्तमान समाज में मनुष्य को मानव बुद्धि व विश्व-राष्ट्र के विकास की सभी उम्मीद धर्म गुरूओं और राजनेताओं से ही है। उन्हें ईश्वर और उनके अवतारों की कोई आवश्यकता नहीं है।
    ”ग्लोबलाईज्ड“ दृष्टि ही ”दिव्य दृष्टि“ है। जिसका मात्र विरोध हो सकता है नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि यह प्राकृतिक बल के अधीन है जो मानव से विश्वमानव तक के विकास के लिए अटलनीय है। दृष्टि, अहंकार है, अंधकार है, अपूर्ण मानव है तो दिव्य दृष्टि, सिद्धान्त है, प्रकाश है, पूर्णमानव-विश्वमानव है। तुम मानव की अवस्था से विश्वमानव की अवस्था में आने का प्रयत्न करो न कि विश्वमानव का विरोध। विरोध से तुम्हारी क्षति ही होगी। जिस प्रकार ”कृष्ण“ नाम है ”योगेश्वर“ अवस्था है, ”गदाधर“ नाम है ”रामकृष्ण परमहंस“ अवस्था है, ”सिद्धार्थ“ नाम है ”बुद्ध“ अवस्था है, ”नरेन्द्र नाथ दत्त“ नाम है ”स्वामी विवेकानन्द“ अवस्था है, ”रजनीश“ नाम है ”ओशो“ अवस्था है। उसी प्रकार व्यक्तियों के नाम, नाम है ”भोगेश्वर विश्वमानव“ उसकी चरम विकसित, सर्वोच्च और अन्तिम अवस्था है। ”दृष्टि“ से युक्त होकर विचार व्यक्त करना निरर्थक है, प्रभावहीन है, यहाँ तक की विरोध करने का भी अधिकार नहीं क्योंकि वर्तमान और भविष्य के समय में इसका कोई महत्व नहीं, अर्थ नहीं क्योंकि वह व्यक्तिगत विचार होगा न कि सार्वजनिक संयुक्त विचार। यह सार्वजनिक संयुक्त विचार ही ”एकात्म विचार“ है और यही वह अन्तिम सत्य है, यहीं ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ है। यहीं धर्मनिपरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव नाम से विश्वमानक - शून्य श्रंृखला: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक तथा धर्म नाम से कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम और पंचमवेदीय श्रंृखला है जिसकी शाखाएं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्यक्त है जिसकी स्थापना चेतना के अन्तिम रुप-दृश्य सत्य चेतना के अधीन है। यहीं ”मैं“ का दृश्य रुप है। यहीं ”विश्व-बन्धुत्व“, ”वसुधैव-कुटुम्बकम्“, ”बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय“, ”एकात्म-मानवतावाद“, ”सर्वेभवन्तु-सुखिनः“ की स्थापना का ”एकात्म कर्मवाद“ आधारित अन्तिम मार्ग है।
    युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे- महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    09. श्रीमती प्रतिभा पाटिल (19 दिसम्बर, 1934 - )

    ”विज्ञान व आध्यात्म में काफी समानताएं हैं और दोनों के लिए अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। इन दोनों का मानव के विकास में भारी योगदान है। जब तक ये एक साथ मिलकर काम नहीं करेंगें उनका पूरा लाभ हासिल नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय समाज के लिए उपयोगी अनुसंधान पर जोर दें ताकि उनका लाभ जनता व देश को हो। ज्ञान के लिए शिक्षा अर्जित की जानी चाहिए और देश के युवाओं के विकास के लिए शिक्षा पद्धति में समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाना जरूरी है। इसका मकसद युवाओं को बौद्धिक और तकनीकी दृष्टि से सक्षम बनाना होना चाहिए।“ (विज्ञान व आध्यात्मिक खोज पर राष्ट्रीय सम्मेलन, नई दिल्ली के उद्घाटन में बोलते हुए) - श्रीमती प्रतिभा पाटिल 
    साभार - हिन्दुस्तान, वाराणसी, दि0 13 मार्च, 2011

    ”भारत पूरी दुनिया को शान्ति की राह दिखाने में संक्षम है। शस्त्र विध्वंशकारी होता है तो शास्त्र पशुता से मानवतावाद की ओर ले जाता है। आज आवश्यकता केवल शिक्षित होने की नहीं बल्कि सुशिक्षित हाने की है। केवल भौतिक विकास को सर्वांगिण विकास नहीं कहा जा सकता । भारत की प्रकृति व यहाँ के ज्ञान के खजाने को ढूढ़ने में पूरी दुनिया लगी है। हमसे दुनियाँ ने बहुत कंुछ सिखा है। आज भी उसे शान्ति का रास्ता भारत ही दिखा सकता है।“ - श्रीमती प्रतिभा पाटिल 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 2 मार्च, 2015


    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    स्वामी विवेकानन्द जी की वाणी है-
    यदि हम अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न एवं आध्यात्मिक एक साथ न हो पाए, तो मानवजाति का अर्थपूर्ण अस्तित्व ही संशय का विषय हो जाएगा। - स्वामी विवेकानन्द
    धर्म तात्त्विक (आध्यात्मिक) जगत के सत्यों से उसी प्रकार सम्बन्धित है, जिस प्रकार रसायन शास्त्र तथा दूसरे भौतिक विज्ञान भौतिक जगत के सत्यों से। रसायन शास्त्र पढ़ने के लिए प्रकृति की पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता है। धर्म की शिक्षाप्राप्त करने के लिए तुम्हारी पुस्तक अपनी बुद्धि तथा हृदय है। सन्त लोग प्रायः भौतिक विज्ञान से अनभिज्ञ ही रहते हैं। क्योंकि वे एक भिन्न पुस्तक अर्थात् आन्तरिक पुस्तक पढ़ा करते हैं; और वैज्ञानिक लोग भी प्रायः धर्म के विषय में अनभिज्ञ ही रहते हैं क्योंकि वे भी भिन्न पुस्तक अर्थात् वाह्य पुस्तक पढ़ने वाले हैं। - स्वामी विवेकानन्द
    विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है। ज्योंही कोई विज्ञान शास्त्र पूर्ण एकता तक पहुँच जायेगा, त्योंहीं उसका आगे बढ़ना रुक जायेगा क्योंकि तब तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुकेगा। उदाहरणार्थ रसायनशास्त्र यदि एक बार उस एक मूल द्रव्य का पता लगा ले, जिससे वह सब द्रव्य बन सकते हैं तो फिर वह और आगे नहीं बढ़ सकेगा। पदार्थ विज्ञान शास्त्र जब उस एक मूल शक्ति का पता लगा लेगा जिससे अन्य शक्तियां बाहर निकली हैं तब वह पूर्णता पर पहुँच जायेगा। वैसे ही धर्म शास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा जब वह उस मूल कारण को जान लेगा। जो इस मत्र्यलोक में एक मात्र अमृत स्वरुप है जो इस नित्य परिवर्तनशील जगत का एक मात्र अटल अचल आधार है जो एक मात्र परमात्मा है और अन्य सब आत्माएं जिसके प्रतिबिम्ब स्वरुप हैं। इस प्रकार अनेकेश्वरवाद, द्वैतवाद आदि में से होते हुए इस अद्वैतवाद की प्राप्ति होती है। धर्मशास्त्र इससे आगे नहीं जा सकता। यहीं सारे विज्ञानों का चरम लक्ष्य है। - स्वामी विवेकानन्द
    किसी भाषा के शब्दों से अपने विचार को लिखित रूप से प्रस्तुत करने वाले चरित्र को लेखक कहते हैं। एक लेखक शब्दों को एक सही क्रम में रखकर कुछ अर्थ और समझ को व्यक्त करने वाला कलाकार होता है।
    जिस प्रकार लोग आत्मा की महत्ता को न समझकर शरीर को ही महत्व देते हैं उसी प्रकार लोग भले ही पढ़कर ही विकास कर रहें हो परन्तु वे शास्त्राकार लेखक की महत्ता को स्वीकार नहीं करते। जबकि वर्तमान समय में चाहे जिस विषय में हो प्रत्येक विकास कर रहे व्यक्ति के पीछे शास्त्राकार, लेखक, आविष्कारक, दार्शनिक की ही शक्ति है जिस प्रकार शरीर के पीछे आत्मा की शक्ति है। सदैव मानव समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र-साहित्य की रचना करना लेखक का काम रहा है। वही सत्य अर्थो में सभी से अभिनय करवाता है क्योंकि मनुष्य का चरित्र वही है जो उसका विचार है। और सभी विचारों को समाज में फैलाने वाला शास्त्राकार, लेखक ही है।
    एक लेखक, शास्त्राकार नहीं हो सकता लेकिन एक शास्त्राकार, लेखक हो सकता है क्योंकि एक लेखक, लेखन की कला को जानता है। यदि उसे शास्त्राकार बनना है तो उसे अपने मन को ऊँचाई को समग्रता, सार्वभौमिकता की ओर ले जाना पड़ेगा। सामान्य रूप में एक लेखक विशेषीकृत विषय का लेखक होता है तो शास्त्राकार समग्रता, सार्वभौमिकता को धारण किया हुआ एकात्मता को विकसित करने के लिए लिखता है। दोनों में अन्तर मात्र मन की ऊँचाई का होता है। एक लेखक नीचे का पायदान है तो शास्त्राकार उसका सर्वोच्च मानक है।
    जो लेखक शब्दों का जितना व्यापक कलाकार होगा जिससे समझ विकसित हो वह उतना ही लम्बे समय तक याद किया जाने वाला लेखक बनता है। 
    आपके विचार पूर्ण सत्य हैं और वो सब आविष्कृत किया जा चुका है।

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 17 - श्री राम नाइक
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    10. श्री राम नाइक (16 अप्रैल 1934 - )

    ”देश विविधता से भरा है। इसमें आस्था ऐसा पहलू है जो एका बनाता है। भले ही बोली भाषा, पहनावा, संस्कृति में भिन्नता हो पर माँ गंगा के प्रति आस्था तो एक जैसी है। इसे विकास से जोड़ने का यह उपयुक्त वक्त है। काशी की इसी धरती पर आदि शंकराचार्य को अद्वैत ज्ञान मिला था। यहाँ के कण-कण में पाण्डित्य व्याप्त है जो हमें संस्कृति की ओर आकर्षित करता है। देश में भले ही विभिन्न राज्यों की अपनी संस्कृति और सम्प्रभुता है मगर काशी, देश के सभी राज्यों को अद्वैत भाव से एकता के साथ लेकर आगे बढ़ती है। देश को एकता के साथ विकास का भाव जगाने के लिए काशी की ओर देखना चाहिए।“ (महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में भारतीय समाजशास्त्रीय सोसायटी के 40वें अधिवेशन के उद्घाटन में) - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत
    साभार - दैनिक जागरण, 30 नवम्बर, 2014


    ”रिजर्व बैंक से दस गुना विचार धन दे गये विवेकानन्द” (स्वामी विवेकानन्द के शिकागो वकृतता के 122 वर्षगाॅठ पर सन् 2015 में अलीगढ़ में) - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत

    ”सोचवीर नहीं, कृतिवीर बनें। जब रामसेतू बन रहा था तब एक गिलहरी भी श्रमदान कर रही थी। क्योंकि वह किनारे बैठकर सोचने की बजाए पूरी ताकत से कृति में जुट गई थी। देशवासीयों को भी इस कथा से प्रेरणा लेनी चाहिए।” (महमूरगंज, वाराणसी के एक अभिनन्दन समारोह में) - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    काशी, सत्य प्रकाशित करने वाला एक क्षेत्र है। मूलतः जिन महापुरूषों के कारण वाराणसी ने गौरव प्राप्त किया उनमें से अधिकतम, वहाँ के निवासी ही नहीं थे। 
    रामनगर (वाराणसी की ओर से गंगा उस पार) का महात्म्य महर्षि वेदव्यास के तप स्थलों के रूप में विदित है। त्रिकोण की संरचना में वेदव्यास के स्थान से जितनी दूरी पर दुर्गा मन्दिर है, ठीक उतनी ही दूरी पर बाबा कीनाराम के द्वारा स्थापित वेदव्यास मंदिर है, जो रामनगर किले के अन्दर स्थित है। जिसे साधारण जनता छोटा वेदव्यास के नाम से जानती है। वास्तव में वेदव्यास की यह सबसे प्राचीन मूर्ति है। व्यासजी द्वारा काशी को शाप देने के कारण विश्वेश्वर ने व्यासजी को काशी से निष्कासित कर दिया था। तब व्यासजी लोलार्क मन्दिर के आग्नेय कोण में गंगाजी के पूर्वी तट पर स्थित हुए। इस घटना का उल्लेख काशी खण्ड में इस प्रकार है-
    लोलार्कादं अग्निदिग्भागे, स्वर्घुनी पूर्वरोधसि। 
    स्थितो ह्यद्यापि पश्चेत्सः काशीप्रासाद राजिकाम्।। - स्कन्दपुराण, काशी खण्ड 96/201

    काशीखण्डोक्त लोलार्क कुण्ड से दक्षिण दिशा की ओर टीला-शिखर पर आदि वेदव्यास का स्थान है। काशी खण्ड के प्रमाण से ही यह सिद्ध होता है कि इस परिक्षेत्र में अतिप्राचीन मेला होता था जो अब समाप्तप्राय है (मघा नक्षत्र युक्ता पूर्णिमा)। माघ महीने में लगने वाला यह मेला वर्तमान में राजकीय व्यवस्था के अभाव से अब समाप्त है। कहा जाता है कि शिव द्वारा वेदव्यास को वरदान था कि काशीवास का पुण्य तभी प्राप्त होगा जब माघ महीने में वेदव्यास का दर्शन किया जाये। इस दर्शन द्वारा एक वर्ष काशीवास का पुण्य प्राप्त होता है। यह मेला मात्र मेला न होकर दूर-दराज के आये लोगों के बीच आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक मंच होता था। किले में स्थित वेदव्यास मंदिर के दर्शन के पश्चात हजारों लोग तालाब में स्नान कर बगीचों व तालाबों के किनारे भोजन कर पुनः वेदव्यास का दर्शन करते थे इस दौरान तालाबों के किनारो पर सैकड़ों दुकानें लगती थीं। जो लोगों की आजीविका तथा राजस्व का एक साधन थे। व्यास काशी क्षेत्र की कुल सीमा करीब 15 किलोमीटर के व्यास में है, जो छोटा मीरजापुर, पटनवाँ, हमीदपुर, जिवनाथपुर, रामनगर से साहुपुरी तक विस्तृत है।
    महर्षि वेदव्यास की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध प्राचीन रामनगर घाट के किनारे की एक बस्ती के रूप में था, जहाँ पर शहर का एक धनाढ्य वर्ग जौहरी, सेठ के रूप में रहता था। 
    ध्यान रहे कि गंगा पार क्षेत्र से ही अन्तिम जीवनदायिनी शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ और ”सत्यकाशी क्षेत्र“ व्यक्त हुआ है। प्रभु नारायण राजकीय इण्टर कालेज से कक्षा-11 व 12 के अपने शिक्षा ग्रहण के दौरान 2 वर्ष रामनगर में गोलाघाट स्थित स्व.एस.एस.लाल के मकान सं0 1/782 में किराये पर मेरा (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“) रहना हुआ। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं’’, काशी (वाराणसी) में एक काशी करवट मन्दिर भी है।
    प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी ने काशी का ध्यान केन्द्रित करते हुये अपने विचार को इस प्रकार व्यक्त किये थे - ”काशी के राष्ट्र गुरू बने बिना भारत जगत गुरू नहीं बन सकता। देश अतीत की तरह आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचेगा तो स्वतः आर्थिक वैभव प्राप्त हो जायेगा। इसी खासियत की वजह से इतिहास में कभी भारत सोने की चिड़िया थी।“ परन्तु काशी अभी तक उस जिम्मेदारी को नहीं पूण कर पा रहा। ”सत्यकाशी क्षेत्र-व्यास क्षेत्र” जो कभी काशी राज्य का ही अंग हुआ करता था, द्वारा ”काशी-सत्यकाशी“ के राष्ट्रगुरू बनने की योग्यता प्रस्तुत हो चुकी है।
    स्वामी विवेकानन्द जी सत्य रूप में रिजर्व बैंक से दस गुना विचार धन दे गये। और वो 100 से अधिक वर्ष पूर्व ही दे गये। अभी भारत उसे कैश (नगद) में परिवर्तित ही नहीं करा पा रहा है तो भारत को उस विचार धन से क्या लाभ? जबकि स्वामी जी के विचार की अगली किस्त आ गई है और वह कैश (नगद) में परिवर्तित होगी। अगली किस्त अनन्त है और वह इतना है कि जैसे-जैसे खर्च होगा वैसे-वैसे बढ़ता ही जायेगा। क्योंकि वो किस्त इस रूप में है-
    शब्द से सृष्टि की ओर...
    सृष्टि से शास्त्र की ओर...
    शास्त्र से काशी की ओर...
    काशी से सत्यकाशी की ओर...
    और सत्यकाशी से अनन्त की ओर...
    एक अन्तहीन यात्रा...............................

    वहीं पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे, अब्दुल कलाम जी ने कहा था-”नवीनता के द्वारा ही ज्ञान को धन में बदला जा सकता है।“ ज्ञान को व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी बनाने और उसके व्यापारीकरण से ही कल्याण होता है। सभी जानते हैं - ”जगत एक सपना है, यह जगत असत्य है, ब्रह्म ही सत्य“, तो क्या कोई काम न किया जाये?

    स्वामी विवेकानन्द जी की वाणी है -
    ”बहुत सेे व्यक्तियों के समूह कांे समष्टि कहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टि कहलाता है आप और मैं दोनों व्यष्टि हैं, समाज समष्टि है आप और मैं- पशु, पक्षी, कीड़ा, कीड़े से भी तुक्ष प्राणी, वृक्ष, लता, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे यह प्रत्येक व्यष्टि है और यह विश्व समष्टि है जो कि वेदान्त में विराट, हिरण गर्भ या ईश्वर कहलाता है। और पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, देवी इत्यादि। व्यष्टि को व्यक्तिशः स्वतन्त्रता होती है या नहीं, और यदि होती है तोे उसका नाम क्या होना चाहिए। व्यष्टि को समष्टि के लिए अपनी इच्छा और सुख का सम्पूर्ण त्याग करना चाहिए या नहीं, वे प्रत्येक समाज के लिए चिरन्तन समस्याएँ हैं सब स्थानों में समाज इन समस्याओं के समाधान में संलग्न रहता है ये बड़ी-बड़ी तरंगों के समान आधुनिक पश्चिमी समाज में हलचल मचा रही हैं जो समाज के अधिपत्य के लिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का त्याग चाहता है वह सिद्धान्त समाजवाद कहलाता है और जो व्यक्ति के पक्ष का समर्थन करता है वह व्यक्तिवाद कहलाता है।” (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ - 288)
    जब रामसेतू बन रहा था तब एक गिलहरी भी श्रमदान कर रही थी क्योंकि गिलहरी को ये पता था कि कौन सा कार्य प्राथमिक है। भारत की स्थिति तो ये है कि पहले गिलहरी ही राम से अपना काम करवायेगी और उसके बाद फुर्र हो जायेगी। भारत, कार्य की स्तरीय प्राथमिकता का विवेक भी खो चुका है। उसे पता ही नहीं कि शारीरिक, आर्थिक और मानसिंक कार्य में कौन सा प्राथ्मिक है, कौन मध्यम और कौन निम्न। समष्टि कार्य के उत्थान के लिए व्यष्टि को अपनी शक्ति लगानी चाहिए। इस ओर कार्य करने को ही बलिदान-त्याग-शहीद होना कहते हैं।
    जबकि महर्षि मनु का कहना था - ”इस कलयुग में मनुष्यों के लिए एक ही कर्म शेष है आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं से कोई फल नहीं होता। इस समय दान ही अर्थात एक मात्र कर्म है और दानो में धर्म दान अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है। दूसरा दान है विद्यादान, तीसरा प्राणदान और चैथा अन्न दान। जो धर्म का ज्ञानदान करते हैं वे अनन्त जन्म और मृत्यु के प्रवाह से आत्मा की रक्षा करते है, जो विद्या दान करते हैं वे मनुष्य की आॅखे खोलते, उन्हें आध्यात्म ज्ञान का पथ दिखा देते है। दूसरे दान यहाॅ तक कि प्राण दान भी उनके निकट तुच्छ है। आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार से मनुष्य जाति की सबसे अधिक सहायता की जा सकती है।“

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 18 - दलाईलामा
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    10. दलाई लामा (6 जुलाई, 1935 - )

    ”दार्शनिक आधार पर चर्चा करने से ही अलगाव बढ़ता है। जब तक व्यावहारिक रूप में धार्मिकता के आधार पर विचारों का सामंजस्य नहीं स्थापित होगा, तब तक हम ऊपर नहीं उठ सकते। दार्शनिक दृष्टि से धर्म में अन्तर होता है लेकिन धार्मिक दृष्टि से नहीं। नई सदी में कार्यो को संपादित करने वाले आप (नये पीढ़ी से) ही है, पुरानी पीढ़ी आपके पीछे है लेकिन सारा दायित्व आप के ऊपर ही है इसलिए पहले अच्छी तरह से शिक्षा ग्रहण करें।“(वाराणसी यात्रा में) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
    साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 18-12-1999

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला अर्थात् विश्वमानक शून्यः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रंृखला व्यावहारिकता पर आधारित ज्ञान-कर्मज्ञान का शास्त्र-साहित्य है। कई जन्मों और लम्बे प्रक्रिया के फलस्वरूप अब धर्म तो विवादमुक्त स्वरूप को प्राप्त कर सांमजस्य स्थापित कर चुका है। अब उसकी स्थापना के लिए पुरानी पीढ़ी सहयोग करें। आपने आने वाली पीढ़ी को दायित्व सौपा है और दायित्व पूर्ण भी किया गया परन्तु पुरानी पीढ़ी पीछे नहीं आगे रहना चाहती है। यह जानते हुये, देखते हुये, समझते हुये कि सदा से भारत का कल्याण युवाओं ने ही किया है परन्तु प्रत्येक समय पुरानी पीढ़ी ही निष्क्रीयता और बाधा रूप में खड़ी रहती है। अगर ऐसा नहीं है तो पुरानी पीढ़ी इस नये सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त, वेद, व्यवस्था को अपने अहंकार को समाप्त कर स्वीकार करें, स्वागत करें, स्थापित करें, क्योंकि क्रियान्वयन पदों पर पुरानी पीढ़ी ही पीठासीन है। कर्मज्ञान का दान तो प्रारम्भ हो चुका है और यही संसाधन युक्त भारत के तीव्र विकास में बाधक था। नई पीढ़ी तो बहुत कुछ कर सकती है परन्तु वह कैसे करे? युवाओें को मत द्वारा विचार व्यक्त करने का अधिकार तो 18 वर्ष की उम्र में ही दे दिया परन्तु पैतृक सम्पत्ति का अधिकार किस उम्र में प्राप्त होगा? अब कर्मज्ञान प्राप्त होने से प्रत्येक ही संसाधन की आवश्यकता समझेगा। ध्यान रहे कर्मज्ञान से कृष्ण का निर्माण होता है तो परिणाम कौन भुगतेगा?“

    ”पश्चिम जगत ने भौतिक जगत की सुख-सुविधाओं के लिए विश्व को बहुत कुछ दिया है। अब हमारी बारी है। उन्हें इसके एवज में कुछ चुकाने का समय है। हम उन्हें शान्ति व जीवन के लक्ष्य बारे में ज्ञान दें।“ (वाराणसी यात्रा में) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 15-01-2011

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
    पश्चिम जगत बहिर्मुखी है, पूर्वी जगत अन्तर्मुखी है। पश्चिम ने पदार्थ विज्ञान दिया तो पूर्वी जगत ने आध्यात्म विज्ञान दिया। अब दोनों के समन्वय और एकीकरण का समय आ गया है जिससे एक नये विश्व का निर्माण हो। जिसके लिए विश्वधर्म के शास्त्र - विश्वशास्त्र का आविष्कार हो चुका है। जिसका लक्ष्य ही शान्ति, जीवन का लक्ष्य, कर्मज्ञान, मानक आधारित विश्व इत्यादि है।
    विश्वशास्त्र की शिक्षा ही सत्य मानक शिक्षा है जो निम्ननिखित पाठ्यक्रम के रूप में छात्रवृत्ति के साथ संचालित है।
    1. पूर्ण ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Complete Knowledge-CCK)
    2. ईश्वर शास्त्र व व्यापार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Godics & Business Knowledge-CGBK)
    3. अवतार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Avatar Knowledge-CAK)
    4. गुरू ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Guru Knowledge-CGK)
    5. संस्थागत धर्म में डिप्लोमा (Diploma in Institutional Religion-DIR)
    6. पूर्ण शिक्षा में स्नातक (Bachelor in Complete Education-BCE)
    7. पूर्ण शिक्षा में परास्नातक (Master in Complete Education-MCE)
    हमेशा यूरोप से सामाजिक तथा एशिया से आध्यात्मिक शक्तियों का उद्भव होता रहा है एवं इन दोनों शक्तियों के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण से ही जगत का इतिहास बना है। वर्तमान मानवेतिहास का एक और नवीन पृष्ठ धीरे-धीरे विकसित हो रहा है एवं चारो ओर उसी का चिन्ह दिखाई दे रहा है। कितनी ही नवीन योजनाओं का उद्भव तथा नाश होगा, किन्तु योग्यतम वस्तु की प्रतिष्ठा सुनिश्चित है- सत्य और शिव की अपेक्षा योग्यतम वस्तु और हो ही क्या सकती है? (1प 310) - स्वामी विवेकानन्द

    ”शून्य आत्मसात् करने से बोधिसत्व की प्राप्ति सम्भव“ (वाराणसी यात्रा में) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 17-01-2011

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
    शून्य, आत्मसात् करने से ही बोधिसत्व की प्राप्ति होती है। सत्य है। हमें उस शून्य का अनुभव करना पड़ेगा जहाँ से समस्त ब्रह्माण्ड बहिर्गत है। उस शून्य को आत्मसात् व बोधिसत्व के प्राप्ति से ही निम्न आविष्कार सम्भव हो सका है-
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है।

    ”भारत में आध्यात्मिकता का बोलबाला हजारों सालों से है इसके बावजूद भी यहाँ किसी भी धर्म को छुये बिना नैतिक मूल्यों की शिक्षा धर्म निरपेक्ष रूप से विकसित हुई है। यह आधुनिक युग में विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन है। आज विश्व को ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष नैतिक मूल्यों की शिक्षा की सख्त जरूरत है। बीसवीं सदी रक्तपात की सदी थी। 21वीं सदी संवाद की सदी होनी चाहिए। इससे कई समस्यायें अपने आप समाप्त हो जाती है। दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करते हैं इसलिए यह जरूरी है कि सेक्यूलर इथिक्स (धर्मनिरपेक्ष नैतिकता) को प्रमोट (बढ़ाना) करें जो वास्तविक और प्रैक्टिकल एप्रोच (व्यावहारिक) पर आधारित हो। धार्मिक कर्मकाण्डों के प्रति दिखावे का कोई मतलब नहीं है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में मानव मूल्यों का अभाव है। यह सिर्फ मस्तिष्क के विकास पर जोर देती है। हृदय की विशालता पर नहीं। करूणा तभी आयेगी जब दिल बड़ा होगा। दुनिया के कई देशों ने इस पर ध्यान दिया है। कई विश्वविद्यालयों में इस पर प्रोजेक्ट चल रहा है।“ (सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में ”21वीं सदी में शिक्षा“ विषय पर बोलते हुये। इस कार्यक्रम में केंन्द्रीय तिब्बती अघ्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति पद्मश्री गेशे नवांग समतेन, पद्मश्री प्रो.रामशंकर त्रिपाठी, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति प्रो. अवधराम, दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर के पूर्व कुलपति प्रो. वेणी माधव शुक्ल, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र और वर्तमान कुलपति प्रो. वी.कुटुम्ब शास्त्री, प्रति कुलपति प्रो.नरेन्द्र देव पाण्डेय, प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी, प्रो. यदुनाथ दूबे इत्यादि उपस्थित थे।) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू
    साभार - दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान, वाराणसी, दि0 18-01-2011

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    जब सभी सम्प्रदायों को धर्म मानकर हम एकत्व की खोज करते हैं तब दो भाव उत्पन्न होते हैं। पहला-यह कि सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखें तब उस एकत्व का नाम सर्वधर्मसमभाव होता है। दूसरा-यह कि सभी धर्मों को छोड़कर उस एकत्व को देखें तब उसका नाम धर्म निरपेक्ष होता है। जब सभी सम्प्रदायों को सम्प्रदाय की दृष्टि से देखते हैं तब एक ही भाव उत्पन्न होता है और उस एकत्व का नाम धर्म होता है। इन सभी भावों में हम सभी उस एकत्व के ही विभिन्न नामों के कारण विवाद करते हैं अर्थात् सर्वधर्मसमभाव, धर्मनिरपेक्ष एवं धर्म विभिन्न मार्गों से भिन्न-भिन्न नाम के द्वारा उसी एकत्व की अभिव्यक्ति है। दूसरे रुप में हम सभी सामान्य अवस्था में दो विषयों पर नहीं सोचते, पहला- वह जिसे हम जानते नहीं, दूसरा- वह जिसे हम पूर्ण रुप से जान जाते हैं। यदि हम नहीं जानते तो उसे धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव कहते हैं जब जान जाते हैं तो धर्म कहते हैं। इस प्रकार आई0 एस0 ओ0/डब्ल्यू0 एस0- शून्य श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव नाम तथा कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मयुक्त नाम है तथा इन समस्त कार्यों को सम्पादित करने के लिए जिस शरीर का प्रयोग किया जा रहा है उसका धर्मयुक्त नाम-लव कुश सिंह है तथा धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव सहित मन स्तर का नाम विश्वमानव है जब कि मैं (आत्मा) इन सभी नामों से मुक्त है।
    आविष्कारक के आविष्कार के उपरान्त आविष्कार विषय का उपयोग ही मानव का कत्र्तव्य है। विश्वधर्म के अनुसार यह आविष्कार विषय ही सेक्यूलर इथिक्स (धर्मनिरपेक्ष नैतिकता), वास्तविक और प्रैक्टिकल एप्रोच (व्यावहारिक) है। जिस पर ही आधारित है मेरा निम्नलिखित आविष्कार-
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है।

    काल प्रवाह में सुसंगत परिवर्तन लाने के लक्ष्य को प्राप्त करना ऐसा आसान कार्य नहीं है जो इने गिने मुट्ठी भर उत्साही लोगों द्वारा चन्द दिनों में किया जा सके। यह कार्य लाखों लोगों के युग-युगान्तर तक किये गये साग्रह एवं निष्ठापूर्ण प्रयास द्वारा ही सम्भव है। इसके लिए हमारी शिक्षा पद्धति को पुनर्गठित करना होगा जिससे मानव के विचारों, आदर्शों एवं कार्यों को नई दिशा प्रदान की जा सके। - स्वामी विवेकानन्द


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    12. स्वामी जयेन्द्र सरस्वती (18 जुलाई, 1935-)

    ”बौद्वो के अनुरोध पर गौतम बुद्व के विष्णु अवतार सिद्ध करने सम्बन्धी अवधारणा को आगे न बढ़ने पर सहमति।“ (मूलगंध कुटी बिहार, सारनाथ में) -जगदगुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वमी 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 20-01-2000

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”जगद्गुरू जी, क्या सिद्धान्त को सिद्धान्त से अलग किया जा सकता है? सत्य को सत्य से अलग किया जा सकता है? क्या सिद्वान्त को रोका जा सकता है? क्या सिद्धान्त को रोकना मानव के वश की बात है? यह तो स्वयं ईश्वर या सिद्धान्तों से निर्मित अवतारगण के भी अधिकार में नहीं है। फिर आप तो विष्णु के आँठवे व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णअवतार तथा ईश्वर-शिव-ब्रह्म-आत्मा के अंशावतार श्रीकृष्ण द्वारा व्यक्त गीतोपनिषद् के व्याख्याता आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ चार पीठों में से एक के सैकड़ों वर्षो बाद के पीठाधीश्वर हैं। पहले बुद्ध कौन थे यह जाने ‘भगवान बुद्ध, व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य काल के व्यष्टि दृश्य काल में अदृश्य सत्य चेतना के अंश से युक्त भगवान विष्णु के नवें अवतार थे। अर्थात् व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य काल के व्यष्टि दृश्य काल में अदृश्य सत्य चेतना से युक्त भगवान विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण के अंशावतार ही भगवान बुद्ध थे। भगवान बुद्ध अपने कार्यो को दार्शनिक आधार इसलिए नहीं दिये क्योंकि दार्शनिक आधार देने पर वह गीतोपनिषद् और श्रीकृष्ण में समाहित हो जाता परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण के समय का हिंसक समाज और हिंसा सहित कर्म की ओर बढ़ते भगवान बुद्ध के समय के समाज में अहिंसा आधारित नये मानव समाज की सृष्टि का कार्य असफल हो जाता। व्यक्तिगत प्रमाणित ज्ञान (वेद) से सार्वजनिक प्रमाणित कर्मज्ञान (कर्मवेद) के विकास क्रम में एकात्म ज्ञान (गीतोपनिषद्) श्रीकृष्ण से व्यक्त तथा व्यावहारिकता के लिए बुद्धि या सम्यक (ध्यान) भगवान सिद्धार्थ बुद्ध से व्यक्त हुआ, तभी अन्त में पूर्ण व्यावहारिक एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म सहित एकात्म ध्यान (कर्मवेद) व्यक्त हुआ।’ इसलिए ऐसे विषयों पर सहमति न व्यक्त करें जो सिद्धान्तः विरूद्ध हो, एकता विरूद्ध हो और स्वयं आपको विवश कर देने वाला हो।“

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 19 - श्री प्रणव मुखर्जी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    13. श्री प्रणव मुखर्जी (11 दिसम्बर 1935 - )

    ”भारतवासियों के रूप में हमें भूतकाल से सीखना होगा, परन्तु हमारा ध्यान भविष्य पर केन्द्रित होना चाहिए। मेरी राय में शिक्षा वह मंत्र है जो कि भारत में अगला स्वर्ग युग ला सकता है। हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों ने समाज के ढांचे को ज्ञान के स्तम्भों पर खड़ा किया गया है। हमारी चुनौती है, ज्ञान को देश के हर एक कोने में पहुँचाकर, इसे एक लोकतांत्रिक ताकत में बदलना। हमारा ध्येय वाक्य स्पष्ट है- ज्ञान के लिए सब और ज्ञान सबके लिए। मैं एक ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ जहाँ उद्देश्य की समानता से सबका कल्याण संचालित हो, जहाँ केन्द्र और राज्य केवल सुशासन की परिकल्पना से संचालित हों, जहाँ लोकतन्त्र का अर्थ केवल पाँच वर्ष में एक बार मत देने का अधिकार न हो, बल्कि जहाँ सदैव नागरिकों के हित में बोलने का अधिकार हो, जहाँ ज्ञान विवेक में बदल जाये, जहाँ युवा अपनी असाधारण ऊर्जा तथा प्रतिभा को सामूहिक लक्ष्य के लिए प्रयोग करे। अब पूरे विश्व में निरंकुशता समाप्ति पर है, अब उन क्षेत्रों में लोकतन्त्र फिर से पनप रहा है जिन क्षेत्रों को पहले इसके लिए अनुपयुक्त माना जाता था, ऐसे समय में भारत आधुनिकता का माॅडल बनकर उभरा है। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने सुप्रसिद्ध रूपक में कहा था कि- भारत का उदय होगा, शरीर की ताकत से नहीं, बल्कि मन की ताकत से, विध्वंस के ध्वज से नहीं, बल्कि शांति और प्रेम के ध्वज से। अच्छाई की सारी शक्तियों को इकट्ठा करें। यह न सोचें कि मेरा रंग क्या है- हरा, नीला अथवा लाल, बल्कि सभी रंगों को मिला लें और सफेद रंग की उस प्रखर चमक को पैदा करें, जो प्यार का रंग है।“ (प्रथम भाषण का संक्षिप्त अंश) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
    साभार - दैनिक जागरण, 26 जुलाई, 2012

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    भारत के स्वतन्त्रता के अनेक दशकों बाद प्रथम नागरिक के ये शब्द, मात्र केवल शब्द नहीं बल्कि भारत के उस अन्तिम और सर्वोच्च ऊँचाई के मार्ग का मूल सिद्धान्त, बीज, मन्त्र और नींव है। आपके इन शब्दों को अक्षरशः एक आम नागरिक अपने देश के प्रति कत्र्तव्य को समझते हुये पूर्ण कर चुका है और वह अनेक दिशाओं से प्रमाण प्राप्त करते हुये ”विश्वशास्त्र“ के रूप में व्यक्त है। अपने देश को मानक लोकतन्त्र के रूप में स्थापित करने के जो सिद्धान्त हैं वे कुछ ही पृष्ठों के हैं परन्तु अपने उद्देश्य से बहुत दूर निकल गये तथाकथित बौद्धिक भारतीय नागरिक और उनके नेतृत्वकर्ताओं के विभिन्न प्रकार के रंग से रंगे मन को एक सफेद रंग में लाने के प्रमाणों से ”विश्वशास्त्र“ लगभग 1700 पृष्ठों का बन गया। इन 1700 पृष्ठों में मनुष्य जाति के इस सृष्टि पर अन्तिम समय तक रहने तक के लिए ज्ञान संकलित कर दिया गया है जिसे भारत के महा-विभूषित, महा-मण्डित संत, महात्मा इत्यादि असम्भव ही समझते रहे हैं। इसलिए ही ”विश्वशास्त्र“ के साथ उसके गुण की पंक्ति (Tag Line) ”द नाॅलेज आॅफ फाइनल नॅालेज“ लगा हुआ है साथ ही शास्त्र के अन्त में ये भी लिखा है-”सभी सार्वेच्च विचार और सर्वोच्च कर्म मेरी ओर ही आते हैं“ और ये चुनौति भी है उन महा-विभूषित, महा-मण्डित संत, महात्मा इत्यादि के लिए जो भीड़ इकट्ठा कर भारत को विश्वगुरू बनाने का सपना दिखाते हैं, कि इससे कम पृष्ठों में अपनी प्रमाणिकता प्रस्तुत करें। आज वो हैं भीड़ है, कल जब वो नहीं रहेंगे तब ये भीड़ अनाथ हो जायेंगी और सपना तोड़ा जा चुका होगा। वे एक बार फिर ठगे जा चुके होंगे। उनका विश्वास उठ चुका होगा। फिर जब वो सत्य रूप में आयेगा तो उस पर कौन विश्वास करेगा क्योंकि भीड़ में बौद्धिकता नहीं होती। केवल अपने लोंगो को बताने की बात होती है कि मैं भी गया था। क्या देखा, क्या सुना, कुछ पता नहीं।

    भारत में अनेक अपराधिक और घोटाले की फाइल में ”विश्वशास्त्र“ से अधिक पृष्ठ होते हैं या यूँ कहे कि ”विश्वशास्त्र“ में निम्नलिखित के अनुसार ही पृष्ठ हैं-

    01. कक्षा 8 तक की शिक्षा प्राप्त करने तक सभी विषयों को मिलाकर जिनते पृष्ठ पढ़ा जाता है, विश्वशास्त्र उससे छोटा है।

    02. उच्च शिक्षा के किसी भी एक विषय के पाठ्य पुस्तक से विश्वशास्त्र छोटा है।

    03. विश्वविद्य़ालय में किसी विषय पर किये गये 5 शोध-पत्रों से विश्वशास्त्र छोटा है।

    04. किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़े गये पुस्तकों से विश्वशास्त्र छोटा है।

    05. 5 उपन्यासों के कुल पृष्ठ से विश्वशास्त्र छोटा है।

    06. किसी सबसे अधिक पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्र के मात्र 15 दिनों के समाचार पत्र से विश्वशास्त्र छोटा है।

    07. एक क्रिकेट टेस्ट मैच के दौरान क्रिकेट के सम्बन्ध में दूरदर्शन के चैनल पर किये गये कमेन्ट्री व वार्ता से निकले वाक्यों से विश्वशास्त्र छोटा है।

    08. 10 फिल्मों के पटकथा से विश्वशास्त्र छोटा है।

    09. किसी एक घोटाले के जाँच पर तैयार किये गये रिपोर्ट से विश्वशास्त्र छोटा है।

    10. 4 औरतों को बिना किसी मुद्दे पर चर्चा के बात करने के लिए 1 सप्ताह एक साथ रखने पर निकले वार्ता से विश्वशास्त्र छोटा है।

    11. एक सास-बहू या किसी दूरदर्शन धारावाहिक को देखने में जितना समय लगेगा, उससे कम समय में विश्वशास्त्र पढ़ा जा सकता है।

    12. एक लड़की जिसका एक लड़का मित्र (ब्वाॅय फ्रेण्ड) हो, मोबाइल पर बात करने के लिए स्वतन्त्र कर दिया जाय तो वह 5 दिन में जितना बात करेगी, उसके मूल्य और निकले साहित्य से विश्वशास्त्र छोटा है।

    और ”विश्वशास्त्र“ की सारांश में उपयोग

    01. निरक्षर के लिए इस शास्त्र का मूल्य शून्य है, साक्षर के लिए यह उपयोगी है, पशु-प्रवृत्तियों के लिए यह विश्वशास्त्र गोवर्धन पर्वत है, योगियों के लिए यह अँगुली पर उठाने योग्य है, धनिकों के लिए यह व्यर्थ है, नई पीढ़ीयों के लिए यह भविष्य निर्माता है, नेतृत्वकर्ताओं के लिए यह नेतृत्व की कला है, ज्ञान पिपासुओं के लिए यह मार्गदर्शक और उपलब्धि है।

    02. काशी क्षेत्र का विश्वशास्त्र सत्य रूप है, उसकी संस्कृति है, उसका प्रतिनिधि शास्त्र है और उसका गौरव है।

    03. भारत के लिए विश्वशास्त्र भारतीयता है तथा मानवता का चरम विकसित बिन्दु है। राष्ट्र के लिए राष्ट्रीयता है। 

    04. युग के लिए यह युग-परिवर्तक है, व्यवस्था के लिए यह व्यवस्था-सत्यीकरण है।

    05. लोकतन्त्र के लिए यह पुष्टिकारक है, संविधान के लिए यह मार्गदर्शक है, विभिन्न शास्त्रों के बीच विश्वशास्त्र ही गुरू है और आत्मतत्व का दृश्य रूप है।

    और हमारे इस ग्रह पृथ्वी के देश भारत में हजारों विश्वविद्यालय, लाखों विद्यालय-महाविद्यालय, लाखों प्रोफेसर-लेक्चरर इत्यादि शिक्षा क्षेत्र से हैं। भारत के ”पुनर्निर्माण व आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार एक भारत-श्रेष्ठ भारत का निर्माण” के लिए प्रस्तुत प्रथम और अन्तिम प्रारूप ”विश्वशास्त्र“ के 1700 पृष्ठों पर निर्णय कितने दिनों में आयेगा, इससे ही निर्धारित होगा भारत की बौद्धिकता का कालानुसार योग्यता कि वो भूतकाल में हैं या वर्तमान में या भविष्य के लिए तुरन्त कार्यवाही करने को तैयार है।

    स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि - ”जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यह है कि ऐसा चक्र प्रर्वतन कर दूँ जो कि उच्च एवम् श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार-द्वार पर पहुँचा दे। फिर स्त्री-पुरूष को अपने भाग्य का निर्माण स्वंय करने दो। हमारे पूर्वजों ने तथा अन्य देशों ने जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें देखने दो कि और लोग क्या कर रहे हैं। फिर उन्हंे अपना निर्णय करने दो। रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार वे किसी विशेष आकार धारण कर लेगें-परिश्रम करो, अटल रहो। ‘धर्म को बिना हानि पहुँचाये जनता की उन्नति’-इसे अपना आदर्श वाक्य बना लो।“ 

    और इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए पुनर्निर्माण  - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) की योजना ”सत्य मानक शिक्षा“ को सबके द्वारा पर पहुँचाने के लिए बनाईं गई है। जो भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) से युक्त है अर्थात इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति/संस्था को शिक्षा के साथ-साथ, छात्रवृत्ति और रायल्टी या सहायता निश्चित रूप से प्राप्त होती है।


    1. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना।
    2. सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश।
    3. सबका साथ, सबका विकास।
    4. 100 नये माॅडल शहर बसाना।
    5. 5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology), और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र। 
     (भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधित करते हुये, सोमवार, 9 जून 2014 ई0) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    इस ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु एक निश्चित उद्देश्य के लिए अपनी प्रकृति के साथ व्यक्त हैं। इस प्रकार ईश्वर, अवतार और मनुष्यों के लिए उनकी अपनी शक्ति सीमा निर्धारित है। स्वयं से अलग दूसरे की शक्ति सीमा के लिए वह इच्छा-विचार तो व्यक्त कर सकता है परन्तु उसे कर पाना असम्भव होता है। 

    आपके द्वारा भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधन में बोले गये 1. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना, अवतारों के शक्ति सीमा का कार्य है। यह किसी भी मनुष्य द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकता। चाहे हजारों देश के सर्वोच्च अधिकार युक्त नेतृत्वकर्ता क्यों न आयें-जायें परन्तु बिना अवतार के अवतरण के यह कार्य पूर्ण करना असम्भव है।

    2. सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश, ये सरकार के ही इच्छा शक्ति पर ही निर्भर है।

    3. सबका साथ, सबका विकास, आशिंक रूप से सरकार कर सकती है लेकिन पूर्ण रूप से अवतार के द्वारा व्यक्त तन्त्र-प्रणाली ही कर सकता है।

    4. 100 नये माॅडल शहर बसाना, ये सरकार के ही इच्छा शक्ति पर निर्भर है। आध्यात्म जगत में जैसे ही कोई आविष्कार होता है वह व्यापार बन जाता है जो आविष्कारक के जीवन, ज्ञान और कर्म से जुड़ा होता है। पुनः आविष्कारक के जीवन, ज्ञान और कर्म पर आधारित अन्य आविष्कार भी होने लगते हैं। जैसे - श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिव-शंकर, बुद्ध, माँ वैष्णों देवी, सांई बाबा, विश्व के तमाम धर्म संस्थापकों के जीवन, ज्ञान व कर्म पर अनेकों व्यापार विकसित हो गये हैं। भारतीय आध्यात्म और दर्शन जगत ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है। उसी प्रकार मेरे जीवन से जुड़ा वाराणसी-विन्ध्याचल-शिवद्वार-सोनभद्र के बीच का क्षेत्र हैं जो सत्यकाशी: पंचम, अन्तिम और सप्तम काशी के रूप में व्यक्त हुआ है। इस क्षेत्र के बीच नया माॅडल शहर सत्यकाशी के नाम से बसाना है। यह 5T का सर्वोच्च उदाहरण है।

    5. 5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology) और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र, ये विकास व लक्ष्य प्राप्ति के कार्य के लिए मार्गदर्शक बिन्दु है जिस पर आधारित होकर सरकार भी काम कर सकती है और अन्य नीजी संगठन भी। नीजी क्षेत्र में प्रयोग का मेरा यह कार्य सर्वोच्च उदाहरण है। 

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 20 - श्री प्रणव मुखर्जी
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

     13. श्री प्रणव मुखर्जी (11 दिसम्बर 1935 - )

    ”क्या आर्थिक विकास ही विकास है? आज विकास का जो स्वरूप दिख रहा है, इसका वीभत्स परिणाम भी ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर का पिघलना, मौसम मे बदलाव आदि के रूप में सामने दिख रहा है। हमें यह देखना होगा कि विकास की इस राह में हमने क्या खोया और क्या पाया। समाज शास्त्री विमर्श कर यह राह सुझायें जिससे विकास, विविधता व लोकतंन्त्र और मजबूत बनें। विकास वह है जो समाज के अन्तिम व्यक्ति को भी लाभान्वित करे। भारत में एकता का भाव, व्यक्ति का मान होना चाहिए क्योंकि इसमें ही देश का सम्मान निहित है। समाज के लोग आगे आयें और सरकारों पर दबाव बनायें। विविधता भारत की संस्कृति की थाती है। भारत की यह संस्कृति 5000 वर्ष से अधिक पुरानी व जीवन्त है। काशी ज्योति का शहर है क्योंकि यहाँ बाबा का ज्योतिर्लिंग है। यह ज्ञान व एकता की ज्योति है। इसके प्रकाश से यह शहर ही नहीं, बल्कि पूरा देश आलोकित हो रहा है। यह शहर ज्ञान की असीम पूँजी लिए देश को अपनी ओर बुला रहा है।“ (महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में भारतीय समाजशास्त्रीय सोसायटी के 40वें अधिवेशन के उद्घाटन में) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत

    साभार - दैनिक जागरण, 30 नवम्बर, 2014

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था -”जितने दिनों से जगत है उतने दिनों से मन का अभाव- उस एक विश्वमन का अभाव कभी नहीं हुआ। प्रत्येक मानव, प्रत्येक प्राणी उस विश्वमन से ही निर्मित हो रहा है क्योंकि वह सदा ही वर्तमान है। और उन सब के निर्माण के लिए आदान-प्रदान कर रहा है।“ (धर्म विज्ञान, रामकृष्ण मिशन, पृष्ठ-27)

    जिस प्रकार विश्वमन, सभी मनों को निर्मित और प्रभावित कर रहा है उसी प्रकार सभी मन भी विश्वमन को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए पहले सभी मनों का शान्ति, एकता, स्थिरता प्रदान करने की जरूरत है। फिर अपने आप विश्वमन भी शान्ति, एकता, स्थिरता को प्राप्त हो जायेगा परिणामस्वरूप प्रकृति द्वारा की जा रही उठा-पटक भी सामान्य में परिवर्तित हो जायेगी। 

    ज्ञान, समान्यीकरण को कहते हैं जो ग्लोबल (वैश्विक) दृष्टि से आती है। आजकल शोध किसी विशेष बिन्दु-शीर्षक पर विशेषीकृत होकर होते हैं जो शोध की कला सीखा देते हैं और शोध परिणाम निरर्थक देते है। शोध से डिग्री और सेमिनार में शोध-पत्र पढ़ने से अतिरिक्त योग्यता प्राप्त होती है जो नौकरी पाने में सहायक होती है। नौकरी मिला काम समाप्त। काम समाप्त फिर मनुष्य धन बनाना और पीढ़ी बढ़ाने में व्यस्त। इसलिए समाजशास्त्रीयों से कोई हल नहीं मिल सकता और ना मिला। जब लक्ष्य ही नहीं पता तो अधिक विचार-विमर्श का परिणाम शून्य ही होता है। उनका काम अकेले पूर्ण कर दिया हूँ और उनके लिए सरकार पर दबाब बनाने का काम छोड़ दिया हूँ।

     

    वाराणसी जिसे काशी कहा जाता है वह मोक्षदायिनी काशी है। यहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग है जो सार्वभौम एकत्व और आदि योगी शिव-शंकर का प्रतीक है। यहाँ जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य जन्म-जात ज्ञानी होता है। उसे जन्म से ही ज्ञात होता है कि यह जगत् एक सपना और झूठा है। यह जगत् सत्य नहीं है इसलिए यहाँ के लोग काम नहीं करना चाहते। सीधी बात है जब सब छोड़कर जाना ही है तो बहुत काम करने से कोई अर्थ नहीं निकलता। जिस असीम ज्ञान को लेकर काशी अपनी ओर देश को बुला रहा है वह जीवनदायिनी सत्यकाशी से व्यक्त हुआ है। वाराणसी से ज्ञान निकलना बन्द हो गया है क्योंकि विश्वेश्वर ने व्यास को काशी से निष्काशित कर दिया था (देखे-स्कन्द पुराण, काशी खण्ड)। व्यास जी काशी के गंगा उस पार आ गये। जो अब जीवनदायिनी सत्यकाशी है और ”विश्वशास्त्र“ को व्यक्त करने वाला क्षेत्र है, इस योग्यता के कारण वह तेरहवाँ और अन्तिम भोगेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना का अधिकार रखता है।

    ”तैयार करें मूल्यों और उम्मीदों पर आधारित ब्लूप्रिन्ट“ (विडिओ कान्फ्रेसिंग से छात्रों और शिक्षकों को सन्देश - राष्ट्र निर्माण का आह्वानं) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत  साभार -  दैनिक जागरण, 20 जनवरी, 2016

     

    ”शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत। ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो समर्पित, विश्वसनीय और आत्म विश्वास से लवरेज युवा तैयार करे। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल काबिल पेशेवर दे बल्कि वो समाज व देश के प्रति जुड़ाव भी महसूस करे।“ (स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के पहले दिक्षांत समारोह में बोलते हुएं) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत

     लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    स्कूल-कालेजों के जाल से शिक्षा के व्यापार का विकास होता है न कि शिक्षा का। शिक्षा का विकास तो शिक्षा पाठ्यक्रम पर निर्भर होता है जिससे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों निर्मित होते हैं। जब तक पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम का निर्माण नहीं होता, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता लेकिन शिक्षा के व्यापार का विकास होता रहेगा।
    आपने विडिओ कान्फ्रेसिंग से छात्रों और शिक्षकों को सन्देश से राष्ट्र निर्माण का आह्वान कर उन्हें एक लक्ष्य - मूल्यों और उम्मीदों पर आधारित ब्लूप्रिन्ट तैयार करने का दिया। जो राष्ट्र को मुख्य धारा में लाने के लिए मार्ग है। परन्तु आप-हम और सभी उसी छात्र जीवन से यहाँ तक पहुँचे हैं। उस छात्र जीवन की सोच में जिन्हें कुछ कर दिखाना होता है उनके मन-हृदय में सिर्फ एक हल्की सी ज्योति जलती रहती है - ”मुझे कुछ कर दिखाना है“। इस ज्योति का ध्यान, इस ज्योति से योग, इस ज्योति की रक्षा, इस ज्योति के प्रकाश को विकसित करने का प्रयास जो अपने जीवन से बढ़कर करता है, वही कुछ कर पाता है। और प्रकट होता है आप और हम जैसा बनकर। जिसे अन्य लोग सिर्फ एक वाक्य में कहकर समाप्त कर देते हैं - ”सब किस्मत की बात है“।
    जिनके छात्र जीवन में सिर्फ यही सोच हो कि एक नौकरी मिल जाये, माता-पिता से दूर एक घर हो और हम और हमारे दो बस,  उनसे राष्ट्र निर्माण के लिए ब्लू प्रिण्ट की उम्मीद ही व्यर्थ है। और यदि नौकरी शिक्षा क्षेत्र में मिल गई तो एक ही विषय को अपने सेवा निवृत्ति के उम्र तक दोहराते हुए बुद्धि बद्ध हो गये। और नौकरी मिल ही गई है तो और जानने की जरूरत ही क्या है। आखिर वर्तमान सामय के अर्थ में ज्ञान का चरम लक्ष्य और उसकी प्रमाणिकता धन ही तो है।
    इतिहास गवाह है इस संसार का विकास और मनुष्यता को पूर्णता की ओर ले जाने का काम डिग्रीधारीयों के द्वारा कभी भी सम्पन्न नहीं हुआ है। ये कार्य वही करते हैं जो समय-समय पर सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का अनुभव कर समाज में प्रसारित करते रहे हैं। और फिर वही घटना घटित हुई है। उस पर आधारित राष्ट्र निर्माण का प्रथम और अन्तिम ब्लू प्रिन्ट ”विश्वशास्त्र“ के रूप में प्रकाशित है।
    प्रस्तुत विश्वशास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया। 
    विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति की एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है। “रत्न” उसे कहते हैं जिसका अपना व्यक्तिगत विलक्षण गुण-धर्म हो और वह गुण-धर्म उसके न रहने पर भी प्रेरक हो। पद पर पीठासीन व्यक्तित्व का गुण-धर्म मिश्रित होता है, वह उसके स्वयं की उपलब्धि नहीं रह जाती। भारत के रत्न वही हो सकते हैं जो स्वतन्त्र भारत में संवैधानिक पद पर न रहते हुये अपने विलक्षण गुण-धर्म द्वारा भारत को कुछ दिये हों और उनके न रहने पर भी भारतीय नागरिक प्रेरणा प्राप्त करता हो। इस क्रम में ”भारत रत्न“ का अगला दावेदार मैं हूँ और नहीं तो क्यों? इतना ही नहीं नोबेल पुरस्कार के साहित्य और शान्ति के संयुक्त पुरस्कार के लिए भी योग्य है जो भारत के लिए गर्व का विषय है।

     

     भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    14. श्री बी.एल.जोशी (27 मार्च, 1936 - )

    ”विश्वविद्यालयों में सिर्फ परीक्षाओं में ही नहीं, शोध कार्यों में भी नकल का बोलबाला है, कोई भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं जिसके किसी शोध को अन्तर्राष्ट्रीय तो क्या, राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली हो।“ (लखनऊ में आयोजित 21 राज्य विश्वविद्यालयों व अन्य के कुलपतियों के सम्मेलन में) -श्री बी.एल. जोशी
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 10 नवम्बर 2010

    ”विश्वविद्यालय को कुलपतियों और शिक्षकों को शिक्षा का स्तर और उन्नत करना चाहिए। एक बार अपना दिल टटोलना चाहिए कि क्या वाकई उनकी शिक्षा स्तरीय है। हर साल सैकड़ों शोधार्थियों को पीएच.डी की उपाधि दी जा रही है, लेकिन उनमें से कितने नोबेल स्तर के हैं। साल में एक-दो शोध तो नोबेल स्तर के हों।“(रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, उ0प्र0, के दीक्षांत समारोह में) -श्री बी.एल. जोशी, राज्यपाल, उ0प्र0, भारत 
    साभार - अमर उजाला, लखनऊ, दि0 21 नवम्बर 2012

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    जैसी प्रजा वैसा राजा। जैसा शिक्षक वैसा शिक्षार्थी। जैसा पाठ्यक्रम वैसा शिक्षक और शिक्षार्थी। विश्वविद्यालय अब शोध नहीं कराते बल्कि शोध की विधि बताते हैं क्योंकि मानसिक विस्तार न होने से शोध के विषय भी समाप्त हो चुके हैं। विश्वविद्यालय में हो रहे शोध मात्र शोध की कला सीखाने की संस्था है न कि ऐसे विषय पर शोध सिखाने की कला जिससे सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक विकास को नई दिशा प्राप्त हो जाये। ”विश्वशास्त्र“ अनेक ऐसे शोध विषयों की ओर दिशाबोध भी कराता है जो मनुष्यता के विकास में आने वाले समय के लिए अति आवश्यक है। पीएच.डी. की डिग्रीयां अवश्य गर्व करने योग्य हैं। परन्तु यह केवल स्वयं के लिए रोजगार पाने के साधन के सिवाय कुछ नहीं है और वह भी संघर्ष से। जबकि डिग्रीधारीयों का समाज को नई दिशा देने का भी कत्र्तव्य होना चाहिए। आखिरकार डिग्रीधारी और सामज व देश के नेतृत्वकर्ता यह कार्य नहीं करेगें तो क्या उनसे उम्मीद की जाय जो दो वक्त की रोटी के संघर्ष के लिए चिंतित रहते है? आखिरकार सार्वजनिक मंचो से डिग्रीधारी किसको यह बताना चाहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए?
    निम्नलिखित विषय स्वतः स्फूर्त प्रेरणा द्वारा एक नोबेल स्तर का शोध ही है क्योंकि मानव समाज का बौद्धिक विकास रूक सा गया था-
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है।



  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 21 - श्री गिरधर मालवीय
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    15. श्री गिरधर मालवीय (14 नवम्बर 1936 - )

    ”वैदिक काल से भारत के ज्ञान-विज्ञान एवं सत्य-अहिंसा के सिद्धान्तों का पूरा विश्व लोहा मानता आ रहा है। वर्तमान में उच्च कोटि के डाॅक्टर, इंजिनियर और सूचना विज्ञान के विशेषज्ञ पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा के दम पर छाये हुये हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की पहचान बन रही है। इन्हीं खूबियों के बूते भारत और सनातन धर्म फिर से विश्व गुरू की पदवी हासिल करेगा।“ (गाँधी विद्या संस्थान, वाराणसी में) -गिरधर मालवीय 
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 26 दिसम्बर, 2010

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    निश्चित रूप से वर्तमान में उच्च कोटि के डाॅक्टर, इंजिनियर और सूचना विज्ञान के विशेषज्ञ पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा के दम पर छाये हुये हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की पहचान बन रही है। अब इन खूबियों को वैश्विक मानव के रूप में स्थापित करने का वक्त आ गया है जिससे भारत और सनातन धर्म फिर से विश्व गुरू की पदवी हासिल कर सके। 
    कर्म के शारीरिक, आर्थिक व मानसिक क्षेत्र में ”विश्वशास्त्र“ मानसिक कर्म का यह सर्वोच्च और अन्तिम कृति है। भविष्य में यह विश्व-राष्ट्र शास्त्र साहित्य और एक विश्व-राष्ट्र-ईश्वर का स्थान ग्रहण कर ले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। इस ”विश्वशास्त्र“ की भाषा शैली मस्तिष्क को व्यापक करते हुये क्रियात्मक और व्यक्ति सहित विश्व के धारण करने योग्य ही नहीं बल्कि हम उसमें ही जीवन जी रहें हैं ऐसा अनुभव कराने वाली है। न कि मात्र भूतकाल व वर्तमान का स्पष्टीकरण व व्याख्या कर केवल पुस्तक लिख देने की खुजलाहट दूर करने वाली है। वर्तमान और भविष्य के एकीकृत विश्व के स्थापना स्तर तक के लिए कार्य योजना का इसमें स्पष्ट झलक है। ”विश्वशास्त्र“ मानने वाली बात पर कम बल्कि जानने और ऐसी सम्भावनाओं पर अधिक केन्द्रित है जो सम्भव है और बोधगम्य है। शास्त्र द्वारा शब्दों की रक्षा और उसका बखूबी से प्रयोग बेमिसाल है। ज्ञान को विज्ञान की शैली में प्रस्तुत करने की विशेष शैली प्रयुक्त है। मन पर कार्य करते हुये, इतने अधिक मनस्तरों को यह स्पर्श करता है जिसको निर्धारित कर पाना असम्भव है। और जीवनदायिनी शास्त्र के रूप में योग्य है।
    ”विश्वशास्त्र“ इस स्थिति तक योग्यता रखता है कि वैश्विक सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक एकीकरण सहित विश्व एकता-शान्ति-स्थिरता-विकास के लिए जो भी कार्य योजना हो उसे देश व संयुक्त राष्ट्र संघ अपने शासकीय कानून के अनुसार आसानी से प्राप्त कर सकता है। और ऐसे आविष्कारकर्ता को इन सबसे सम्बन्धित विभिन्न पुरस्कारों, सम्मानों व उपाधियों से बिना विलम्ब किये सुशोभित किया जाना चाहिए। यदि यथार्थ रूप से देखा जाये तो विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार-नोबेल पुरस्कार के शान्ति व साहित्य क्षेत्र के पूर्ण रूप से यह योग्य है। साथ ही भारत देश के भारत रत्न से किसी भी मायने में कम नहीं है।

     

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 22 - श्री कौफी अन्नान
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    16. श्री कौफी अन्नान (8 अप्रैल, 1938 - )

    ‘भारत, संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन में अपना योगदान दें। - कौफी अन्नान, मार्च ‘97 में

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ”भारत, संयुक्त राष्ट्र संघ के पुर्नगठन और उसके उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्तिम रूप से यह सलाह देता है कि विश्व-राष्ट्रीय-जन ऐजेण्डा-साहित्य-2012$ को विश्व ऐजेण्डा-2012$ के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सदस्य देशों के समक्ष प्रस्तुत करें तथा पूर्ण सहमति के लिए प्रयत्न करें। अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आई0 एस0 ओ0) को विश्व मानकीकरण संगठन (डब्ल्यू0 एस0 ओ0) के रूप में परिवर्तित कर अपने एक अभिकरण के रूप में स्वीकार करें जिस प्रकार विश्व व्यापार संगठन, यूनीसेफ, यूनेस्को, इत्यादि अभिकरण हैं। विश्वमानक शून्य श्रृखंला को डब्ल्यू. एस. ओ. शून्य श्रृंखला के रूप में स्थापना के लिए प्रत्येक देशो के लिए अनिवार्य करें। विश्व स्तर का मानव संसाधन निर्माण के लिए विश्व शिक्षा-प्रणाली बनाकर सभी देशों के लिए अनिवार्य करें। ये सभी रास्ते वैधानिक और लोकतान्त्रिक मार्ग से है तथा विश्व शान्ति, एकता स्थिरता, विकास और सुरक्षा के लिए अन्तिम मार्ग है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने अस्तित्व के अन्तिम क्षणों तक चाहे क्यों न प्रयत्न कर ले, विश्वमानक - शून्य श्रृंखलाः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक का विश्वव्यापी स्थापना ही विश्व शान्ति, एकता, स्थिरता, विकास और रक्षा का प्रथम एवम् अन्तिम मार्ग है। जिसे प्रस्तुत करना भारत का दायित्व तथा विश्वव्यापी स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ का कत्र्तव्य है। तभी भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ अपने अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। जिसके लिए एक अधुरा है तो दूसरा भूखा है। जिसके सम्बन्ध में ही आपको तथा भारत में स्थित दूतावास के द्वारा सभी देशों को दिनांक 12-06-2000 को पत्र प्रेषित किया गया था।“

    ”.......... लेकिन भूमण्डलीय क्रिया का प्रारम्भ कहीं निर्मित हो चुका है और यदि संयुक्त राष्ट्र संघ में नहीं तो कहाँ? ......... मैं जानता हूँ स्वयं की एक घोषणा कम महत्व रखती है। परन्तु दृढ़ प्रतिज्ञा युक्त एक घोषणा और यथार्थ लक्ष्य, सभी राष्ट्रों के नेताओं द्वारा निश्चित रुप से स्वीकारने योग्य, अपने सत्ताधारी की कुशलता का निर्णय के लिए एक पैमाने के रुप में विश्व के व्यक्तियों के लिए अति महत्व का हो सकता है। ........... और मैं आशा करता हूँ कि यह कैसे हुआ? देखने के लिए सम्पूर्ण विश्व पीछे होगा।“-श्री कोफी अन्नान 
    (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा 6 जून, 2000 को पंजीकृत डाक द्वारा श्री कोफी अन्नान को प्रेषित पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए 5-7 सितम्बर, 2000 को आयोजित विश्व शान्ति सहस्त्राब्दि सम्मेलन, न्यूयार्क के वक्तव्य का अंश, जो ”द टाइम्स आफ इण्डिया“, नई दिल्ली, 7 सितम्बर’ 2000 को प्रकाशित हुआ था।)

     

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
    प्रकाशित खुशमय तीसरी सहस्त्राब्दि के साथ यह एक सर्वोच्च समाचार है कि नयी सहस्त्राब्दि केवल बीते सहस्त्राब्दियों की तरह एक सहस्त्राब्दि नहीं है। यह प्रकाशित और विश्व के लिए नये अध्याय के प्रारम्भ का सहस्त्राब्र्दि है। केवल वक्तव्यों द्वारा लक्ष्य निर्धारण का नहीं बल्कि स्वर्गीकरण के लिए असिमीत भूमण्डलीय मनुष्य और सर्वोच्च अभिभावक संयुक्त राष्ट्र संघ सहित सभी स्तर के अभिभावक के कर्तव्य के साथ कार्य योजना पर आधारित। क्योंकि दूसरी सहस्त्राब्दि के अन्त तक विश्व की आवश्यकता, जो किसी के द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं हुई उसे विवादमुक्त और सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। जबकि विभिन्न विषयों जैसे- विज्ञान, धर्म, आध्यात्म, समाज, राज्य, राजनिति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, परिवार, व्यक्ति, विभिन्न संगठनों के क्रियाकलाप, प्राकृतिक, ब्रह्माण्डीय, देश, संयुक्त राष्ट्र संघ इत्यादि की स्थिति और परिणाम सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रुप में थे।
    विज्ञान के सर्वोच्च आविष्कार के आधार पर अब यह विवाद मुक्त हो चुका है कि मन केवल व्यक्ति, समाज, और राज्य को ही नहीं प्रभावित करता बल्कि यह प्रकृति और ब्रह्माण्ड को भी प्रभावित करता है। केन्द्रीयकृत और ध्यानीकृत मन विभिन्न शारीरिक सामाजिक और राज्य के असमान्यताओं के उपचार का अन्तिम मार्ग है। स्थायी स्थिरता, विकास, शान्ति, एकता, समर्पण और सुरक्षा के लिए प्रत्येक राज्य के शासन प्रणाली के लिए आवश्यक है कि राज्य अपने उद्देश्य के लिए नागरिकों का निर्माण करें। और यह निर्धारित हो चुका है कि क्रमबद्ध स्वस्थ मानव पीढ़ी के लिए विश्व की सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए विश्व मानव के निर्माण की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा नहीं है और विभिन्न अनियन्त्रित समस्या जैसे- जनसंख्या, रोग, प्रदूषण, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, विकेन्द्रीकृत मानव शक्ति एवं कर्म इत्यादि लगातार बढ़ रहे है। जबकि अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के क्षेत्र में मानव का व्यापक विकास अभी शेष है। दूसरी तरफ लाभकारी भूमण्डलीकरण विशेषीकृत मन के निर्माण के कारण विरोध और नासमझी से संघर्ष कर रहा है। और यह असम्भव है कि विभिन्न विषयों के प्रति जागरण समस्याओं का हल उपलब्ध करायेगा।
    मानक के विकास के इतिहास में उत्पादों के मानकीकरण के बाद वर्तमान में मानव, प्रक्रिया और पर्यावरण का मानकीकरण तथा स्थापना आई0 एस0 ओ0-9000 एवं आई0 एस0 ओ0-14000 श्रृंखला के द्वारा मानकीकरण के क्षेत्र में बढ़ रहा है। लेकिन इस बढ़ते हुए श्रृंखला में मनुष्य की आवश्यकता (जो मानव और मानवता के लिए आवश्यक है) का आधार ‘‘मानव संसाधन का मानकीकरण’’ है क्योंकि मनुष्य सभी (जीव और नीर्जीव) निर्माण और उसका नियन्त्रण कर्ता है। मानव संसाधन के मानकीकरण के बाद सभी विषय आसानी से लक्ष्य अर्थात् विश्व स्तरीय गुणवत्ता की ओर बढ़ जायेगी क्यांेकि मानव संसाधन के मानक में सभी तन्त्रों के मूल सिद्धान्त का समावेश होगा।
    वर्तमान समय में शब्द -‘‘निर्माण’’ भूमण्डलीय रुप से परिचित हो चुका है इसलिए हमें अपना लक्ष्य मनुष्य के निर्माण के लिए निर्धारित करना चाहिए। और दूसरी तरफ विवादमुक्त, दृश्य, प्रकाशित तथा वर्तमान सरकारी प्रक्रिया के अनुसार मानक प्रक्रिया उपलब्ध है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मानक हमेशा सत्य का सार्वजनिक प्रमाणित विषय होता है न कि विचारों का व्यक्तिगत प्रमाणित विषय। अर्थात् प्रस्तुत मानक विभिन्न विषयों जैसे- आध्यात्म, विज्ञान, तकनीकी, समाजिक, नीतिक, सैद्धान्तिक, राजनीतिक इत्यादि के व्यापक समर्थन के साथ होगा। ‘‘उपयोग के लिए तैयार’’ तथा ‘‘प्रक्रिया के लिए तैयार’’ के आधार पर प्रस्तुत मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C (World Class Manufactuing–Total Life Maintenance- Satya, Heart, Yoga, Ashram, Meditation.Conceousness) प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total System Involvement-TSI) है औरं विश्वमानक शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला (WS-0 : World Standard of Mind Series) समाहित है। जो और कुछ नहीं, यह विश्व मानव निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी और मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्व मानक है। जैसे- औद्योगिक क्षेत्र में इन्स्टीच्यूट आॅफ प्लान्ट मेन्टीनेन्स, जापान द्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी डब्ल्यू0 सी0 एम0-टी0 पी0 एम0-5 एस(WCM-TPM-5S (World Class Manufacturing-Total Productive Maintenance-Siri (छँटाई), Seton (सुव्यवस्थित), Sesso (स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement) है। का प्रयोग उद्योगों में विश्व स्तरीय निर्माण प्रक्रिया के लिए होता है। और आई.एस.ओ.-9000 (ISO-9000) तथा आई.एस.ओ.-14000 (ISO-14000) है।
    युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे- महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।
    दो या दो से अधिक माध्यमों से उत्पादित एक ही उत्पाद के गुणता के मापांकन के लिए मानक ही एक मात्र उपाय है। सतत् विकास के क्रम में मानकों का निर्धारण अति आवश्यक कार्य है। उत्पादों के मानक के अलावा सबसे जरुरी यह है कि मानव संसाधन की गुणता का मानक निर्धारित हो क्योंकि राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के मन को भी आधुनिक अर्थात् वैश्विक-ब्रह्माण्डीय करना पड़ेगा। तभी मनुष्यता के पूर्ण उपयोग के साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य के सही उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्कृष्ट उत्पादों के लक्ष्य के साथ हमारा लक्ष्य उत्कृष्ट मनुष्य के उत्पादन से भी होना चाहिए जिससे हम लगातार विकास के विरुद्ध नकारात्मक मनुष्योें की संख्या कम कर सकें। भूमण्डलीकरण सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में कर देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि यदि मनुष्य के मन का भूमण्डलीकरण हम नहीं करते तो इसके लाभों को हम नहीं समझ सकते। आर्थिक संसाधनों में सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य ही है। मनुष्य का भूमण्डलीकरण तभी हो सकता है जब मन के विश्वमानक का निर्धारण हो। ऐसा होने पर हम सभी को मनुष्यों की गुणता के मापांकन का पैमाना प्राप्त कर लेगें, साथ ही स्वयं व्यक्ति भी अपना मापांकन भी कर सकेगा। जो विश्व मानव समाज के लिए सर्वाधिक महत्व का विषय होगा। विश्वमानक शून्य श्रृंखला मन का विश्व मानक है जिसका निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है जो यह निश्चित करता है कि समाज इस स्तर का हो चुका है या इस स्तर का होना चाहिए। यदि यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित होगा तो निश्चित ही अन्तिम मानक होगा।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 23 - श्रीमती शीला दीक्षित - श्री अन्ना हजारे
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    17. श्रीमती शीला दीक्षित (31 मार्च, 1938 - )

    ”विश्व का कोई भी धर्म तभी आगे बढ़ता है जब वह अपने आप में नवीनता लाता है। सनातन धर्म नया बातों को अपने आप में पचाने की क्षमता रखता है“ -श्रीमती शीला दीक्षित 
    साभार - सन्मार्ग, वाराणसी, दि0 11 अगस्त 2002

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    कोई भी उत्पाद तभी तक बाजार में टिका रह सकता है और लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाता रह सकता है जब उसमें सदैव अच्छा जोड़ने का उसके निर्माता द्वारा प्रयत्न किया जाता रहे। यह जितना किसी उत्पाद जैसे कार, बाइक, मोबाइल, साइकिल, कम्प्यूटर इत्यादि के सम्बन्ध में सत्य है ठीक उतना ही धर्म के सम्बन्ध में भी है। सनातन धर्म सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त पर आधारित है। इसकी अनुभूति करते हुये सदैव इसमें नवीनता लाने का प्रयत्न किया जाता रहा है। इसलिए यह अन्तिम रूप में ”विश्वधर्म“ के रूप में व्यक्त हुआ है। जो धर्म या निर्माता अपने धर्म या उत्पाद में नवीनता नहीं लाता वह इतिहास बन जाता है या म्यूजियम में रखा जाने वाली वस्तु बन जाती है। 
    वर्तमान समय में धर्म में फिर नवीनता आ गई है जिसके सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था -
    मेरी नीति है- प्राचीन आचार्यों के उपदेशों का अनुसरण करना। मैंने उनके कार्य का अध्ययन किया है, और जिस प्रणाली से उन्होंने कार्य किया, उसके आविष्कार करने का मुझे सौभाग्य मिला। वे सब महान समाज संस्थापक थे। बल पवित्रता और जीवन शक्ति के वे अद्भुत आधार थे। उन्होंने सब से अद्भुत कार्य किया-समाज में बल, पवित्रता और जीवन शक्ति संचारित की। हमें भी सबसे अद्भुत कार्य करना है। आज अवस्था कुछ बदल गयी है, इसलिए कार्य-प्रणाली में कुछ थोड़ा-सा परिवर्तन करना होगा; बस इतना ही, इससे अधिक कुछ नहीं। (मेरी समर नीति-पृ0-27) - स्वामी विवेकानन्द
    हमें देखना है कि किस प्रकार यह वेदान्त हमारे दैनिक जीवन में, नागरिक जीवन में, ग्राम्य जीवन में, राष्ट्रीय जीवन में और प्रत्येक राष्ट्र के घरेलू जीवन में परिणत किया जा सकता है। कारण, यदि धर्म मनुष्य को जहाॅ भी और जिस स्थिति में भी है, सहायता नहीं दे सकता, तो उसकी उपयोगिता अधिक नहीं - तब वह केवल कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के लिए कोरा सिद्धान्त हो कर रह जायेगा। (व्यावहारीक जीवन में वेदान्त, पृष्ठ-11) - स्वामी विवेकानन्द
    सभी कालों में प्राचीन रितियों को नये ढंग में परिवर्तित करने से ही उन्नति हुई है। भारत में प्रचीन युग में भी धर्म प्रचारकों ने इसी प्रकार काम किया था। केवल बुद्ध देव के धर्म ने ही प्राचीन रिति और नीतियों का विध्वंस किया था भारत से उसके निर्मूल हो जाने का यहीं कारण है। (संग में, पृष्ठ-19) - स्वामी विवेकानन्द
    यह सनातन धर्म का देश है। देश गिर अवश्य गया है, परन्तु निश्चय फिर उठेगा। और ऐसा उठेगा कि दुनिया देखकर दंग रह जायेगी। (विवेकानन्दजी के संग में, पृष्ठ-159) 
    - स्वामी विवेकानन्द

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    18. श्री अन्ना हजारे (15 जनवरी, 1940 - )

    ”भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनलोकपाल लागू करवाना है।“ - अन्ना हजारे

     

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    किसी भी अवतार-महापुरूष इत्यादि का सार्वभौम सत्य ज्ञान एक हो सकता है परन्तु उसके स्थापना की कला उस अवतार-महापुरूष इत्यादि के समय की समाजिक व शासनिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है, जो पुनः दुबारा प्रयोग में नहीं लायी जा सकती। वर्तमान तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिससे यह सिद्ध होता हो कि उस अवतार-महापुरूष इत्यादि की कला को दुबारा प्रयोग कर कुछ सकारात्मक किया गया हो। इस सम्बन्ध में आचार्य रजनीश ”ओशो“ जी की वाणी है-
    ”एक तरह का सिद्व एक ही बार होता है, दोबारा नहीं होता। क्योकि जो सिद्ध हो गया, फिर नही लौटता। गया फिर वापस नहीं आता। एक ही बार तुम उसकी झलक पाते हो- बुद्व की, महावीर की, क्राइस्ट ही, मुहम्मद की, एक ही बार झलक पाते हो, फिर गये सो गये। फिर विराट में लीन हो गये। फिर दोबारा उनके जैसा आदमी नहीं होगा, नहीं हो सकता। मगर बहुत लोग नकलची होगें। उनको तुम साधु कहते हो। उन नकलीची का बड़ा सम्मान है। क्योंकि वे तुम्हारे शास्त्र के अनुसार मालूम पड़ते हैं। जब भी सिद्ध आयेगा सब अस्त व्यस्त कर देगा सिद्ध आता ही है क्रान्ति की तरह ! प्रत्येक सिद्ध बगावत लेकर आता है, एक क्रान्ति का संदेश लेकर आता है एक आग की तरह आता है- एक तुफान रोशनी का! लेकिन जो अँधेरे में पड़े है। उनकी आँखे अगर एकदम से उतनी रोशनी न झेल सके और नाराज हो जाय तो कुछ आश्चर्य नहीं।“
    एक सत्य कानून को लागू करवाने के लिए आपका संघर्ष सराहनीय था। परन्तु समय के अनुसार अब अनशन और हिसंक क्रान्ति जैसा मार्ग अब अ-प्रभावकारी और अ-मान्य है। अब यदि विचार अच्छे हों तो वह विचार करने के उपरान्त स्वंय ही लागू हो जायेगी। दौर आत्मीय बल का है और समाज के लिए अच्छा ही करना नेतृत्व की विवशता है। 
    आज के 20 वर्ष पहले जब धीरे-धीरे कम्प्यूटर ने समाज में प्रवेश करना शुरू किया था तो तमाम कर्मचारी संघ ने इसे बेरोजगारी बढ़ाने वाला बताया था। बेरोजगारी तकनीकी से नहीं बढ़ती बल्कि तकनीकी के अनुसार स्वयं को योग्य न बना पाने के कारण बढ़ती है। यदि केवल कम्प्यूटर को ही जीवन से हटा दिया जाय तो समस्या इतनी बढ़ जायेगी कि इतनी बड़ी जनसंख्या के सुविधाओं को नियंत्रित करना नामुमकिन हो जायेगा। उस समय जब धीरे-धीरे कम्प्यूटर ने समाज में प्रवेश करना शुरू किया था तो शायद मनुष्य के प्रकृति को परिवर्तित करने में इसका कितना बड़ा योगदान हो जायेगा, किसी ने भी ना सोचा होगा। सभी नैतिकता कानून से ही नियंत्रित नहीं हो पाते, बहुत सी अनैतिकता तकनीकी द्वारा रोक दिये जाते हैं और मनुष्य विवश हो जाता है- नैतिक बनने के लिए। 
    कानून पे कानून, बनाते-बनाते तो भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान बन गया लेकिन नागरिक अभी भी नैतिकता युक्त नहीं हो पा रहे। इसका स्पष्ट संकेत यह है कि नागरिको के मन-मस्तिष्क में गलत चिप्स या साफ्टवेयर चल रहा है। इसलिए साफ्टवेयर या विचार को आधुनिक बनाना मूल कार्य होना चाहिए।
    बुड्ढा कृष्ण-कृष्ण भाग-2 और अन्तिम की कुछ पक्तियाँ हैं - 
    सखी, मेरे बाल रूप को, मेरे युवा रूप को, मेरे प्रेम रूप को, मेरे गीता उपदेश को यह संसार समझने लगा है। मैं सिर्फ अपना बचा शेष कार्य पूर्ण करने आया हूँ। ”नव मनुष्य और सृष्टि निर्माण“, जिसमें अब न तो पाण्डवों की आवश्यकता है न ही कौरवों की। अब तो न पाण्डव हैं न ही कौरव हैं, वे तो पिछले समय में ही मुक्त हो चुके। अब तो पाण्डव व कौरव एक ही शरीर में विद्यमान हैं। जिस किसी को देखो वह कुछ समय पाण्डव रूप में दिखता है तो अगले समय में वही कौरव रूप में दिखने लगता है। फिर वही पाण्डव रूप में दिखने लगता है। सब कुछ विवशता वश एकीकरण की ओर बढ़ रहा है। अब युद्ध कहाँ, अब तो उस एकीकरण के मार्ग को दिखाना मात्र मेरा शेष कार्य हैं। और इस कार्य में मैं बिल्कुल अकेला, निःसंग, न कोई मेरे लिए जीवन की कामना करने वाला, न ही कोई मेरी मृत्यु की कामना करने वाला, न ही मुझसे मिलने की चेष्टा करने वाला, न ही मुझसे कुछ सुनने वाला, न मुझे कुछ सुनाने वाला और न ही गोपीयाँ हैं। दर असल मैं मृत ही पैदा ही हुआ था, एक मरा हुआ जीवित मनुष्य, यही मेरा इस जीवन का रूप था। और मेरे इस जीवन को संसार बुढ़े कृष्ण के रूप में याद करेगा जो मुझ परमात्मा के पूर्ण कार्य का भाग दो होगा, जिसे लोगों ने देख व जान नहीं पाया था। आज मैं बहुत कुछ बताना चाहता हूँ सखी क्योंकि तुम्हारे सिवा मुझे कौन सुनता ही था और कौन समझता ही था, और कौन विश्वास ही करता था। - मैं बोलता जा रहा था।
    तात्पर्य यह है कि आपके साख का उपयोग करने के लिए लोग आपके साथ आये और प्राप्त संसाधन और अपनी आधुनिक बदलती प्रकृति के अनुसार स्वयं का मार्ग निर्धारित कर आगे बढ़े, आपके संघर्ष और उद्देश्य को वहीं छोड़ दिये। फिर भी आप एक अच्छे इन्सान, अच्छे उद्देश्य लेकर जीवन जीये हंै। इसमें कोई शक नहीं इसलिए ही आप ”विश्वशास्त्र“ में स्थान पा सके।
    ध्यान रहे स्थिर तारे अर्थात स्थिर या निर्धारित प्रकृति पर निशाना या योजना बनाया जाता है गतिशील और परिवर्तनशील प्रकृति पर नहीं। महाभारत तभी हो सका जब स्थिर या निर्धारित प्रकृति के व्यक्ति थे जिन्हें पुरूष कहते हैं। गतिशील और परिवर्तनशील को तो प्रकृति या नारी कहते हैं। गतिशील और परिवर्तनशील, नर या नारी हो उसे नारी ही कहते हैं और स्थिर या निर्धारित, नर या नारी हो उसे पुरूष ही कहते हैं। 
    जब गतिशील और परिवर्तनशील ही नर या नारी हो गये हो तो यह कहना ही पड़ेगा कि - (बुड्ढा कृष्ण-कृष्ण भाग-2 से) सखी, तुम्हारे उत्तर से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि तुम अब पूर्ण हो चुकी हो। अब तुममे और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। तुममें, मैं और मुझमें, तुम। आदि में, मैं और अन्त में भी, मैं। और अब, सभी में, मैं और मुझमें, सभी। सखी, व्यक्ति, समाज, राज्य की आवश्यकताओं को देखो, भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणीयों को देखो, ये सब मुझे पुकार रही हैं। ग्रहों के चालों, सूर्य व चन्द्र ग्रहण को देखो, ये सब मेरी उपस्थिति को बता रही हैं। मैं आया था, मैंने अपना कार्य पूर्ण किया मैं जा भी रहा हूँ, तुमसे एकाकार होकर। मैं मुक्त था, मैं मुक्त हूँ, मैं मुक्त ही रहूँगा। आओ सखी चलें। यह पूर्ण पुरूष और पूर्ण प्रकृति का महामिलन है। मैं ही योगेश्वर हूँ, मैं ही भोगेश्वर हूँ। आदि में योगेश्वर हूँ और अन्त में भोगेश्वर हूँ। मैं प्रकृति को नियंत्रित कर व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य रूप से विकसित होकर सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य जगत में व्यक्त होता हूँ। अब ईश्वर भी अपने कत्र्तव्य से मुक्त है और प्रकृति भी। जो ईश्वर है वही प्रकृति है। जो प्रकृति है वही ईश्वर है। दोनों एक-दूसरे के अदृश्य और दृश्य रूप हैं। प्रत्येक में दोनों विद्यमान हैं। यही अर्धनारीश्वर है। 
    एक मात्र मैं ही पुरूष हूँ। 
    अकेला चलो रे।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 24 - श्री सैम पित्रोदा
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    19. श्री सैम पित्रोदा (4 मई 1942 - )

    ”शिक्षा का नया माॅडल विकसित करना होगा। पिछले 25 वर्षो से हम अमीर लोगों की समस्या सुलझा रहे हैं। अब हमें गरीबों की समस्या सुलझानें का नैतिक दायित्व निभाना चाहिए। देश में 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोग हैं। हमें सोचना होगा कि हम उन्हें नौकरी और प्रशिक्षण कैसे देगें। भौतिकी, रसायन, गणित जैसे पारम्परिक विषयों को पढ़ने का युग समाप्त हो गया। अब तो हमें रचनात्मकता, समन्वय, लीडरशिप, ग्लोबल तथा प्रोफेशनल विषयों को पढ़ने तथा सूचना तकनीक के जरिए पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है। हमारे देश में जो अध्यापक हैं, वे शोध नहीं करते और जो शोध करते हैं वे पढ़ाते नहीं। हमें पूरी सोच को बदलनी है।“ - सैम पित्रोदा, अध्यक्ष, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्
    (प्रधानमंत्री के सूचना तकनीकी सलाहकार व राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के पूर्व अध्यक्ष)
    27 नवम्बर, 2011, हिन्दुस्तान, वाराणसी संस्करण

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    छात्रों की विवशता है कि उनके शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय जो पाठ्यक्रम तैयार करेगें वहीं पढ़ना है और छात्रों की यह प्रकृति भी है कि वही पढ़ना है जिसकी परीक्षा ली जाती हो। जिसकी परीक्षा न हो क्या वह पढ़ने योग्य नहीं है? बहुत बड़ा प्रश्न उठता है। तब तो समाचार पत्र, पत्रिका, उपन्यास इत्यादि जो पाठ्यक्रम के नहीं हैं उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय तो एक विशेष पाठ्यक्रम के लिए ही विशेष समय में परीक्षा लेते हैं परन्तु ये जिन्दगी तो जीवन भर परीक्षा हर समय लेती रहती है तो क्या जीवन का पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य नहीं है? परन्तु यह पाठ्यक्रम मिलेगा कहाँ? निश्चित रूप से ये पाठ्यक्रम अब से पहले उपलब्ध नहीं था लेकिन इस संघनित (Compact) होती दुनिया में ज्ञान को भी संघनित (Compact) कर पाठ्यक्रम बना दिया गया है। इस पाठ्यक्रम का नाम है - ”सत्य मानक शिक्षा“ और आप तक पहुँचाने के कार्यक्रम का नाम है - ”पुनर्निर्माण-सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way)“। यह वही पाठ्यक्रम है जोे मैकाले शिक्षा पाठ्यक्रम (वर्तमान शिक्षा) से मिलकर पूर्णता को प्राप्त होगा। इस पाठ्यक्रम का विषय वस्तु जड़ अर्थात सिद्धान्त सूत्र आधारित है न कि तनों-पत्तों अर्थात व्याख्या-कथा आधारित। जिसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- मैकेनिक जो मोटर बाईडिंग करता है यदि वह केवल इतना ही जानता हो कि कौन सा तार कहाँ जुड़ेगा जिससे मोटर कार्य करना प्रारम्भ कर दें, तो ऐसा मैकेनिक विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार नहीं कर सकता जबकि विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार केवल वही कर सकता है जो मोटर के मूल सिद्धान्त को जानता हो। ऐसी ही शिक्षा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेशदर्शिनी (Single Dimensional) होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी (Multi Dimensional) होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“
    शिक्षा क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि जीवन से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण विषय ”व्यापार“, को हम एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर सकें। इसकी कमी का अनुभव उस समय होता है जब कोई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा के उपरान्त किसी कारणवश, आगे की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता। फिर उस विद्यार्थी द्वारा पढ़े गये विज्ञान व गणित के वे कठिन सूत्र उसके जीवन में अनुपयोगी लगने लगते है। यदि वहीं वह व्यापार के ज्ञान से युक्त होता तो शायद वह जीवकोपार्जन का कोई मार्ग सुगमता से खोजने में सक्षम होता।
    आध्यात्म और विज्ञान ने मानव सभ्यता के विकास में अब कम से इतना विकास तो कर ही चुका है कि अब हमें मन के एकीकरण के लिए कार्य करना चाहिए। और उस मन पर कार्य करने का ही परिणाम है - 
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है।

    जो शिक्षा का नया माॅडल है। गरीबों की समस्या सुलझानें का नैतिक दायित्व है। देश में 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोगों के लिए पुननिर्माण जैसी योजना हैं। उन्हें नौकरी और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। रचनात्मकता, समन्वय, लीडरशिप, ग्लोबल तथा प्रोफेशनल विषयों को पढ़ने तथा सूचना तकनीक के जरिए पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने से युक्त है। हमारे देश में जो अध्यापक हैं, वे शोध नहीं करते और जो शोध करते हैं वे पढ़ाते नहीं, इसलिए शिक्षार्थी को ही शोध पत्र (विश्वशास्त्र) पढ़ाया जाय क्योंकि शिक्षक पढ़ने से तो रहे क्योंकि समान्यतः धन के आने की सुनिश्चितता के बाद लोग पढ़ना छोड़ देते हैं, यही नहीं कोशिश तो यह भी रहती है कि पढ़ाना भी न पड़े और उन्हें सेवा से हटाया भी नहीं जा सकता।
    शिक्षा (वर्तमान अर्थ में) प्राप्त करने के बाद या तो शिक्षा-कौशल के अनुसार कार्य को आजीविका बनाते हैं या जो पढ़े हैं उसे ही पढ़ाओ वाले व्यापार में लग जाते हैं। अब बेरोजगारों को इस दुनिया में परिवर्तन लाने वाले राष्ट्र निर्माण के व्यापार से जोड़ना पड़ेगा। इससे उन्हें रोजगार भी मिलेगा और राष्ट्र निर्माण का श्रेय भी। वे शान से कह सकेगें - ”हम सत्य ज्ञान का व्यापार करते हैं। हम राष्ट्र निर्माण का व्यापार करते हैं। हम समाज को सहायता प्रदान करने का व्यापार करते हैं। हम, लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का व्यापार करते हैं और वहाँ करते हैं जिस क्षेत्र, जिला, मण्डल, प्रदेश व देश के निवासी हैं। जहाँ हमारे भाई-बन्धु, रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि रहते हैं।“
    स्वामी विवेकान्द जी ने कहा था - सुधारकों से मैं कहूंगा कि मैं स्वयं उनसे कहीं बढ़कर सुधारक हूँ। वे लोग इधर-उधर थोड़ा सुधार करना चाहते हैं- और मैं चाहता हूँ आमूल सुधार। हम लोगों का मतभेद है केवल सुधार की प्रणाली में। उनकी प्रणाली विनाशात्मक है और मेरी संघटनात्मक। मैं सुधार में विश्वास नहीं करता, मैं विश्वास करता हूँ स्वाभाविक उन्नति में।
    स्वाभाविक उन्नति तभी होती है जब संसाधन उपलब्ध हो। कार-मोटरसाइकिल घर में पहले से रहता है तो स्वाभाविक रूप से कम उम्र में ही घर के लोग चलाना सिख जाते हैं इसलिए सुधार का वो महान शास्त्र - ”विश्वशास्त्र“ पहले संसाधन के रूप में प्रत्येक घर में उपलब्ध हो। जो ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ निर्माण का अन्तिम शास्त्र है। फिर 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोग अपने आप आत्मनिर्भर हो जायेगें। 
    वैसे तो यह कार्य भारत सरकार को राष्ट्र की एकता, अखण्डता, विकास, साम्प्रदायिक एकता, समन्वय, नागरिकों के ज्ञान की पूर्णता इत्यादि जो कुछ भी राष्ट्रहित में हैं उसके लिए सरकार के संस्थान जैसे- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.), एन.सी.ई.आर.टी, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्, भारतीय मानक ब्यूरो के माध्यम से ”राष्ट्रीय शिक्षा आयोग“ बनाकर पूर्ण करना चाहिए जो राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए अति आवश्यक और नागरिकों का राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निर्धारण व परिभाषित करने का मार्ग भी है। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    20. श्री यदुनाथ सिंह (6 जुलाई, 1945 - )

    ”तू जमाना बदल“ - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र

    ”रामनगर (वाराणसी) से विन्ध्याचल (मीरजापुर) तक का क्षेत्र पुराणों में वर्णित सत्यकाशी का क्षेत्र है।“ - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र 
    साभार - राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ, दि0 17 जून, 1998)

    ”वर्तमान समय में देश स्तर पर व्यवस्था परिवर्तन की चर्चा बहुत अधिक हो रही है। इसमें मेरे विचार से सर्वप्रथम आरक्षण के मापदण्ड पर पुनः विचार करने का समय आ गया है। देश के स्वतन्त्रता के समय जातिगत आरक्षण की आवश्यकता थी और वह सीमित समय के लिए ही लागू किया गया था परन्तु राजनीतिक लाभ के कारणों से वह वर्तमान तक लागू है। हम समाज से मनुवादी व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं परन्तु एक तरफ आज समाज इससे धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है और दूसरी तरफ संविधान ही इसका समर्थक बनता जा रहा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण व्यवस्था का मापदण्ड जाति आधारित से शारीरिक, आर्थिक और मानसिक आधारित कर देनी चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव भी है और लोकतन्त्र का धर्म भी धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव है
    मेरे विचार में व्यवस्था परिवर्तन का दूसरा आधार युवाओं को अधिकतम अधिकार से युक्त करने पर विचार करने का समय आ गया है। देश में 18 वर्ष के उम्र पर वोट देने का अधिकार तथा विवाह का उम्र लड़कों के लिए 21 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 18 वर्ष तो कर दिया गया है परन्तु उन्हें पैतृक सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार अभी तक नहीं दिया गया है। इसलिए उत्तराधिकार सम्बन्धी अधिनियम की भी आवश्यकता आ गयी है। जिसमें यह प्राविधान हो कि 25 वर्ष की अवस्था में उसे पैतृक सम्पत्ति अर्थात दादा की सम्पत्ति जिसमें पिता की अर्जित सम्पत्ति शामिल न रहें, उसके अधिकार में हो जाये। 
    किसी भी विचार पर किया गया आदान-प्रदान ही व्यापार होता है और यह जितनी गति से होता है उतनी ही गति से व्यापार, विकास और विनाश होता है। देश के विकास के लिए धन के आदान-प्रदान को तेज करना पड़ेगा और ऐसे सभी बिन्दुओं का पहचान करना होगा जो धन के आदान-प्रदान में बाधा डालती है। इसलिए कालेधन का मुद्दा अहम मुद्दा है। ऐसे प्राविधान की आवश्यकता है कि जिससे यह धन देश के विकास में लगे।
    विभिन्न प्रकार के अनेकों साहित्यों से भरे इस संसार में यह भी एक समस्या है कि हम किस साहित्य को पढ़े जिससे हमें ज्ञान की दृष्टि शीघ्रता से प्राप्त हो जाये। विश्वशास्त्र इस समस्या को हल करते हुए एक ही संगठित पुस्तक के रूप में उपलब्ध हो चुका है। यह इस सत्यकाशी क्षेत्र की एक महान और ऐतिहासिक उपलब्धि है जिसके कारण यह क्षेत्र सदैव याद किया जायेगा। 
    - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    विधायक जी, जब शब्द वायुमण्डल में व्यक्त हो जाते हैं तो वह बीज के रूप में पड़े रहते हैं और योग्य वातावरण पाते ही वह उग आते हैं। आपका ”तू जमाना बदल“ और ”सत्यकाशी“ के सत्य विचार को पूर्ण करने के लिए ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त कर दिया गया है। जिस प्रकार आपके द्वारा कहा गया शब्द योग्य वातावरण पाकर जन्म लिया उसी प्रकार इस जमाने को बदलने और सत्यकाशी के विश्वव्यापी स्थापना के लिए ”विश्वशास्त्र“ के द्वारा व्यक्त विचार भी योग्य वातावरण पाकर अवश्य जन्म लेगा क्योंकि विचार कभी मरता नहीं, शरीर मरता है शास्त्र नहीं। हम आप शरीर धारी हैं, शरीर छूट जायेगा परन्तु यह शास्त्र अन्य पुस्तक व शास्त्रों की भाँति धरती पर उस समय तक रहेगा जब तक मनुष्य नाम का जीव रहेगा। इसलिए संतुष्ट हो जाइये। आपके ही गाँव से यह कार्य सम्पन्न हो गया है और अब यह गाँव इतिहास में सदा के लिए अमर हो गया है जिसके आकाश में सितारे के रूप में आप और मैं सदा चमकते रहेंगे। रही प्रसार की बात तो इस युग में इलेक्ट्रानिक डिजीटल मीडिया भी सशक्त हो गयी है। घर बैठे ही बैठे सभी मीडिया व संसार के इस प्रकार के कार्य करने वालों तक पहुँच जायेगा।

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 25 - श्री बिल क्लिन्टन
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    20. श्री यदुनाथ सिंह (6 जुलाई, 1945 - )

    ”तू जमाना बदल“ - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र

    ”रामनगर (वाराणसी) से विन्ध्याचल (मीरजापुर) तक का क्षेत्र पुराणों में वर्णित सत्यकाशी का क्षेत्र है।“ - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र 
    साभार - राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ, दि0 17 जून, 1998)

    ”वर्तमान समय में देश स्तर पर व्यवस्था परिवर्तन की चर्चा बहुत अधिक हो रही है। इसमें मेरे विचार से सर्वप्रथम आरक्षण के मापदण्ड पर पुनः विचार करने का समय आ गया है। देश के स्वतन्त्रता के समय जातिगत आरक्षण की आवश्यकता थी और वह सीमित समय के लिए ही लागू किया गया था परन्तु राजनीतिक लाभ के कारणों से वह वर्तमान तक लागू है। हम समाज से मनुवादी व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं परन्तु एक तरफ आज समाज इससे धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है और दूसरी तरफ संविधान ही इसका समर्थक बनता जा रहा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण व्यवस्था का मापदण्ड जाति आधारित से शारीरिक, आर्थिक और मानसिक आधारित कर देनी चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव भी है और लोकतन्त्र का धर्म भी धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव है
    मेरे विचार में व्यवस्था परिवर्तन का दूसरा आधार युवाओं को अधिकतम अधिकार से युक्त करने पर विचार करने का समय आ गया है। देश में 18 वर्ष के उम्र पर वोट देने का अधिकार तथा विवाह का उम्र लड़कों के लिए 21 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 18 वर्ष तो कर दिया गया है परन्तु उन्हें पैतृक सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार अभी तक नहीं दिया गया है। इसलिए उत्तराधिकार सम्बन्धी अधिनियम की भी आवश्यकता आ गयी है। जिसमें यह प्राविधान हो कि 25 वर्ष की अवस्था में उसे पैतृक सम्पत्ति अर्थात दादा की सम्पत्ति जिसमें पिता की अर्जित सम्पत्ति शामिल न रहें, उसके अधिकार में हो जाये। 
    किसी भी विचार पर किया गया आदान-प्रदान ही व्यापार होता है और यह जितनी गति से होता है उतनी ही गति से व्यापार, विकास और विनाश होता है। देश के विकास के लिए धन के आदान-प्रदान को तेज करना पड़ेगा और ऐसे सभी बिन्दुओं का पहचान करना होगा जो धन के आदान-प्रदान में बाधा डालती है। इसलिए कालेधन का मुद्दा अहम मुद्दा है। ऐसे प्राविधान की आवश्यकता है कि जिससे यह धन देश के विकास में लगे।
    विभिन्न प्रकार के अनेकों साहित्यों से भरे इस संसार में यह भी एक समस्या है कि हम किस साहित्य को पढ़े जिससे हमें ज्ञान की दृष्टि शीघ्रता से प्राप्त हो जाये। विश्वशास्त्र इस समस्या को हल करते हुए एक ही संगठित पुस्तक के रूप में उपलब्ध हो चुका है। यह इस सत्यकाशी क्षेत्र की एक महान और ऐतिहासिक उपलब्धि है जिसके कारण यह क्षेत्र सदैव याद किया जायेगा। 
    - यदुनाथ सिंह, पूर्व विधायक, चुनार क्षेत्र

    लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
    विधायक जी, जब शब्द वायुमण्डल में व्यक्त हो जाते हैं तो वह बीज के रूप में पड़े रहते हैं और योग्य वातावरण पाते ही वह उग आते हैं। आपका ”तू जमाना बदल“ और ”सत्यकाशी“ के सत्य विचार को पूर्ण करने के लिए ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त कर दिया गया है। जिस प्रकार आपके द्वारा कहा गया शब्द योग्य वातावरण पाकर जन्म लिया उसी प्रकार इस जमाने को बदलने और सत्यकाशी के विश्वव्यापी स्थापना के लिए ”विश्वशास्त्र“ के द्वारा व्यक्त विचार भी योग्य वातावरण पाकर अवश्य जन्म लेगा क्योंकि विचार कभी मरता नहीं, शरीर मरता है शास्त्र नहीं। हम आप शरीर धारी हैं, शरीर छूट जायेगा परन्तु यह शास्त्र अन्य पुस्तक व शास्त्रों की भाँति धरती पर उस समय तक रहेगा जब तक मनुष्य नाम का जीव रहेगा। इसलिए संतुष्ट हो जाइये। आपके ही गाँव से यह कार्य सम्पन्न हो गया है और अब यह गाँव इतिहास में सदा के लिए अमर हो गया है जिसके आकाश में सितारे के रूप में आप और मैं सदा चमकते रहेंगे। रही प्रसार की बात तो इस युग में इलेक्ट्रानिक डिजीटल मीडिया भी सशक्त हो गयी है। घर बैठे ही बैठे सभी मीडिया व संसार के इस प्रकार के कार्य करने वालों तक पहुँच जायेगा।


    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    21. श्रीमती सोनिया गाँधी (9 दिसम्बर 1946 - )

    ‘‘शिक्षा के भारतीयकरण, राष्ट्रीयकरण और आध्यात्मिकता से जोड़े जाने का प्रस्ताव है, उसका क्या अर्थ है? क्या पिछले पचास वर्षो से लागू शिक्षा प्रणाली गैर भारतीय, विदेशी थी जिसमे भारत की भूत और वर्तमान वास्तविकताएं नहीं थीं?’’ (अटल विहारी वाजपेयी को लिखे पत्र में) -श्रीमती सोनिया गाॅधी, 
    साभार - आज, वाराणसी, दि0-23-10-98

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ‘‘शिक्षा की सत्य प्रणाली ज्ञान-विज्ञान-तकनीकी आधारित होती है। व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य काल में यह ज्ञान-कर्मज्ञान-अदृश्य कर्मज्ञान-अदृश्य विज्ञान-अदृश्य तकनीकी पर आधारित तथा सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य काल में यह ज्ञान-कर्मज्ञान-दृश्य कर्मज्ञान-दृश्य विज्ञान-दृश्य तकनीकी पर आधारित होती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली कालानुसार नहीं है। वर्तमान समय की शिक्षा प्रणाली केवल दृश्य विज्ञान-दृश्य तकनीकी पर आधारित है जो ज्ञान-कर्म ज्ञान-दृश्य कर्मज्ञान के बिना अधुरी है। शिक्षा के भारतीयकरण, राष्ट्रीयकरण और आध्यात्मिकता से जोड़े जाने के प्रस्ताव का अर्थ शिक्षा में ज्ञान-कर्मज्ञान-दृश्य कर्मज्ञान को सम्मिलित करना है। जो मानव एवम् प्रकृति का सत्य हैं और सत्य किसी सम्प्रदाय का नहीं बल्कि सर्वव्यापी सत्य है। कोई भी इसकी अनुभूति करें या न करे, यदि शिक्षा में यह सर्वव्यापी सत्य नहीं तो वह गैर भारतीय ही होगी या यूॅ कहें कि गैर मानवीय होगी। पिछले पचास वर्षो से लागू शिक्षा प्रणाली गैर भारतीय ही है जिसमें भारत की भूत और वर्तमान की वास्तविकताएं तो हैं परन्तु भविष्य की आवश्यकताएं नहीं है। इक्कीसवीं सदी और उसके उपरान्त की शिक्षा प्रणाली सत्य चेतना अर्थात भूत काल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकतानुसार वर्तमान में कार्य करने पर आधारित होगी, न कि प्राकृतिक चेतना अर्थात् भूत काल का अनुभव के अनुसार वर्तमान में कार्य करना पर।’’

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के पूर्व जन्में वर्तमान

    22. श्री बिल क्लिन्टन (19 अगस्त, 1946 - )

    ”विश्व को लोकतन्त्र, भारत का उपहार; ज्ञान और सूचना आधारित सहयोग; भारत और अमेरिका मिलकर विश्व को नई दिशा दे सकता है; भारत यदि शून्य और दशमलव न दिया होता तो कम्प्यूटर चिप्स बनाना असम्भव होता; प्रत्येक देश कहता है हम महान हैं परन्तु कैसे ? यह सिद्ध करना एक चुनौती है । इत्यादि।“(भारत यात्रा पर दि0 20-24 मार्च’ 2000 के समय वक्तव्य) -श्री विल क्लिन्टन, राष्ट्रपति, संयुक्त राज्य अमेरिका 

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
    ”महोदय, 11 सितम्बर’ 1893 में आपके संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म संसद को सम्बोधित करते हुए भारत का युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका वासीयों को ‘मेरे अमेरिकी भाईयों और बहनों’ कहा था तथा ‘विश्व बन्धुत्व’ का सन्देश आपके संयुक्त राज्य और युरोपिय देशों में लगातार 3 वर्षों तक देता रहा। भारत भाव प्रधान देश है तथा आपका देश योजना प्रधान देश है। इसलिए प्रथमतया भाव से आघात करते हुए स्वामी जी ने ‘अमेरिकी भाईयों और बहनों’ कहा था, फिर योजना ‘विश्व बन्धुत्व’ का सन्देश दिया था। विश्व-बन्धुत्व एक सत्य-योजना है। जो अब विश्व की विवशता बन गयी है। आप भारत की यात्रा में भाव की प्रधानता को स्वयं अनुभव किये होंगे। यहाँ भाव पहले चलता है योजना और क्रियान्वयन बाद में जबकि आपके यहाँ इसके विपरीत कार्य होता है। यहाँ सीधे योजना और कार्य पर बात करने से कोई महत्व नहीं देता चाहे वह उसके हित का अन्तिम मार्ग ही क्यों न हो। भाव से मिलकर यहाँ दूसरे का गला भी काटा जा सकता है और काटा भी जा रहा है। यही कारण है कि यहाँ का गरीब समाज सदा गरीब ही बना रहता है। और योजना प्रधान व्यक्ति भोग करता है। निश्चय ही स्वामी विवेकानन्द का प्रयत्न सफल रहा है तभी आपके अन्दर का व्यक्तित्व भाव प्रधान बन पाया है जिसे भारतवासीयों ने सार्वजनिक प्रमाणित रुप से देखा और अनुभव किया है। हमारे धर्म साहित्य में एकात्म कथा को पुराण कहते हैं उसमें एकात्म ज्ञान और एकात्म वाणी समाहित एकात्म कर्म और एकात्म प्रेम के प्रक्षेपण को भगवान विष्णु कहते हैं जो सृष्टि के पालनकर्ता कहे जाते हैं। जिसमें से हमारा देश एकात्म प्रेम की तथा आपका देश एकात्म कर्म की प्राथमिकता वाला बन चुका है। इसलिए सम्पूर्ण विश्व को नई दिशा और उसका पालनकर्ता बनने के लिए दोनों देशों का मिलना अतिआवश्यक ही नहीं विवशता भी है क्योंकि एक दूसरे के बिना हम अधुरे हैं। भारत में कुछ ऐसे संकीर्ण विचार वाले नेतृत्वकर्ता हैं जो भारत को सिर्फ भारत की सीमा तक ही देखते हैं और अपने अस्तित्व व महत्व को बनाये रखने के लिए उसी प्रकार के मानवों का निर्माण कर प्राकृतिक बल के विरुद्ध उसी भाँति मूर्खता पूर्ण कार्य करते हैं जिस प्रकार तेज आंधी को शरीर से रोक लेने का प्रयत्न।
    अनेक मत, सम्प्रदाय और धर्मों को साथ लेकर वर्षों से भारत विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को सफलतापूर्वक बिना लोक या गण या जन के सत्य रुप को व्यक्त किये, बनाये हुए हैं। यह विश्व के समक्ष एक उदाहरण ही है। भारत का लोकतन्त्र विश्व का ही लोकतन्त्र है तथा भारत का संसद, विश्व संसद ही है। क्योंकि अन्य देश एक मत-सम्प्रदाय-धर्म को लेकर लोकतन्त्र नहीं चला पा रहे हैं यहाँ तो अनेक धर्म हैं और समभाव से हैं।
    शाश्वत से भारत ने शून्य से अधिक कर्म ही नहीं किया। क्योंकि भारत अन्तर्मुखी आविष्कारक है। वह सम्पूर्ण आविष्कार सर्वप्रथम मन पर करता है। स्वामी विवेकानन्द ने अद्धैत-वेदान्त को मानव जीवन में उपयोगिता के लिए अन्तिम मार्ग बताया, वह भी तो शून्य अर्थात् मन पर ही आविष्कार का परिणाम था। निश्चय ही यदि भारत ने यदि शून्य और दशमलव का आविष्कार न किया होता तो कम्प्यूटर चिप्स बनाना असम्भव होता। पुनः मन पर ही आविष्कार का परिणाम है-विश्वमानक शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला, जो वर्तमान में आविष्कृत कर प्रस्तुत किया गया है। जिसके बिना अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मानव निर्माण ही असम्भव है। यही लोक या जन या गण का सत्य रुप है। यहीं आदर्श वैश्विक मानव का सत्य रुप है। जिससे पूर्ण स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग की प्राप्ति होगी। इसी से विश्व-बन्धुत्व की स्थापना होगी। इसी से विश्व शिक्षा प्रणाली विकसित होगी। इसी से विश्व संविधान निर्मित होगा। इसी से संयुक्त राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य को सफलता पूर्वक प्राप्त करेगा। इसी से 21 वीं सदी और भविष्य का विश्व प्रबन्ध संचालित होगा। इसी से मानव को पूर्ण ज्ञान का अधिकार प्राप्त होगा। यही परमाणु निरस्त्रीकरण का मूल सिद्धान्त है। भारत को अपनी महानता सिद्ध करना चुनौती नहीं है, वह तो सदा से ही महान है। पुनः विश्व का सर्वोच्च और अन्तिम अविष्कार विश्वमानक शून्य श्रृंखला को प्रस्तुत कर अपनी महानता को सिद्ध कर दिखाया है। बिल गेट्स के माइक्रोसाफ्ट आॅरेटिंग सिस्टम साफ्टवेयर से कम्प्यूटर चलता हेै । भारत के विश्वमानक शून्य श्रृंखला से मानव चलेगा। बात वर्तमान की है परन्तु हो सकता है स्वामी जी के विश्व बन्धुत्व की भाँति यह 100 वर्ष बाद समझ में आये। अपने ज्ञान और सूचना आधारित सहयोग की बात की है। विश्वमानक शून्य श्रृंखला से बढ़कर ज्ञान का सहयोग और क्या हो सकता है? इस सहयोग से भारत और अमेरिका मिलकर विश्व को नई दिशा सिर्फ दे ही नहीं सकते वरन् यहीं विवशतावश करना भी पड़ेगा। मनुष्य अब अन्तरिक्ष में उर्जा खर्च कर रहा है। निश्चय ही उसे पृथ्वी के विवाद को समाप्त कर सम्पूर्ण शक्ति को विश्वस्तरीय केन्द्रीत कर अन्तरिक्ष की ओर ही लगाना चाहिए। जिससे मानव स्वयं अपनी कृति को देख आश्चर्यचकित हो जाये जिस प्रकार स्वयं ईश्वर अपनी कृति को देखकर आश्चर्य में हैं और सभी मार्ग प्रशस्त हैं। भाव भी है। योजना भी है। कर्म भी है। विश्वमानक शून्य श्रृंखला भी है। फिर देर क्यों? और कहिए- वाहे गुरु की फतह!“

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 26 - भारतीय संविधान
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    01. भारतीय संविधान

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    सत्य से सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त तक का र्माग अवतारों का मार्ग है। सार्वभौम सत्य-सिंद्धान्त की अनुभूति ही अवतरण है। इसके अंश अनुभूति को अंश अवतार तथा पूर्ण अनुभूति को पूर्ण अवतार कहते है। अवतार मानव मात्र के लिए ही कर्म करते हैं न कि किसी विशेष मानव समूह या सम्प्रदाय के लिए। अवतार, धर्म, धर्मनिरपेक्ष व सर्वधर्मसमभाव से युक्त अर्थात एकात्म से युक्त होते है। इस प्रकार अवतार से उत्पन्न शास्त्र मानव के लिए होते हैं, न कि किसी विशेष मानव समूह के लिए। उत्प्रेरक, शासक और मार्गदर्शक आत्मा सर्वव्यापी है। इसलिए एकात्म का अर्थ संयुक्त आत्मा या सार्वजनिक आत्मा है। जब एकात्म का अर्थ संयुक्त आत्मा समझा जाता है तब वह समाज कहलाता है। जब एकात्म का अर्थ व्यक्तिगत आत्मा समझा जाता है तब व्यक्ति कहलाता है। अवतार, संयुक्त आत्मा का साकार रुप होता है जबकि व्यक्ति व्यक्तिगत आत्मा का साकार रुप होता है। शासन प्रणाली में समाज का समर्थक दैवी प्रवृत्ति तथा शासन व्यवस्था प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र या स्वतन्त्र या मानवतन्त्र या समाजतन्त्र या जनतन्त्र या बहुतन्त्र या स्वराज कहलाता है और क्षेत्र गणराज्य कहलाता है। ऐसी व्यवस्था सुराज कहलाती है। शासन प्रणाली में व्यक्ति का समर्थक असुरी प्रवृत्ति तथा शासन व्यवस्था राज्यतन्त्र या राजतन्त्र या एकतन्त्र कहलाता है और क्षेत्र राज्य कहलाता है ऐसी व्यवस्था कुराज कहलाती है। सनातन से ही दैवी और असुरी प्रवृत्तियों अर्थात् दोनों तन्त्रों के बीच अपने-अपने अधिपत्य के लिए संघर्ष होता रहा है। जब-जब समाज में एकतन्त्रात्मक या राजतन्त्रात्मक अधिपत्य होता है तब-तब मानवता या समाज समर्थक अवतारों के द्वारा गणराज्य की स्थापना की जाती है। या यूँ कहें गणतन्त्र या गणराज्य की स्थापना ही अवतार का मूल उद्देश्य अर्थात् लक्ष्य होता है शेष सभी साधन अर्थात् मार्ग ।
    अवतारों के प्रत्यक्ष और प्रेरक दो कार्य विधि हैं। प्रत्यक्ष अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का प्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब अधर्म का नेतृत्व एक या कुछ मानवों पर केन्द्रित होता है। प्रेरक अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का अप्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण जनता एवं नेतृत्वकर्ता के माध्यम से करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब समाज में अधर्म का नेतृत्व अनेक मानवों और नेतृत्वकर्ताओं पर केन्द्रित होता है।
    इन विधियों में से कुल दस अवतारों में से प्रथम सात (मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम) अवतारों ने समाज का सत्यीकरण प्रत्यक्ष विधि के प्रयोग द्वारा किया था। आठवें अवतार (श्रीकृष्ण) ने दोनों विधियों प्रत्यक्ष ओर प्रेरक का प्रयोग किया था। नवें (भगवान बुद्ध) और अन्तिम दसवें अवतार की कार्य विधि प्रेरक ही है।
    जल-प्लावन (जहाँ जल है वहाँ थल और जहाँँ थल है वहाँ जल) के समय मछली से मार्ग दर्शन (मछली के गतीशीलता से सिद्धान्त प्राप्त कर) पाकर मानव की रक्षा करने वाला ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) का पहला अंशावतार मतस्यावतार के बाद मानव का पुनः विकास प्रारम्भ हुआ। दूसरे कूर्मावतार (कछुए के गुण का सिद्धान्त), तीसरे- वाराह अवतार (सुअर के गुण का सिद्धान्त), चैथे- नृसिंह (सिंह के गुण का सिद्धान्त), तथा पाँचवे वामन अवतार (ब्राह्मण के गुण का सिद्धान्त) तक एक ही साकार शासक और मार्गदर्शक राजा हुआ करते थे और जब-जब वे राज्य समर्थक या उसे बढ़ावा देने वाले इत्यादि असुरी गुणों से युक्त हुए उन्हें दूसरे से पाँचवें अंशावतार ने साकार रुप में कालानुसार भिन्न-भिन्न मार्गों से गुणों का प्रयोग कर गणराज्य का अधिपत्य स्थापित किया।
    ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के छठें अंश अवतार परशुराम के समय तक मानव जाति का विकास इतना हो गया था कि अलग-अलग राज्यों के अनेक साकार शासक और मार्ग दर्शक राजा हो गये थे उनमें से जो भी राज्य समर्थक असुरी गुणों से युक्त थे उन सबको परशुराम ने साकार रुप में वध कर डाला। परन्तु बार-बार वध की समस्या का स्थाई हल निकालने के लिए उन्होंने राज्य और गणराज्य की मिश्रित व्यवस्था द्वारा एक व्यवस्था दी जो आगे चलकर ”परशुराम परम्परा“ कहलायी। व्यवस्था निम्न प्रकार थी-
    1. प्रकृति में व्याप्त तीन गुण- सत्व, रज और तम के प्रधानता के अनुसार मनुष्य का चार वर्णों में निर्धारण। सत्व गुण प्रधान - ब्राह्मण, रज गुण प्रधान- क्षत्रिय, रज एवं तम गुण प्रधान- वैश्य, तम गुण प्रधान- शूद्र।
    2.गणराज्य का शासक राजा होगा जो क्षत्रिय होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति जो रज गुण अर्थात् कर्म अर्थात् शक्ति प्रधान है।
    3. गणराज्य में राज्य सभा होगी जिसके अनेक सदस्य होंगे जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति के सत्व, रज एवं तम गुणों से युक्त विभिन्न वस्तु हैं।
    4. राजा का निर्णय राजसभा का ही निर्णय है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति का निर्णय वहीं है जो सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित निर्णय होता है।
    5. राजा का चुनाव जनता करे क्योंकि वह अपने गणराज्य में सर्वव्यापी और जनता का सम्मिलित रुप है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति सर्वव्यापी है और वह सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित रुप है।
    6. राजा और उसकी सभा राज्य वादी न हो इसलिए उस पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण का नियन्त्रण होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान आत्मा का नियन्त्रण होता है।
    ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के सातवें अंश अवतार श्रीराम ने इसी परशुराम परम्परा का ही प्रसार और स्थापना किये थे।
    ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के समय तक स्थिति यह हो गयी थी राजा पर नियन्त्रण के लिए नियुक्त ब्राह्मण भी समाज और धर्म की व्याख्या करने में असमर्थ हो गये। क्योंकि अनेक धर्म साहित्यों, मत-मतान्तर, वर्ण, जातियों में समाज विभाजित होने से व्यक्ति संकीर्ण और दिग्भ्रमित हो गया था और राज्य समर्थकों की संख्या अधिक हो गयी थी परिणामस्वरुप मात्र एक ही रास्ता बचा था- नवमानव सृष्टि। इसके लिए उन्होंने सम्पूर्ण धर्म साहित्यों और मत-मतान्तरों के एकीकरण के लिए आत्मा के सर्वव्यापी व्यक्तिगत प्रमाणित निराकार स्वरुप का उपदेश ”गीता“ व्यक्त किये और गणराज्य का उदाहरण द्वारिका नगर का निर्माण कर किये । उनकी गणराज्य व्यवस्था उनके जीवन काल में ही नष्ट हो गयी परन्तु ”गीता“ आज भी प्रेरक बनीं हुई है।
    ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के नवें अवतार भगवान बुद्ध के समय पुनः राज्य एकतन्त्रात्मक होकर हिंसात्मक हो गया परिणामस्वरुप बुद्ध ने अहिंसा के उपदेश के साथ व्यक्तियों को धर्म, बुद्धि और संघ के शरण में जाने की शिक्षा दी। संघ की शिक्षा गणराज्य की शिक्षा थी। धर्म की शिक्षा आत्मा की शिक्षा थी। बुद्धि की शिक्षा प्रबन्ध और संचालन की शिक्षा थी जो प्रजा के माध्यम से प्रेरणा द्वारा गणराज्य के निर्माण की प्रेरणा थी।
    ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के दसवें और अन्तिम अवतार के समय तक राज्य और समाज स्वतः ही प्राकृतिक बल के अधीन कर्म करते-करते सिद्धान्त प्राप्त करते हुए पूर्ण गणराज्य की ओर बढ़ रहा था परिणामस्वरुप गणराज्य का रुप होते हुए भी गणराज्य सिर्फ राज्य था और एकतन्त्रात्मक अर्थात् व्यक्ति समर्थक तथा समाज समर्थक दोनों की ओर विवशतावश बढ़ रहा था।
    भारत में निम्न्लिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
    1. ग्राम, विकास खण्ड, नगर, जनपद, प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य और गणसंघ का रुप।
    2. सिर्फ ग्राम स्तर पर राजा (ग्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष ) का चुनाव सीधे जनता द्वारा।
    3. गणराज्य को संचालित करने के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान।
    4. गणराज्य के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप-नियम और कानून।
    5. राजा पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप- राष्ट्रपति, राज्यपाल, जिलाधिकारी इत्यादि।
    विश्व स्तर पर निम्नलिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
    1. गणराज्यों के संघ के रुप में संयुक्त राष्ट्र संघ का रुप।
    2. संघ के संचालन के लिए संचालक और संचालक का निराकार रुप- संविधान।
    3. संघ के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप- नियम और कानून।
    4. संघ पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप-पाँच वीटो पावर।
    5. प्रस्ताव पर निर्णय के लिए सदस्यों की सभा।
    6. नेतृत्व के लिए राजा- महासचिव।
    जिस प्रकार आठवें अवतार द्वारा व्यक्त आत्मा के निराकार रुप ”गीता“ के प्रसार के कारण आत्मीय प्राकृतिक बल सक्रिय होकर गणराज्य के रुप को विवशतावश समाज की ओर बढ़ा रहा था उसी प्रकार अन्तिम अवतार द्वारा निम्नलिखित शेष समष्टि कार्य पूर्ण कर प्रस्तुत कर देने मात्र से ही विवशतावश उसके अधिपत्य की स्थापना हो जाना है।
    1. गणराज्य या लोकतन्त्र के सत्य रुप- गणराज्य या लोकतन्त्र के स्वरुप का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्व मानक।
    2. राजा और सभा सहित गणराज्य पर नियन्त्रण के लिए साकार ब्राह्मण का निराकार रुप- मन का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्व मानक।
    3. गणराज्य के प्रबन्ध का सत्य रुप- प्रबन्ध का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्व मानक।
    4. गणराज्य के संचालन के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान के स्वरुप का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्व मानक।
    5. साकार ब्राह्मण निर्माण के लिए शिक्षा का स्वरुप- शिक्षा पाठ्यक्रम का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्व मानक।
    इस समष्टि कार्य द्वारा ही काल व युग परिवर्तन होगा न कि सिर्फ चिल्लाने से कि ”सतयुग आयेगा“, ”सतयुग आयेगा“ से। यह समष्टि कार्य जिस शरीर से सम्पन्न होगा वही अन्तिम अवतार के रूप में व्यक्त होगा। धर्म में स्थित वह अवतार चाहे जिस सम्प्रदाय (वर्तमान अर्थ में धर्म) का होगा उसका मूल लक्ष्य यही शेष समष्टि कार्य होगा और स्थापना का माध्यम उसके सम्प्रदाय की परम्परा व संस्कृति होगी।
    जिस प्रकार केन्द्र में संविधान संसद है, प्रदेश में संविधान विधान सभा है उसी प्रकार ग्राम नगर में भी संविधान होना चाहिए जिस प्रकार केन्द्र और प्रदेश के न्यायालय और पुलिस व्यवस्था है उसी प्रकार ग्राम नगर के भी होने चाहिए कहने का अर्थ ये है कि जिस प्रकार की व्यवस्थाये केन्द्र और प्रदेश की अपनी हैं उसी प्रकार की व्यवस्था छोटे रुप में ग्राम नगर की भी होनी चाहिए। संघ (राज्य) या महासंघ (केन्द्र) से सम्बन्ध सिर्फ उस गणराज्य से होता है प्रत्येक नागरिक से नहीं संघ या महासंघ का कार्य मात्र अपने गणराज्यों में आपसी समन्वय व सन्तुलन करना होता है उस पर शासन करना नहीं तभी तो सच्चे अर्थों में गणराज्य व्यवस्था या स्वराज-सुराज व्यवस्था कहलायेगी। यहीं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रसिद्ध युक्ति ”भारत ग्राम (नगर) गणराज्यों का संघ हो“ और ”राम राज्य“ का सत्य अर्थ है।

    ”किसी देश का संविधान, उस देश के स्वाभिमान का शास्त्र तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश की मूल भावना का शिक्षा पाठ्यक्रम उसका अंग न हो। इस प्रकार भारत देश का संविधान भारत देश का शास्त्र नहीं है। संविधान को भारत का शास्त्र बनाने के लिए भारत की मूल भावना के अनुरूप नागरिक निर्माण के शिक्षा पाठ्यक्रम को संविधान के अंग के रूप में शामिल करना होगा। जबकि राष्ट्रीय संविधान और राष्ट्रीय शास्त्र के लिए हमें विश्व के स्तर पर देखना होगा क्योंकि देश तो अनेक हैं राष्ट्र केवल एक विश्व है, यह धरती है, यह पृथ्वी है। भारत को विश्व गुरू बनने का अन्तिम रास्ता यह है कि वह अपने संविधान को वैश्विक स्तर पर विचार कर उसमें विश्व शिक्षा पाठ्यक्रम को शामिल करे। यह कार्य उसी दिशा की ओर एक पहल है, एक मार्ग है और उस उम्मीद का एक हल है। राष्ट्रीयता की परिभाषा व नागरिक कर्तव्य के निर्धारण का मार्ग है। जिस पर विचार करने का मार्ग खुला हुआ है।“ - लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 27 - भारतीय संसद - भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    02. भारतीय संसद

    ‘‘द्वितीय स्वतन्त्रता संग्राम शुरू करने का संसद में सर्वसम्मति से आहवान’’
    स्वतन्त्रता के 50 वर्ष पूर्ण होने पर संसद का निर्णय, साभार-दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 31-8-97

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    जिसका निर्णय संसद में सर्वसम्मति से लिया गया, जो साधारण जनता, शहीद एवम् जीवित स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की आत्मा की आवाज है। जो संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव, भारत के राष्ट्रपति, राजनितिक दलों एवम् बुद्धिजीवि वर्ग का आवश्यक कर्म है और जनता तथा वर्तमान एवं भविष्य की पीढ़ी का भविष्य है। जिसे युवाओं को कर्म के साथ प्रारम्भ करना है। नवयुवकों और वृद्धों को समर्थन के साथ आना है। प्रौढ़ो को कर्म एवम् ज्ञान के साथ आना है। महिलाओं को समानता के लिए आत्मसात् कर शक्ति रूप में व्यक्त होना है। जो भारत तथा विश्व का भविष्य है। यह वही कार्य है, जो द्वितीय और अन्तिम स्वतन्त्रता संग्राम-आध्यात्मिक स्वन्त्रता संग्राम के रूप में व्यक्त हुआ है। जब व्यक्ति एवम् देश के शरीर को स्वतंत्र करना था अर्थात प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम था। तब देश भक्तों की आवश्यकता थी। अब जब द्वितीय स्वतन्त्रता संग्राम का अवसर है तब देश भक्त (भारत भक्त) सहित राष्ट्र भक्त (विश्व भक्त) की आवश्यकता है। क्योंकि देशभक्त की भावना में दूसरे देश के प्रति अपनत्व नहीं आ पाती। दूसरे देश के प्रति अपनत्व की भावना तभी आ सकती है जब वह राष्ट्र भक्त हो। प्रकृति अविष्कृत राष्ट्र एक विश्व है। जिसमें मानव अविष्कृत राष्ट्र-देश समाहित हैं। यह प्रश्न हो सकता है कि पूर्ण ज्ञान या पूर्ण स्वतन्त्रता के बाद समाज और लोकतंत्र बिखर नहीं जायेगा? ऐसा कदापि नहीं होगा बल्कि वह स्वस्थ हो जायेगा क्योंकि व्यक्ति समाज और लोकतंत्र का देश काल मुक्त ज्ञान एवम् कर्मज्ञान सभी में समान हो जायेगा और देश काल बद्ध ज्ञान एवम् कर्मज्ञान से युक्त होकर अपने अधिकार क्षेत्र में ही वे कार्य करेंगे। वर्तमान समय के तरह नहीं कि जो कर्म व्यक्ति को स्वयं कर लेने चाहिए उसे भी वे नेताओं पर छोड़े रहते है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से प्राप्त स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत के संविधान का निर्माण हुआ जो सुरक्षा, कर्मफल एवम् पश्चिमी भाव आधारित संविधान है। अब द्वितीय एवम् पूर्ण स्वतंत्रता के उपरान्त भारतीय संविधान का विश्व संविधान में परिवर्तित करना हो तो शान्ति, कर्म-कारण एवम् भारतीय भाव आधारित संविधान का निर्माण करना होगा जो एकात्म कर्मवाद पर आधारित होना चाहिए न कि एकात्मवाद (एकात्म संस्कृति) पर आधारित। 
    विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के संसद को मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि अगस्त, 1997 में संसद ने ‘‘द्वितीय स्वतन्त्रता संग्राम शुरू करने का संसद में सर्वसम्मति से आह्वान’’ (दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 31-8-97) किया था। लोकतन्त्र की मर्यादा और विश्व के समक्ष अपनी सवश्रेष्ठता सहित उसकी स्वस्थता व पूर्णता के लिए मैं संसद के समक्ष उसके निर्णय के अनुरूप कुछ लक्ष्य रख कर आह्वान करता हूँ कि संसद नागरिक, देश व विश्व के लिए उसे पूर्ण कर अपने कर्तव्य को निभाये। 
    1. जिस प्रकार भारत में एक राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), एक राष्ट्रीय पक्षी (भारतीय मोर), एक राष्ट्रीय पुष्प (कमल), एक राष्ट्रीय पेड़ (भारतीय बरगद), एक राष्ट्रीय गान (जन गण मन), एक राष्ट्रीय नदी (गंगा), एक राष्ट्रीय प्रतीक (सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ का सिंह), एक राष्ट्रीय पंचांग (शक संवत पर आधारित), एक राष्ट्रीय पशु (बाघ), एक राष्ट्रीय गीत (वन्दे मातरम्), एक राष्ट्रीय फल (आम), एक राष्ट्रीय खेल (हाॅकी), एक राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह, एक संविधान है उसी प्रकार एक राष्ट्रीय शास्त्र भी भारत को आवश्यकता है। जिससे नागरिक अपने व्यक्तिगत धर्म शास्त्र को मानते हुये भी राष्ट्रधर्म को भी जान सके। जो लोकतन्त्र का धर्मनिरपेक्ष-सर्वधर्मसमभाव शास्त्र भी होगा।
    2. पिछले 65 वर्षो से अकेले रह रहे हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को एक राष्ट्रपुत्र भी चाहिए जिसके स्वामी विवेकानन्द पूर्णतः योग्य हैं।ं जिससे नागरिक उनके धर्मनिरपेक्ष-सर्वधर्मसमभाव विचार व जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर सके।
    3. ”शिक्षा के अधिकार अधिनियम“ के बाद अब ”पूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम“ बनना चाहिए। पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम बनने से पूर्ण मानव का निर्माण प्रारम्भ होगा फलस्वरूप देश सहित विश्व के विकास और उसके प्रति समर्पित नागरिक प्राप्त होने लगेगें जो कत्र्तव्य आधारित नागरिक होंगे।
    4. यह प्रश्न उठाना चाहिए कि देश, व्यक्ति व संस्था किस प्रकार के नागरिक का निर्माण करना चाहते हैं और उसका मानक क्या हैं? यह सभी संस्थानों से पूछा जाना चाहिए।
    5. यह प्रश्न उठाना चाहिए कि ऐसा कौन सा सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त है जो पूर्णतया विवादमुक्त है जिससे सभी तन्त्रों को विवादमुक्त कर उसका सत्यीकरण किया जा सके।
    6. यह प्रश्न उठना चाहिए कि गणराज्य का सत्य रूप क्या है? जिससे हम सबसे बड़े लोकतन्त्र को पूर्णता प्रदान करते हुये विश्व को एक मानक लोकतन्त्र दे सकें।
    7. मन या मानव संसाधन का विश्व मानक निर्धारण के लिए प्रक्रिया प्रारम्भ करना आवश्यक है जिससे राश्ट्र को मानक मानव संसाधन प्राप्त हो।
    उपरोक्त लक्ष्यों के लिए मैं भारत के संसद का आह्वान करता हूँ कि कम से कम समस्याओं से घिरते विश्व को अपनी सकारात्मक सोच से परिचय कराये।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    03. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय

    ”भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कत्र्तव्य है कि वह भारत की संविधान की धारा 51 (ए) के अन्र्तगत बिना किसी जाति, वंश या मजहब के भेदभाव के गीता में दिये गये धर्म का पालन करें।“ (एक जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का फैसला) -माननीय न्यायमूर्ति श्री एस.एन. श्रीवास्तव, इलाहाबाद, उ0प्र0, भारत
    साभार - दी हिन्दू, चेन्नई, दि0 12 सितम्बर 2007

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    गीता जिस कालक्रम में व्यक्त हुई थी उस समय वह मानव मात्र के लिए ही थी। वह आज भी मानव मात्र के लिए ही है। जिन्हें अपना बौद्धिक विकास करना हो, उन सब के लिए है। परन्तु कालान्तर में अन्य धर्म (सम्प्रदाय) आने के बाद गीता को किसी एक धर्म (सम्प्रदाय) का माना जाने लगा। यह उसी प्रकार हो गया जैसे कि आम की लकड़ी का अन्य वस्तु जैसे- खाट, चैकी, कुर्सी इत्यादि बन जाने के बाद उसका नाम खाट, चैकी, कुर्सी इत्यादि हो जाता है, आम की लकड़ी गायब हो जाती है। जो लोग गीता को पढ़ते हैं उन्हें उसका लाभ समझ में आता है परन्तु सार्वजनिक रूप से उसे स्वीकार करने पर उन्हें अपने धर्म-सम्प्रदाय-मत इत्यादि पर आघात समझ में आता है। 
    निश्चित ही गीता शास्त्र है परन्तु पूर्ण शास्त्र नहीं। गीता में सत्य-ज्ञान है परन्तु कर्म-ज्ञान नहीं। गीता में सत्य-सिद्धान्त है परन्तु सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त नहीं। गीता में प्रकृति की व्याख्या है परन्तु ब्रह्माण्ड की व्याख्या नहीं। गीता व्यक्ति (व्यक्तिगत मन) की पूर्णता का शास्त्र है परन्तु समष्टि (संयुक्त मन) की पूर्णता का शास्त्र नहीं। गीता में ज्ञान की परिभाषा है परन्तु ध्यान की परिभाषा नहीं। गीता व्यक्तिगत प्रमाणित है परन्तु सार्वजनिक प्रमाणित नहीं। गीता व्यक्ति को कैसे चलना चाहिए यह आंशिक रुप से बताती है परन्तु व्यक्ति सहित सम्पूर्ण राष्ट्र को पूर्ण रुप से कैसे चलना चाहिए यह नहीं बताती। गीता ज्ञान व सिद्धान्त का बीज शास्त्र है न कि वृक्ष शास्त्र। गीता में योग है परन्तु ध्यान व चेतना नहीें। गीता में दर्शन है परन्तु विकास दर्शन नहीें। गीता में ईश्वर की व्याख्या है परन्तु अवतार की व्याख्या नहीें। गीता चेला बनाने में उपयोगी है परन्तु गुरू बनाने में नहीें। गीता अर्जुन बनाने में उपयोगी है परन्तु कृष्ण बनाने में नहीें। 
    आपका फैसला सही था परन्तु गीता के व्यक्तिगत प्रमाणित होने के कारण वह विरोध का शिकार हो गया। ”विश्वशास्त्र“ के साथ ऐसा नहीं हो पायेगा क्योंकि यह गीता समाहित सार्वजनिक प्रमाणित शास्त्र है। जो इसे स्वीकार-आत्मसात् नहीं करेगा वह स्वयं ही ज्ञान-बौद्धिकता के इस युग में पीछे होकर विलीन हो जायेगा। विश्वशास्त्र, समष्टि धर्म शास्त्र है। व्यक्ति अपने व्यष्टि धर्म शास्त्र को भी जीये और एक वैश्विक नागरिक होने के कारण विश्वशास्त्र को भी जीये, तभी उन्नति कर पायेगें।
    जिस प्रकार मानवी शरीर एक व्यक्ति है और उसका प्रत्येक सूक्ष्म भाग जिसे हम ”कोश“ कहते हैं एक अंश है। उसी प्रकार सारे व्यक्तियों का समष्टि ईश्वर है, यद्यपि वह स्वयं भी एक व्यक्ति है। समष्टि ही ईश्वर है, व्यष्टि या अंश जीव है। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व जीवों के अस्तित्व पर निर्भर है जैसे कि शरीर का उसके सूक्ष्म भाग पर और सूक्ष्म भाग का शरीर पर। इस प्रकार जीव और ईश्वर परस्परावलम्बी हैं। जब तक एक का अस्तित्व है तब तक दूसरे का भी रहेगा। और हमारी इस पृथ्वी को छोड़कर अन्य सब उँचे लोकों में शुभ की मात्रा अशुभ से अधिक होती है। इसलिए वह समष्टि स्वरुप ईश्वर शिव स्वरुप, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ कहा जा सकता है। ये गुण प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। ईश्वर से सम्बद्ध होने के कारण उन्हें प्रमाण करने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म इन दोनों से परे है और वह कोई विशिष्ट अवस्था नहीं है वह एक ऐसी वस्तु है जो अनेकों की समष्टि से नहीं बनी है। वह एक ऐसी सत्ता है जो सूक्ष्मातित-सूक्ष्म से लेकर ईश्वर तक सब में व्याप्त है और उसके बिना किसी का अस्तित्व नहीं हो सकता सभी का अस्तित्व उसी सत्ता या ब्रह्म का प्रकाश मात्र है। जब मैं सोचता हूँ ”मैं ब्रह्म हूँ“ तब मेरा यथार्थ अस्तित्व होता है ऐसा ही सबके बारे में है विश्व की प्रत्येक वस्तु स्वरुपतः वहीं सत्ता है - स्वामी विवेकानन्द

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 28 - भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

     03. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय

    ”मुसलमानों के लिए कुरान और क्रिश्चियनों के लिए बाइबिल है। हर मजहब अपना अपना धर्म शास्त्र रखता है। इसलिए यह हम कैसे कह सकते हैं कि गीता सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए है।“ (एक जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का फैसला) - श्री एच.आर. भारद्वाज
    साभार - दी हिन्दू, चेन्नई, दि0 12 सितम्बर 2007

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    वैसे तो गीता किसी मजहब के लिए व्यक्त नहीं की गई थी, वो मानव मात्र के ज्ञान-बौद्धिक विकास के लिए व्यक्त हुई थी। चलिए मान भी लिया जाये कि मुसलमानों के लिए कुरान, क्रिश्चियनों के लिए बाइबिल और हिन्दूओं के लिए गीता इत्यादि हैं। अर्थात ये सब धर्मशास्त्र किसी अलग-अलग मानव समूह के लिए हैं। तो फिर सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए कौन सा है या अभी उपलब्ध नहीं हुआ है। लेकिन अब सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त हो चुका है। जो राजतन्त्र में नहीं लोकतन्त्र में आविष्कृत है। खान-पान, पहनावा, पूजा-पद्धति पर आधारित नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त व कर्मज्ञान पर आधारित है। जिसकी उपयोगिता है-
    वर्तमान समय के भारत तथा विश्व की इच्छा शान्ति का बहुआयामी विचार-अन्तरिक्ष, पाताल, पृथ्वी और सारे चराचर जगत में एकात्म भाव उत्पन्न कर अभय का साम्राज्य पैदा करना और समस्याओं के हल में इसकी मूल उपयोगिता है। साथ ही विश्व में एक धर्म- विश्वधर्म-सार्वभौम धर्म, एक शिक्षा-विश्व शिक्षा, एक न्याय व्यवस्था, एक अर्थव्यवस्था, एक संविधान, एक शास्त्र स्थापित करने में है। भारत के लिए यह अधिक लाभकारी है क्योंकि यहाँ सांस्कृतिक विविधता है। जिससे सभी धर्म-संस्कृति को सम्मान देते हुए एक सूत्र में बाँधने के लिए सर्वमान्य धर्म उपलब्ध हो जायेगा। साथ ही संविधान, शिक्षा व शिक्षा प्रणाली व विषय आधारित विवाद को उसके सत्य-सैद्धान्तिक स्वरूप से हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। साथ ही पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी से संकीर्ण मानसिकता से व्यक्ति को उठाकर व्यापक मानसिकता युक्त व्यक्ति में स्थापित किये जाने में आविष्कार की उपयोगिता है। जिससे विध्वंसक मानव का उत्पादन दर कम हो सके। ऐसा न होने पर नकारात्मक मानसिकता के मानवो का विकास तेजी से बढ़ता जायेगा और मनुष्यता की शक्ति उन्हीं को रोकने में खर्च हो जायेगी। यह आविष्कार सार्वभौम लोक या गण या या जन या स्व का निराकार रूप है इसलिए इसकी उपयोगिता स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग तथा व्यवस्था के सत्यीकरण और स्वराज की प्राप्ति में है अर्थात मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्वमानक की प्राप्ति और ब्रह्माण्ड की सटीक व्याख्या में है। मनुष्य किसी भी पेशे में हो लेकिन उसके मन का भूमण्डलीयकरण, एकीकरण, सत्यीकरण, ब्रह्माण्डीयकरण करने में इसकी उपयोगिता है जिससे मानव शक्ति सहित संस्थागत और शासन शक्ति को एक कर्मज्ञान से युक्त कर ब्रह्माण्डीय विकास में एकमुखी किया जा सके।
    इस पर आपके क्या विचार हैं?
    यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म हो सकता है, तो वह ऐसा ही होगा, जो देश या काल से मर्यादित न हो, जो उस अनन्त भगवान के समान ही अनन्त हो, जिस भगवान के सम्बन्ध में वह उपदेश देता है, जिसकी ज्योति श्रीकृष्ण के भक्तों पर और ईसा के प्रेमियों पर, सन्तों पर और पापियों पर समान रूप से प्रकाशित होती हो, जो न तो ब्राह्मणों का हो, न बौद्धों का, न ईसाइयों का और न मुसलमानों का, वरन् इन सभी धर्मों का समष्टिस्वरूप होते हुए भी जिसमें उन्नति का अनन्त पथ खुला रहे, जो इतना व्यापक हो कि अपनी असंख्य प्रसारित बाहूओं द्वारा सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य का प्रेमपूर्वक आलिंगन करें।... वह विश्वधर्म ऐसा होगा कि उसमें किसी के प्रति विद्वेष अथवा अत्याचार के लिए स्थान न रहेगा, वह प्रत्येक स्त्री और पुरूष के ईश्वरीय स्वरूप को स्वीकार करेगा और सम्पूर्ण बल मनुष्यमात्र को अपनी सच्ची, ईश्वरीय प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रित रहेगा। - स्वामी विवेकानन्द
    ईसाई को हिन्दू अथवा बौद्ध नहीं होना पडे़गा, और न हिन्दू या बौद्ध को ईसाई ही, परन्तु प्रत्येक धर्म दूसरे धर्मो के सारभाग को आत्मसात् करके पुष्टिलाभ करेगा और अपने वैशिष्ट्य की रक्षा करते हुए अपनी निजी प्रकृति के अनुसार वृद्धि को प्राप्त होगा। यदि इस सर्वधर्म परिषद् ने जगत् के समक्ष कुछ प्रमाणित किया है तो वह यह कि उसने यह सिद्ध कर दिखाया है कि शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय-विशेष की सम्पत्ति नहीं है तथा प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र स्त्री पुरूषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजुद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जायेंगे और केवल उसका धर्म ही अपना सर्वश्रेष्ठता के कारण जीवित रहेगा, तो उस पर मैं अपने हृदय के अन्तस्थल से दया करता हॅू और उसे स्पष्ट शब्दों में बतलाये देता हूॅ कि वह दिन दूर नहीं हैं, जब उस-जैसे लोगों के अड़ंगों के बावजूद भी प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा-‘सहयोग, न कि विरोध’, पर-भाव-ग्रहण न कि पर-भाव-विनाश, ‘समन्वय और शान्ति, न कि मतभेद और कलह’!
    - स्वामी विवेकानन्द

    ”भगवान शिव, हनुमान, दुर्गा ब्रह्माण्ड की अलौकिक शक्तियाँ। ये देवी-देवता किसी पंथ से जुड़े नहीं हैं। इसलिए इनके पूजन और मन्दिर के रखरखाव का खर्च, धार्मिक कृत्य नहीं।“  -आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल), नागपुर, भारत

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    ”धार्मिक कृत्य“, जनता के शारीरिक-आर्थिक-मानसिक विकास से सम्बन्धित कार्य कहा जाता है। हिन्दू देवी-देवताओं का प्रक्षेपण ब्रह्माण्डीय सत्य-सिद्धान्त के अनुसार मानक चरित्र के रूप में मानव कल्याण के लिए उनके मस्तिष्क के विकास और मार्गदर्शन के लिए महर्षि व्यास द्वारा किया गया है। जब मानव कल्याण की बात आती है तो वह किसी भी पंथ से नहीं जुड़ सकता जैसे सूर्य सबको प्रकाश-ऊर्जा देता है, वर्षा द्वारा जल सभी को प्राप्त होता है इत्यादि, इसलिए सूर्य या जल देवता को किसी पंथ से नहीं जोड़ा जा सकता। यह सत्य है कि किसी भी उपासना स्थल के देवी-देवता के पूजन और उपासना स्थल के रखरखाव का खर्च किसी भी स्थिति में धार्मिक कृत्य नहीं हो सकता। हाँ ऐसे स्थल के द्वारा जनता के शारीरिक-आर्थिक-मानसिक विकास से सम्बन्धित कार्य, धार्मिक कृत्य के अन्तर्गत आ सकता है। जिस प्रकार किसी उद्योग के रखरखाव में आया खर्च, खर्च होता है और उसके द्वारा उत्पादित वस्तु, उसका कृत्य उत्पाद होता है। उसी प्रकार उपासना स्थल के रखरखाव का खर्च, खर्च है और उसके द्वारा उत्पादित वस्तु अर्थात जन कल्याण कार्य, उसका कृत्य धर्मिक कृत्य होता है।

    ”गीता धर्मिक ग्रन्थ नहीं, जीवन दर्शन है जिससे नागरिकता का प्रशिक्षण मिलता है। गीता से न्यायायिक नियंत्रण और सामाजिक सौहार्द का सन्देश भी हासिल होता है।“ -मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, भारत
    साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 29 जनवरी, 2012

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ अर्थात ब्रह्माण्डीय नियम, किसी भी पंथ से नहीं जुड़ सकता जैसे सूर्य सबको प्रकाश-ऊर्जा देता है, वर्षा द्वारा जल सभी को प्राप्त होता है। नागरिकता का प्रशिक्षण, जीवन दर्शन, समाजिक समरसता, समभाव इत्यादि जो मनुष्यता और मानवता के विकास के विषय है, वे सब क्या मनुष्य को नहीं चाहिए? क्या किसी देश और उसके नागरिकों को नहीं चाहिए? और यदि चाहिए तो वह ”गीता“ में पहले से ही उपलब्ध है तो ”गीता“ का क्या दोष? ”गीता“ जब अवतरित की गई थी तब कितने वर्तमान अर्थो के धर्म समाज में थें, यह भी जानना आवश्यक होगा। तभी यह जान पायेंगे कि ”गीता“ किसी पंथ से सम्बन्धित है या मानव जाति से सम्बन्धित है। यह ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ अर्थात ब्रह्माण्डीय नियम से सम्बन्धित है या मानव निर्मित नियम से सम्बन्धित है। वर्तमान अर्थो के धर्म जो एक पंथ है उनकी पहचान एक पद्धति के रूप में होती है जिसमें एक उपासना स्थल, एक खान-पान, एक वेश-भूषा, एक धार्मिक पुस्तक इत्यादि होते हैं। ”गीता“ इन सबसे मुक्त होकर केवल मस्तिष्क के विकास और चिन्तनशील बनाती है न कि उपासना स्थल, खान-पान, वेश-भूषा इत्यादि की स्थापना करती है।
    इसी क्रम में मूल बीज ”गीता“ का वृक्ष शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ है जो सिर्फ ”ज्ञान-कर्मज्ञान“ की बात करती है और यह व्यष्टि (व्यक्तिगत मन) और समष्टि (संयुक्त मन) दोनों के लिए उपलब्ध है। अब यदि कोई यह कहे कि यह ”गीता“ आधारित है और यह हिन्दू धर्म का है तो उस व्यक्ति और देश को ज्ञान-कर्मज्ञान न अपनाने से हानि किसकी होगी? ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ अर्थात ब्रह्माण्डीय नियम के आविष्कारक ऋषिगण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कल्याण और एकत्व के लिए कार्य करते थे, न कि एक अलग पंथ और समूह बनाने के लिए। मनुष्य का अपना एक अलग प्रकार का अंहकार होता है, उसे एक नियम बनाकर एक समूह को मोहरे की भाँति संचालित करने में उसके अंहकार को संतुष्टि प्राप्त होती है और उस अपने नियम से ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ अर्थात ब्रह्माण्डीय नियम को ही नकारने लगता है जिससे वह स्वयं भी संचालित रहता है और उसी से अन्त में वह मिटा दिया जाता है। सभी धर्म शास्त्र राजतन्त्र में आविष्कृत व्यष्टि धर्म शास्त्र हैं। लोकतन्त्र में आविष्कृत प्रथम और अन्तिम व्यष्टि सहित समष्टि धर्म शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ है।

    ”हिन्दुत्व पर व्यापक व्याख्या शुरू“ (20 वर्ष से लंबित मामला) -सुप्रीम कोर्ट, भारत

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    हिन्दुत्व पर बहस करने से कुछ नहीं प्राप्त होगा। बहस से कुछ हल नहीं निकलता, केवल मनोरंजन होता है। दूरदर्शन के अनके चैनलों पर हमेशा बहस होता है। सीधे-सीधे निम्नलिखित कुछ प्रश्न उठाकर समाज के बौद्धिक शक्ति से उत्तर माँग लिजिए। वह उत्तर ही हिन्दुत्व पर बहस का हल होगा-
    1. जिस प्रकार भारत में एक राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), एक राष्ट्रीय पक्षी (भारतीय मोर), एक राष्ट्रीय पुष्प (कमल), एक राष्ट्रीय पेड़ (भारतीय बरगद), एक राष्ट्रीय गान (जन गण मन), एक राष्ट्रीय नदी (गंगा), एक राष्ट्रीय प्रतीक (सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ का सिंह), एक राष्ट्रीय पंचांग (शक संवत पर आधारित), एक राष्ट्रीय पशु (बाघ), एक राष्ट्रीय गीत (वन्दे मातरम), एक राष्ट्रीय फल (आम), एक राष्ट्रीय खेल (हाॅकी), एक राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह, एक संविधान है उसी प्रकार एक राष्ट्रीय शास्त्र भी भारत को आवश्यकता है। जिससे नागरिक अपने व्यक्तिगत धर्म शास्त्र को मानते हुये भी राष्ट्रधर्म को भी जान सके। जो लोकतन्त्र का धर्मनिरपेक्ष-सर्वधर्मसमभाव शास्त्र भी होगा। इसके लिए संरकार व समाज प्रयत्न करें।
    2. क्या राष्ट्रपुत्र के रूप में स्वामी विवेकानन्द को मान्यता दे दी जाय?
    3. ”शिक्षा के अधिकार अधिनियम“ के बाद अब ”पूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम“ बनना चाहिए। पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम किस प्रकार बनाया जाय और उसका स्वरूप क्या होगा?
    4. देश, व्यक्ति व संस्था किस प्रकार के नागरिक का निर्माण करना चाहते हैं और उसका मानक क्या हैं? 
    5. ऐसा कौन सा सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त है जो पूर्णतया विवादमुक्त है जिससे सभी तन्त्रों को विवादमुक्त कर उसका सत्यीकरण किया जा सके?
    6. गणराज्य का सत्य रूप क्या है? जिससे हम सबसे बड़े लोकतन्त्र को पूर्णता प्रदान करते हुये विश्व को एक मानक लोकतन्त्र दे सकें?
    7. मन या मानव संसाधन का विश्व मानक निर्धारण करना आवश्यक है वह कैसे निर्मित हो?
    उपरोक्त कार्य संवैधानिक विकास व लोकतन्त्र की पूर्णता का ही कदम है।

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 29 - भारतीय शिक्षा प्रणाली
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    04. भारतीय शिक्षा प्रणाली

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    स्कूल-कालेजों के जाल से शिक्षा के व्यापार का विकास होता है न कि शिक्षा का। शिक्षा का विकास तो शिक्षा पाठ्यक्रम पर निर्भर होता है जिससे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों निर्मित होते हैं। जब तक पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम का निर्माण नहीं होता, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता लेकिन शिक्षा के व्यापार का विकास होता रहेगा।
    छात्रों की विवशता है कि उनके शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय जो पाठ्यक्रम तैयार करेगें वहीं पढ़ना है और छात्रों की यह प्रकृति भी है कि वही पढ़ना है जिसकी परीक्षा ली जाती हो। जिसकी परीक्षा न हो क्या वह पढ़ने योग्य नहीं है? बहुत बड़ा प्रश्न उठता है। तब तो समाचार पत्र, पत्रिका, उपन्यास इत्यादि जो पाठ्यक्रम के नहीं हैं उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय तो एक विशेष पाठ्यक्रम के लिए ही विशेष समय में परीक्षा लेते हैं परन्तु ये जिन्दगी तो जीवन भर परीक्षा हर समय लेती रहती है तो क्या जीवन का पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य नहीं है? परन्तु यह पाठ्यक्रम मिलेगा कहाँ? निश्चित रूप से ये पाठ्यक्रम अब से पहले उपलब्ध नहीं था लेकिन इस संघनित (Compact) होती दुनिया में ज्ञान को भी संघनित (Compact) कर पाठ्यक्रम बना दिया गया है। इस पाठ्यक्रम का नाम है - ”सत्य मानक शिक्षा“ और आप तक पहुँचाने के कार्यक्रम का नाम है - ”पुनर्निर्माण-सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way)“। यह वही पाठ्यक्रम है जोे मैकाले शिक्षा पाठ्यक्रम (वर्तमान शिक्षा) से मिलकर पूर्णता को प्राप्त होगा। इस पाठ्यक्रम का विषय वस्तु जड़ अर्थात सिद्धान्त सूत्र आधारित है न कि तनों-पत्तों अर्थात व्याख्या-कथा आधारित। जिसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- मैकेनिक जो मोटर बाईडिंग करता है यदि वह केवल इतना ही जानता हो कि कौन सा तार कहाँ जुड़ेगा जिससे मोटर कार्य करना प्रारम्भ कर दें, तो ऐसा मैकेनिक विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार नहीं कर सकता जबकि विभिन्न शक्ति के मोटर का आविष्कार केवल वही कर सकता है जो मोटर के मूल सिद्धान्त को जानता हो। ऐसी ही शिक्षा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेशदर्शिनी (Single Dimensional) होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी (Multi Dimensional) होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“
    शिक्षा क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि जीवन से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण विषय ”व्यापार“, को हम एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर सकें। इसकी कमी का अनुभव उस समय होता है जब कोई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा के उपरान्त किसी कारणवश, आगे की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता। फिर उस विद्यार्थी द्वारा पढ़े गये विज्ञान व गणित के वे कठिन सूत्र उसके जीवन में अनुपयोगी लगने लगते है। यदि वहीं वह व्यापार के ज्ञान से युक्त होता तो शायद वह जीवकोपार्जन का कोई मार्ग सुगमता से खोजने में सक्षम होता।
    आध्यात्म और विज्ञान ने मानव सभ्यता के विकास में अब कम से इतना विकास तो कर ही चुका है कि अब हमें मन के एकीकरण के लिए कार्य करना चाहिए। और उस मन पर कार्य करने का ही परिणाम है - 
    सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
    1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
    2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
    3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
    5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
    और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है। 
    जो शिक्षा का नया माॅडल है। गरीबों की समस्या सुलझानें का नैतिक दायित्व है। देश में 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोगों के लिए पुननिर्माण जैसी योजना हैं। उन्हें नौकरी और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। रचनात्मकता, समन्वय, लीडरशिप, ग्लोबल तथा प्रोफेशनल विषयों को पढ़ने तथा सूचना तकनीक के जरिए पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने से युक्त है। हमारे देश में जो अध्यापक हैं, वे शोध नहीं करते और जो शोध करते हैं वे पढ़ाते नहीं, इसलिए शिक्षार्थी को ही शोध पत्र (विश्वशास्त्र) पढ़ाया जाय क्योंकि शिक्षक पढ़ने से तो रहे क्योंकि समान्यतः धन के आने की सुनिश्चितता के बाद लोग पढ़ना छोड़ देते हैं, यही नहीं कोशिश तो यह भी रहती है कि पढ़ाना भी न पड़े और उन्हें सेवा से हटाया भी नहीं जा सकता।
    शिक्षा (वर्तमान अर्थ में) प्राप्त करने के बाद या तो शिक्षा-कौशल के अनुसार कार्य को आजीविका बनाते हैं या जो पढ़े हैं उसे ही पढ़ाओ वाले व्यापार में लग जाते हैं। अब बेरोजगारों को इस दुनिया में परिवर्तन लाने वाले राष्ट्र निर्माण के व्यापार से जोड़ना पड़ेगा। इससे उन्हें रोजगार भी मिलेगा और राष्ट्र निर्माण का श्रेय भी। वे शान से कह सकेगें - ”हम सत्य ज्ञान का व्यापार करते हैं। हम राष्ट्र निर्माण का व्यापार करते हैं। हम समाज को सहायता प्रदान करने का व्यापार करते हैं। हम, लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का व्यापार करते हैं और वहाँ करते हैं जिस क्षेत्र, जिला, मण्डल, प्रदेश व देश के निवासी हैं। जहाँ हमारे भाई-बन्धु, रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि रहते हैं।“
    स्वामी विवेकान्द जी ने कहा था - सुधारकों से मैं कहूंगा कि मैं स्वयं उनसे कहीं बढ़कर सुधारक हूँ। वे लोग इधर-उधर थोड़ा सुधार करना चाहते हैं- और मैं चाहता हूँ आमूल सुधार। हम लोगों का मतभेद है केवल सुधार की प्रणाली में। उनकी प्रणाली विनाशात्मक है और मेरी संघटनात्मक। मैं सुधार में विश्वास नहीं करता, मैं विश्वास करता हूँ स्वाभाविक उन्नति में।
    स्वाभाविक उन्नति तभी होती है जब संसाधन उपलब्ध हो। कार-मोटरसाइकिल घर में पहले से रहता है तो स्वाभाविक रूप से कम उम्र में ही घर के लोग चलाना सिख जाते हैं इसलिए सुधार का वो महान शास्त्र - ”विश्वशास्त्र“ पहले संसाधन के रूप में प्रत्येक घर में उपलब्ध हो। जो ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ निर्माण का अन्तिम शास्त्र है। फिर 25 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ लोग अपने आप आत्मनिर्भर हो जायेगें। 
    वैसे तो यह कार्य भारत सरकार को राष्ट्र की एकता, अखण्डता, विकास, साम्प्रदायिक एकता, समन्वय, नागरिकों के ज्ञान की पूर्णता इत्यादि जो कुछ भी राष्ट्रहित में हैं उसके लिए सरकार के संस्थान जैसे- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.), एन.सी.ई.आर.टी, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद्, भारतीय मानक ब्यूरो के माध्यम से ”राष्ट्रीय शिक्षा आयोग“ बनाकर पूर्ण करना चाहिए जो राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए अति आवश्यक और नागरिकों का राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निर्धारण व परिभाषित करने का मार्ग भी है। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।
    एक पूर्ण मानव निर्माण प्रक्रिया में शिक्षा पाठ्यक्रम के स्वरूप का विश्वमानक निम्नवत् है। जो किसी विशेष देश-काल-पात्र पर निर्भर नही करता अर्थात् यह प्रत्येक देशों और व्यक्तियों के लिए शिक्षा का स्वरूप है। जिससे ब्रह्माण्डीय, वैश्विक और व्यक्तिगत संतुलन, स्थिरता, एकता, प्रबन्ध, विकास, शान्ति और सुरक्षा निर्धारित होती है।
    1. प्राइमरी शिक्षा (कक्षा - 5 तक) - भाषा ज्ञान आधारित:- क्षेत्रीय, देश, विश्व और विज्ञान की भाषा का ज्ञान, सामान्य विज्ञान, सामान्य ज्ञान, चित्र कला।
    2. जूनियर हाई स्कूल (कक्षा - 6 से 8 तक) - समाज ज्ञान आधारित:- क्षेत्रीय, देश, विश्व और विज्ञान की भाषा का ज्ञान, सामान्य विज्ञान, सामान्य ज्ञान, चित्र कला का विस्तार, खेल, संगीत, कृषि, समाज विज्ञान।
    2. हाई स्कूल (कक्षा - 9 से 10 तक) - सामान्यीकृत ज्ञान आधारित:- ज्ञान-कर्मज्ञान समाहित WCM-TLM-SHYAM.C प्रणाली अर्थात शिक्षा पाठ्यक्रम का विश्व मानक, कालानुसार विज्ञान, तकनीकी, व्यापारीक व प्रबन्धकीय ज्ञान की शिक्षा।
    3. इण्टरमीडिएट (कक्षा - 11 से 12 तक) - विशेषीकृत ज्ञान आधारित :- कौशल विकास की शिक्षा।
    4. उच्च शिक्षा - इच्छानुसार विशेष क्षेत्र आधारित

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 30 - भारतीय विपणन प्रणाली - भारतीय मीडिया
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    05. भारतीय विपणन प्रणाली

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    कुल मिलाकर उपभोक्ता जो कहीं किसी और माध्यम से धन अर्जित करता है उसके उस धन को लेने के लिए किये गये सारे प्रपंच विपणन के अन्तर्गत आते हैं। यदि उपभोक्ता के पास धन नहीं तो ये सारे प्रपंच बेकार सिद्ध हो जाते हैं उसके लिए फाइनेन्स (आसान किस्तों में धन चुकाने की व्यवस्था), खरीदे और दूसरे को खरीद करायें वाली प्रणाली भी विपणन के प्रपंच में से ही है।
    विश्व में शायद किसी भी देश में सरकार द्वारा निश्चित की गई विपणन प्रणाली लागू नहीं हैं। सरकार को केवल विभिन्न प्रकार के करों (Taxes) से मतलब होता है। निर्माता अपने उत्पाद को चाहे जिस विधि/प्रणाली से बेचे। बस मल्टीलेवेल मार्केटिंग के लिए कुछ दिशा निर्देश भारत में समय-समय पर निर्धारित होते रहते हैं।
    चेस्टस्टन ने कहा था, ”ब्रह्माण्डीय दर्शन मनुष्य के अनुरूप बैठने के लिए नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड के अनुरूप बैठने के लिए रचा गया है। मनुष्य के पास ठीक उसी तरह अपना एक नीजी धर्म नहीं हो सकता, जिस तरह उसके पास एक निजी सूर्य और एक चंद्रमा नहीं हो सकता।“ अर्थात मनुष्य, मनुष्य के साथ व्यापार करने के लिए अनेक प्रकार की प्रणाली का विकास तो कर सकता है परन्तु वह एक मानक प्रणाली नहीं हो सकती। मानक प्रणाली वही हो सकती है जो ब्रह्माण्डीय दर्शन अर्थात सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त के अनुरूप होगा। वह प्रणाली कल्याणकारी- लाभकारी और सरल होगी। ब्रह्माण्ड एक व्यापार क्षेत्र अर्थात व्यापार केन्द्र है। सर्वव्यापी सार्वभौम आत्मा (ईश्वर-सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) की उपस्थिति में सर्वत्र व्यापार चल रहा है। जहाँ भी, कुछ भी आदान-प्रदान हो रहा हो, वह सब व्यापार के ही अधीन है। किसी विचार पर आधारित होकर आदान-प्रदान का नेतृत्वकर्ता व्यापारी और आदान-प्रदान में शामिल होने वाला ग्राहक होता है। प्रत्येक व्यक्ति ही व्यापारी है और वही दूसरे के लिए ग्राहक भी है। यदि व्यक्ति आपस में आदान-प्रदान कर व्यापार कर रहें हैं तो इस संसार-ब्रह्माण्ड में ईश्वर का व्यापार चल रहा है और सभी वस्तुएँ उनके उत्पाद है। उन सब वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा है जिसके व्यापारी स्वयं ईश्वर हंै। ये सनातन सिद्धान्त है। जिस प्रकार मानव नियंत्रित व्यापार का मालिक मानव (कम्पनी, फर्म इत्यादि) होता है उसी प्रकार ईश्वर नियंत्रित व्यापार का मालिक ईश्वर स्वयं हैं। दोनों ही स्थितियों के अपने-अपने नियम द्वारा व्यापार संचालित हैं।
    ईश्वर संचालित व्यापार की प्रणाली की विशेषताओं को जानने से ही एक मानक प्रणाली बन सकती है जो कल्याणकारी-लाभकारी और सरल हो। 
    ”कल्कि“ अवतार के सम्बन्ध में कहा गया है कि उसका कोई गुरू नहीं होगा, वह स्वयं से प्रकाशित स्वयंभू होगा जिसके बारे में अथर्ववेद, काण्ड 20, सूक्त 115, मंत्र 1 में कहा गया है कि ”ऋषि-वत्स, देवता इन्द्र, छन्द गायत्री। अहमिद्धि पितुष्परि मेधा मृतस्य जग्रभ। अहं सूर्य इवाजिनि।।“ अर्थात ”मैं परम पिता परमात्मा से सत्य ज्ञान की विधि को धारण करता हूँ और मैं तेजस्वी सूर्य के समान प्रकट हुआ हूँ।“ जबकि सबसे प्राचीन वंश स्वायंभुव मनु के पुत्र उत्तानपाद शाखा में ब्रह्मा के 10 मानस पुत्रों में से मन से मरीचि व पत्नी कला के पुत्र कश्यप व पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य (सूर्य) की चैथी पत्नी छाया से दो पुत्रों में से एक 8वें मनु - सांवर्णि मनु होगें जिनसे ही वर्तमान मनवन्तर 7वें वैवस्वत मनु की समाप्ति होगी। ध्यान रहे कि 8वें मनु - सांवर्णि मनु, सूर्य पुत्र हैं। अर्थात कल्कि अवतार और 8वें मनु - सांवर्णि मनु दोनों, दो नहीं बल्कि एक ही हैं और सूर्य पुत्र हैं। इसलिए सूर्य सिद्धान्त पर ही भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली का नामकरण 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) रखा गया है। अर्थात ऐसा सिद्धान्त जिसके नीचे ईंधन (Fuel) हो बीच में अग्नि (Fuel) हो फिर उसके उपर ईंधन (Fuel) हो, तो वो आग कब बुझेगी? ईंधन के कारण आग जल रहा है, आग के कारण ईंधन मिल रहा हो तो वो आग कब बुझेगी? जलने से ही ईंधन बन रहा हो तो वो आग कब बुझेगी?
    3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली, चूँकि भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली और एक सत्य मानक विपणन प्रणाली है इसलिए भारत के जो भी नेतृत्वकर्ता ये चाहते हों कि भारत को सोने की चिड़िया बनायेंगे और आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत का निर्माण करेंगे, उन्हें उत्पाद के ऐसे क्षेत्र में जो मनुष्य के लिए उपयोग करना मजबूरी हो, उस क्षेत्र के विपणन कम्पनी/संगठन को इस प्रणाली का संचालन अनिवार्य कर देना चाहिए और अन्य क्षेत्र में विपणन स्वैच्छिक रूप से चलते रहने देना चाहिए। अनिवार्य करने के क्षेत्र ये हो सकते हैं जैसे - शिक्षा क्षेत्र, दैनिक उपभोग के वस्तु क्षेत्र।
    3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली से दैनिक उपभोग के वस्तु क्षेत्र के विपणन कम्पनी के विपणन खर्च में बहुत अधिक कमी आ जायेगी, साथ ही उपभोक्ता स्वयं ही उत्पाद को खरीदने के लिए स्वयं आने लगेंगे। उन्हें उत्पाद बेचने के अनेक प्रकार के प्रपंच से मुक्ति मिल जायेगी। क्योंकि अभी तक उपभोक्ता धन लाभ कहीं और से अर्जित करता था और उत्पाद कहीं और से खरीदता था लेकिन 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली से उसे उत्पाद खरीदने से भी धन लाभ होने लगेगा। परिणामस्वरूप उपभोक्ता की क्रय शक्ति बढ़ जायेगी और यह सभी के लिए लाभदायक होगा और तब एक नया ज्ञान सूत्र जन्म लेगा ”खर्च के लिए धन नहीं, अब धन लाभ के लिए खर्च“
    3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली से शिक्षा क्षेत्र के विपणन कम्पनी और सरकार के खर्च में बहुत अधिक कमी आ जायेगी, साथ ही शिक्षार्थी स्वयं आने लगेंगे। उन्हें अनेक प्रकार के अनुदान/छात्रवृत्ति देने से मुक्ति मिल जायेगी। क्योंकि अभी तक शिक्षार्थी के अभिभावक धन लाभ कहीं और से अर्जित करते थे और मँहगी होती शिक्षा के लिए भुगतान कहीं और करते थे, लेकिन 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली से उन्हें शिक्षा से भी धन लाभ होने लगेगा। परिणामस्वरूप शिक्षा से रूचि बढ़ जायेगी और यह सभी के लिए लाभदायक होगा और तब एक नया ज्ञान सूत्र जन्म लेगा ”शिक्षा के लिए धन नहीं, अब धन लाभ के लिए शिक्षा“
    3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली के लागू किये बिना भारत को सोने की चिड़िया बनाना और आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत का निर्माण एक सपना है जो कहने से नहीं बल्कि उस प्रणाली को अपनाने से पूरा हो सकता है।
    3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) विपणन प्रणाली का विस्तृत विवरण अध्याय-4 में उपलब्ध है।

    भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

    06. भारतीय मीडिया (चैथा स्तम्भ - पत्रकारिता)

    ”अपने उद्देश्य और शक्ति के कारण मीडिया को ‘फोर्थ स्टेट’ नहीं बल्कि ‘फस्र्ट स्टेट’ का दर्जा मिलना चाहिए हालांकि कुछ वर्षों से मीडिया की भूमिका न्यूज सप्लायर की हो गयी है। मीडिया का सशक्त तंत्र, लोकतंत्र के तीनों अंगांे की आलोचना करने में समर्थ है। और उनको सही दिशा में कार्य करने पर जोर देता है। लेकिन विचार और आलोचना के लिए स्वतंत्र होने का मतलब यह नहीं है कि समाज को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं की पहले ही इच्छानुसार अभिव्यक्ति की जाय। दरअसल मीडिया की भूमिका रचनात्मक विपक्ष की तरह होनी चाहिए। जो बातें प्रशंसा के योग्य हो उन्हें अहमियत दी जाए। बुरी बात को कहने से हिचकने की जरुरत नहीं है हालांकि दुर्भाग्य से आज ऐसा नहीं हो रहा है।“ (पत्रकारिता विभाग, बी0 एच0 यू0 में बोलते हुए) -न्यायमूर्ति परशुराम वी0 सावंत, अध्यक्ष प्रेस काउंसिल आॅफ इण्डिया 
    साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 22-02-2000

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 

    ”निश्चित रुप से मीडिया अपने उद्देश्य और शक्ति के कारण फोर्थ स्टेट नहीं बल्कि फस्र्ट स्टेट है परन्तु यह किसी सर्टिफिकेट द्वारा प्राप्त नहीं होता। यह स्वयं मीडिया अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए शक्ति का प्रदर्शन कर प्राप्त कर सकती है। मीडिया लोकतन्त्र के तीनों अंगों को शक्ति तो अवश्य प्रदान करता है किन्तु वर्तमान में यह तीनों अंगों की गुलाम ही है। मीडिया का वास्तविक स्वरुप लोकतन्त्र में लोक की भूमिका है और जहाँ भी लोक प्रतिनिधित्व करता विचार व्यक्त हो रहा हो वहाँ शीघ्रता शीघ्र सक्रिय हो जाना चाहिए। लोकतन्त्र के तीनों अंगों की अस्वस्थता को तो मीडिया व्यक्त कर देती है परन्तु मीडिया की अस्वस्थता को कौन व्यक्त करेगा? मीडिया की अस्वस्थता को वहीं व्यक्त कर सकता है जो लोक या जन या गण का वास्तविक रुप हो जिसके बिना लोकतन्त्र, लोकतन्त्र न हो। भारत, भारत न हो। विश्व, विश्व न हो। और उस पर भी मीडिया निष्क्रिय रहे। ‘स्वामी विवेकानन्द का पुनर्जन्म’, ‘कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद का आविष्कार’, ‘विश्वमानक - शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक का आविष्कार’, ‘विश्व राजनीतिक पार्टी संघ का प्रारूप’, ‘विश्वशास्त्र-साहित्य की रचना’, ‘विश्व- राष्ट्रीय-जन-ऐजेण्डा-साहित्य-2012+ का प्रस्तुतीकरण’, ‘ईश्वर का अन्तिम अवतरण’ इत्यादि विषय मीडिया के लिए समाचार और लोकतन्त्र के स्वस्थता के निर्माण में उसकी सशक्त भागीदारी ही तो है। परन्तु क्या मीडिया अपना धर्म निभा पायेगी? 21 वीं सदी और भविष्य की मीडिया तो सार्वभौम सत्य-सैद्धान्तिक रचनात्मक आधारित मीडिया होगी। बिना इसको प्राप्त किये मीडिया फस्र्ट स्टेट क्या फोर्थ स्टेट के भी योग्य नहीं।“

     

  • क्लिक करें=>सत्य एकीकरण भाग - 31 - भारतीय मीडिया
  • भारत के स्वतन्त्रता (सन् 1947 ई0) के बाद जन्में वर्तमान

     06. भारतीय मीडिया (चैथा स्तम्भ - पत्रकारिता)

    ”अक्सर मीडिया जनविरोधी भूमिका अदा कर रहा है इसकी तीन नजीरें देता हूँ। पहली, यह अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटा देती है, जो कि आर्थिक है। लोग बेरोजगारी, मँहगाई और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ये लोग इस समस्यओं से ध्यान हटाकर फिल्मी सितारों, फैशन परेड और क्रिकेट का मुजाहिरा करते हैं। लगता है जैसे लोगों की यहीं समसस्याएँ हैं। मीडिया में आम कार्यशैली काफी निम्न है और मीडिया के ज्यादातर लोगों के बारे में मेरी खराब राय है। मैं नहीं समझता कि उन्हें आर्थिक सिद्धान्तों, राजनीतिशास्त्र, साहित्य या दर्शन के बारे में काफी कुछ जानकारी होगी। मैं नहीं समझता कि उन्होंने इन सबका अध्ययन किया होगा। मुझे यह कहने में अफसोस है कि मीडिया के ज्यादातर लोगों के विवेक का स्तर काफी निम्न है।“ (एक टी.वी चैनल के इण्टरव्यू में) - मार्कंडेय काटजू, (सेवा निवृत्त न्यायाधीश) अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद्

    श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण

    बिल्कुल सत्य कहा आपने। जिसे हम लोग वर्तमान में मीडिया कहते हैं और लोकतन्त्र का सबसे सशक्त माध्यम समझते हैं वह एक घटना और सूचना का व्यापारिक संगठन है। इसकी शक्ति है पढ़ने, सुनने और देखने वाले लोग, और उसके आधार पर मिलने वाले विज्ञापन की राशि। ये हुआ सफेद रूप में। काले रूप में कौन सा समाचार प्रसारित करें और कौन सा दबा दें, इसके लिए मिलने वाली गुप्त धन। जिसके लिए सफेदपोश ब्लैक मेलिंग व्यवसाय कहना उचित होगा। मीडिया एक प्लेटफार्म है जहाँ या तो रिक्त कागज है या रिक्त प्रसारण समय। इसमें कुछ छापना है या कुछ दिखाना है। ये विवशता है। तो भारत के मनोरंजन प्रधान समाज के व्यक्ति के लिए मनोरंजन की प्राथमिकता है। शेष बचा विज्ञापन, इससे धन प्राप्त होता है इसलिए ये तो आवश्यक ही है। उसके बाद आता है ऐसी घटनाएँ जो कानून के दायरे में आ चुकी है अर्थात पुलिस-प्रशासन तक पहुँच चुकी है जिससे कथानक प्रमाणिकता के साथ वहीं जो वहाँ लिखित है। हकीकत चाहे जो भी हो। उसके बाद प्रिंट मीडिया के लिए उनके क्षेत्र में हुये कुछ कार्यक्रम का समाचार। जितने बड़े लोगों का कार्यक्रम उतना स्थान। शेष कुछ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समाचार। संपादकीय विचार और कुछ वैचारिक लेख। इलेक्ट्रानिक मीडिया में किसी &